10.ज्ञान मार्गणा

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7. ज्ञान मार्गणा ज्ञान किसे कहते हैं? जो जानता है वह ज्ञान है । जिसके द्वारा जाना' जाता है वह ज्ञान है, जानना मात्र ज्ञान है । जिसके द्वारा जीव त्रिकाल विषयक भूत- भविष्यत् वर्तमान काल सम्बन्धी समस्त द्रव्य और उनके गुण तथा उनकी अनेक प्रकार की पर्यायों को जाने उसको ज्ञान कहते है । (गो. जी. 299) ज्ञान कितने प्रकार का होता है? ज्ञान दो प्रकार का होता है - ( 1) सम्यग्ज्ञान ( 2) मिथ्याज्ञान ( 1) ज्ञान ( 2) अज्ञान ( 1) ज्ञान ( 2) कुज्ञान ( 1) प्रत्यक्षज्ञान ( 2) परोक्ष ज्ञान सम्यग्ज्ञान किसे कहते हैं? जिस-जिस प्रकार से जीवादि पदार्थ अवस्थित हैं उस-उस प्रकार से उनको जानना सम्यग्ज्ञान है । (सर्वा.) नय और प्रमाण के विकल्प पूर्वक जीवादि पदार्थों का यथार्थ ज्ञान सम्यग्ज्ञान हे । (रा. वा.) जो ज्ञान वस्तु के स्वरूप को न्यूनता रहित तथा अधिकता रहित, विपरीतता रहित, जैसा का तैसा, सन्देह रहित जानता है उसको आगम के ज्ञाता पुरुष सम्यग्ज्ञान कहते ?? अन्‌नमनतिरिक्त याथातर्थ्य विना च विपरीतात् । निःसंदेहं वेदयदाहुस्तज्जानमागमिन: २, क. आ. 42) । । मिथ्याज्ञान? कुज्ञान? अज्ञान किसे कहते हैं? जो वस्तु के स्वभाव को नहीं पहचानता है अथवा उल्टा पहिचानता है या निरपेक्ष पहिचानता है वह मिथ्याज्ञान है । (नच-वृ. 238) प्रत्यक्षज्ञान किसे कहते हैं? इन्द्रिय आदि की सहायता के बिना सिर्फ आत्मा से होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्षज्ञान कहते हैं विशदं प्रत्यक्षं' ' विशदज्ञान को प्रत्यक्ष कहते हें (प. मु. 2 ' 3) कौन-कौन से ज्ञान प्रत्यक्ष हैं? प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार के हैं - ( 1) देशप्रत्यक्ष - अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान तथा विभंगावधि ( 2) सकलप्रत्यक्ष - केवलज्ञान ( वृद्ध- सं. 5)


तालिका संख्या

स्थान गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय ज्ञान सयम दर्शन लेश्या भव्यत्व सम्बक्ल संज्ञी आहार गुणस्थान

पर्याप्ति प्राण सज्ञा उपयोग ध्यान आसव जाति


कुमति कुश्रुत ज्ञान

1. प्रश्न : मति अज्ञान (कुमति

विवरण नतिमदे. ए-द्वीत्रीचतुप.

5 स्थावर 1 त्रस यम. व. का. सीपुनपुं. 16 कषा. 9 नोक. स्वकीय असयम चक्षुअच. कृनीकापीपशु. भव्य, अभव्य सासादन, मिथ्यात्व सैनी, असैनी आहारक, अनाहारक प्रथम, द्वितीय 14 स्थावर '5 त्रस आशइश्वाभाम. ५.. ब. श्वाआ. आभमैपरि. 1 ज्ञानों. 2 दर्शनो. वैआ. बरही.

मि. अवि.25क. 1 यो चारों गति सम्बन्धी चारों गति सम्बन्धी

ज्ञान) किसे कहते है?

विशेष

आहारकद्विक नहीं है ।

कुमति ज्ञान में कुमतिशान

अवधि तथा केवलदर्शन नहीं है

धर्म तथा शुक्ल ध्यान नहीं होते हैं ।

उत्तर : परोपदेश के बिना जो विष, यंत्र, कूट, पंजर तथा बन्ध आदि के विषय में बुद्धि प्रवृत्त होती है उसको ज्ञानी जीव मत्यज्ञान कहते हैं । (गोजी. 303)


जिसको खाने से जीव मर जाये, उस द्रव्य को विष कहते हैं । भीतर पैर रखते ही जिसके किवाड़ बन्द हो जायें और जिसके भीतर बकरी आदि को बाँध कर पकड़ा जाता है उसको यत्र कहते हैं । जिससे चूहे आदि पकड़े जाते हैं उसे कूट कहते हैं । रस्सी में गाँठ लगाकर जो जाल बनाया जाता है, उसे पंजर कहते हैं । हाथी आदि को पकड़ने के लिए जो गड्‌ढे आदि बनाये जाते हैं, उनको बन्ध कहते हैं । (गो. जी. 3०3)

कुश्रुत ज्ञान किसे कहते हैं? चौर शास्त्र तथा हिंसा शास्त्र आदि के परमार्थ शून्य अतएव अनादरणीय उपदेशों को कुश्रुतज्ञान कहते हैं । आदि शब्द से हिंसादि पाप कर्मों के विधायक तथा असमीचीन तत्व के प्रतिपादक ग्रन्थों को कुश्रुत और उनके ज्ञान को कुश्रुतज्ञान समझना चाहिए । (गो. जी. 3०4) कुमति आदि ज्ञानों को अज्ञान क्यों कहा है? मति, सुत और अवधिज्ञान, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी का उदय होने पर अज्ञान हो जाते हैं । (गो. जी. 3०1) तत्वार्थ में रुचि, निश्चय, श्रद्धा और चारित्र का धारण करना ज्ञान का कार्य है, यह कार्य मिथ्यादृष्टि जीव में नहीं पाया जाता है, इसलिए उसके ज्ञान को अज्ञान कहा है । रुचि - इच्छा प्रकट करना । निश्चय - स्वरूप का निर्णय करना । श्रद्धा - निर्णय से चलायमान न होना । क्या कोई ऐसा कुश्रुतज्ञानी है जिसके चसुदर्शन नहीं होता है? ही, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय जीवों के ल्श्तज्ञान होता है लेकिन चखुदर्शन नहीं होता है । यद्यपि तेरहवें, चौदहवें गुणस्थान में भी चखुदर्शन नहीं होता है परन्तु उनके कुश्रुतज्ञान नहीं होता है । कुश्रुतलानी त्रम जीवों के कितने प्राण होते हैं? कुश्रुतशानी त्रस जीवों के कम से कम चार प्राण होते हैं । 2 इन्द्रिय, 1 बल, 1 आयु ये चार प्राण द्वीन्द्रिय जीवों की निर्वृत्यपर्याप्तक अथवा लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था में होते

