10.दर्शनमार्गणा अधिकार

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दर्शनमार्गणा अधिकार

अथ दर्शनमार्गणाधिकार:

अधुना दर्शनमार्गणायां त्रिविधदर्शनवतां स्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणी अचक्खुुदंसणी ओहिदंसणी णाम कधं भवदि ?।।५६।।
खओवसमियाए लद्धीए।।५७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-उदये पतनकाले सर्वघातिस्पर्धकानां यदनंतगुणहीनत्वं स तेषां क्षयो नाम, देशघातिस्पर्धकानां स्वरूपेण यदवस्थानं स उपशमःतदुभयगुणसमन्वितचक्षुर्दर्शनावरणीयकर्मस्कंधविपाक-जनितजीवपरिणामः लब्धिरिति गृहीतव्या क्षायोपशमिका। अचक्षुर्दर्शनावरणीयस्य देशघातिस्पर्धकानामुदयेन अचक्षुर्दर्शनं भवतीति कृत्वा क्षायोपशमिक्या लब्ध्या अचक्षुर्दर्शनमिति प्रोक्तं। अवधिदर्शनावरणीयस्य देशघातिस्पर्धकानामुदयजनितलब्धेः अवधिदर्शनी भवतीति क्षयोपशमिकायाः लब्धेः अवधिदर्शनी निर्दिष्टः।
कश्चिदाह-न दर्शनमस्ति, विषयाभावात्। न बाह्यार्थसामान्यग्रहणं दर्शनं, केवलदर्शनस्य अभाव-प्रसंगात्। किंच—केवलज्ञानेन त्रिकालगोचरानंतार्थव्यञ्जनपर्यायस्वरूपेषु सर्वद्रव्येषु अवगतेषु केवलदर्शनस्य विषयाभावात्। न च गृहीतमेव गृण्हाति केवलदर्शनं, गृहीतग्रहणे फलाभावात् ?
तस्य समाधानं क्रियते-अस्ति दर्शनं, सूत्रे अष्टकर्मनिर्देशात्। न चासति आवरणीये आवारकमस्ति, अन्यत्र तथानुपलंभात्। न चोपचारेण दर्शनावरणनिर्देशः, मुख्यस्याभावे उपचारानुपपत्तेः। न चावरणीयं नास्ति, चक्षुर्दर्शनी अचक्षुर्दर्शनी अवधिदर्शनी क्षायोपशमिकायाः लब्धेः केवलदर्शनी क्षायिकाया लब्धेः इति तदस्तित्वप्रतिपादनजिनवचनदर्शनात्। तथाहि—
एओ मे सस्सदो अप्पा, णाणदंसणलक्खणो।
सेसा मे बाहिरा भावा, सव्वे संजोगलक्खणा।।१।।
असरीरा जीवघणा, उवजुत्ता दंसणे य णाणे य ।
सायारमणायारं, लक्खणमेयं तु सिद्धाणं।।२।।
इत्याद्युपसंहारसूत्रदर्शनाच्च।
आगमप्रमाणेन भवतु नाम दर्शनस्य अस्तित्वं न युक्त्या इति चेत् ?
न, युक्तिभिः आगमस्य बाधाऽऽभावात्। न चैवं सति दर्शनस्याभाव:, बाह्यार्थान् मुक्त्वा तस्य अन्तरंगार्थे व्यापारात्। न च केवलज्ञानमेव शक्तिद्वयसंयुक्तत्वात् बहिरंतरंगार्थपरिच्छेदकं, ज्ञानमात्मद्रव्यस्य पर्यायः तस्य पर्यायस्य पर्यायाभावात्। भावे वा अनवस्था आगच्छति, अवस्थानकारणाभावात्। तस्मात् अंतरंगोपयोगात् बहिरंगोपयोगेन पृथग्भूतेन भवितव्यमन्यथा सर्वज्ञत्वानुपपत्तेः। अंतरंगबहिरंगोपयोगसंज्ञित-द्विशक्तियुक्तः आत्मा एषितव्यः।
कश्चिदाह- जं सामण्णग्गहणं भावाणं णेव कट्टु आयारं।
अविसेसिदूण अट्ठे दंसणमिदि भण्णदे समए।।
तस्य समाधानं-न च एतेन सूत्रेण उपर्युक्तं व्याख्यानं विरुध्यते, अत्र गाथायां प्रयुक्तसामान्यशब्दस्य आत्मार्थे ग्रहणात्। न च जीवस्य सामान्यत्वमसिद्धं, नियमेन विना विषयीकृतत्रिकालगोचरानंतार्थ-व्यंजन-पर्यायोपचितबाह्यांतरंगाणां तत्र सामान्यत्वाविरोधात्।
