10.श्रावकाचार प्रश्नोत्तरी

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श्रावकाचार

प्रश्न २०३—धर्म की परिभाषा क्या है ?
उत्तर—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र इन तीनों के समुदाय को धर्म कहते हैं।

प्रश्न २०४—यह रत्नत्रयात्मक धर्म कितने प्रकार का है ?
उत्तर—यह रत्नत्रयात्मक धर्म दो प्रकार का है—(१) सर्वदेश धर्म, (२) एकदेश धर्म

प्रश्न २०५—सर्वदेश धर्म का पालन कौन करते हैं और एकदेश धर्म का पालन कौन करते हैं ?
उत्तर'—सर्वदेश धर्म का पालन निग्र्रंथ मुनि करते हैं और एकदेश धर्म का पालन गृहस्थ करते हैं।

प्रश्न २०६—मुनिधर्म तो उत्कृष्ट है ही किन्तु श्रावक धर्म किस प्रकार उत्कृष्ट है ?
उत्तर—श्रावकगण बड़े—बड़े जिनमंदिर बनवाते हैं, आहार देकर मुनियों के शरीर की स्थिति करते हैं, सर्वदेश और एकदेशरूप धर्म की प्रवृत्ति करते हैं और दान देते हैं इसलिए इन सब बातों का मूल कारण श्रावक ही है अत: श्रावक धर्म भी अत्यन्त उत्कृष्ट है।

प्रश्न २०७—श्रावक के षट् आवश्यक कत्र्तव्य कौन से हैं ?
उत्तर—श्रावक के षट् आवश्यक कत्र्तव्य हैं—(१) देवपूजा, (२) गुरूपास्ति, (३) स्वाध्याय, (४) संयम (५) तप और (६) दान।

प्रश्न २०८—सामायिक का लक्षण बताइये ?
उत्तर—समस्त प्राणियों में साम्यभाव रखना, संयम धारण करने में अच्छी भावना रखना और आर्तध्यान व रौद्रध्यान का त्याग करना इसी का नाम सामायिक व्रत है।

प्रश्न २०९—देवपूजा करने वाले को क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जो भव्य जीव जिनेन्द्र भगवान को भक्तिपूर्वक देखते हैं, उनकी पूजा—स्तुति करते हैं वे तीनों लोकों में दर्शनीय, पूजा योग्य तथा स्तुति के योग्य होते हैं अर्थात् सर्व लोक उनको भक्ति से देखता है तथा उनकी पूजा—स्तुति करता है।

प्रश्न २१०—भव्य जीवों को प्रात:काल उठकर क्या करना चाहिए ?
उत्तर—भव्य जीवों को प्रात:काल उठकर जिनेन्द्रदेव एवं गुरू का दर्शन करना चाहिए, भक्तिपूर्वक उनकी वन्दना, स्तुति करनी चाहिए और धर्म का श्रवण भी करना चाहिए।

प्रश्न २११—गुरुओं को नहीं मानने वाले मनुष्य कैसे होते हैं ?
उत्तर—जो मनुष्य परिग्रहरहित तथा ज्ञान, ध्यान, तप में लीन गुरुओं को नहीं मानते हैं, उनकी उपासना, भक्ति आदि नहीं करते हैं उन पुरुषों के अंतरंग में अज्ञानरूपी अंधकार सदा विद्यमान रहता है।

प्रश्न २१२—यथार्थ रीति से वस्तु का स्वरूप कैसे जाना जाता है ?
उत्तर—वस्तु का स्वरूप यथार्थ रीति से शास्त्र से जाना जाता है।

प्रश्न २१३—शास्त्र स्वाध्याय न करने वाले कैसे कहे जाते हैं ?
उत्तर—शास्त्र स्वाध्याय न करने वाले नेत्र सहित होने पर भी अन्धे कहलाते हैं।

प्रश्न २१४—संयम का लक्षण बताओ ?
उत्तरजीवों की रक्षा करना और मन व इन्द्रियों को वश में रखने का नाम संयम है।

प्रश्न २१५—गृहस्थों के आठ मूलगुण कौन से हैं ?
उत्तर—मद्य, मांस, मधु तथा पाँच उदुम्बर फल इन आठों का सम्यग्दर्शनपूर्वक त्याग करना ही आठ मूलगुण है।