ज्ञान मार्गणा. 185 हैं । तथा अधिक-से-अधिक 1० प्राण होते हैं - 5 इन्द्रिय, 3 बल, श्वासो, आयु ये दस प्राण सैनी पंचेन्द्रिय जीवों के होते हैं । कुमतिज्ञानी पुरुषवेदी के कितनी पर्याप्तियों होती हैं? कुमतिज्ञानी पुरुषवेदी के कम-से-कम 5 पर्याप्तियाँ होती हैं - आ., श., इ., श्वासो. तथा भाषा । ये पाँच पर्याप्तियाँ असैनी पंचेन्द्रिय (गर्भज) के होती हैं तथा अधिक से अधिक 6 पर्याप्तियाँ होती हैं । 6 पर्याप्तियाँ सैनी पंचेन्द्रिय जीवों के होती हैं । क्या कुमतिज्ञानी मुनि के भी अविरति सम्बन्धी आसव के प्रत्यय होते है? ही, कुमतिशानी मुनि के भी अविरति सम्बन्धी आसव के प्रत्यय होते ही हैं क्योंकि बाह्य में अहिंसा आदि का पालन करने से अविरति सम्बन्धी आसव नहीं रुकता है । अविरति सम्बन्धी आसव को रोकने के लिए तीन चौकड़ी कषाय के उदय का अभाव होना आवश्यक है । त्रस सम्बन्धी अविरति से बचने के लिए भी दो चौकड़ी कषाय का उदयाभाव होना ही चाहिए । कुमतिज्ञानी मुनि के दोनों ही अविरतियों का अभाव नहीं होता इसलिए अविरति सम्बन्धी आस्रवों का भी अभाव नहीं हो सकता है । कुमतिज्ञानी जीव के 24 स्थानों में से किस- किस स्थान के सभी भेद हो सकते हैं? कुमतिज्ञानी जीवों के 24 स्थानों में से 15 स्थानों के सभी भेद हो सकते हैं - ( 1) गति (2) इन्द्रिय ( 3) काय ( 4) वेद ( 5) कषाय (6) लेश्या (7) भव्य ( 8) संज्ञी (9) आहारक ( 1०) जीवसमास ( 11) पर्याप्ति ( 12) प्राण ( 13) संज्ञा ( 14) जाति ( 15) कुल ।


तालिका संख्या 33

स्थान गति इन्द्रिय काय योग

वेद कषाय ज्ञान ' सयम दर्शन लेश्या भव्यत्व सम्बक्ल संज्ञी आहार ' गुणस्थान जीवसमास पर्याप्ति प्राण संज्ञा उपयोग ध्यान आसव

1. प्रश्न : उत्तर :


2 -ला 1

कुअवधि ज्ञान

नतिमदे. पंचेन्द्रिय त्रस म. व. 2 का

सी. पु. नई. 16 क. 9 नोकवाय स्वकीय असंयम चक्षु. अचक्षु. कृ. नी. का. पी. प. शु. भव्य, अभव्य . सासादन, मिथ्यात्व सैनी आहारक मिथ्यात्व, सासादन सैनी पंचानय आ. श. इ. श्व!. भा. म. 5 इन्द्रिय 3 ब. श्वा. आयु. आ. भ. मै. पीर. 1 ज्ञानो. 2 दर्शनो. 4 आ. 4 री.

मि. अवि. क. 1 ०यो पंचेन्द्रिय सम्बन्धी

1 ०ट्ट -लाक. पंचेन्द्रिय सम्बन्धी

विशेष

औदारिक व वैक्रियिक काय योग होता है ।

कुअवधिज्ञान

असैनी जीव नहीं है

कुअवधिज्ञान किसे कहते हैं? मिथ्यादृष्टि जीव के अवधि ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न हुआ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा को लिये हुए रूपी द्रव्य को विषय करने वाला किन्तु देव-शास्र और


