11.श्रावकाचार

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श्रावकाचार

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।।छठा अधिकार।।

(१) श्री आदिजिनेश्वर ऋषभनाथ और नृप श्रेयांस जग पूज्य हुए। इनमें पहले आदीश्वर जी व्रततीर्थ प्रवत्र्तक प्रथम हुए।। फिर उसी काल में नृप श्रेयांस ने दानतीर्थ की प्रवृति करी। इन दोनों से ही भरतक्षेत्र में धर्मतीर्थ की प्रवृति हुई।। (२) सम्यग्दर्शन और ज्ञान चरण इन तीनों का समुदाय धरम। कहलाता है और निश्चित ही यह मोक्षमार्ग का है कारण।। (३) जो प्राणी रत्नत्रयस्वरूप इस मोक्षमार्ग को नहिं धरते। वह मुक्ती नहीं प्राप्त करते इस जग में ही भ्रमते रहते।। (४) इस रत्नत्रय के एकदेश और सर्वदेश दो भेद कहे। इकदेश धर्म श्रावक के हैं अरु सर्वदेश मुनि के रहते।। (५) इस पंचमकाल में इन दोनों से धर्म मार्ग की प्रवृत्ति है। इसलिए धर्म के कारण में श्रावक की पहले गिनती है।। (६) इस पंचमकाल में श्रावकगण जिनमंदिर आदिक बनवाते। मुनियों को दे आहारदान दोनों विध धर्म निकट जाते।। इसलिए कहा आचार्यों ने है गृहीधर्म भी अति उत्तम। क्योंकी मुनिधर्म ग्रहण करने में श्रावक ही बनते कारण।। ।।षट् आवश्यक कर्म।। (७) जिनपूजा गुरु की उपासना स्वाध्याय और संयम तप है। अरु दान मिलाकर श्रावक के षट्कार्य मुनीश्वर कहते हैं।। सामायिक का लक्षण (८) सब प्राणी में समता रखना संयम धारण के भाव रखे। और आर्त रौद्र दुध्र्यानों का जो त्याग करे सामायिक है।। (९) जिस प्राणी का चित व्यसनों में हो रहा मलिन निंह कर सकता। सामायिक का जो आकांक्षी वह सप्त व्यसन को है तजता।। ।।सप्त व्यसनों के नाम।। (१०) खेले जो जुआँ, अरु मांस, मद्य, वेश्यासेवन, चोरी, शिकार। परस्त्री सेवन सप्त व्यसन ये महापाप इनको तू त्याग।। (११) जो जीव धर्म का अभिलाषी उसके यदि सप्तव्यसन होवे। तो उसमें धर्म धारने की योग्यता कभी भी नहिं होवे।। (१२) जिस तरह व्यसन हैं सात नरक भी सात कहे आचार्यों ने। अपनी वृद्धी के लिए करे आकर्षित वह ले जाने में।। (१३) सप्तांग सैन्यबल से राजागण जैसे युद्ध जीतते हैं। वैसे ही पापमयी राजा धर्मरूपी युद्ध जीतते हैं।। ले सप्त व्यसन की सेना फिर वे करे चढ़ाई धर्मी पर।। यदि उसके वश में हो जाए, भोगें दुख दुर्गति में जाकर।। (१४) जो भव्य पुरुष जिन भगवन का भक्तीपूर्वक दर्शन करता। उनकी पूजा स्तुति करता फिर सारा लोक उन्हें नमता।। (१५) लेकिन जो प्राणी जिनवर की भक्ति पूजा स्तुति न करे। उसका सारा जीवन निष्फल आचार्य उन्हें धिक्कार रहे।। (१६) प्रात: उठकर जिन देव तथा गुरु का दर्शन करना चहिए। भक्तीपूर्वक वंदना करे फिर धर्मश्रवण करना चहिए। (१७) इसके पश्चात् अन्य गृह संबंधी कार्यों को पूर्ण करे। क्योंकि धर्मार्थ काम अरु मोक्ष में धर्म ही पहला कर्म कहे।। (१८) गुरुओं की कृपा दृष्टि से ही ये ज्ञानरूप दो नेत्र मिले। जिससे सारे पदार्थ दिखते हस्तरेखा सम जब ज्ञान मिले।। (१९) जो गुरुओं को गुरु नहिं माने नहिं सेवा अरु वंदना करे। निज जीवन में कर प्राप्त दिवाकर अंधकार में सतत रहे।। (२०) जो श्रावक निष्कलंक गुरुओं से लिखित शास्त्र को नहिं पढ़ते। वे नेत्र सहित होने पर भी अंधे के ही समान दिखते।। (२१) जिस नर ने गुरु के सन्निध रह नहिं शास्त्र सुना अरु नहिं धारा। उनके नहिं कान और मन है ऐसा गुरुओं ने है माना।। (२२) जीवों की