१०. समयसार अधिकार-

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समयसार अधिकार

अध्याय १०

प्रश्न—समयसार अधिकार के मंगलाचरण में किनको नमस्कार किया हुआ है ?

उत्तर—

वंदित्तु देवदेवं तिहुअणमहिदं च सव्व सिद्धाणं।
वोच्छामि समयसारं सुण संखेवं जहावुत्तं।।८९४।।

समयसार अधिकार के मंगलाचरण में त्रिभुवन से पूजित अरहंत देव सर्व और सिद्धों को नमस्कार किया हुआ है।

प्रश्न—समयसार किसे कहते हैं ?

उत्तर—सम्यक दर्शन ज्ञान चारित्र और तप का नाम समय है और इनका सार चारित्र है।

प्रश्न—श्रमण शीघ्र ही सिद्धि को कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?

उत्तर—

दव्वं खेत्तं कालं भावं च पडुच्च संघडणं।
जत्थ हि जददे समणो तत्थ हि सिद्धिं लहुंलहइ।।८९५।।

श्रमण जहाँ पर भी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और संहनन की अपेक्षा करके उद्यम करते हैं, वहाँ पर सिद्धि को शीघ्र ही प्राप्त कर सकते हैं।

जिस किसी स्थान में भी मुनि यदि शरीर शुद्धि और आहार शुद्धि का आश्रय लेकर, रात्रि आदि में गमन नहीं करने रूप काल शुद्धि एवं असंयम आदि के परिहार रूप भाव शुद्धि का आश्रय लेकर के तथा शरीर संहनन आदि को भी समझकर चारित्र का अच्छी तरह पालन करते हैं तो वे चाहें बहुज्ञानी हो या अल्पज्ञानी, सिद्धि को शीघ्र ही प्राप्त कर लेते हैं। जिस कारण से ऐसी बात है उसी हेतु से यह समयसार रूप चारित्र द्रव्य क्षेत्र आदि के आश्रय से सावधानी पूर्वक धारण किया जाता है।

इसलिए द्रव्यकल, क्षेत्रबल, कालबल और भावबल का आश्रय लेकर तपश्चरण करना चाहिए। तात्पर्य यही है कि जिस तरह से वात पित्त कफ आदि कुपित नहीं हो, वैसा प्रयत्न करना चाहिए, यही सार—समयसार का सारभूत कथन है।


प्रश्न—वैराग्य ही मय का सार कैसे है ?

उत्तर—

धीरो वइरग्गपरो थोवं हि य सिक्खिदूण सिज्झदि हु।
ण य सिज्झदि वेरग्गविहीणो पढिदूण सव्वसत्थाइं।।८९६।।

धीर, वैराग्य में तत्पर मुनि निश्चित्त रूप से थोड़ी भी शिक्षा पाकर सिद्ध हो जाते हैं किन्तु वैराग्य से हीन मुनि सर्व शास्त्रों को पढ़कर भी सिद्ध नहीं हो पाते हैं।

प्रश्न— सम्यक चारित्र के आचरण हेतु किस प्रकार का उपदेश है ?

उत्तर—

भिक्खं चर वस रण्णे थोवं जेमेहि मा बहू जंप।
दु:खं सह जिण णिद्दा मेत्तिं भावेहि सुट्ठु वेरग्गं।।८९७।।
अव्ववहारी एक्को झाणे एयग्गमणो भवे णिरारंभो।
चत्तकसायपरिग्गह पयत्तचेट्ठो असंगो य।।८९८।।

हे मुनि ! तुम भिक्षावृत्ति से भोजन करो, वन में रहो, अल्प भोजन करो, बहुत मत बोलो, दु:ख सहन करो, निद्रा को जीतो, एवं मैत्री तथा दृढ़ वैराग्य की भावना करो।

हे साधो ! तुम लोक व्यवहार से रहित होओ, ज्ञान दर्शन को छोड़कर अन्य कुछ भी मेरा नहीं है ऐसी एकत्व की भावना भाओ। धर्मध्यान और शुक्लध्यान में एकाग्र चित्त होओ। अंतरंग और बहिरंग परिग्रह को छोड़ो। सर्वथा सावधानीपूर्वक क्रियाएँ करो तथा किसी के साथ भी संगति मत करो।

प्रश्न—मुख्य रूप से चारित्र ही प्रधान क्यों है ?

उत्तर—

थोवह्यि सिक्खिदे जिणइ बहुसुदं जो चरित्तसंपुण्णो।
जो पुण चरित्तहीणो िंक तस्स सुदेण बहुएण।।८९९।।

जोे चरित्र से परिपूर्ण है वह थोड़ा शिक्षित होने पर भी बहुश्रुतधारी को जीत लेता है किन्तु जो चारित्र से रहित है उसके बहुत से श्रुत से भी क्या प्रयोजन ?

प्रश्न— भवसागर तिरने का उपाय बताइए ?

उत्तर—

णिज्जावगो य णाणं वादो झाणं चरित्त णावा हि।
भवसागरं तु भविया तरंति तिहिसण्णिपायेण।।९००।।

खेवटिया ज्ञान है, वायु ध्यान है और नौका चारित्र है। इन तीनों के संयोग से ही भव्य जीव भवसागर को तिर जाते हैं।

प्रश्न—किस कारण से मोक्ष की प्राप्ति होती है ?

उत्तर—

णाणं पयासओ तओ सोधओ संजमो य गुत्तियरो।
तिण्हं पि य संपजोगे होदि हु जिणसासणे मोक्खो।।९०१।।

ज्ञान प्रकाशक है, तप शोधक है, और संयम रक्षक है। इन तीनों के मिलने पर ही जिनशासन में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रश्न—ज्ञान, िंलग अथवा तप इनमें से एक—एक के द्वारा मोक्षफल मिल सकता है ?

उत्तर—

णाणं करणविहीणं लिंगग्गहणं च संजमविहूणं।
दंसणरहिदो य तवो जो कुणइ णिरत्थयं कुणइ।।९०२।।

क्रिया रहित ज्ञान, संयम रहित वेषधारण और सम्यक्त्व रहित तप को जो करते हैं सो व्यर्थ ही है।

प्रश्न—सम्यग्ज्ञान आदि से युक्त तप और ध्यान का माहात्म्य बताइए ?

उत्तर—

तवेण धीरा विधुणंति पावं अज्झप्पजोगेण खवंति मोहं।
संखीणमोह्य धुदरागदोसा ते उत्तमा सिद्धिगदिं पयंति।।९०३।।

धीर मुनि तप से पाप नष्ट करते हैं, अध्यात्मयोग से मोह का क्षय करते हैं। पुन: वे उत्तम पुरुष मोह रहित और राग द्वेष रहित होते हुए सिद्धगति को प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न—ध्यान का माहात्म्य बताइए ?

उत्तर—

लेस्साझाण तवेण य चरियविसेसेण सुग्गई होइ।
तह्या इदराभावे झाणं संभावए धीरो।।९०४।।

लेश्या, ध्यान और तप के द्वारा एवं चर्या विशेष के द्वारा सुगति की प्राप्ति होती है इसलिए अन्य के अभाव में धीर मुनि ध्यान की भावना करें।

प्रश्न— सम्यग्दर्शन का माहात्म्य बताइए ?

उत्तर—

सम्मत्तादो णाणं णाणादो सव्वभावउवलद्धी।
उवलद्धपयत्थो पुण सेयासेयं वियाणादि।।९०५।।

सम्यक्त्व से ज्ञान होता है, ज्ञान से सभी पदार्थों का बोध होता है और सभी पदार्थों को जानकर पुरुष हित–अहित जान लेते हैं।

प्रश्न—श्रेय—अश्रेय का माहात्म्य बताइए ?

उत्तर—

सेयासेयविदण्हू उद्धुददुस्सील सीलवं होदि।
सीलफलेणब्भूदयं तत्तो पुण लहदि णिव्वाणं।।९०६।।

श्रेय—पुण्य और अश्रेय—पाप के ज्ञाता दु:शील का ्नााश करके शीलवान होते हैं, पुन: उस शील के फल के अभ्युदय तथा निर्वाण पद को प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न—सम्यक चारित्र ही सुगति का कारण क्यों हैं दुष्टान्त दीजिए ?

उत्तर—

सव्वं पि हु सुदणाणं सुट्ठु सुगुणिदं पि सुट्ठु पढिदं पि।
समणं भट्टचरित्तं ण हु सक्को सुग्गइं णेदुं।।९०७।।
जदि पडदि दीवहत्थो अवडे िंक कुणदि तस्स सो दीवो।
जदि सिक्खिऊण अणयं करेदि िंक तस्स सिक्खफलं।।९०८।।

अच्छी तरह पढ़ा हुआ भी और अच्छी तरह गुना हुआ भी सारा श्रुतज्ञान निश्चित रूप से भ्रष्टचारित्र श्रमण को सुगति प्राप्त कराने में समर्थ नहीं है। यदि दीपक हाथ में लिये हुए मनुष्य गर्त में गिरता है तो उसके लिए भी दीपक क्या कर सकता है ? यदि कोई शिक्षित होकर भी अन्याय करता है तो उसके लिए शिक्षा का फल क्या हो सकता है ?

प्रश्न—चारित्र की शुद्धि किन कारणों से होती है ?

उत्तर—

िंपडं सेज्जं उवधिं ऊग्गमउप्पायणेसणादीहिं।
चारित्तरक्खण्ट्ठं सोधणयं होदि सुचरित्तं।।९०९।।

चारित्र की रक्षा के लिए उद्गम, उत्पादन और एषणा आदि के द्वारा आहार वसतिका और उपकरण का शोधन करता हुआ सुचारित्र सहित होता है।

प्रश्न—जिस लिंग से वह चारित्र अनुष्ठित किया जाता है, उस लिंग का भेद और स्वरूप बताइए ?

उत्तर—

अच्चेलक्वंâ लोचो वोसट्ट सरीरदा य पडिलिहणं।
एसो हु लिंगकप्पो चदुव्विधो होदि णायव्वो।।९१०।।

नग्नत्व, लोच, शरीर संस्कार हीनता और पिच्छिका यह चार प्रकार का लिंग भेद जानना चाहिए।

प्रश्न—श्रमण कल्प के कितने भेद हैं नाम निर्देश करें ?