ज्ञान मार्गणा. 187 पदार्थों में विपरीत रूप से ग्रहण करने वाला अवधिज्ञान केवलज्ञानियों के द्वारा प्रतिपादित आगम में विभंग कहा जाता है । ' वि' अर्थात् विशिष्ट अवधिज्ञान का शो अर्थात् विपर्यय विभंग है, यह निरुक्ति सिद्ध अर्थ भी है । (गो. जी. जी. 3०5) अवधिज्ञानावरण तथा वीर्यान्तराय कर्मों के क्षयोपशम से द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादायुक्त मिथ्यादृष्टि जीवों के ज्ञान को विभंगावधि ज्ञान कहते हैं । यही कुअवधिज्ञान है । अवधिज्ञान उल्टा क्यों होता है? अवधिज्ञान विभंग या उल्टा इसलिए होता है कि इसके द्वारा जाना गया रूपी पदार्थों का स्वरूप सच्चे देव, गुरु और आगम के विपरीत होता है । तीव्र कायक्लेश के निमित्त से उत्पन्न होने से तिर्यब्ज और मनुष्यों में गुणप्रत्यय व देवनारकियों में भवप्रत्यय होता है । जीव को पहले विभंगावधि ज्ञान होता है या अवधिज्ञान? यदि सम्यग्दृष्टि को अवधिज्ञान उत्पन्न होता है तो पहले अवधिज्ञान होता है और यदि उसके मिथ्यात्व का उदय आ जावे तो वही अवधिज्ञान विभंगावधि में परिवर्तित हो जाता है । यदि मिथ्यादृष्टि को अवधिज्ञान उत्पन्न होता है तो विभंगावधि ज्ञान उत्पन्न होता है, उसको यदि सम्यग्दर्शन प्राप्त हो जावे तो वही विभंगावधि अवधिज्ञान में बदल जाता है । विभगज्ञानियों के सम्बक्ल आदि के फलस्वरूप अवधिज्ञान के उत्पन्न होने पर गिरगिट आदि अशुभ आकार मिट कर नाभि के ऊपर शख आदि शुभ आकार हो जाते हैं ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । इसी प्रकार अवधिज्ञान से लौट कर प्राप्त हुए विभगज्ञानियों के भी शुभ सस्थान मिट कर अशुभ संस्थान हो जाते हैं, ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । (ध. 137 मे 98) मिथ्यादृष्टि के दोनों (कुमति- कुश्रुत) भले ही अज्ञान होवें, क्योंकि वहाँ मिथ्यात्व का उदय पाया जाता है लेकिन सासादन गुणस्थान में मिथ्यात्व का उदय नहीं है इसलिए वहाँ ये अज्ञान नहीं होने चाहिए? नहीं, क्योंकि विपरीताभिनिवेश को मिथ्यात्व कहते हैं और वह मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी इन दोनों के निमित्त से उत्पन्न होता है । सासादन गुणस्थान में वह पाया ही जाता है इसलिए सासादन गुणस्थान में भी वे दोनों अज्ञान सम्भव हैं । (इसी प्रकार विभंगावधि को भी जानना चाहिए) मिथ्यात्व का उदय नहीं होने पर भी अनन्तानुबन्धी कषाय का उदय होने से तीनों ज्ञान अज्ञान रूप ही होते हैं । (रा. वा. 971) विपरीताभिनिवेश (विपर्यय) किसे कहते हैं? विपर्यय शब्द का अर्थ मिथ्या है । वह विपर्यय तीन प्रकार का है - चउबीस ठाणा -मैं? 188

( 1) संशय (2) विपर्यय ( 3) अनव्यवसाय । संशय - विपरीत अनेक पक्षों के अवगाहन करने वाले ज्ञान को संशय कहते हैं, जैसे- स्थाणु है या पुरुष । विपर्यय - विपरीत एक पक्ष का निश्चय करने वाला ज्ञान विपर्यय है जैसे-सीप में यह चाँदी है । इस प्रकार का ज्ञान होना । अनष्यवसाय - यह क्या है' ' इस प्रकार जो आलोचन मात्र होता है उसको अनध्यवसाय कहते हैं । (न्यादी. 1 ' 9) कुअवधिज्ञान में कौन-कौन से योग नहीं होते हैं? कुअवधिज्ञान में 5 योग नहीं होते हैं - औदारिक मिश्र, बैक्रियिक मिश्र, आहारकद्विक तथा कार्मण काययोग । अनाहारक अवस्था में कुअवधिज्ञान क्यों नहीं होता है? कुअवधिज्ञान पर्याप्तकों के ही होता है, अपर्याप्तकों के नहीं होता है । ४. ' 363) असंज्ञी और अपर्याप्तकों के यह सामर्थ्य नहीं है । (सर्वा. 1? 22) इसलिए अनाहारक अवस्था में कुअवधिज्ञान नहीं होता है । क्या विभंगावधि ज्ञान में भी छहों लेश्याएँ होती हैं? ही, विभंगावधि ज्ञानी के भी छहों लेश्याएँ होती हैं - . नारकियों की अपेक्षा - तीन अशुभ लेश्याएँ । . देवों की अपेक्षा - तीन शुभ लेश्याएँ । . भोगभूमिया जीवों की अपेक्षा - तीन शुभ लेश्याएँ । . कर्मभूमिया मनुष्य तिर्यंच की अपेक्षा - छहों लेश्याएँ । कुअवधिज्ञानी जीव के 24 स्थानों में से किस- किस स्थान के सभी भेद नहीं हो सकते हैं? कुअवधिज्ञानी जीव के 24 स्थानों में से 16 स्थान के सभी भेद नहीं पाये जाते हैं - ( 1) इन्द्रिय (2) काय ( 3) योग (4) ज्ञान (5) संयम (6) दर्शन (7) सभ्यक्ल (8) संज्ञी (9) आहारक ( 1०) गुणस्थान ( 11) जीवसमास ( 12) उपयोग ( 13) ध्यान ( 14) आसव के प्रत्यय ( 15) जाति ( 16) कुल । ९ज्ञान मार्गणा? 189

तालका सख्या 34

स्थान गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय ज्ञान सयम दर्शन लेश्या भव्यत्व सम्बक्ल

संज्ञी आहार गुणस्थान जीवसमास पर्याप्ति प्राण संज्ञा उपयोग ध्यान


मति सुत अवधिज्ञान विशेष नतिमदे. पंचेन्द्रिय एकेन्द्रिय आदि चार इन्द्रिय नहीं हैं। त्रस 4 म. 4 व. 7 का. सीपुनपु. 12 क. 9 नोक. ? स्वकीय मतिज्ञान में मतिज्ञान......... साछेपसूयसंयअस. चअचअव. केवलदर्शन नहीं है कृनीकापीपशु. भव्य क्षाक्षयोउप. मिथ्यात्व, सासादन और सभ्यग्मिथ्यात्व नहीं हैं। सैनी आहारक, अनाहारक चौथे से बारहवें तक सैनी पंचेन्द्रिय आशइश्वाभाम. 5 इन्द्रिय, 3 बल. श्वाआ. आभमैप. . 1 ज्ञानो. 3 दर्शनो. आ. बर., ४४. .शुक्ल ख्तक्रियाप्रतिपाती तथा स्युपरतक्रिया निवृत्ति ध्यान नहीं हैं।