भवतु नाम सामान्येन दर्शनस्य सिद्धिः केवलदर्शनस्य सिद्धिश्च, न शेषदर्शनानां। तथाहि-
चक्खूण जं पयासदि दिस्सदि तं चक्खुदंसणं वेंति।
दिट्ठस्स य जं सरणं णायव्वं तं अचक्खू त्ति।।१।।
परमाणुआदियाइं अंतिमखंधं त्ति मुत्तिदव्वाइं।
तं ओहिदंसणं पुण जं पस्सदि ताणि पच्चक्खं।।२।।
इति गाथाभ्यां बाह्यार्थविषयदर्शनप्ररूपणात् ?
नैतद वक्तव्यं, भवद्भिः एतयोः गाथयोः परमार्थार्थो नावगतः।
कोऽसौ परमार्थार्थः ?
उच्यते-‘‘जं यत् चक्खूणं चक्षुषां पयासदि प्रकाशते दिस्सदि चक्षुषा दृश्यते वा तं तत् चक्खुदंसणं चक्षुर्दर्शनमिति वेंति बु्रवते। चक्ंिखदियणाणादो जो पुव्वमेव सुवसत्तीए सामण्णाए अणुहओ चक्खुणाणुप्पत्ति-णिमित्तो तं चक्खुदंसणमिदि उत्तं होदि।
कधमंतरंगाए चक्ंिखदियविसयपडिबद्धाए सत्तीए चक्खिंदियस्सप-उत्ती ? ण, अंतरंगे बहिरंगत्थोवयारेण बालजणपबोहणणट्ठं चक्खूणं जं दिस्सदि तं चक्खुदंसणमिदि परूवणादो।
गाहाए गलभंजणमकाऊण उज्जुवत्थो किण्ण घेप्पदि ? ण, तत्थ पुव्वुत्तासेसदोसप्पसंगादो ।
दिट्ठस्स शेषैन्द्रियैः प्रतिपन्नस्यार्थस्य ‘जं’ यस्मात् ‘सरणं’ अवगमनं णायव्वं ज्ञातव्यं तं तत् अचक्खु त्ति अचक्षुर्दर्शनमिति। सेसिंदियणाणुप्पत्तीदो जो पुव्वमेव सुवसत्तीए अप्पणो विसयम्मि पडिबद्धाए सामण्णेण संवेदो अचक्खुणाणुप्पत्तिणिमित्तो तमचक्खुदंसणमिदि उत्तं होदि।
परमाणुआदियाइं परमाण्वादिकानि अंतिमखंधं ति आ पश्चिमस्कंधादिति मुत्तिदव्वाइं मूर्तिद्रव्याणि जं यस्मात् पस्सदि पश्यति’ जानीते ताणि तानि पच्चक्खं साक्षात् तं तत् ओहिदंसणं अवधिदर्शनमिति द्रष्टव्यम् । परमाणुमादिं कादूण जाव पच्छिमखंधो त्ति ट्ठिदपोग्गलदव्वाणमवगमादो पच्चक्खादो जो पुव्वमेव सुवसत्तीविसयउवजोगो ओहिणाणुप्पत्तिणिमित्तो तं ओहिदंसणमिदि घेत्तव्वं, अण्णहा णाण-दंसणाणं भेदाभावादो।
कधं केवलणाणेण केवलदंसणं समाणं ?
ण, णेयप्पमाणकेवलणाणभेएण भिण्णप्पविसयउवजोगस्स वि तत्तियमेत्तत्ताविरोहादो।’’
केवलिदर्शनिनां स्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
केवलदंसणी णाम कधं भवदि ?।।५८।।
खइयाए लद्धीए।।५९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थः सुगमोऽस्ति। दर्शनावरणीयस्य निर्मूलविनाशः क्षयः नाम। तस्मात् जातजीवपरिणामः क्षायिका लब्धिः, तस्याः निमित्तेन केवलदर्शनिभगवान् भवति।
उक्तं च- एवं सुत्तपसिद्धं भणंति जे केवलं च णत्थि त्ति ।
मिच्छादिट्ठी अण्णो को तत्तो एत्थ जियलोए।।
एवं प्रकारेण सूत्रप्रसिद्धं केवलदर्शनं सिद्ध्यति, ततोऽपि ये केचित् भणंति केवलदर्शनं नास्ति तस्मादधिकः कः अज्ञानी मिथ्यादृष्टी भवति अस्मिन् जीवलोके इति। अस्यायमभिप्रायः-कश्चिदपि सम्यग्दृष्टिः केवलदर्शनस्य नास्तित्वं न कथयति इति ज्ञातव्यं।
एवं दर्शनमार्गणायां स्वामित्वकथनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां दर्शनमार्गणानाम नवमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ दर्शनमार्गणा अधिकार