उत्तर—

अच्चेलक्कुद्देसियसेज्जाहररायपिंड किदियम्मं।
वद जेट्ठ पडिक्कमणं मासं पज्जो समणकप्पो।।९११।।

अचेलकत्व : वस्त्रादि का अभाव।

औद्देशिक त्याग : उद्देश्य करके भोजन न करें, अर्थात् उद्देश्य से होने वाले दोष का परिहार करना अनौद्देशिक है।

शय्यागृह त्याग : मेरी वसतिका में जो ठहरे हैं उन्हें मैं आहारदान आदि दूँगा अन्य को नहीं। इस प्रकार के अभिप्राय से दिये हुए दान को न लेना शय्यागृह त्याग है।

राजपिण्ड त्याग : राजा के यहाँ आहार का त्याग करना। गरिष्ठ, इन्द्रियों में उत्तेजना उत्पन्न करने वाले आहार का त्याग करना।

कृतिकर्म : वन्दना आदि क्रियाओं के करने में उद्यम करना।

व्रत : अिंहसा आदि व्रत कहलाते हैं। उन व्रतों से आत्मा की भावना करना अर्थात् उन व्रतों के साथ संवास करना।

प्रतिक्रमण : सात प्रकार के प्रतिक्रमणों द्वारा आत्म भावना करना।

मास : वर्षायोग ग्रहण से पहले एकमास पर्यन्त रहकर वर्षाकाल में वर्षायोग ग्रहण करना तथा वर्षायोग को समाप्त करके पुन: एक मास तक अवस्थान करना चाहिए। अथवा ऋतु-ऋतु में (दो माह की एक ऋतु) अर्थात् प्रत्येक ऋतु में एक-एक मास तक रहना चाहिए और एक-एक मास तक विहार करन चाहिए। ऐसा यह ‘मास’ नाम का श्रमणकल्प है। अथवा वर्षाकाल में वर्षायोग ग्रहण करना और चार-चार महिनों में नन्दीश्वर करना सो यह मास श्रमणकल्प है।

पर्या : पर्युपासन को पर्या कहते हैं। निषद्य का स्थान और पंचकल्याणक स्थानों को उपासना करना पर्या है।

प्रश्न—पिच्छिका—प्रतिलेखन के कितने गुण हैं नाम बताइए ?

उत्तर—

रजसेदाणमगहणं मद्दव सुकुमालदा लहुत्तं च।
जत्थेदे पंचगुणा तं पडिलिहणं पसंसंति।।९१२।।

धूलि को ग्रहण नहीं करना एक गुण है, पसीना ग्रहण नहीं करना दूसरा गुण है, चक्षु में फिराने पर भी पीड़ा नहीं करना अर्थात् मृदुता तीसरा गुण है, सुकुमारता चौथा गुण है अर्थात् यह देखने योग्य, सुन्दर और कोमल है, तथा उठाने में या किसी वस्तु को परिर्मािजत करने आदि में हल्की है अत: इसमें लघुत्व है जो पाँचा गुण है। जिस प्रतिलेखन में ये पाँच गुण पाये जाते हैं उस मयूरपंखों के प्रतिलेखन—पिच्छिका के ग्रहण करने को ही गणधर देव आदि आचार्यगण प्रशंसा करते हैं और ऐसा प्रतिलेखन ही वे स्वीकार करते हैं।

प्रश्न— चक्षु से भी तो प्रर्मािजत किया जा सकता है तब पिच्छिका धारण करना किसलिए अनिवार्य है ?

उत्तर—

सुहुमा हु संति पाणा दुप्पलेक्खा अक्खिणो अगेज्झाहु।
तह्या जीवदयाए पडिलिहणं धारए भिक्खू।।९१३।।

बहुत से द्वीन्द्रिय आदि जीव तथा एकेन्द्रिय जीव अत्यन्त सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं देते हैं, चर्म चक्षु से ग्रहण नहीं किये जा सकते हैं। उन जीवों की दया हेतु व प्राणी संयम पालन हेतु मुनिराज मयूरपंखों की पिच्छिका ग्रहण करें।

प्रश्न—प्रत्येक क्रिया में साधु को पिच्छिका की क्यों आवश्यकता है ?

उत्तर—

उच्चारं पस्सवणं णिसि सुत्तो उट्ठिदो हु काऊण।
अप्पडिलिहिय सुवंतो जीववहं कुणदि णियदं तु।।९१४।।

जो साधु रात्रि में सोते से जाग कर अंधेरे में पिच्छिका के अभाव में परिमार्जन किये बिना मल—मूत्र कफ, आदि विसर्जन करके या करवट आदि बदलकर पुन: सो जाता है वह निश्चित ही जीवों को परितापन आदि पीड़ा पहुँचा देता है।

प्रश्न—पिच्छि लघु क्यों होनी चाहिए ?

उत्तर—

ण य होदि णयणपीडा अिंच्छ पि भमाडिदे दु पडिलेहे।
तो सुहुमादी लहुओ पडिलेहो होदि कायव्वो।।९१५।।

मयूर पिच्छ के प्रतिलेखन को आँखों में डालकर फिराने पर भी व्यथा नहीं होती है। इसलिए सूक्ष्मत्व आदि से युक्त लघु प्रमाण वाली ही पिच्छिका जीव—दया के लिए लेनी चाहिए।

प्रश्न—प्रतिलेखन के स्थान बताइए ?

उत्तर—

ठाणे चंकमणादाणे णिक्खेवे सयणआसण पयत्ते।
पडिलेहणेण पडिलेहिज्जइ िंलगं च होइ सपक्खे।।९१६।।

ठहरने में, चलने में, ग्रहण करने में, रखने में, सोने में, बैठने में साधु प्रतिलखेन से प्रयत्नपूर्वक परिमार्जन करते हैं क्योंकि यह उनके अपने (मुनि) पक्ष का चिन्ह है।

प्रश्न—पिच्छि निर्दोष वैâसे है बताइए ?

उत्तर— कार्तिक मास में मोर के पंख स्वयं झड़ जाते हैं, वे जीवघात करके नहीं लाये जाते हैं अत: ये पंख सर्वथा निर्दोष हैं और अत्यन्त कोमल हैं। जिस प्रकार से आहार की शुद्धि की जाती है अर्थात् उद्गम, उत्पादन आदि दोषों से रहित आहार लिया जाता है उसी प्रकार से उपकरण आदि की भी शुद्धि करनी चाहिए।

प्रश्न—पिच्छि चिन्ह से युक्त मुनि के आचरण का फल बताइए ?

उत्तर—

पोसह उवहोपक्खे तह साहू जो करेदि णावाए।
णावाए कल्लाणं चादुम्मासेण णियमेण।।९१७।।

जो साधु चातुर्मासिक उपवास और सांवत्सरिक उपवास के साथ कृष्ण चतुर्दशी तथा शुक्ल चतुर्दशी को हमेशा उपवास करते हैं वे कल्याण रूप परमसुख के भागी होते हैं अथवा जो साधु बिना बाधा के कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष में उपवास करते हैं फिर भी वे चातुर्मासिक नियम से ‘कल्याण’ नामक प्रायश्चित्त को प्राप्त होते हैं अथवा नहीं भी प्राप्त होते हैं, ऐसा सम्बन्ध करना।

ठाणणिसिज्जागमणे जीवाणं हंति अप्पणो देहं।
दसकत्तरिठाणगदं णिपिच्छे णत्थि णिव्वाणं।। कुन्द. मूला.

अर्थात् जो मुनि अपने पास पिच्छिका नहीं रखता है वह कायोत्सर्ग के समय , बैठने के समय, आने जाने के समय अपनी देह की क्रिया से जीवों का घात करता है अत: उसे मुक्ति नहीं मिलती। मुनि के लिए बिना पिच्छिका के दश पग से अधिक गमन करने पर प्रायश्चित्त का विधान है।

प्रश्न—जो साधु पिच्छि से शोधन नहीं करते हैं उन्हें कौन—सा प्रायश्चित्त है ?

उत्तर—

पिंडोवधिसेज्जाओ अवसोधिय जो य भुंजदे समणो।
मूलट्ठाणं पत्तो भुवणेसु हवे समणपोल्लो।।९१८।।
तस्स ण सुज्झइ चरियं तवसंजमणिच्चकालपरिहीणं।
आवासयं ण सुज्झइ चिरपव्वइयो वि जइ होई।।९१९।।

जो मुनि आहार, उपकरण, वसतिका आदि को बिना शोधन किये अर्थात् उद्गम—उत्पादन आदि दोषों से रहित न करके सेवन करते हैं वे मूलस्थान को प्राप्त करते हैं अर्थात् गृहस्थ हो जाते हैं और लोक में यतिपने से हीन माने जाते हैं। उसके तप और संयम में निरन्तर हीन चारित्र शुद्ध नहीं होता है इसलिए चिरकाल से दीक्षित हो तो भी उनके आवश्यक तक शुद्ध नहीं होते हैं।

प्रश्न—निरतिचार रूप से अहिंसा व्रतादि मूलगुणों का पालन करना श्रेष्ठ क्यों है ?

उत्तर—

मूलं छित्ता समणो जो गिण्हादी य बाहिरं जोगं।
बाहिरजोगा सव्वे मूलविहूणस्स विंâ करिस्संति।।९२०।।
हंतूण य बहुपाणं अप्पाणं जो करेदि सप्पाणं।
अप्पासुअसुहवंâखी मोक्खंवंâखी ण सो समणो।।९२१।।

जो श्रमण मूल का घात करके बाह्य योग को ग्रहण करता है उस मूल गुणों से हीन के वे सभी बाह्य योग क्या करेंगे ? जो बहुत से प्राणियों का घात करके अपने प्राणों की रक्षा करता है, अप्रासुक में सुख का इच्छुक वह श्रमण मोक्ष सुख का इच्छुक नहीं है। अत: चारित्र का पालन श्रेष्ठ है।

प्रश्न—अहिंसा व्रत पालन नहीं होने से जो दोष लगते हैं उन्हें दृष्टान्त द्वारा बताइए ?