प्रश्न २१६—श्रावक के १२ व्रत कौन से हैं ?
उत्तर—पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार प्रकार के शिक्षाव्रत ये श्रावक के १२ व्रत हैं।

प्रश्न २१७—पांच अणुव्रतों के नाम बताइये ?
उत्तर—अहिंसा अणुव्रत, सत्य अणुव्रत, अचौर्य अणुव्रत, ब्रह्मचर्य अणुव्रत तथा परिग्रह परिमाण अणुव्रत।

प्रश्न २१८—तीन गुणव्रत कौन से हैं ?
उत्तर—दिग्व्रत, देशव्रत और अनर्थदण्डव्रत।

प्रश्न २१९—चार शिक्षाव्रत कौन—कौन से हैं ?
उत्तर—देशावकाशिक, सामायिक, प्रोषधोपवास और वैयावृत्य।

प्रश्न २२०—गृहस्थ किस प्रकार तप कर सकते हैं ?
उत्तरगृहस्थ अष्टमी चतुर्दशी को शक्ति के अनुसार उपवास आदि तप तथा छने हुए जल का पान और रात को भोजन का त्यागकर तप का पालन कर सकते हैं।

प्रश्न २२१—गृहस्थी को किन—किन की विनय करनी चाहिए ?
उत्तर—जिनेन्द्र भगवान के अनुयायी गृहस्थों को उत्कृष्ट स्थान में रहने वाले परमेष्ठियों में तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यग्चारित्र को धारण करने वाले महात्माओं की विनय करनी चाहिए।

प्रश्न २२२—विनय से किसकी प्राप्ति होती है ?
उत्तर—विनय से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र तथा तप आदि की प्राप्ति होती है।

प्रश्न २२३—विनय को आचार्यों ने किसकी संज्ञा दी है ?
उत्तर—विनय को गणधर आदि महापुरुषों ने मोक्ष का द्वार कहा है।

प्रश्न २२४—दान के बिना गृहस्थ कैसा है ?
उत्तर—दान के बिना गृहस्थों का गृहस्थपना निष्फल ही है।

प्रश्न २२५—दान न देने वाले गृहस्थ के लिए घर कैसा है ?
उत्तर—दान न देने वाले गृहस्थ के लिए घर मनुष्यों के फांसने के लिए जाल है।

प्रश्न २२६—गृहस्थों को कितने दान देने योग्य हैं ?
उत्तरगृहस्थियों को औषधि, शास्त्र, अभय और आहार ये चारों दान देने योग्य हैं।

प्रश्न २२७—समर्थ होकर भी दान न देने वालों को क्या फल मिलता है ?
उत्तरसमर्थ होकर भी दान न देने वाला मूढ़ पुरुष आगामी जन्म में होने वाले अपने सुख का स्वयं नाश कर लेता है और कदापि मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता है।

प्रश्न २२८—साधर्मी जनों से प्रीति न रखने वाले मनुष्य कैसे कहलाते हैं ?
उत्तर—जो मनुष्य साधर्मी सज्जनों में शक्ति के अनुसार प्रीति नहीं करते उन मनुष्यों की आत्मा प्रबल पाप से ढकी हुई है और वे धर्म से पराङ्मुख हैं।

प्रश्न २२९—अहिंसा की परिभाषा क्या है ?
उत्तर—केवल अन्य प्राणियों को पीड़ा देने से ही पाप की उत्पत्ति नहीं होती अपितु ‘उस जीव को मारूंगा अथवा वह जीव मर जावे तो अच्छा हो’ इस प्रकार हिंसा का संकल्प भी नहीं करना अहिंसा है।

प्रश्न २३०—भावनाएँ कितनी होती हैं, नाम बताइये ?
उत्तर—भावनाएँ १२ होती हैं—(१) अध्रुव अर्थात् अनित्य, (२) अशरण, (३) संसार, (४) एकत्व, (५) अन्यत्व, (६) अशुचित्व, (७) आस्रव, (८) संवर, (९) निर्जरा, (१०) लोक, (११) बोधिदुर्लभ, (१२) धर्म।