48 १२३. 2 क. 1 यो

जाति 26 लाख पंचेन्द्रिय सम्बन्धी कुल 1०8 - ला.क. पंचेन्द्रिय सम्बन्धी


मातेंज्ञान किसे कहते हैं?
इन्द्रिय और मन के निमित्त से शब्द, रस, स्पर्श, रूप और गन्ध आदि विषयों में अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा रूप ज्ञान होता है वह मतिज्ञान है । ( ज. ध. 1 ?? 42)

मतिज्ञानावरण एव वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से तथा बहिरंग पाँच इन्द्रिय और मन की सहायता से मूर्त-अमूर्त वस्तुओं का जो एकदेश से, विकल्पाकार परोक्ष रूप से अथवा सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष ज्ञान होता है वह मतिज्ञान है । ३- द्रसै. टी. 5) मतिज्ञान कितने प्रकार का होता है? मतिज्ञान 4 प्रकार का होता है - अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा । अथवा मतिज्ञान 336 प्रकार का होता है - अवग्रह के 12० ( 72 अर्थावग्रह. 48 व्यञ्जनावग्रह) ईहा 72, अवाय 72, धारणा 72 यानी 12०. 72. 72. 72८336 । अवग्रह - पाँच इन्द्रिय तथा मन की सहायता से दर्शन के पश्चात् जो सामान्य अवलोकन होता है, वह अवग्रह है । ईहा - अवग्रह से जाने हुए पदार्थ में विशेष जानने की इच्छा को ईहा कहते हैं । अवाय - पदार्थों का निर्णय करना अवाय है । धारणा - निर्णीत पदार्थ को भविष्य में नहीं भूलना धारणा है । लि. सू 1? 15 - 19) नोट - विशेष तत्वार्थफ्ट की टीकाओं में देखें । श्रुतज्ञान किसे कहते हैं? जो परोक्ष रूप से सम्पूर्ण वस्तुओं को अनेकान्त रूप दर्शाता है, सशय, विपर्यय आदि से रहित है, उस ज्ञान को श्रुतज्ञान कहते हैं । (का. अ. 262) श्रुतशानावरण कर्म के क्षयोपशम से नोइन्द्रिय के अवलम्बन से तथा प्रकाश, उपाध्याय आदि बहिरंग सहकारी कारण से जो मूर्त्तिक-अमूर्त्तिक वस्तु को, लोक तथा अलोक को व्याप्ति ज्ञान रूप से अस्पष्ट जानता है, उसको श्रुतज्ञान कहते हैं । ३- द्रर्स. टी. 5) श्रुतज्ञान कितने प्रकार का होता है? श्रुतज्ञान दो प्रकार का होता है- 1. अंगबाह्य 2. अंगप्रविष्ट । अंगबाह्य श्रुतज्ञान अनेक प्रकार का है तथा अंगप्रविष्ट आचारोग आदि के भेद से 12 प्रकार का होता है । (त. सु 1 ' 2०)

ज्ञान मलण'. 191 ३

5. प्रश्न

अवधिज्ञान किसे कहते हैं? अवधिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से जो मूर्त पदार्थों को एकदेशप्रत्यक्ष जानता है वह अवधिज्ञान है । २- द्रसै. टी. 5) जो प्रत्यक्ष ज्ञान अन्तिम स्कन्ध पर्यन्त परमाणु आदि पूर्घ द्रव्यों को जानता है उसको अवधिज्ञान जानना चाहिए । (ति. प. 4 ' 981) द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके विकल्प से अनेक प्रकार के पुद्‌गल द्रव्य को जो प्रत्यक्ष जानता है, उसे अवधिज्ञान कहते हैं । (य. 17 93) अवधिज्ञान कितने प्रकार का होता है? अवधिज्ञान दो प्रकार का है - ( 1) भवप्रत्यय अवधिज्ञान ( 2) गुणप्रत्यय 7 क्षयोपशम निमित्तक अवधिज्ञान । अथवा अवधिज्ञान के तीन भेद हैं - ( 1) देशावधि ( 2) परमावधि ( 3) सर्वावधि भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव-नारकियों के होता है । गुणप्रत्यय अवधिज्ञान मनुष्य - तिर्यच्चों के होता है । गुणप्रत्यय अवधिज्ञान के छह भेद हैं - ( 1) अनुगामी (2) अननुगामी (3) वर्धमान ( 4) हीयमान ( 5) अवस्थित (6) अनवस्थित । त्, भू 1? 21 - 22) मतिश्रुत ज्ञान में योगमार्गणा किस प्रकार लगानी चाहिए? मतिश्रुत ज्ञान में योगमार्गणा : मति सुत ज्ञानियों के सामान्य से पन्द्रह योग होते हैं । चतुर्थ गुणस्थानवतीं मतिभुतज्ञानी के 13 योग होते हैं । पचम गुणस्थानवर्ती मतिश्रुतज्ञानी के 9 योग होते हैं । छठे गुणस्थानवर्ती मतिश्रुतज्ञानी के 11 योग होते हैं और सातवें गुणस्थान से बारहवें गुणस्थानवर्ती मतिसुतज्ञानी के 9 योग होते हैं । क्या सभी त्रम जीवों के मति आदि ज्ञान होते हैं? नहीं, केवल संज्ञी पंचेन्द्रिय सम्यग्दृष्टि त्रस जीवों के ही मति सुतादि ज्ञान होते है अन्य द्वीन्द्रिय आदि त्रस जीवों के नहीं, क्योंकि उनको सम्यग्दर्शन नहीं हो सकता है । विशिष्ट सम्बक्ल ही अवधिज्ञान की उत्पत्ति का कारण है । इसलिए सभी सम्यग्दृष्टि तिर्यब्ज और मनुष्यों में अवधिज्ञान नहीं होता है । ७. सत् प्र. 12० लू) मति- भुत ज्ञानी जीवों के सामायिक संयम कहाँ-कहाँ नहीं पाया जाता है? मति- सुत ज्ञानी जीवों के 5 गुणस्थानों में सामायिक सयम नहीं पाया जाता है - चौथा, पाँचवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं ।