उत्तर—

एक्को वावि तयो वा सीहो वग्घो मयो व खादिज्जो।
जदि खादेज्ज स णीचो जीवयरासिं णिहंतूण।।९२२।।

कोई सिंह अथवा व्याघ्र या अन्य हिंस्र प्राणी एक अथवा दो या तीन अथवा चार मृगों का भक्षण करते हैं तो वे हिंस्र प्राणी पापी कहलाते हैं। तब फिर जो अध: कर्म के द्वारा तमाम जीव समूह की विराधना करके आहार लेते हैं वे अधम क्यों नहीं हैं ? अर्थात् अधम ही हैं।

प्रश्न—प्राणियों का घात करने से किसका घात होता है ?

उत्तर—

आरंभे पाणिवहो पाणिवहे होदि अप्पणो हु वहो।
अप्पा ण हु हंतव्वो पाणिवहो तेण मोत्तव्वो।।९२३।।

पकाने आदि क्रियाओं के आरम्भ में जीवों का घात होता है और उससे आत्मा का घात होता है अर्थात् निश्चित ही नरक—तिर्यंच गति के दुख भोगना पड़ते हैं। और, आत्मा का घात करना ठीक नहीं हैं अतएव प्राणियों की हिंसा का त्याग कर देना चाहिए।

प्रश्न— अध: कर्म युक्त आहार लेकर तपस्या करते हैं तो वह वैâसे निरर्थक है ?

उत्तर—

जो ठाणमोणवीरासणेहिं अत्थदि चउत्थछट्ठेहिं।
भुंजदि आधाकम्मं सव्वे वि णिरत्थया जोगा।।९२४।।
िंक काहदि वणवासो सुण्णागारो य रुक्खमूलो वा।
भुंजदि आधाकम्मं सव्वे वि णिरत्थया जोगा।।९२५।।
िंक तस्स ठाणमोणं विंâ काहदि अब्भोवगासमादावो।
मोत्तिविहूणो समणो सिज्झदि ण हु सिद्धिवंâखो वि।।९२६।।
जह वोसरित्तु कत्तिं विसं ण वोसरदि दारुणो सप्पो।
तह को वि मंदसमणो पंच दु सूणा ण वोसरदि।।९२७।।

जो मुनि कायोत्सर्ग करते हैं, मौन धारण करते हैं, वीरासन आदि नाना प्रकार के आसन से कायक्लेश करते हैं, उपवास बेला, तेला आदि करते हैं किन्तु अध:कर्म से र्नििमत आहार ग्रहण कर लेते हैं उनके वे सभी योग अनुष्ठान और उत्तरगुण व्यर्थ ही हैं।

जो अध:कर्म युक्त आहार लेते हैं उनका वन में रहना, शून्य स्थान में रहना, अथवा वृक्ष के नीचे ध्यान करना क्या करेगा ? उनके सभी योग निरर्थक हैं।

उसके कायोत्सर्ग और मौन क्या करेंगे ? क्योंकि मैत्रीभाव से रहित वह श्रमण मुक्ति का इच्छुक होते हुए भी मुक्त नहीं होगा।

जिस प्रकार क्रूर सर्प कांचुली को छोड़कर के भी विष को नहीं त्यागता है, उसी प्रकार मन्द चारित्रवाला श्रमण पंचसूना को नहीं छोड़ता है।

प्रश्न—पंचसूना का नाम बताइए ?

उत्तर—

वंâडणी पीसणी चुल्ली उदवुंâभं पमज्जणी।
बीहेदव्वं णिच्चं ताहिं जीवरासी से मरदि।।९२८।।

मूसल आदि खंडनी, चक्की, चूल्हा, पानी भरना और बुहारी ये पाँच सूना हैं। हमेशा ही इनसे डरना चाहिए क्योंकि इनसे जीवसमूह मरते हैं।

प्रश्न—पुनरपि विशेष रीति से अध:कर्म के दोष बताइए ?

उत्तर—

जो भुंजदि आधाकम्मं छज्जीवाणं घायणं किच्चा।
अबुहो लोल सजिब्भो ण वि समणो सावओ होज्ज।।९२९।।
पयण व पायणं वा अणुमणचित्तो ण तत्थ बीहेदि।
जेमंतो वि सघादी ण वि समणो दिट्ठिसंपण्णो।।९३०।।
ण हु तस्स इमो लोओ ण वि परलोओ उत्तमट्ठभट्टस्स।
लिंगग्गहणं तस्स दु णिरत्थयं संजमेण हीणस्स।।९३१।।
पायछित्तं आलोयणं च काऊण गुरुसयासह्यि।
तं चेव पुणो भुंजदि आधाकम्मं असुहकम्मं।।९३२।।
जो जत्थ जहा लद्धं गेण्हदि आहारमुवधिमादीयं।
समणगुणमुक्कजोगी संसारपवड्ढओ होइ।।९३३।।
पयणं पायणमणुमणणं सेवंतो ण वि संजदो होदि।
जेमंतो वि य जह्या ण वि समणो संजमो णत्थि।।९३४।।

जो षट्काय के जीवों का घात करके अध: कर्म से बना आहार लेता है वह अज्ञानी लोभी जिह्वेन्द्रिय का वशीभूत श्रमण नहीं रह जाता, वह तो श्रावक हो जाता है।

जो पकाने या पकवाने में अथवा अनुमोदना में अपने मन को लगाता है उनसे डरता नहीं है वह आहार करते हुए भी स्वघाती है, सम्यक्त्व सहित श्रमण नहीं है। उस उत्तमार्थ से भ्रष्ट के यह लोक भी नहीं है और परलोक भी नहीं है। संयम से हीन उसका मुनि वेष ग्रहण करना व्यर्थ है।

जो गुरु के पास आलोचना और प्रायश्चित्त करके पुन: वही अशुभ क्रियारूप अध: कर्म युक्त आहार करता है उसका इहलोक और परलोक नहीं है।

जो जहाँ जैसा भी मिला वहाँ वैसा ही आहार, उपकरण आदि ग्रहण कर लेता है तो वह मुनि के गुणों से रहित हुआ संसार को बढ़ाने वाला है।

पकाना, पकवाना, और अनुमति देना—ऐसा करता हुआ वह संयत नहीं है। वैसा आहार लेता हुआ भी उस कारण से वह श्रमण नहीं है और न संयमी ही है।

प्रश्न— चारित्र से हीन मुनि का बहुत श्रुतज्ञान भी निरर्थक कैसे है ?

उत्तर—

बहुगं पि सुदमधीदं विंâ काहदि अजाणमाणस्स।
दीवविसेसो अंधे णाणविसेसो वि तह तस्स।।९३५।।

चारित्र का आचरण नहीं करने वाले उपयोग से रहित मुनि का पढ़ा गया बहुत—सा श्रुत भी क्या करेगा? जैसे नेत्रहीन मनुष्य के लिए दीपक कुछ भी नहीं करता है वैसे ही चारित्र से हीन मुनि के लिए ज्ञान विशेष भी कुछ नहीं कर सकता है।

प्रश्न— परिणाम के निमित्त से शुद्धि होती है इसका स्पष्टीकरण करें ?

उत्तर—

आधाकम्मपरिणदो फासुगदव्वे दि बंधगो भणिदो।
सुद्धं गवेसमाणो आधाकम्मे वि सो सुद्धो।।९३६।।

प्रासुक द्रव्य के होने पर भी जो साधु अध: कर्म के भाव से परिणत है। वह बन्ध को करने वाला हो जाता है, ऐसा आगम में कहा है। यदि पुन: कोई शुद्ध आहार का अन्वेषण करते भी अध: कर्म से युक्त आहार मिल गया तो भी वह शुद्ध है क्योंकि उसके परिणाम शुद्ध हैं। अर्थात् उद्गम आदि दोषों से रहित आहार की खोज में भी मिला अध: कर्म से युक्त सदोष आहार, यदि उसे मालूम नहीं है तो निर्दोष है।

प्रश्न— भाव दोष के भेद बताइए ?

उत्तर—

भावुग्गमोय दुविहो पसत्थपरिणाम अप्पसत्थोत्ति।
सुद्धे असुद्धभावो होदि उवट्ठावणं पायच्छित्तं।।९३७।।

भावोद्गम—भावदोष के दो भेद हैं—प्रशस्त परिणाम और अप्रशस्त परिणाम। उनमें से यदि शुद्ध वस्तु में अशुद्ध भाव करता है तो उसे उपस्थापना नाम का प्रायश्चित होता है।

प्रश्न— प्रासुक दान का फल बताइए ?

उत्तर—

फासुगदाणं फासुगउवधिं तह दो वि अत्तसोधीए।
जो देदि जो य गिण्हदि दोण्हं पि महप्फलं होई।।९३८।।

जो प्रासुक दान या प्रासुक उपकरण या दोनों को भी आत्मशुद्धि से देता है और ग्रहण करता है उन दोनों को ही महाफल होता है।

प्रश्न— चर्या आहारशुद्धि का व्याख्यान विस्तार से क्यों किया है ?

उत्तर—

जोगेसु मूलजोगं भिक्खाचरियं च वण्णियं सुत्ते।
अण्णे य पुगो जोगा विण्णाणविहीणएहिं कया।।९३९।।

सम्पूर्ण मूलगुणों में और उत्तर गुणों में प्रधानव्रत भिक्षा शुद्धि है। आहार की शुद्धिपूर्वक जो थोड़ा भी तप किया जाता है वह शोभन है। भिक्षाशुद्धि को त्यागकर जो मुनि योगादिक करते हैं वे विज्ञानरहित होकर चारित्ररहित किये हैं ऐसा समझना चाहिये। उनको परमार्थ का ज्ञान नहीं है ऐसा समझना चाहिए। आहारशुद्धि सहित थोड़ा भी योगादिक आचरण करना अच्छा है आत्महितकारक है और आहारशुद्धि से रहित होकर त्रिकालयोगादिक धारण करने पर भी आत्महित नहीं होता है।

प्रश्न— आहार—चर्या शुद्धि की प्रशंसा किस प्रकार करते हैं ?