रक्षा अरु मन एवं इंद्रिय पर संयम रखना। यह एकदेशव्रत संयम है इसका मन से पालन करना।। क्योंकी संयम को पाले बिन व्रत फलीभूत नहिं हो सकते। इसलिए श्रावकों को इसका पालन कर स्वर्ग मोक्ष मिलते।। (२३) श्रावकगण मद्य मांस मधु एवं पंच उदुम्बर त्याग करें। सम्यग्दर्शनपूर्वक हो त्याग ये अष्टमूलगुण कहे गये।। (२४) बारह व्रत कहे गृहस्थों के जो इनका पालन करते हैं। वे पाँच अणुव्रत तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत हैं।। (२५) अष्टमी चतुर्दशि पर्वों में जो यथाशक्ति उपवास करे। रात्रि में भोजन नहिं करता और छना हुआ जल पान करे।। (२६) सम्यग्दृष्टी श्रावक ऐसे धन का नर का आश्रय न करें। एवं उस देश नहीं जाएं जहाँ सम्यग्दर्श मलिन होवे।। (२७) भोगोपभोग परिमाण करे यह कहा हमारे मुनियों ने। विद्वान लोग इस व्रत के बिन नहिं रहें एक क्षण जीवन में।। (२८) हे भव्यजीव ! आलस्य रहित हो रत्नत्रय का आश्रय लो। जिससे आगे जन्मान्तर में श्रद्धा की दिन-दिन वृद्धी हो।। (२९) जो जैनधर्म के अनुयायी उनको स्व योग्यता के नुसार। पाँचों परमेष्ठि और रत्नत्रयधारी की समयानुसार।। श्रद्धा अरु विनय अवश्य करे जिससे बोधी की प्राप्ती हो। गुरुओं की जो जन विनय करें उनकी भवभ्रमण समाप्ती हो।। (३०) इस विनय से रत्नत्रय एवं तप आदिक की प्राप्ती होती। गणधर आदिक जो महापुरुष कहते मुक्ती उसको वरती।। (३१) श्रावकजन यथाशक्ति अपनी, सत्पात्र में दान अवश्य करें। बिन दान गृहस्थपना निष्फल ऐसा सूरीगण हमें कहें।। (३२) निग्र्रंथ साधुओं को जो जन चारों प्रकार आहार न दे। उनके घर कारागृह सदृश केवल बंधन के लिए बने।। (३३) जिससे यतिवर को सुख पहुँचे वह चार दान ये कहे गये। औषध आहार अभय अरु शास्त्रदान से ख्याति बहुत होवे।। (३४) धन आदिक से समर्थ होकर भी यति को दान नहीं देता। वह मूढ़ पुरुष अगले भव में निज सुख को स्वयं नष्ट करता।। (३५) जो गृह आश्रम है दान रहित वह पत्थर की नौका सम है। क्योंकी पत्थर से बनी नाव डूबेगी ही कहता जन है।। (३६) जो सज्जन में शक्त्यानुसार वात्सल्य भाव नहिं रखते हैं। वह धर्म पराङ्मुख आत्मा को ही प्रबल पाप से ढ़कते हैं।। (३७) करुणापूरित उपदेशों से भी जिनके मन में दया नहीं। वे मनुज धर्म के पात्र कभी भी नहिं हो सकते कहा यही।। (३८) यह धर्मरूप तरु की जड़ है सब व्रत में मुख्य कहा इसको। यह दया सर्व संपति का घर और गुण की खान कहें इसको।। (३९) जिस तरह पूâल के हारों को धागे से बाँधा जाता है। वैसे ही प्राणी में समस्त गुण दया भाव से आता है।। (४०) मुनियों और श्रावक के जितने व्रत प्रभु के द्वारा कहे गए। वे सभी अिंहसा की प्रसिद्धि के लिए जिनेन्द्र प्रभू ने कहे।। (४१) केवल प्राणी को पीड़ा देने से ही पाप नहीं होता। बल्कि संकल्पसहित जो िंहसा से भी भाव मलिन होता।। वह मर जावे तो अच्छा हो अथवा मैं उसको मारूंगा। इत्यादि भाव से भी िंहसा का दोष लगे सो बंध होगा। (४२) द्वादश अनुप्रेक्षा का िंचतन श्रावकजन को करना चहिए। इससे सब कर्म नष्ट होते इसलिए मनन करना चहिए।। ।।बारह भावनाओं के नाम।। (४३) अध्रुव अशरण संसार और एकत्व अन्यत्व भावना है। अशुचित्व और आस्रव संवर निर्जरा लोक ये सब दश हैं।। (४४) ग्यारहवीं कही बोधिदुर्लभ बारहवीं धर्म अनुप्रेक्षा। जिनपुंगव द्वारा कही गयी इनसे रोके मन की इच्छा।। ।।