प्रश्न २३१—अनित्य भावना का स्वरूप बताइये ?
उत्तर—प्राणियों के समस्त शरीर, धन—धान्यादि पदार्थ विनाशीक हैं इसलिए उनके नष्ट होने पर जीवों को कुछ भी शोक नहीं करना अनित्य भावना है।

प्रश्न २३२—अशरण भावना किसे कहते हैं ?
उत्तरसंसार में आपत्ति के आने पर जीव को कोई इन्द्र, अहमिन्द्र आदि नहीं बचा सकते, मात्र धर्म ही प्राणी का रक्षक है।

प्रश्न २३३—संसार भावना का स्वरूप क्या है ?
उत्तर—संसार में जो सुख है वह सुखाभास है और जो दुख है वह सत्य है किन्तु वास्तविक सुख मोक्ष में ही है, यही संसार भावना है।

प्रश्न २३४—एकत्व भावना किसे कहते हैं ?
उत्तर—इस संसार में प्रत्येक जीव अकेला है, उसका न कोई स्वजन है और न ही परिजन है, प्रत्येक प्राणी अपने किए हुए कर्म को अकेला भोगता है।

प्रश्न २३५—अन्यत्व भावना का लक्षण बताइये ?
उत्तर—शरीर और आत्मा की स्थिति दूध और जल में मिली होने के समान होते हुए भी परस्पर में भिन्न है तब तो स्त्री, पुत्रादि भिन्न ही हैं इसलिए स्त्री, पुत्रादि को कदापि अपना नहीं मानना चाहिए।

प्रश्न २३६—अशुचित्व भावना किसे कहते हैं ?
उत्तर—मल, मूत्र, धातु आदि अपवित्र पदार्थों से भरा हुआ यह शरीर इतना अपवित्र है कि उसके सम्बन्ध से दूसरी वस्तु भी अपवित्र हो जाती है इसलिए इसमें कदापि ममत्व नहीं रखना चाहिए अपितु इससे होने वाले जप, तप आदि उत्तम कार्यों से इसे सफल करना चाहिए।

प्रश्न २३७—आस्रव भावना का स्वरूप बताओ ?
उत्तरजिस प्रकार समुद्र में जहाज में छिद्र हो जाने पर जल भर जाता है और जहाज डूब जाता है उसी प्रकार यह जीव मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग के द्वारा कर्मों को ग्रहण करता है।

प्रश्न २३८—संवर किसे कहते हैं ?
उत्तर—आते हुए कर्मों का रुक जाना संवर है तथा मन, वचन, काय का जो संवरण करना है यही संवर का आचरण है।

प्रश्न २३९—निर्जरा का स्वरूप बताइए ?
उत्तर—पहले संचित किए हुए कर्मों का जो एकदेश रूप से नाश होता है वही निर्जरा है तथा वह निर्जरा संसार, देह आदि से वैराग्य कराने वाले अनशन, अवमौदर्य आदि तप से होती है।

प्रश्न २४०—लोकानुप्रेक्षा का स्वरूप क्या है ?
उत्तर—यह समस्त लोक विनाशीक और अनित्य है तथा नाना प्रकार के दुखों का करने वाला है अत: इससे हटकर मोक्ष की ओर बुद्धि लगाना चाहिए।

प्रश्न २४१—बोधिदुर्लभ भावना का स्वरूप बताओ ?
उत्तर—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रस्वरूप रत्नत्रय की प्राप्ति का नाम बोधि है, जिसकी प्राप्ति संसार में अत्यन्त कठिन है, उसकी प्राप्ति होने पर प्रबल प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करना बोधिदुर्लभ भावना है।

प्रश्न २४२—धर्मानुप्रेक्षा किसे कहते हैं ?
उत्तर—संसार में प्राणियों को ज्ञानानन्द स्वरूप जिनधर्म को प्राप्त कर मोक्षपर्यन्त तक रहने की भावना करना चाहिए, जिनेन्द्रदेव द्वारा कहा हुआ आत्मस्वभाव रत्नत्रय स्वरूप तथा उत्तम क्षमादि स्वरूप यह धर्म है।

प्रश्न २४३—इन बारह भावनाओं के चिन्तवन से क्या फल मिलता है ?'

उत्तर—इन बारह भावनाओं के चिन्तवन से पुण्य का उपार्जन होता है जो स्वर्ग तथा मोक्ष का कारण है।