उत्तर—

कल्लं कल्लं पि वरं आहारो परिमिदो पसत्थो य।
ण य खमण पारणाओ बहवो बहुसो बहुविधो य।।९४०।।

परिमित और प्रशस्त आहार प्रतिदिन भी लेना श्रेष्ठ है किन्तु चर्या शुद्धि रहित अनेक उपवास करके अनेक प्रकार की पारणाएँ श्रेष्ठ नहीं हैं।

प्रश्न— शुद्धयोग क्या है ?

उत्तर—

मरणभयभीरुआणं अभयं जो देदि सव्व्जीवाणं।
तं दाणाण वि दाणं तं पुण जोगेसु मूलजोगं पि।।९४१।।

जो मुनि मरण के भय से भीरु सभी जीवों को अभयदान देता है उसका अभयदान सर्वदानों में श्रेष्ठ है और सभी योगों में प्रधान योग है।

प्रश्न— गुणस्थान की अपेक्षा से चारित्र का माहात्म्य दृष्टान्त द्वारा निरूपण करें ?

उत्तर—

सम्मादिट्ठिस्य वि अवरिदस्स ण तवो महागुणो होदि।
होदि हु हत्थिण्हाणं चुंदच्छिदकम्म तं तस्स।।९४२।।

व्रत रहित सम्यग्दृष्टि का भी तप महागुणकारी नहीं है क्योंकि वह हाथी के स्थान के समान है। जैसे हाथी स्नान करके पुन: सूँड से धूली को लेकर अपने ऊपर डाल देता है उसी प्रकार तप के द्वारा कर्मों का अंश निर्जीण हो जाने पर भी असयंत के असंयम के कारण बहुत से कर्मों का आस्रव होता रहता है।

जैसे लकड़ी में छेद करने वाले वर्मा की रस्सी उसमें छेद करते समय एक तरफ से खुलती और दूसरी तरफ से बंधती रहती है उसी प्रकार से असयंत जन का तपश्चरण एक तरफ से कर्मों को नष्ट करता और असंयम द्वारा दूसरी तरफ से कर्मों को बाँधता रहता है। अर्थात् मंथन चर्मपालिका के समान वह तप संयमहीन तप होता है।

प्रश्न— शोभन क्रियाओं के संयोजन से कर्मक्षय होता है, ऐसा दृष्टान्त के द्वारा पुष्टि करें ?

उत्तर—

वेज्जादुरभेसज्जापरिचार य संपदा जहारोग्गं।
गुरुसिस्सरयणसाहण संपत्तीए तहा मोक्खो।।९४३।।

वैद्य, रोगी, औषधि और वैयावृत्त्य करने वाले—इनके संयोग से रोगी के रोग का अभाव हो जाता है वैसे ही गुरु—आचार्य, वैराग्य में तत्पर शिष्य, अंतरंग साधन सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रय तथा बाह्य साधन पुस्तक, पिच्छिका, कमण्डलु आदि के संयोग से ही मोक्ष होता है।

प्रश्न— उपर्युक्त दृष्टान्त को दाष्र्टान्त में घटित करें ?

उत्तर—

आइरिओ वि य वेज्जो सिस्सो रोगी दु भेसजं चरिया।
खेत्त बल काल पुरिसं णाऊण सणिं दढं कुज्जा।।९४४।।

आचार्य देव वैद्य हैं, शिष्य रोगी है, औषधि निर्दोष भिक्षा चर्या है, शीत, उष्ण, आदि सहित प्रदेश क्षेत्र हैं, शरीर की सामथ्र्य आदि बल है, वर्षा आदि काल हैं एवं जघन्य, मध्यम, तथा उत्कृष्ट भेद रूप पुरुष होते हैं। इन सभी को जानकर आकुलता के बिना आचार्य शिष्य को चर्या रूपी औषधि का प्रयोग कराए। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार वैद्य रोगी को आरोग्य हेतु औषधि प्रयोग कराकर स्वस्थ कर देता है।

प्रश्न— मोक्ष यात्रा के लिए आहार वैâसा होना चाहिए, द्रव्य शुद्धि बताइए ?

उत्तर—

भिक्खं सरीरजोग्गं सुभत्तिजुत्तेण फासुयं दिण्णं।
दव्वपमाणं खेत्तं कालं भावं च णादूण।।९४५।।
णवकोडीपडिसुद्धं फासुय सत्थं च एसणासुद्धं।
दसदोसविप्पमुक्वंâ चोद्दसमलवज्जियं भुंजे।।९४६।।
आहारेदु तवस्सी विगिंदगालं विगदगालं विगदधूमं च।
जत्तासाहणमेत्तं जवणाहारं विगदरागो।।९४७।।

सुभक्ति से युक्त श्रावक के द्वारा जो दिया गया है, अपने शरीर के योग्य है, प्रासुक है, नवकोटि से परिशुद्ध है, निर्दोष है, निन्दा आदि दोषों से रहित होने से प्रशस्त है, जो एषणा समिति से शुद्ध है, दश दोषों से र्विजत है एवं चौदह मल दोषों से रहित है ऐसे आहार को साधु द्रव्य प्रमाण, क्षेत्र, काल एवं भाव को जानकर ही ग्रहण करें।

अंगार दोष और धूम दोष रहित, मोक्ष यात्रा के लिए साधनमात्र और क्षुधा का उपशामक आहार वीतराग तपस्वी ग्रहण करें।

आसक्ति से युक्त आहार लेना अंगार दोष है और निन्दा करते हुए आहार लेना धूम दोष है। साधु इन दोषों से रहित आहार लेते हैं।

प्रश्न— साधु संयम का पालन करते हुए, व्यवहार शुद्धि का पालन जुगुप्सा परिहार किस प्रकार करते हैं ?

उत्तर—

ववहारसोहणाए परमट्ठाए तहा परिहरउ।
दुविहा चावि दुगंछा लोइय लोगुत्तरा चेव।।९४८।।
परमट्ठियं विसोहिं सुट्ठु पयत्तेण कुणइ पव्वइओ।
परमट्ठदुगंछा वि य सुट्ठु पयत्तेण परिहरउ।।९४९।।
संजममविराधंतो करेउ ववहार सोधणं भिक्खू।
ववहारदुगंछावि य परिहरउ वदे अभंजंतो।।९५०।।

निन्दा के दो भेद है : लौकिक और अलौकिक। लोक व्यवहार की शुद्धि के लिए सूतक आदि के निवारण हेतु लौकिक निन्दा का परिहार करना चाहिए। और परमार्थ के लिए रत्नत्रय की शुद्धि के लिए लोकोत्तर जुगुप्सा नहीं करना चाहिए।

साधु कर्मक्षय निमित्तक रत्नत्रय शुद्धि को अच्छी तरह प्रयत्नपूर्वक करें। तथा परमार्थ जुगुप्सा अर्थात् शंकादि दोषों का भी भलीभाँति प्रमाद रहित होकर त्याग करें।

साधु संयम की विराधना नहीं करें, व्यवहार शुद्धि का पालन करें, व्रतों में दोष नहीं लगाएँ और लोक निन्दा का परिहार करें।

प्रश्न— आत्मसाधना के लिए अयोग्य स्थान कौन—सा है ?

उत्तर—

जत्थ कसायुप्पत्तिर भत्तिंदियदारइत्थि जण बहुलं।
दुक्खमुवसग्गबहुलं भिक्खू खेत्तं विवज्जेज्ज।।९५१।।

जहाँ पर कषायों की उत्पत्ति हो, भक्ति न हो, इन्द्रियों के द्वार और स्त्रीजन की बहुलता हो, दु:ख हो, उपसर्ग की बहुलता हो उस क्षेत्र को मुनि छोड़ दें।

प्रश्न—आत्म साधना के लिए वैराग्य वर्धन स्थान कौन—सा है ?

उत्तर—

गिरिवंâदरं मसाणं सुण्णागारं च रुक्खमूलं वा।
ठाणं विराग बहुलं धीरो भिक्खु णिसेवेऊ।।९५२।।

धीर मुनि पर्वत की कन्दरा, श्मशान, शून्य मकान और वृक्ष के मूल ऐसे वैराग्य की अधिकता युक्त स्थान का सेवन करें।

प्रश्न—संयमियों को और भी किन क्षेत्रों का त्याग करना चाहिए ?

उत्तर—

णिवदिविहूणं खेत्तं णिवदी वा जत्थ दुट्ठओ होज्ज।
पव्वज्जा च ण लब्भइ संजमघादो य तं वज्जे।।९५३।।
णो कप्पदि विरदाणं विरदीणमुवासयह्यि चेट्टेदुं।
तत्थ णिसेज्जउवट्ठणसज्झायाहारवोसरणे।।९५४।।

जिस देश में, नगर में, ग्राम में, या घर में स्वामी न हो—सभी लोग स्वेच्छा से प्रवृत्ति करते हो अथवा जिस देश का राजा दुष्ट हो। जिस देश में शिष्य, श्रोता, अध्ययन करने वाले, व्रतों के रक्षण में तत्पर तथा दीक्षा को ग्रहण करने वाले लोग सम्भव न हों। व्रतों में बहुत अतीचार लगते हों, साधु ऐसे क्षेत्र का त्याग करें। र्आियकाओं के उपाश्रय में मुनियों का रहना उचित नहीं है। वहाँ पर बैठना, उद्वर्तन करना, स्वाध्याय, आहार और व्युत्सर्ग भी करना उचित नहीं है।

प्रश्न—आर्यिकाओं की वसतिका में मुनिराज को रहना उचित क्यों नहीं है ?