13. प्रश्न उत्तर

क्या ऐसे कोई मति- भुत ज्ञानी हैं जिनके कापोत लेश्या ही पाई जाती है? ही, ऐसे मति- सुत ज्ञानी जीव भी हैं जिनके कापोत लेश्या ही पाई जाती है - ( 1) प्रथम एवं दूसरे नरक के मति- सुलतानी नारकियों के तथा तीसरे नरक में जहाँ तक कापोत लेश्या पाई जाती है । (2) तीसरे नरक में स्थित तीर्थंकर प्रकृति वाले मति-भूत ज्ञानी जीवों के । (3) मतिश्रुत ज्ञानी (कृतकृत्यवेदक तथा क्षायिक सम्यग्दृष्टि) मनुष्य जब भोगभूमि में जाते हैं तब उनकी निर्वृत्यपर्यासक अवस्था में । क्या ऐसे कोई अवधिज्ञानी जीव हैं जिनके कृष्ण लेश्या भी पाई जाती है? ही, ऐसे अवधिज्ञानी जीव भी हैं जिनके कृष्ण लेश्या भी पाई जाती है - ( 1) पाँचवें नरक के अवधिज्ञानी जीव । (2) कर्म-भूमिया तिर्यज्व-मनुष्य । (3) जो आचार्य छठे गुणस्थान तक छहों लेश्याएँ मानते हैं उनकी अपेक्षा चौथे, पाँचवें गुणस्थानवर्ती अवधिज्ञानी तिर्यब्ज-मनुष्य तथा छठे गुणस्थानवर्ती अवधिज्ञानी मनुष्यों के भी कृष्ण लेश्या हो सकती है । अवधिज्ञानी जीवों के कौन- कौन सा सम्य? कहाँ- कहाँ पाया जाता है? अवधिज्ञानी जीवों के - 1. क्षायिक सम्बक्ल - चौथे से बारहवें तक 2. क्षायोपशमिक सम्बक्ल - चौथे से सातवें तक 3. उपशम सम्बक्ल - चौथे गुणस्थान से 11 वें तक । सम्बक्ल - मार्गणा के शेष मिथ्यात्वादि भेद अवधिज्ञानी जीवों के नहीं होते हैं । क्या कोई ऐसे अवधिज्ञानी जीव हैं जिनके अनाहारक अवस्था नहीं होती? ही, ऐसे अवधिज्ञानी जीव भी हैं जिनके अनाहारक अवस्था नहीं होती है - ( 1) तद्‌भव मोक्षगामी जीवों के । (2) सर्वावधि ज्ञानी एश्वं परमावधि ज्ञानी मुनिराज के । ( 3) क्षपक श्रेणी में स्थित अवधिज्ञानी जीवों के । (4) प्रथमोपशम सम्बक्च वाले अवधिज्ञानी जीवों के । नोट - यद्यपि तद्‌भव मोक्षगामी जीवों के अनाहारक अवस्था होती है लेकिन अवधिज्ञान के साथ नहीं होती, केवलज्ञान के साथ होती है ।

ज्ञान मार्गणा? 193 ं

.प्रश्न उत्तर

15. प्रश्न उत्तर

16. प्रश्न

क्या मति- धुत ज्ञानी जीवों के परिग्रह संज्ञा का भी अभाव हो सकता है? ही, मति-मृत ज्ञानी जीव भी जब दसवें गुणस्थान को पार करके ग्यारहवें, बारहवें गुणस्थान में पहुँच जाता है, तब उसके परिग्रह सज्ञा का भी अभाव हो जाता है । मति- भुत ज्ञानी जीव के कौन-कौन सी जातियाँ नहीं होती हैं - मति सुतज्ञानी जीव के अट्ठावन लाख जातियाँ नहीं होती हैं - नित्य निगोद की 7 लाख वायुकायिक की 7 लाख इतर निगोद की 7 लाख वनस्पतिकायिक की 1० लाख पृथ्वीकायिक की 7 लाख द्वीन्द्रिय की 2 लाख जलकायिक की 7 लाख त्रीन्द्रिय की 2 लाख अग्रिकायिक की 7 लाख चतुरिन्द्रिय की 2 लाख ८58 लाख विभंगावधि ज्ञान के समान निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में अवधिज्ञान का निषेध क्यों नहीं किया है? नहीं, क्योंकि उत्पत्ति की अपेक्षा तो अपर्याप्तावस्था में अवधिज्ञान का भी विभंगज्ञान के समान ही निषेध देखा जाता है । सम्यग्दृष्टियों के उत्पन्न होते ही प्रथम समय से ही अवधिज्ञान होता है, ऐसा नहीं है; क्योंकि ऐसा मानने पर विभंगज्ञान के भी उसी प्रकार की उत्पत्ति का प्रसंग आता है; पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि देव और नारकियों के अपर्याप्तावस्था में अवधिज्ञान का अत्यन्त अभाव है; क्योंकि तिर्यव्यों और मनुष्यों में सम्बक्ल गुण के निमित्त से उत्पन्न हुआ अवधिज्ञान देवों और नारकियों के अपर्याप्त अवस्था में भी पाया जाता है । विभंगज्ञान में भी यह क्रम लागू हो जायेगा, यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अवधिज्ञान के कारणभूत अनुकम्पा आदि का अभाव होने से अपर्याप्त अवस्था में वहाँ उसका अवस्थान नहीं रहता है । ( ध. 13 ' 291)

---इ-?ँ?;?