अब दर्शनमार्गणा में तीन प्रकार के दर्शन को प्राप्त जीवों का स्वामित्व प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

दर्शनमार्गणानुसार जीव चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी व अवधिदर्शनी किस कारण से होते हैं ?।।५६।।

क्षायोपशमिक लब्धि प्राप्त जीव चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी और अवधिदर्शनी होते हैं।।५७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उदय में पतन के समय में सर्वघाती स्पर्धकों का जो अनन्तगुण हीनपना हो जाता है, वही उनका क्षय है और देशघाती स्पर्धकों का स्वरूप से जो अवस्थान है, वही उपशम है। क्षय और उपशमरूप इन दो गुणों से युक्त चक्षुदर्शनावरणीय कर्म के स्कंधों के उदय से उत्पन्न हुए जीवपरिणाम का नाम क्षायोपशमिक लब्धि है, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। अचक्षुदर्शनावरणीय देशघाती स्पर्धकों के उदय से अचक्षुदर्शन होता है, ऐसा समझकर क्षायोपशमिक लब्धि से अचक्षुदर्शन होता है, ऐसा कहा गया है। अवधिदर्शनावरणीय के देशघाती स्पर्धकों के उदय से उत्पन्न हुई लब्धि से जीव अवधिदर्शनी होता है, इसलिए क्षायोपशमिक लब्धि से अवधिदर्शन कहा गया है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-दर्शन नहीं है, क्योंकि उसका कोई विषय नहीं है। बाह्य पदार्थों संबंधी सामान्य को ग्रहण करना दर्शन नहीं है, क्योंकि वैसा मानने पर केवलदर्शन के अभाव का प्रसंग आता है, इसका कारण यह है कि जब केवलज्ञान के द्वारा त्रिकालगोचर अनन्त अर्थ और व्यंजन पर्याय स्वरूप समस्त द्रव्यों को जान लेने पर केवलदर्शन के लिए कोई विषय ही नहीं रहता है और केवलज्ञान के द्वारा ग्रहण किए गए पदार्थ को ही केवलदर्शन ग्रहण करता है, ऐसा नहीं है, क्योंकि ग्रहण किये गये पदार्थ के पुन: ग्रहण करने का कोई फल नहीं है ?

अब यहाँ उक्त शंका का समाधान करते हैं-दर्शन का अस्तित्व है, क्योंकि सूत्र में आठ कर्मों का निर्देश किया गया है और आवरणीय के अभाव में आवारक हो नहीं सकता है, क्योंकि अन्यत्र वैसा पाया नहीं जाता। दर्शनावरण का निर्देश उपचार से किया गया है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि मुख्य वस्तु के अभाव में उपचार की उपपत्ति नहीं बनती और आवरणीय नहीं है, सो बात भी नहीं है, क्योंकि क्षायोपशमिक लब्धि से चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी और अवधिदर्शनी तथा क्षायिकलब्धि से केवलदर्शनी होते हैं’ इस प्रकार के अस्तित्व का प्रतिपादन करने वाले जिन भगवान के वचन देखे जाते हैं। इसका स्पष्टीकरण-