उत्तर—

होदिं दुगंछा दुविहा ववहारादो तधा य परमट्ठे।
पयदेण य परमट्ठे ववहारेण य तहा पच्छा।।९५५।।

व्यवहार से तथा परमार्थ से दो प्रकार से निन्दा होती है। र्आियकाओं के स्थान में आने जाने से मुनियों की निन्दा होती है यह व्यवहार जुगुप्सा है यह तो होती ही है, पुन: व्रतों में हानि होना परमार्थ जुगुप्सा है सो भी सम्भव है। यह न भी हो तो भी व्यवहार में निन्दा तो होती ही है।

प्रश्न—संसर्ग के गुण दोष बताइए ?

उत्तर—

वड्ढदि बोही संसग्गेण तह पुणो विणस्सेदि।
संसग्गविसेसेण दु उप्पलगंधो जहा वुंâभो।।९५६।।

सदाचार के सम्पर्वâ से सम्यग्दर्शन आदि की शुद्धि बढ़ जाती है, उसी प्रकार पुन: कुत्सित आचार वाले के सम्पर्वâ से नष्ट भी हो जाती है, जैसे कमल आदि के संसर्ग से घड़े का जल सुगन्धमय और शीतल हो जाता है और अग्नि आदि के संयोग से उष्ण तथा विरस हो जाता है।

प्रश्न—आत्मसाधना के इच्छुक का किनके साथ संसर्ग वर्जनीय है ?

उत्तर—

चंडो चवलो मंदो तह साहू पुट्ठिमंसपडिसेवी।
गारवकसाय बहुलो दुरासओ होदि सो समणो।।९५७।।
वेज्जावच्चविहूणं विणयविहूणं च दुस्सुदिकुसीलं।
समणं विरागहीणं सुजमो साधू ण सेविज्ज।।९५८।।
दंभं परपरिवादं णिसुणत्तण पावसुत्तपडिसेवं।
चिरपव्वइदं पि मुणी आरंभजुदं ण सेविज्ज।।९५९।।
चिरपव्वइदं पि मुणी अपुट्ठधम्मं असंपुडं णीचं।
लोइय लोगुत्तरियं अयाणमाणं विवज्जेज्ज।।९६०।।

जो साधु क्रोधी, चंचल, आलसी, चुगलखोर है एवं गौरव और कषाय की बहुलता वाला है वह श्रमण आश्रय लेने योग्य नहीं है। सुचारित्रवान् साधु वैयावृत्त्य से हीन, विनय से हीन, खोटे, शास्त्र से युक्त कुशील और वैराग्य से हीन श्रमण का आश्रय न लेवें। मायायुक्त, अन्य का निन्दक, पैशुन्यकारक, पापसूत्रों के अनुरूप प्रवृत्ति करने वाला और आरम्भसहित श्रमण चिरकाल से दीक्षित क्यों न हो तो भी उसकी उपासना न करें। मिथ्यात्व युक्, स्वेच्छाचारी, नीचकार्ययुक्त, लौकिक व्यापारयुक्त, लोकोत्तर व्यापार को नहीं जानते, चिरकाल से दीक्षित भी वाले मुनि को छोड़ देवें।

प्रश्न—पापश्रमण किसे कहते हैं ?

उत्तर—

आयरिय कुलं मुच्चा विहरिद समणो य जो दु एगागी।
ण य गेण्हदि उवदेसं पावस्समणोत्ति वुच्चदि दु।।९६१।।
आयरियत्तण तुरिओ पुव्वं सिस्सत्तणं अकाऊणं।
िंहडई ढुंढायरिओ णिरंकुसो मत्तहत्थिव्व।।९६२।।

जो श्रमण आचार्य संघ को छोड़कर एकाकी विहार करता है और उपदेश को ग्रहण नहीं करता है वह पापश्रमण कहलाता है। जो पहले शिष्यत्व न करके आचार्य होने की जल्दी करता है वह ढोंढाचार्य है। वह मदोन्मत्त हाथी के समान निरंकुश भ्रमण करता है।

आयरियकुलं मुच्चा विहरदि एगागिणो दु जो समणो।
अविगोण्हिय उवदेसं ण य सो समणो समणडोंबो।। कुन्द. मूला.

जो आचार्य कुल को छोड़कर और उपदेश को न ग्रहणकर एकाकी विहार करता है वह श्रमण डोंब है।

प्रश्न—दृष्टांत से संसर्गजन्य दोष को बताइए ?

उत्तर—

अंबो णिंबत्तणं पत्तो दुरासएण जहा तहा।
समणं मंदसंवेगं अपुट्ठधम्मं ण सेविज्ज।।९६३।।

आम का वृक्ष खोटी संगति से—नीम के संसर्ग से नीमपने को प्राप्त अर्थात् कटु स्वादवाला हो जाता है, उसी प्रकार जो श्रमण धर्म के अनुराग रूप संवेग में आलसी है, समीचीन से आचार से हीन है, खोटे आश्रय से सम्पन्न है उसका संसर्ग नहीं करो, क्योंकि आत्मा भी ऐसे संसर्ग से ऐसा ही हो जाएगा।

प्रश्न—पाश्र्वस्थ मुनि को किन शब्दों की उपमा देकर उनसे दूर रहने को कहा है ?

उत्तर—

बिहेदव्वं णिच्चं दुज्जणवयणा पलोट्टजिब्भस्स।
वरणयरणिग्गमं पिव वयणकयारं वहंतस्स।।९६४।।
आयरियत्तणमुवणायइ जो मुणि आगमं ण याणंतो।
अप्पाणं पि विणासिय अण्णे वि पुणो विणासेई।।९६५।।

दुर्जन के सदृश वचन वाले, यद्वा तद्वा बोलने वाले, नगर के नाले के कचरे को धारण करते हुए के समान मुनि से हमेशा डरना चाहिए। जो मुनि आगम को न जानते हुए आचार्यपने को प्राप्त हो जाता है वह अपने को नष्ट करके पुन: अन्यों को भी नष्ट कर देता है।

प्रश्न—अभ्यन्तर योगों के बिना बाह्य योगों की निष्फलता वैâसे है ?

उत्तर—

घोडयलद्दिसमाणस्स बाहिर बगणिहुदकरणचरणस्स।
अब्भंतरम्हि कुहिदस्स तस्स दु विंâ बज्झजोगेहिं।।९६६।।

घोड़े की लीद के समान अन्तरंग में निन्द्य और बाह्य से बगुले के सदृश हाथ पैरों को निश्चल करने वाले साधु के बाह्य योगों से क्या प्रयोजन ?

जो घोड़े की लीद के समान अन्तरंग में कुथित—निन्द्य—भावना युक्त एवं बाह्य में बगुले के समान हाथ पैरों को निश्चल करके खड़े हैं। मूलगुण से रहित हैं ऐसे मुनि को बाह्य वृक्षमूलादि योगों से कुछ भी लाभ नहीं है।

प्रश्न—‘मैं बहुत काल का श्रमण हूँ’ ऐसा गर्व क्यों नहीं करें ?

उत्तर—

मा होह वासगणणा ण तत्थ वासाणि परिगणिज्जंति।
बहवो तिरत्तवुत्था सिद्धा धीरा विरगपरा समणा।।९६७।।

वर्षों का गणना मत करो, मुझे दीक्षा लिए बहुत वर्ष हो गये हैं। मुझसे यह छोटा है, आज दीक्षित हुआ है। इस प्रकार से गर्व मत करो क्योंकि वहाँ मुक्ति के कारण में वर्षों की गिनती नहीं होती हैं। क्योंकि बहुतों ने तीन रात्रि मात्र ही चारित्र धारण किया है, किन्हीं ने अन्तर्मुहुर्त मात्र ही चारित्र का वर्तन किया है, किन्तु वैराग्य में तत्पर और सम्यग्दर्शन आदि में निष्कम्प होने से ऐसे श्रमण अतिशीघ्र ही अशेष कर्मों का निर्मूलन करके सिद्ध हो गये हैं।

प्रश्न—बन्ध और बन्ध के कारण को बताइए ?

उत्तर—

जोगणिमित्तं गहणं जोगो मणवयणकायसंभूदो।
भावणिमित्तो बंघो भावो रदिरागदोसमोहजुदो।।९६८।।

कर्मों का ग्रहण योग के निमित्त से होता है, वह योग मन वचन काय से उत्पन्न होता है। कर्मों का बन्ध भावों के निमित्त से होता है और भाव रति, राग, द्वेष एवं मोह सहित होता है।

प्रश्न—पुद्गल कर्मरूप वैâसे परिणमित होते हैं ?

उत्तर—

जीव परिणाम हेदू कम्मत्तण पोग्गला परिणमंति।
ण दु णाणपरिणदो पुण जीवो कम्मं समादियदि।।९६९।।
णाणविण्णाणसंपण्णो झाणज्झणतवेजुदो।
कसायगारवुम्मुक्को संसारं तरदे लहुं।।९७०।।

जीव के परिणाम के निमित्त से पुद्गल कर्मरूप से परिणमन करते हैं। ज्ञान—परिणत हुआ जीव तो कर्म ग्रहण करता नहीं है।

ज्ञान–विज्ञान से सम्पन्न एवं ध्यान—अध्ययन और तप से युक्त तथा कषाय और गौरव से रहित मुनि शीघ्र ही संसार को पार कर लेते हैं।

प्रश्न—स्वाध्याय की भावना से वैâसे संसार तिरा जाता है, बताइए ?

उत्तर—

सज्झायं कुव्वंतो पंचिदियसंपुडो तिगुत्तो य।
हवदि य एयग्गमणो विणएण समाहिओ भिक्खू।।९७१।।

विनय से सहित मुनि स्वाध्याय करते हुए पंचेन्द्रियों को संकुचित कर तीन गुप्तियुक्त और एकाग्रमना हो जाते हैं।

प्रश्न—स्वाध्याय का माहात्म्य बताइए ?