चउबीस ठाणा? 194

तालिका संख्या 35

स्थान गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय ज्ञान सयम दर्शन लेश्या भव्य सम्बक्म

सज्ञी आहार गुणस्थान जीवसमास पर्याप्ति प्राण सज्ञा उपयोग ध्यान आसव


जाति 14 ला. ल 14 लाक

मनःपर्यय ज्ञान ? विशेष मनुष्यगति । पंचेन्द्रिय त्रस म. व. -का. औदारिक काययोग है। पुरुष वेद 4 कषाय 7 नोक. स्वकीय मन: पर्ययज्ञान स[छेसूय. परिहारविशुद्धिसंयमा. तथाअसंयमनहींहैं। चअचअव. पीपशु. भव्य क्षाक्षायोउप. द्वितीयोपशम सम्य. की अपेक्षा उपशम सम्य. होता है । सैनी आहारक अनाहारक नहीं है छठे से बारहवें तक सैनी पंचेन्द्रिय आ.श,इ.श्ंवा.भा.म. 5 इन्द्रिय 3 बलश्वाभा. आभपैपरि. 1 ज्ञानो. 3 दर्श. मनःपर्ययज्ञानोपयोग है। 3 आ. 4 ध. 2 शुका. निदान आर्त्तध्यान नहीं है । 11 क. प्रयोग मनुष्यगति सम्बन्धी लच७ सम्बन्धी

1. प्रश्न : मन: पर्ययज्ञान किसे कहते हैं? उत्तर : मनःपर्यय ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से दूसरों के मनोगत पदार्थ को एकदेश प्रत्यक्ष जानता है वह मनःपर्यय ज्ञान है । (रा. वा. 4)

ज्ञान मलण'. 195 ३


3. प्रश्न उत्तर

4. प्रश्न उत्तर

चिन्ता, अचिन्ता और अर्धचिन्ता के विषयभूत अनेक भेदरूप पदार्थ को जो ज्ञान नरलोक के भीतर जानता है, वह मनःपर्यय ज्ञान है । (ति. प. 4? 973) मन: पर्यय ज्ञान कितने प्रकार का होता है? मनःपर्यय ज्ञान दो प्रकार का होता है - ( 1) ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञान (2) विपुलमति मनःपर्यय ज्ञान ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान : ऋजु का अर्थ निर्वर्तित (निष्पन्न) और प्रगुण (सीधा) है । दूसरे के मन को प्राप्त वचन, काय और मनस्कृत अर्थ के विज्ञान से निर्वर्तित या ऋजु जिसकी मति है वह ऋजुमति कहलाता है । (सर्वा. 1723) विपुलमति मनःपर्ययज्ञान : अपने और पर के व्यक्त मन से या अव्यक्त मनसे चिन्तित या अचिन्तित (या अर्धचिन्तित) सभी प्रकार के चिन्ता, जीवन-मरण, सुख-दु: ख, लाभ- अलाभ आदि को जानता है, वह विपुलमति मनःपर्ययज्ञान कहलाता है । (रा. वा. 1? 23) ऋजुमति एवं विपुलमति मनःपर्यय ज्ञान में क्या विशेषता है? ऋजुमति एवं विपुलमति मनःपर्ययज्ञान में विशुद्धि एव अप्रतिपात की अपेक्षा विशेषता है- विशुद्धि : अनुमति से विपुलमति मनःपर्ययज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षा विशुद्धतर है । अप्रतिपात : अप्रतिपात की अपेक्षा भी विपुलमति मनःपर्ययज्ञान विशिष्ट है, क्योंकि इसके स्वामियों के प्रवर्धमान चारित्र पाया जाता है परन्तु ऋजुमति प्रतिपाती है, क्योंकि इसके स्वामियों के कषाय के उदय से घटता हुआ चारित्र पाया जाता हे । (त. सू 1 ' 24) मनःपर्ययज्ञान किसको होता है? मनःपर्ययज्ञान मनुष्यों में ही होता है देव, नारक व तिर्यब्ज योनि में नहीं । मनुष्यों में भी गर्भजों में ही होता है, सम्हर्च्छिमों में नहीं । गर्भजों में भी कर्मभूमिजों के ही होता है, अकर्मभूमिजों में नहीं । कर्मभूमिजों में भी पर्याप्तकों के ही होता है अपर्याप्तकों के नहीं । उनमें भी सम्यग्दृष्टियों के होता है मिथ्यात्व-सासादन व सम्बग्मिथ्यादृष्टियों के नहीं । उनमें भी संयतों के ही होता है असंयतों तथा संयतासंयतों के नहीं । संयतों में भी प्रमत्त से लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तक ही होता है उससे ऊपर नहीं । उनमें भी प्रवर्तमान चारित्रवालों को ही होता है हीयमान चारित्रवालों को नहीं । उनमें भी सात ऋद्धियों में से अन्यतम ऋद्धि को प्राप्त होने वाले के ही होता है अन्य के नहीं । ऋद्धिप्राप्तों में भी किन्हीं के ही होता है, सबको नहीं । ( रा. वा. 1723)


म न : पययज्ञान प्रमाद से राहत अप्रमत्त मुनि के ही उत्पन्न होता है । यहाँ अप्रमत्तपने का नियम उत्पत्ति काल में ही है, पीछे प्रमत्त अवस्था में भी सम्भव है । काता 3-4) मन: पर्ययज्ञानी के अवेद अवस्था में कितने संयम होते हैं? मनःपर्ययज्ञानी की अवेद अवस्था में भी चार संयम होते हैं - नवम गुणस्थान की अपेक्षा - सामायिक-छेदोपस्थापना । दशम गुणस्थान की अपेक्षा - न्ल्यू साम्पराय । ग्यारहवें-बारहवें की अपेक्षा - यथाख्यात । मन: पर्ययज्ञानी के अरति-शोक कषाय के साथ कितने गुणस्थान होते हैं? मनःपर्यय ज्ञानी के अरति-शोक कषाय के साथ तीन गुणस्थान होते हैं - छठा, सातवीं, आठवीं । मनःपर्यय ज्ञान में कषायों की विवेचना कैसे करनी चाहिए? मनःपर्यय ज्ञान में कषायों की विवेचना -