गाथार्थ-ज्ञान और दर्शनरूप लक्षण वाला मेरा आत्मा ही एक और शाश्वत है। शेष समस्त संयोगरूप लक्षण वाले पदार्थ मुझसे बाह्य हैं।।१।।

जो अशरीर अर्थात् काय रहित हैं, शुद्ध जीव प्रदेशों से घनीभूत हैं, दर्शन और ज्ञान में अनाकार व साकार उपयोग से उपयुक्त हैं, वे सिद्ध हैं। यह सिद्ध जीवों का लक्षण हैं।।२।।</font color>

इस प्रकार अनेक उपसंहार सूत्रों के देखने से भी यही सिद्ध होता है कि यह दर्शन है।

शंका-आगम प्रमाण से दर्शन का अस्तित्व भले ही हो, किन्तु युक्ति से तो दर्शन का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि युक्तियों से आगम बाधित नहीं होता है। इस प्रकार आगम और युक्ति से दर्शन का अस्तित्व सिद्ध होने पर उसका अभाव नहीं माना जा सकता है, क्योंकि दर्शन का व्यापार बाह्य पदार्थों को छोड़कर अन्तरंग वस्तु में होता है। यहाँ यह नहीं कह सकते कि केवलज्ञान ही दो शक्तियों से संयुक्त होने के कारण बहिरंग और अंतरंग दोनों वस्तुओं का परिच्छेदक है क्योंकि ज्ञान स्वयं आत्म द्रव्य की एक पर्याय है और एक पर्याय में दूसरी पर्याय होती नहीं है। यदि पर्याय में भी और पर्याय मानी जाये तो अवस्थान का कोेई कारण न होने से अनवस्था दोष उत्पन्न होता है। इसलिए अंतरंग उपयोग से बहिरंग उपयोग को पृथग्भूत ही होना चाहिए, अन्यथा सर्वज्ञत्व की उपपत्ति नहीं बन सकती है। अतएव आत्मा को अंतरंग उपयोग और बहिरंग उपयोग ऐसी दो शक्तियों से युक्त मानना अभीष्ट सिद्ध होता है। ऐसा मानने पर कोई शंका करता है-

गाथार्थ-वस्तुओं का आकार न करके व पदार्थों में विशेषता न करके जो सामान्य का ग्रहण किया जाता है उसे ही शास्त्र में दर्शन कहा है।।

उसका समाधान करते हैं-इस सूत्र से प्रस्तुत व्याख्यान विरुद्ध भी नहीं पड़ता, क्योंकि उक्त गाथा में ‘सामान्य’ शब्द का प्रयोग आत्म-पदार्थ के अर्थ में किया गया है और जीव का सामान्यपना असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि नियम के बिना ज्ञान के विषयभूत किये गये त्रिकालगोचर अनन्त अर्थ और व्यंजन पर्यायों से संचित बहिरंग और अंतरंग पदार्थों का जीव में सामान्यपना मानने में कोई विरोध नहीं आता है।

शंका-इस प्रकार सामान्य से दर्शन की सिद्धि और केवलदर्शन की सिद्धि भले हो जाये, किन्तु उससे शेष दर्शनों की सिद्धि नहीं होती है। उसे ही दिखाते हैं-

गाथार्थ-जो चक्षुइन्द्रियों का अवलम्बन लेकर प्रकाशित होता है, या दिखता है उसे चक्षुदर्शन कहते हैं और जो अन्य इन्द्रियों से दर्शन होता है, उसे अचक्षुदर्शन जानना चाहिए।।१।।

परमाणु से लेकर अंतिम स्कंध तक जितने मूर्तिक द्रव्य हैं, उन्हें जो प्रत्यक्ष देखता है, वह अवधिदर्शन है।।२।।

इन दोनों गाथाओं में बाह्य पदार्थों को विषय करने वाला दर्शन कहा गया है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि तुमने इन गाथाओं का परमार्थरूप अर्थ नहीं समझा है।

शंका-यह परमार्थरूप अर्थ क्या है ?