उत्तर—

बारसविधह्यि य तवे सब्भंतर बाहिरे कुसलदिट्ठे।
ण वि अत्थि ण वि य होहदि सज्झायसमं तवोकम्मं।।९७२।।
सूई जहा ससुत्ता ण णस्सदि दु पमाददोसेण।
एवं सुसुत्तपुरिसो ण णस्सदि तहा पमाददोसेण।।९७३।।

बारह प्रकार के तपों में स्वाध्याय के सदृश अन्य कोई तप कर्म न है और न होगा ही। अत: स्वाध्याय परमतप है, ऐसा समझकर निरन्तर उसकी भावना करना चाहिए।

जैसे सुई सूक्ष्म होती है फिर भी यदि वह धागे से पिरोई हुई है तो खोती नहीं हैं। प्रमाद के निमित्त से यदि वह वूâड़े—कचरे में गिर भी गयी है तो भी आँखों से दिख जाती है। उसी प्रकार से श्रुतज्ञान से समन्वित साधु भी नष्ट नहीं होता है, वह प्रमाद के दोष से भी संसार गर्त में नहीं पड़ता है।

प्रश्न—ध्यान के लिए उपकारी कौन हैं ?

उत्तर—

णिद्दं जिणेहि णिच्चं णिद्दा खलु नरमचेदणं कुणदि।
वट्टेज्ज हू पसुत्तो समणो सव्वेसु दोसेसु।।९७४।।

निद्राजय ध्यान के लिए उपकारी है। निद्रा नर को अचेतन कर देती है। क्योंकि सोया हुआ श्रमण सभी दोषों में प्रवर्तन करता है।

प्रश्न—एकाग्रचिन्तानिरोध ध्यान वैâसे करें ?

उत्तर—

जह उसुगारो उसुमुज्जु करई संपिंउियेहिं णयणेहिं।
तह साहू भावेज्जो चित्तं एयग्ग भावेण।।९७५।।

(१)जैसे धनुर्धर अपने लक्ष्य पर एकटक दृष्टि रखकर बाण सीधा उसी पर छोड़ता है वैसे ही साधु मन को एकाग्र कर आत्मतत्त्व का चिन्तवन करें।

(२)साधु शुभध्यान के लिए मन—वचन—काय की स्थिरवृत्ति रूप और पंचेन्द्रियों के निरोधरूप एकाग्रभाव द्वारा अपने मन के व्यापार को रोवेंâ अर्थात् अपने मन को किसी एक विषय में रमावें।

प्रश्न—आचार्य मुनिराज को ध्यान के लिए किस प्रकार सम्बोधित करते हैं ?

उत्तर—

कम्मस्स बंधमोक्खो जीवा जीवे य दव्वपज्जाए।
संसारसरीराणि य भोगविरत्तो सया झाहि।।९७६।।

हे मुने ! तुम भोगों से विरक्त होकर कर्म का, बन्ध मोक्ष का, जीव—अजीव का, द्रव्य—पर्यायों का तथा संसार और शरीर का हमेशा ध्यान करो।

प्रश्न—ध्यान में किस प्रकार िंचतन करते हैं ?

उत्तर—

दव्वे खेत्ते काले भावे य भवे य होंति पंचेव।
परिवट्टणाणि बहुसो अणादि काले य िंचतेज्जो।।९७७।।
मोहग्गिणा महंतेण दज्झमाणे महाजगे धीरा।
समणा विसयविरत्ता झायंति अणंत संसारं।।९७८।।

द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और भव ये पाँच संसार होते हैं, अनादिकाल से ये परिवर्तन अनेक बार किए हैं। ऐसा चिन्तवन करना चाहिए।

यह महाजगत् महान् मोहरूपी अग्नि से जल रहा है। धीर तथा विषयों से विरक्त श्रमण इस अनन्त संसार का चिन्तवन करते हैं।

प्रश्न—आरम्भ और कषाय सहित ध्यान हो सकता है क्या ?

उत्तर—

आरंभं च कसायं च ण सहदि तवो तहा लोए।
अच्छी लवणसमुद्दो य कयारं खलु जहा दिट्ठं।।९७९।।

जैसे नेत्र और लवण समुद्र अपने अन्दर पड़े हुए तृण आदि को नहीं सहन करते, किनारे कर देते हैं, उसी प्रकार से वह तपरूप चारित्र आरम्भ—परिग्रह का उपार्जन और कषायों को नहीं सहन करता है, इन्हें बाहर कर देता है। अर्थात् आरम्भ और कषायों के रहते हुए चारित्र तथा ध्यान असम्भव है।

प्रश्न—इन पंच परिवर्तनों को क्या उसी जीव ने किया है अथवा अन्य जीव ने ? यदि उसी जीव ने किया है, अन्य ने नहीं, तो क्यों ?

उत्तर—

जह कोइ सट्टिवरिसो तीस दिवरिसे णराहिवो जाओ।
उभयत्थ जम्मसद्दो वासविभागं विसेसेइ।।९८०।।
एवं तु जीवदव्वं अणाइणिहाणं विसेसियं णियमा।
रायसरिसो दुकेवलपज्जाओ तस्स दु विसेसो।।९८१।।

जैसे कोई साठ वर्ष का मनुष्य तीस वर्ष की आयु में राजा हो गया। दोनों अवस्थाओं में होने वाला जन्म शब्द वर्ष के विभाग की विशेषता प्रकट करता है।

जिसका जन्म हुआ है वही राजा हुआ है अत: उसके राजा होने के पहले और अनन्तर—दोनों अवस्थाओं में ‘जन्म’ शब्द का प्रयोग होता है यद्यपि ये दोनों अवस्थाएँ भिन्न हैं किन्तु जिसकी है वह अभिन्न है। इससे प्रत्येक वस्तु द्रव्य रूप से एक है तथा नाना पर्यायों में भिन्न—भिन्न है ऐसा समझता। वैसे ही एक जीव इन परिवर्तनों को करता रहता है उसकी नाना पर्यायों में भेद होने पर भी जीव में भेद नहीं रहता है।

दृष्टान्त को दाष्र्टान्त में घटित करते हुए कहते हैं—इसी प्रकार से जीवद्रव्य अनादि निधन है। वह नियम से विशेष्य है। किन्तु उसकी पर्याय केवल विशेष है जो कि राजा के सदृश है।

प्रश्न—पर्यार्यािथक नय की अपेक्षा से भेद का प्रतिपादन करें, जीव को विभिन्न निर्देशन करें ?

उत्तर—

जीवो अणाइणिहणो जीवोत्ति य णियमदो ण वत्तव्वो।
जं पुरिसाउगजीवो देवाउग जीविदविसिट्ठो।।९८२।।

जीव अनादि निधन है, वह जीव ही है ऐसा एकान्त से नहीं कहना चाहिए क्योंकि मनुष्य आयु से युक्त जीव देवायु से युक्त जीव से भिन्न है।

जैसे मनुष्यायु से युक्त जीव की अपेक्षा देवायु से युक्त जीव में भेद है। जो देव है वही मनुष्य नहीं है और जो मनुष्य है वह तिर्यंच नहीं है और जो तिर्यंच है वही नारकी नहीं है। अर्थात् पर्यायों के भेद से जीव में भी भेद पाया जाता है चूंकि प्रत्येक पर्याय कथंचित् पृथक—पृथक है।

प्रश्न—जीव की पर्यायों का वर्णन करें ?

उत्तर—

संखेज्जतमसंखेज्जमणंत कप्पं च केवलं णाणं।
तह रायदोसमोहा अण्णे वि य जीवपज्जाया।।९८३।।
अकसायं तु चरित्तं कसाय वसिओ असंजदो होदि।
उवसमदि जह्यि काले तक्काले संजदो होदि।।९८४।।

संख्यात को विषय करने वाले होने से मतिज्ञान और श्रुतज्ञान संख्येय हैं। असंख्यात को विषय करने वाले होने से अवधिज्ञान और मन:पर्यय ज्ञान असंख्येय—असंख्यात कहलाते हैं। अनन्त को विषय करने वाला होने से केवलज्ञान अनन्तकल्प कहलाता है। उसी प्रकार से जीव की राग, द्वेष और मोह पर्यायें हैं। अन्य भी नारक, तिर्यंच आदि तथा बाल, युवा वृद्धत्व आदि पर्यायें होती हैं।

कषाय रहित होना चारित्र है। कषाय के वश में हुआ जीव असंयत होता है जिस काल में उपशम भाव को प्राप्त होता है उस काल में यह संयत होता है। अर्थात् आत्मा ज्ञान प्रमाण है और ज्ञान ज्ञेय प्रमाण है। ज्ञेय लोकालोक प्रमाण है इसलिए ज्ञान सर्वगत माना गया है।

प्रश्न—कषाय के वशीभूत हुआ जीव असंयम को प्राप्त होता है, इसका स्पष्टीकरण करें ?

उत्तर—

वरं गणपवेसादो विवाहस्स पवेसणं।
विवाहे रागउप्पत्ती गणो दोसाणमागरो।।९८५।।

यति अंत समय में यदि गण में प्रवेश करेंगे तो शिष्यादिकों में मोह उत्पन्न होगा तथा मुनिकुल में मोह उत्पन्न होने के लिए कारणभूत ऐसे पाश्र्वस्थादिक पाँच मुनियों से संपर्वâ होगा। उन पाश्र्वस्थ के संपर्वâ की अपेक्षा से विवाह में प्रवेश करना अर्थात् गृह में प्रवेश करना अधिक अच्छा है क्योंकि विवाह में स्त्री आदिक परिग्रहों का ग्रहण होता है और उससे रागोत्पत्ति होती है। परन्तु गण तो सर्व दोषों का आकर स्थान है उसमें मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, रागद्वेषादिक उत्पन्न होते हैं। विवाह में मिथ्यात्व नहीं होगा केवल राग उत्पत्ति होती है परन्तु गण प्रवेश में तो सब दोष उत्पन्न होते हैं इसलिए मुनियों को कषाय से दूर रहना ही अच्छा है।

प्रश्न—कारण के अभाव में दोषों का अभाव हो जाता है स्पष्टीकरण कीजिए ?