11 कषाय-छठे से आठवें गुणस्थान तक-संज्वलन चतुष्क तथा स्त्रीवेद-नपुंसक ० बिना सात नोकषाय । 5 कषाय - नौवें गुणस्थान में - सज्वलन चतुष्क एव पुरुषवेद । 4 कषाय - नौवें गुणस्थान में - संज्वलन चतुष्क । 3 कषाय - नौवें गुणस्थान में - सज्वलन मान, माया, लोभ । 2 कषाय - नौवें गुणस्थान में - सैज्जवन माया और लोभ । 1 कषाय - नौवें तथा दसवें गुणस्थान में - सज्वलन लोभ, नौवें में जब केवल ?? लोभ शेष रहता है । ० कषाय - ग्यारहवें-बारहवें गणस्थान में ।

मनःपययज्ञानी के कौन से सम्बक्ल में सबसे कम गुणस्थान होते हैं? मनःपर्यय ज्ञानी के क्षायोपशमिक सम्यक में केवल दो गुणस्थान होते हैं - छठा, सातवीं । मन: पर्ययज्ञानी के छठा गुणस्थान है तो उसके कम-से-कम 7 प्राण क्यों नहीं हो सकते?




मनःपर्यय ज्ञानी को छठा गुणस्थान होने पर भी आहारकऋद्धि प्राप्त नहीं हो सकती है क्योंकि मनःपर्यय ज्ञान के साथ आहारक योग का निषेध है इसलिए उनके कम-से-कम 7 प्राण नहीं हो सकते हैं । छठे गुणस्थान में 7 प्राण मात्र आहारकमिश्र काययोग की अपेक्षा ही होते हैं । ऋजुमति मनःपर्ययज्ञानी के कितनी संज्ञा का अभाव हो सकता है? अनुमति मनःपर्ययज्ञानी जीवों के चारों संज्ञाओं का अभाव हो सकता है । 7 वें गुणस्थान से आहार सज्ञा का । 9 वें गुणस्थान से भय सज्ञा का । 9 वें गुणस्थान के अवेद भाग से मैथुन सज्ञा का तथा ग्यारहवें - बारहवें गुणस्थान में पीणह सज्ञा का भी अभाव हो जाता है । क्या विपुलमति मनःपर्ययज्ञानी के भी आर्चध्यान हो सकते हैं? ही, विपुलमति मनःपर्ययज्ञानी जीवों के भी आर्त्तध्यान हो सकते है क्योंकि छठे गुणस्थान में भी विपुलमतिमनःपर्ययज्ञान पाया जाता है । जैसे - भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष जाने पर गौतमस्वामी को इष्ट वियोगज आर्सध्यान होना सम्भव है । लेकिन मनःपर्ययज्ञानी के निदान नाम का आर्त्तध्यान नहीं हो सकता है । नोट - मुनिराज के आर्त्तध्यान कदाचित् ही होते हैं और क्षण मात्र के लिए ही हो सकते ?? मन: पर्ययज्ञानी जीव के सामायिक संयम के साथ कम- से- कम कितने आसव के प्रत्यय होते हैं? मनःपर्ययज्ञानी सामायिक संयम वाले के कम-से-कम दस आसव के प्रत्यय होते हैं - 1 कषाय (संज्वलन लोभ) 9 योग ( 4 म. 4 व- 1 औदारिक काययत्नो) नवमें गुणस्थान में जब सज्वलन क्रोध, मान, माया का उपशम या क्षय हो जाता है उस समय सामायिक संयम के साथ आसव के दस प्रत्यय होते हैं । चउबीस ठाणा? 198

तालिका संख्या 36

स्थान गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय ज्ञान संयम - दर्शन लेश्या भव्यत्व सम्बक्म संज्ञी आहारक गुणस्थान जीवसमास पर्याप्ति प्राण सज्ञा उपयोग ध्यान आसव जाति 14 कुल 14

केवलज्ञान विवरण मनुष्य गति पंचेन्द्रिय त्रस म. व. का.

केवलज्ञान यथाख्यात केवलदर्शन शुक्ल लेश्या भव्य क्षायिक सम्बक्ल

आहारक, अनाहारक तेरहवीं, चौदहवाँ पंचेन्द्रिय आ. श. इ. श्वा. भा. म. वचन बल, कायबल, श्वा. आ

केवलज्ञानो; केवलदर्शनो शुख ध्यान योग मनुष्यगति सम्बन्धी

.क. बार सम्बन्धी

गति से रहित जीव भी होते हैं । इन्द्रिय से रहित जीव भी होते हैं । कायातीत जीव भी होते हैं । औदारिकद्विक एवं कार्मण काययोग

संयम से रहित जीव भी होते हैं।

लेश्यातीत जीव भी होते हैं। भव्याभव्य से रहित भी होते हैं।

सैनी- असैनी से रहित ही होते हैं ।

गुणस्थानातीत भी होते हैं। समासातीत जीव भी होते हैं । पर्याप्ति से रहित भी होते हैं। प्राणातीत जीव भी होते हैं। संज्ञातीत जीव ही होते हैं।

ख्तक्रियाप्रतिपाक, व्रपरतक्रियानिवृति। म व का. ।

ज्ञान मार्गणा? 199

1. प्रश्न उत्तर

1. प्रश्न उत्तर

3. प्रश्न उत्तर

केवलज्ञान किसे कहते है?
ज्ञानावरणीय कर्म के अत्यन्त क्षय होने से जो तीन लोक, तीन काल की सम्पूर्ण द्रव्य-