समाधान-कहते हैं-चक्षुओं के आलम्बन से जो प्रकाशित होता है, अर्थात् दिखता है अथवा आँख द्वारा देखा जाता है, वह चक्षुदर्शन है इसका अर्थ ऐसा समझना चाहिए कि चक्षुइन्द्रियज्ञान से जो पूर्व ही चक्षुज्ञान की उत्पत्ति में निमित्तभूत जिससे स्वशक्तिरूपसामान्य का अनुभव होता है वह चक्षुदर्शन है, यह उक्त कथन का तात्पर्य है।

शंका-उस चक्षुइन्द्रिय के विषय से प्रतिबद्ध अंतरंग शक्ति में चक्षुइन्द्रिय की प्रवृत्ति कैसे हो सकती है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि बालक जनों को ज्ञान कराने के लिए अंतरंग में बहिरंग पदार्थों के उपचार से चक्षुओं को जो दिखता है, वही चक्षुदर्शन है, ऐसा प्ररूपण किया गया है।

शंका-गाथा का गला न घोंटकर उक्त गाथा का अर्थ क्यों नहीं लेते?

समाधान-नहीं, क्योंकि वैसा करने में तो पूर्वोक्त समस्त दोषों का प्रसंग आता है।

गाथा के उत्तरार्ध का अर्थ इस प्रकार है-जो देखा गया है, जो पदार्थ शेष इन्द्रियों के द्वारा जाना गया है अत: उसका जो शरण अर्थात् ज्ञान होता है उसे अचक्षुदर्शन जानना चाहिए। चक्षुइन्द्रिय को छोड़कर शेष इन्द्रियज्ञानों की उत्पत्ति से पूर्व ही अपने विषय में प्रतिबद्ध स्वशक्ति का अचक्षुज्ञान की उत्पत्ति का निमित्तभूत जो सामान्य से संवेद या अनुभव होता है वह अचक्षुदर्शन है, ऐसा कहा गया है।

द्वितीय गाथा का अर्थ इस प्रकार है-परमाणु से लगाकर अंतिम स्कंधपर्यंत जितने मूर्तिक द्रव्य हैं, उन्हें जिसके द्वारा जीव साक्षात् देखता है, या जानता है वह अवधिदर्शन है ऐसा जानना चाहिए। परमाणु से लेकर अंतिम स्कंध पर्यन्त जो पुद्गलद्रव्य स्थित हैं, उनके प्रत्यक्ष ज्ञान से पूर्व ही जो अवधिज्ञान की उत्पत्ति का निमित्तभूत स्वशक्ति विषयक उपयोग होता है। वही अवधिदर्शन है। ऐसा ग्रहण करना चाहिए, अन्यथा ज्ञान और दर्शन में कोई भेद नहीं रहेगा।

शंका-केवलज्ञान से केवलदर्शन समान किस प्रकार है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि ज्ञेयप्रमाण केवलज्ञान के भेद से भिन्न आत्मविषयक उपयोग को भी तत्प्रमाण मानने में कोई विरोध नहीं आता है।

अब केवलदर्शन वाले जीवों का स्वामित्व प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव केवलदर्शनी किस कारण से होते हैं ?।।५८।।

क्षायिक लब्धि से जीव केवलदर्शनी होते हैं।।५९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। दर्शनावरणीय कर्म का निर्मूल विनाश क्षय कहलाता है। उस क्षय से उत्पन्न जीवपरिणाम को क्षायिक लब्धि कहते हैं। उससे केवलदर्शनी भगवान होते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ-इस प्रकार सूत्र द्वारा प्रसिद्ध होते हुए भी जो कहते हैं कि केवलदर्शन नहीं है, उनसे बड़ा इस जीव लोक में मिथ्यात्वी कौन होगा ?

इस प्रकार सूत्र में कहा गया केवलदर्शन सिद्ध हो जाता है, फिर भी जो कहते हैं कि केवलदर्शन नहीं है, उनसे अधिक अज्ञानी-मिथ्यादृष्टि इस संसार में कौन हो सकता है ? अर्थात् कोई नहीं। इसका अभिप्राय यह है कि कोई भी सम्यग्दृष्टि केवलदर्शन को नकार नहीं सकता है, ऐसा जानना चाहिए। इस प्रकार दर्शनमार्गणा में स्वामित्व का कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणिटीका में दर्शनमार्गणा नाम का नवमाँ अधिकार समाप्त हुआ।