उत्तर—

पच्चयभूदा दोसा पच्च्यभावेण णत्थि उप्पत्ती।
पच्चयभावे दोसा णस्संति णिरासया जहा बीयं।।९८६।।
हेदू पच्चयभूदा हेदुविणासे विणासमुवयंति।
तह्या हेदु विणासो कायव्वो सव्वसाहूहिं।।९८७।।
जं जं जे जे जीवा पज्जायं परिणमंति संसारे।
रायस्स य दोसस्स य मोहस्स वसा मुणेयव्वा।।९८८।।

कारण से दोष होते हैं, कारण के अभाव में उनकी उत्पत्ति नहीं होती है। प्रत्यय के अभाव से निराश्रय दोष नष्ट हो जाते हैं। जैसे कि बीज रूप कारण के बिना अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती। अभिप्राय यही है कि शिष्यादि के निमित्त से मोह—राग—द्वेष उत्पन्न होते हैं और उनके नहीं होने से नहीं होते हैं अत: दोषों से बचने के लिए उन्हें छोड़ देना चाहिए।

क्रोध, मान, माया, लोभ ये कषाय हेतु हें। इन लोभादिकों के होने पर ही परिग्रह आदि कार्य होते हैं। अत: इन हेतुओं के नष्ट हो जाने पर परिग्रहादि संज्ञाएँ भी नष्ट हो जाती हैं। सभी साधुओं को इन हेतुओं का विनाश करना चाहिए, क्योंकि लोभादि कषायों के नहीं रहने पर परिग्रह की इच्छा नहीं होती है। ये मूच्र्छा आदि परिणाम ही परिग्रह हैं, इन्हें दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।

संसार में जीव नरक, तिर्यंच आदि जिन—जिन पर्यायों को ग्रहण करते हैं, उन उन को रागद्वेष और मोह मोह के अधीन हुए ही ग्रहण करते हैं, क्योंकि सभी संसारिक पर्यायें कर्म के ही आधीन हैं।

प्रश्न—राग—द्वेष का फल क्या है ?

उत्तर—

अत्थस्स जीवियस्स य जिब्भोवत्थाण कारणं जीवो।
मरदि य मारावेदि य अणंतसो सव्वकाल तु।।९८९।।

गृह, पशु, वस्त्र, धन आदि के लिए तथा जीवन अर्थात् आत्मरक्षा के लिए जिह्वा अर्थात् आहार के लिए और उपस्थ अर्थात् कामभोग के लिए राग द्वेष से यह जीव स्वयं सदा ही अनन्त बार प्राण त्याग करता है और अनन्त बार अन्य जीवों का भी घात करता है।

प्रश्न—जिह्वा इन्द्रिय और कामेन्द्रिय जीतने हेतु किस प्रकार समझाते हैं ?

उत्तर—

जिब्भोवत्थणिमित्तं जीवो दुक्खं अणदिसंसारे।
पत्तो अणंतसो तो जिब्भोवत्थे जयह दाणिं।।९९०।।
चदुरंगुला च जिब्भा असुहा चदुरंगुलो उवत्थो वि।
अट्ठं गुलदोसेण दु जीवो दुक्खं खु पप्पोदि।।९९१।।

इस जीव ने इस अनादि संसार में जिह्वा इन्द्रिय और स्पर्शन इन्द्रिय के वश में होकर अनन्त बार दु:ख प्राप्त किया है। इसलिए हे मुने ! तुम इसी समय इस रसनेन्द्रिय और कामेन्द्रिय को जीतो। चार अंगुल की जिह्वा अशुभ है और चार अंगुल की कामेन्द्रिय भी अशुभ है। इन आठ अंगुलों के दोष से यह जीव निश्चित रूप से दु:ख प्राप्त करता है। अत: इन दोनों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करो।

प्रश्न—स्पर्शन जय क्यों करना चाहिए ?

उत्तर—

बीहेदव्वं णिच्चं कट्ठत्थस्स वि तिहत्थिरूवस्स।
हवदि य चित्तक्खाभो पच्चय भावेण जीवस्स।।९९२।।
घिदभरिद घडसरित्थो पुरिसो इत्थी बलंत अग्गिसमा।
तो महिलेयं ढुक्का णट्ठा पुरिसा सिवं गया इयरे।।९९३।।
मायाए वहिणीए धूआए मूइ वुड्ढ इत्थीए।
बीहेदव्वं णिच्चं इत्थीरूवं णिरावेक्खं।।९९४।।
हत्थपादपरिच्छिण्णं कण्णणासवियप्पियं।
अविवास सदिं णारिं दूरिदो परिवज्जए।।९९५।।

काठ, लेप, आदि कलाकृति में बने हुए भी स्त्री रूप से हमेशा भयभीत रहना चाहिए क्योंकि कारण के वश से अथवा उन पर विश्वास कर लेने से जीव के मन में चंचलता हो जाती है।

पुरुष घी के भरे हुए घड़े के सदृश है और स्त्री जलती हुई अग्नि के सदृश है। इन स्त्रियों के समीप हुए पुरुष नष्ट हो गये हैं तथा इनसे विरक्त पुरुष मोक्ष को प्राप्त हुए हैं।

माता, बहिन, पुत्री अथवा गूंगी या वृद्धा इन सभी स्त्रियों से डरना चाहिए। स्त्रीरूप की कभी भी अपेक्षा नहीं करना चाहिए। क्योंकि स्त्रियाँ अग्नि के समान सर्वत्र जलाती हैं।

तो हाथ—पैर या कान अथवा नाक से विकलांग हो, अथवा छिन्नपाद, नासिकाहीन होने से यद्यपि कुरूपा हो तथा वस्त्ररहित या नग्नप्राय हो उन्हें भी दूर से ही छोड़ देना चाहिए क्योंकि काम से मलिन हुए पुरुष इनकी भी इच्छा करने लगते हैं।

प्रश्न—ब्रह्मचर्य के भेदों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर—

मण बंभचेर वचि बंभचेर तह काय बंभचेरं च।
अहवा हु बंभचेरं दव्वं भावं ति दुवियप्पं।।९९६।।

मन से ब्रह्मचर्य के तीन भेद हैं। अथवा द्रव्य और भाव की अपेक्षा से दो प्रकार का ब्रह्मचर्य है। इनमें भाव ब्रह्मचर्य प्रधान है।

प्रश्न—द्रव्य ब्रह्मचर्य के साथ भाव ब्रह्मचर्य प्रधान क्यों है ?

उत्तर—

भावविरदो दु विरदो ण दव्वविरदस्स सुग्गई होई।
विसयवणरमणलोलो धरियव्वो तेण मणहत्थी।।९९७।।

भाव से विरत मनुष्य ही विरत है—क्योंकि द्रव्य विरत की मुक्ति नहीं होती है। इसलिए विषय रूपी वन में रमण करने में चंचल मन रूपी हाथी को बांधकर रखना चाहिए।

प्रश्न—अब्रह्म के कितने कारण हैं, नाम निर्देश करें ?

उत्तर—

पढमं विउलाहारं विदियं कायसोहणं।
तदियं गंधमल्लाइं चउत्थं गीयवाइयं।।९९८।।
तह सयणसोधणं पि य इत्थिसंसग्गं पि अत्थसंगहणं।
पुव्वरदिसरणमिंदियविसयरदी पणिदरससेवा।।९९९।।

अत्यधिक भोजन करना—अब्रह्मचर्य का यह प्रथम कारण है जो कि अब्रह्म कहलाता है। स्नान, उबटन आदि राग के कारणों से शरीर का संस्कार करना द्वितीय अब्रह्म है। सुगन्धित पदार्थ एवं पुष्पमाला आदि की सुगन्धि ग्रहण करना तृतीय अब्रह्म है। बांसुरी, वीणा, तन्त्री आदि वाद्यों का सुनना चतुर्थ अब्रह्म है। रूई के गद्दे, पलंग आदि एवं कामोद्रेक के कारणभूत क्रीडास्थल चित्रशाला आदि व एकान्त स्थानादि में रहना यह पाँचवा अब्रह्म है। चित्त में चंचलता उत्पन्न करती हुई स्त्रियों के साथ सम्पर्वâ रखना, उनके साथ क्रीड़ा करना छठा अब्रह्म है। सुवर्ण आदि का संग्रह करना सातवाँ अब्रह्म है। पूर्वकाल में भोगे हुए भोगों का स्मरण—चिन्तन करना आठवाँ अब्रह्म है। पाँचों इन्द्रियों के विषयों में रति करना नवम कारण है। इष्ट रसों का सेवन करना करना दसवां अब्रह्म है।

प्रश्न—दृढ़ ब्रह्मचर्य का स्वरूप बताइए ?

उत्तर—

दसविह मब्बंभमिणं संसार महादुहाण मावाहं।
परिहरइ जो महप्पा णो दढबंभव्वदो होदि।।१०००।।

जो महात्मा संसार के महादु:खों के लिए स्थान रूप उपरोक्त दस प्रकार के अब्रह्म का परिहार करता है वह दृढ़ ब्रह्मचर्यव्रती होता है।

प्रश्न—परिग्रह परित्याग का फल बताइए ?

उत्तर—

कोहमदमायलोहेहिं परिग्गहे लयइ संसजइ जीवो।
तेणुभयसंगचाओ कायव्वो सव्वसाहूहिं।।१००१।।

क्रोध, मान, माया, और लोभ के द्वारा यह जीव परिग्रह में आसक्त होता है, इसलिए सर्वसाधुओं को बाह्य एवं अन्तरंग उभय परिग्रह का त्याग कर देना चाहिए।

प्रश्न—श्रमण कौन होता है ?

उत्तर—

विस्संगो णिरारंभो भिक्खाचरियाए सुद्धभावो य।
एगागी झाणरदो सव्वगुणड्ढो हवे समणो।।१००२।।

जो नि:संग, निरारम्भ, भिक्षाचर्या में शुद्धभाव, एकाकी, ध्यानलीन और सर्वगुणों से युक्त हो वही श्रमण होता है।

प्रश्न—श्रमण के कितने भेद हैं ?

उत्तर—

णामेण जहा समणो ठावहिणए तह य दव्वभावेण।
णिक्खेवो वीह तहा चदुव्विहो होई णायव्वो।।१००३।।

नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव रूप से श्रमण के चार भेद हैं।

प्रश्न—भावश्रमण का स्वरूप निरूपण कीजिए ?