गुण पर्यायों को एक साथ प्रत्यक्ष रूप से जानता है उसे केवलज्ञान कहते हैं । केवल असहाय को कहते हैं । जो ज्ञान असहाय है, इन्द्रिय और आलोक की अपेक्षा रहित है, त्रिकाल गोचर अनन्त पर्याय समवाय सम्बन्ध को प्राप्त अनन्त वस्तुओं को जानने वाला है, असंकुटित (सर्व व्यापक) है और असपल (प्रतिपक्ष रहित) है उसे केवलज्ञान कहते हैं । (थ. 6) केवलज्ञान आत्मा और अर्थ से अतिरिक्त इन्द्रियादिक सहायक की अपेक्षा रहित है इसलिए भी वह केवल असहाय है । इस प्रकार केवल, असहाय जो ज्ञान है उसे केवलज्ञान कहते हें । जि. ध. 1 ', से 3) भावेन्द्रिय के अभाव में केवलज्ञानी पंचेन्द्रिय कैसे हो सकते हैं? आगम में सयोगी और अयोगी केवली के पंचेन्द्रियत्व कहा है वहाँ द्रव्येन्द्रियों की विवक्षा है, ज्ञानावरण के क्षयोपशम रूप भावेन्द्रिय की नहीं । यदि भावेन्द्रिय की विवक्षा होती तो ज्ञानावरण का सद्‌भाव होने से सर्वज्ञता ही नहीं हो सकती हे । (रा. वा. 1०) केवलियों के यद्यपि भावेन्द्रिय समूल नष्ट हो गयी है और बाह्य इन्द्रियों का व्यापार भी बन्द हो गया है तो भी भावेन्द्रिय के निमित्त से उत्पन्न हुई द्रव्येन्द्रियों के सद्‌भाव की अपेक्षा उन्हें पंचेन्द्रिय कहा गया है । (य. 17265) केवली को भूतपूर्व का ज्ञान कराने वाले न्याय के आश्रय से पंचेन्द्रिय कहा है । (ध. 1 266) आवरण के क्षीण हो जाने से पंचेन्द्रियों के क्षयोपशम के नष्ट हो जाने पर भी क्षयोपशम से उत्पन्न और उपचार से क्षायोपशमिक सज्ञा को प्राप्त पाँचों बाह्येन्द्रिय का अस्तित्व पाये जाने से सयोगी और अयोगी जिनों के पंचेन्द्रियत्व सिद्ध कर लेना चाहिए । ७.) नोट - केवली भगवान के क्षायोपशमिक ज्ञान रूप भावेन्द्रिय का अभाव हुआ है न कि पंचेन्द्रिय जाति नाम कर्म के उदय का । अत' औदयिक भाव रूप पंचेन्द्रियत्व का सद्‌भाव होने में कोई बाधा नहीं है । केवली भगवान पंचेन्द्रिय हैं तो उनके चार प्राण ही क्यों कहे हैं, दस क्यों नहीं? यदि प्राणों में द्रव्येन्द्रियों का ही ग्रहण किया जावे तो संज्ञी जीवों के अपर्याप्त काल में सात प्राणों के स्थान पर कुल दो प्राण ही कहे जावेंगे, क्योंकि उनके द्रव्येन्द्रियों का अभाव होता है । अत:! यह सिद्ध हुआ कि सयोगी जिन के भावेन्द्रिय नहीं होने से चार अथवा दो ही प्राण होते हैं । (र्धे. 2 ' मै मै मैं) ?,?-?---इ?-? ????

चउबीस ठाणा? 2००


केवलज्ञान के साथ शुक्ल लेश्या केवल रच्छ गुणस्थान में होती है- तेरहवें में । केवलज्ञान में अनाहारक अवस्था में कम- से- कम कितने प्राण हो सकते हैं? केवलज्ञान में अनाहारक अवस्था में कम-से-कम एक प्राण होता है - आयु प्राण । यह एक प्राण चौदहवें गुणस्थान की अपेक्षा कहा गया है । केवलज्ञान के साथ औदारिक मिश्र अवस्था में कितने आसव के प्रत्यय होते हैं? केवलज्ञान के साथ औदारिकमिश्र अवस्था में आसव का केवल एक ही प्रत्यय होता है - औदारिक मिश्र योग सम्बन्धी । क्योंकि उस समय नाना जीवों की अपेक्षा भी शेष योग नहीं हो सकते हैं । चौबीस स्थानों में ऐसे कौन से स्थान हैं जिनके सभी उत्तर भेद केवलज्ञान में पाये जाते हैं? चौबीस स्थानों में ऐसे केवल दो स्थान हैं जिनके सभी उत्तर भेद केवलज्ञान में पाये जाते हैं- ( 1) आहार (2) पर्याप्ति । ऐसे कौन से स्थान हैं जिनका एक भी भेद केवलज्ञान में नहीं पाया जाता है? चार स्थान ऐसे हैं जिनका एक भी भेद केवलज्ञान में नहीं पाया जाता है - ( 1) वेद (2) कषाय (3) संज्ञी (4) संज्ञा सिद्ध भगवान की अपेक्षा (क्योंकि वे भी केवलज्ञानी हैं) 19 स्थान ऐसे हैं जिनका एक भी भेद उनके नहीं पाया जाता है - ( 1) गति (2) इन्द्रिय ( 3) काय (4) योग (5) वेद (6) कषाय (7) संयम (8) लेश्या (9) भव्य ( 1०) संज्ञी ( 11) गुणस्थान ( 12) जीवसमास ( 13) पर्याप्ति ( 14) प्राण

उत्तर : . प्रश्न :

. प्रश्न :


8. प्रश्न

15 सज्ञा 16 ध्यान 17 आसव ० प्रत्यय 1819 कुल । यथार्थ में तो सिद्ध भगवान के चौबीस स्थानों में से एक भी भेद नहीं पाया जाता है ०८' वे कर्मों के बन्ध, उदय एव सत्व से रहित हैं, उनके सभी गुण शुद्ध ही होते हैं । ० उनके ज्ञान, दर्शन, सम्यक, आदि गुण पाये जाते हैं केवलज्ञान, केवलदर्शन आदि ' फिर भी उन्हें केवलज्ञानी कहा जाता है क्योंकि वह ज्ञान गुण की शुद्ध पर्याय है ।