अनित्य भावना।। (४५) प्राणी के सभी शरीर और धन धान्य पदार्थ विनाशी हैं। इसके नशने पर शोक न कर यह दुख से बंध स्वभावी हैं।। ।।अशरण भावना।। (४६) जिस मृग के बच्चे का शरीर व्याघ्री ने कसकर पकड़ लिया। निर्जन वन में इस बच्चे को नहिं कोई बचाने योग्य मिला।। वैसे ही आपत्ती आने पर इंद्र नरेन्द्र न बचा सवेंâ। इसलिए धर्म के बिना नहीं कोई शरणा हम जिसे लहें।। (४७) जो िंकचित सुख मालुम होता वह सुखाभास सुख के समान। जो दुख है सत्य वही है बस, सच्चा सुख मुक्ती का निधान।। ।।एकत्व भावना।। (४८) यदि निश्चय से देखा जाए संसार में जीव का कोई नहीं। सब कर्म के फल को भोग रहे ना स्वजन कोई ना परजन ही। ।।अन्यत्व भावना।। (४९) आत्मा शरीर की स्थिति तो है क्षीर नीर सम मिली हुई। फिर भी हैं भिन्न परस्पर में स्त्री पुत्रादिक वैसे ही।। ।।अशुचित्व भावना।। (५०) यह काया कृमि धातू मल आदिक अशुचि वस्तु से भरी हुई। इसके संबंध से अन्य वस्तुएँ अपवित्रता को प्राप्त हुर्इं।। ।।आश्रव भावना।। (५१) इस भव समुद्र में जीवरूप नौका छिद्रों से युक्त सही। मिथ्यात्वादिक कषाय रूपी छिद्रों में कर्म जल आश्रव ही।। अपने विनाश के लिए कर्म को ग्रहण करे वह आश्रव है। इसके स्वरूप को जान इसे जो त्यागे वह श्रावक है।। ।।संवर भावना।। (५२) कर्मों का आश्रव रुक जाना वह ही निश्चय से संवर है। मन वचन काय की अशुभ वृत्ति को वश करना भी संवर है।। ।।निर्जरा भावना।। (५३) पहले से संचित कर्मों का इकदेश रूप से नश जाना। है वही निर्जरा कहलाती संसार भोग को भी तजना।। वैराग्य बढ़ाने वाले तप अनशन अवमौर्यादिक ही है। मुनिवर ये तप धारण करते जिनके न मोह मायादिक हैं।। ।।लोक अनुप्रेक्षा।। (५४) यह सर्व लोक है विनाशीक अध्रुव है दुख करने वाला। ऐसा विचार कर श्रावक को है कहा मुक्ति में रम जाना।। ।।बोधिदुर्लभ भावना।। (५५) रत्नत्रय की जो प्राप्ती है वह बोधि भावना कहलाती। यह बोधि प्राप्ति अति दुर्लभ है उससे भी कठिन रक्षा उसकी। ।।धर्म भावना।। (५६) जिनधर्म को पाना बहुत कठिन जो ज्ञानानंद स्वरूप कहा। मुक्ती पर्यंत साथ जाए ऐसी रीती से धरो सदा।। (५७) संसार रूप खारे समुद्र से यदि तिरने की इच्छा है। तो धर्मपोत ही पार करे ऐसी गणधर की शिक्षा है।। नाना प्रकार के दुखरूपी जो नक्र मकर से व्याप्त सदा। ऐसे समुद्र को तिरने में आश्रय है धर्मजहाज सदा।। (५८) जो सज्जन जन अनुप्रेक्षाओं का बार बार िंचतवन करें। वे पुण्य उपार्जन करते हैं और स्वर्ग मोक्ष में हेतु कहें।। (५९) जिसकी आदी में क्षमा धर्म दश भेद रूप वह होता है। श्रावक को यथाशक्ति आगम अनुरूप पालना होता है। (६०) चैतन्य स्वरूप विशुद्धात्मा तो अंतस्तत्व कहाती है। और सब प्राणी में दयाभाव से बाह्य तत्त्व बन जाती है।। इन दोनों के सम्मेलन से ही मोक्षमार्ग की प्राप्ती हो। दोनों तत्वों का भलीभाँति आश्रय ले मोक्ष अभिलाषी जो।। (६१) कर्मों से कर्मों के कार्यों से जो होता सर्वथा भिन्न। वह चिदानंद चैतन्य रूप अविनाशी और आनंद स्वरूप।। इस नित्यानंदमयी पद को देने वाली इस आत्मा का। ज्ञानीजन को िंचतवन सदा करना चहिए परमात्मा का।। (६२) इस तरह ‘‘पद्मनंदी मुनि’’ ने श्रावकाचार की रचना की। इसके अनुवूâल आचरण करने की जिसमें है प्रवृत्ति रही।। और उन्हीं मनुष्यों को तब ही इस निर्मल धर्म की प्राप्ती हो। इसलिए धर्म के अभिलाषी की सदा धर्म में प्रवृत्ति हो।।

।।इति उपासक संस्कार (श्रावकाचार) अधिकार।।