उत्तर—

भावसमणा हु समणा ण सेससमणाण सुग्गई जम्हा।
जहिऊण दुविह मुवहिं भावेण सुसंजदो होह।।१००४।।

भाव श्रमण ही श्रमण है क्योंकि शेष श्रमणों को कोक्ष नहीं है, इसलिए हे मुने, दो प्रकार के परिग्रह को छोड़ कर भाव से सुसंयत होओ।

प्रश्न—भिक्षा शुद्धि का प्रतिपादन करें ?

उत्तर—

वदसीलगुणा जम्हा भिक्खाचरिया विसुद्धिए ठंति।
तम्हा भिक्खाचरियं सोहिय साहू सदा विहारिज्ज।।१००५।।

भिक्षाचर्या की विशुद्धि के होने पर व्रत, शील, और गुण ठहरते हैं। इसलिए साधु भिक्षाचर्या का शोधन करके हमेशा विहार करें।

प्रश्न—किन गुणों से युक्त साधु को भगवन् कहते हैं ?

उत्तर—

भिक्वंâ वक्वंâ हिययं सोधिय जो चरदि णिच्च सो साहू।
एसो सुट्ठिद साहू भणिओ जिणसासणे भयवं।।१००६।।

जो आहार, वचन व हृदय का शोधन करके नित्य ही आचरण करते हैं वे ही साधु हैं। जिन शासन में ऐसे सुस्थित साधु भगवन् कहे गये हैं।

प्रश्न—साधु को जैन—शासन की क्या आज्ञा है ?

उत्तर—

दव्वं खेत्तं कालं भावं सत्तिं च सुट्ठु णाऊण।
झाणज्झयणं च तहा साहू चरणं समाचरऊ।।१००७।।

साधु द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और शक्ति को अच्छी तरह समझकर भलीप्रकार से ध्यान, अध्ययन और चारित्र का आचरण करें।

प्रश्न—त्याग का फल बताइए ?

उत्तर—

चाओ य होइ दुविहो संगच्चाओ कलत्तचाओ य।
उभयच्चायं किच्चा साहू सिद्धिं लहू लहदि।।१००८।।

त्याग दो प्रकार का है—परिग्रह त्याग और स्त्रीत्याग, दोनों का त्याग करके साधु शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न—पृथ्वी आरम्भ में किन जीवों की विराधना होती है ?

उत्तर—

पुढविकायिगजीवा पुढवीए चावि अस्सिदा संति।
तम्हा पुढवीए आरम्भे णिच्चं विराहणा तेसिं।।१००९।।

पृथ्वीकायिक जीव और पृथ्वी के आश्रित जीव होते हैं। इसलिए पृथ्वी के आरम्भ में उन जीवों की सदा विराधना होती है।

प्रश्न—असंयम का कारण क्या है ?

उत्तर—

तम्हा पुढवि समारंभो दुविहो तिविहेण वि।
जिण मग्गाणुचारीणं जावज्जीवं ण कप्पई।।१०१०।।

पृथ्वीकायिक आदि पंच स्थावर और त्रस की विराधना यही असंयम का कारण है।

पुढवि कायिगा जीवा पुढविं जे समासिदा।
दिट्ठा पुढविसमारंभे धुवा तेसिं विराधणा।।
आउकायिगा जीवा आऊं जे समस्सिदा।
दिट्ठा आउसमारंभे धुवा तेसिं विराधणा।।कुन्द. मूला.।

जलकायिक जीव और उसके आश्रित रहने वाले अन्य जो त्रस जीव हैं जल के गर्म करने, छानने, गिराने आदि आरम्भ से निश्चित ही उनकी विराधना होती है।

तेउकायिगा जीवा तेउं ते समस्सिदा।
दिट्ठा तेउसमारंभे धुवा तेसिं विराधणा।। कुन्द. मूला.।

अग्निकायिक जीव और अग्नि के आश्रित रहने वाले जीव हैं उनकी अग्नि बुझाने आदि आरम्भ से निश्चित ही विराधना होती है।

वाउकायिगा जीवा वाउं ते समस्सिदा।
दिट्ठा वाउसमारम्भे धुवा तेसिं विराधणा।। कुन्द. मूला.।

वायु कायिक जीव और उनके आश्रित रहने वाले जो त्रसजीव हैं उनकी वायु के प्रतिबन्ध करने या पंखा करना आदि आरम्भ से निश्चित ही विराधना होती है।

वणप्फदि काइगा जीवा वणप्फदिं जे समस्सिदा।
दिट्ठा वणप्फदिसमारंभे धुवा तेसिं विराधणा।। कुन्द. मूला.।

वनस्पतिकायिक जीव और उनके आश्रित रहने वाले जो जीव हैं, वनस्पति फल—पुष्प के तोड़ने, मसलने आदि आरम्भ से उनकी नियम से विराधना होती है।

जे तसकायिगा जीवा तसं जे समस्सिदा।
दिट्ठा तससमारंभे धुवा तेसिं विराधणा।।

जो त्रस कायिक जीव हैं और उनके आश्रित जो अन्य जीव हैं उन सबका घात पीडन आदि करने से नियम से उन जीवों की विराधना होती है।

(कुन्दकुन्दाचार्य कृत मूलाचार की अधिक गाथाएँ)

प्रश्न—मिथ्यात्व का कारण बताइए ?

उत्तर—

जो पुढविकाइजीवे णवि सद्दहदि जिणेहिं णिद्दिट्ठे।
दूरत्थो जिणवयणे तस्स उवट्ठावणा णत्थि।।१०११।।

जो जिनेन्द्र देव द्वारा कथित पृथवीकायिक आदि पंच स्थावर और उनके आश्रित जीवों को स्वीकार नहीं करता श्रद्धान नहीं करता है वह जिनवचन से दूर स्थित है। उसके भी उपस्थापना नहीं होती है वह भी मिथ्यादृष्टि ही है। उसकी मोक्षमार्ग में कदाचित् भी स्थिति नहीं है क्योंकि दर्शन के अभाव में चारित्र और ज्ञान का अभाव ही है।

प्रश्न—मिथ्यात्व की विशुद्धि किस प्रकार से होगी ?

उत्तर—

जो पुढविकाय जीवे अइसद्दहदे जिणेहिं पण्णत्ते।
उवलद्ध पुण्णपावस्स तस्सुवट्ठावणा अत्थि।।१०१२।।

जो जिनदेवों द्वारा प्रज्ञप्त पृथ्वीकायिक आदि पंचस्थावर एवं त्रस जीवों के अस्तित्व का अतिशय श्रद्धान करता है ऐसे पुण्य पाप के ज्ञात उस साधु की उपस्थापना होती है और मिथ्यात्व की विशुद्धि होती है।

प्रश्न—जो पंचस्थावर और त्रस जीवों को नहीं मानते, श्रद्धान नहीं करते उसका फल बताइए ?

उत्तर—

ण सद्दहदि जो एदे जीवे पुढविदं गदे।
स गच्छे दिग्घमद्धाणं लिगंत्थो वि हु दम्मदी।।१०१३।।

जो पृथ्वी कायिक पर्याय को प्राप्त जीवों को और उनके आश्रित जीवों को स्वीकार नहीं करता है, इसी प्रकार से जो जलकायिक, वायुकायिक, अग्निकायिक, वनस्पतिकायिक और त्रसकायिक तथा उनके आश्रित जीवों को स्वीकार नहीं करता है वह मुनिवेषधारी होकर भी दुर्मति है अत: दीर्घ संसार में ही भ्रमण करता रहता है।

प्रश्न—सम्पूर्ण जीवों की रक्षा हेतु गणधर देव ने भी तीर्थंकर परमदेव से किस प्रकार प्रश्न पूछे थे ?

उत्तर—

कधं चरे कधं चिट्ठे कधमासे कधं सये।
कधं भुंजेज्ज भासिज्ज कधं पावं ण बज्झदि।।१०१४।।

हे भगवन् कैसे आचरण करें, कैसे ठहरें, कैसे बैठें, कैसे सोवें, कैसे भोजन करें, एवं किस प्रकार बोलें, कि जिससे पाप से नहीं बंधे।

प्रश्न—श्री तीर्थंकर द्वारा गणधर जी को किस प्रकार से उत्तर प्राप्त होता है ?

उत्तर—

जदं चरे जदं चिट्ठे जदमासे जदं सये।
जदं भुंजेज्ज भासेज्ज एवं पावं ण बज्झइ।।१०१५।।

ईर्यापथशुद्धि से गमन करे। सावधानी पूर्वक खड़े हो। सावधानी पूर्वक देखकर और पिच्छिका से परिमार्जन करके पर्यंक आदि से बैठें। सावधानी पूर्वक पिच्छिका से प्रतिलेखन करके करवट बदलने रूप आदि क्रियाएँ करते हुए संकुचित गात्र करके रात्रि में शयन करें। सावधानीपूर्वक छयालीस दोष र्विजत आहार ग्रहण करें, तथा सावधानी पूर्वक सत्यव्रत से सम्पन्न होकर भाषा समिति के क्रम से बोलें। इस प्रकार से पाप का बन्ध नहीं होता है अर्थात् कर्मों का आस्रव रूक जाता है।

प्रश्न—यत्नपूर्वक गमन करने का फल क्या है।

उत्तर—

जदं तु चरमाणस्य दयापेहुस्स भिक्खुणो।
णवं ण बज्झदे कम्मं पोराणं च विधूयदि।।१०१६।।

यत्न पूर्वक चलते हुए, दया से जीवों को देखने वाले साधु के नूमन कर्म नहीं बंधते हैं और पुराने कर्म झड़ जाते हैं।

प्रश्न—समयसार अधिकार का उपसंहार किस प्रकार से करते हैं ?

उत्तर—

एवं विधाणचरियं जाणित्ता आचरिज्ज जो भिक्खू।
णासेऊण दु कम्मं दुविहं पि य लहु लहइ सिद्धिं।।१०१७।।

जो साधु इस प्रकार से विधानरूप चारित्र को जानकर आचरण करते हैं वे दोनों प्रकार के कर्मों का नाश करके शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं।