11.संयम मार्गणा

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

प्रश्न-1- संयम किसे कहते हैं?

उत्तर- सम्यक् प्रकार के यम को संयम कहते हैं । (ध 7 / 7)
व्रतों का धारण, समिति का पालन, कषायों का निग्रह, दण्डों का त्याग तथा पंचेन्द्रिय पर जय प्राप्त करना संयम है । (गो.जी. 465)

प्रश्न-2- संयम कितने प्रकार का होता है?

उत्तर- संयम दो प्रकार का होता है - ( 1) देशसंयम (2) सकलसंयम ।

( 1) अपहृत संयम (2) उपेक्षा संयम ।

( 1) इन्द्रिय संयम (2) प्राणी संयम ।

अथवा - संयम (चारित्र) पाँच प्रकार का होता है -

( 1) सामायिक (2) छेदोपस्थापना ( 3) परिहारविशुद्धि ( 4) सूक्ष्मसाम्पराय (5) यथाख्यात संयम । (त. सू 9 / 18)

प्रश्न-3- देशसंयम आदि के क्या लक्षण हैं?

उत्तर-
(अ) देशसंयम : गृहस्थों का चारित्र उपासकाध्ययन आदि ग्रन्धों में कथित मार्ग से पंचम गुणस्थान के योग्य दान, शील, पूजा, उपवास आदि रूप होता है अथवा दार्शनिक आदि ग्यारह स्थानों रूप होता है । (पं. का. ता. 160)

(ब) सकलसंयम : समस्त प्रकार के परिग्रह से रहित मुनियों का सकल चारित्र है । (र.क.श्रा.50) मुनियों का चारित्र आचारांग आदि चारित्र विषयक प्रन्धों में कथित मार्ग से प्रमत्त और अप्रमत्त इन दो गुणस्थानों के योग्य पच महाव्रत, पंचसमिति, त्रिगुप्ति, छह आवश्यक आदि रूप होता है । यही सकल संयम है । (पं. का. ता. 160)

(स) उपेक्षासंयम : देश और काल के विधान को समझने वाले स्वाभाविक रूप से शरीर से विरक्त और तीन गुतियों के धारक व्यक्ति के राग और द्वेष रूप चित्तवृत्ति का न होना उपेक्षा संयम है ।

(द) अपहतसंयम : उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य के भेद से यह तीन प्रकार का है ।

  1. उत्कृष्ट : प्रासुक वसति और आहारमात्र हैं बाह्य साधन जिनके तथा स्वाधीन हैं ज्ञान और चारित्ररूप करण जिनके ऐसे साधु का बाह्य जन्तुओं के आने पर उनसे अपने को बचा कर संयम पालना उत्कृष्ट अपहतसंयम है ।
  2. मृदु उपकरण से जन्तुओं का परिहार करना मध्यम तथा अन्य उपकरणों की इच्छा रखने वाले के जघन्य अपहतसंयम होता है । (रा.वा. 9 / 6)

(य) इन्द्रिय संयम : शब्दादि जो इन्द्रियों के विषय हैं उनमें राग का अभाव सो इन्द्रिय संयम है ।

(र) प्राणिसंयम : एकेन्द्रियादि प्राणियों की पीड़ा का परिहार प्राणिसंयम है । (रा. वा. 9 / 6)

प्रश्न-4- संयम मार्गणा किसे कहते हैं?

उत्तर- संयम में जीवों की खोज करना संयम मार्गणा है ।

प्रश्न-5- संयम मार्गणा कितने प्रकार की होती है?
उत्तर- संयम मार्गणा सात प्रकार की होती है -

(1) सामायिक संयम (2) छेदोपस्थापना (3) परिहारविशुद्धि (4) सूक्ष्मसाम्पराय ( 5) यथाख्यात संयम (6) संयमासंयम ( 7) असंयम । ( ध 1 / 368)

प्रश्न-6- संयम मार्गणा में संयम-संयमासंयम और असंयम तीनों का ग्रहण है इसलिए इस मार्गणा का नाम संयम मार्गणा देना युक्त नहीं है? उत्तर- नहीं, क्योंकि 'आम्रवन' वा 'निम्बवन' इन नामों के समान प्राधान्य पद का आश्रय लेकर संयमानुवाद से' अर्थात् संयम मार्गणा यह व्यपदेश करना युक्तियुक्त हो जाता है । ( ध 4 / 287)

प्रश्न-7- सामायिक संयम किसे कहते हैं?

उत्तर-अभेद रूप से पाँच पाप की बुद्धि न होना सामायिक संयम है । (आ. सा. 5)
हिंसा, झूठ, चोरी आदि सभी सावद्य योगों का अभेद रूप से सार्वकालिक या नियमित समय तक त्याग करना सामायिक संयम है । (रा. वा. 2)

व्रतधारण आदि संयम में संग्रह नय की अपेक्षा से एकयम-भेद रहित होकर अर्थात् अभेद रूप से "मैं सर्व सावद्य त्यागी हूँ" इस तरह से जो सम्पूर्ण सावद्य का त्याग करना इसको सामायिक संयम कहते हैं । (गो. जी. 470)

प्रश्न-8- छेदोपस्थापना संयम किसे कहते हैं?

उत्तर-किसी देश काल के कारण वा किसी की रुकावट के कारण वा प्रमाद से अथवा और किसी कारण से यदि स्वीकार किये हुए व्रतों में अतिचार लग जावे तो अपनी निन्दा- गर्हा आदि के द्वारा प्रायश्चित्त धारण कर उस अतिचार का शोधन करना, दोषों को शुद्ध करना छेदोपस्थापना संयम है । ( मू. प्र. 2973 - 74)

प्रश्न-9- परिहारविशुद्धि संयम किसे कहते हैं?

उत्तर-प्राणिवध की निवृत्ति को परिहार कहते हैं । इससे युक्त शुद्धि जिस चारित्र में होती है वह परिहारविशुद्धि चारित्र है । (सर्वा. 9 / 18)

जिस संयम में दोषों के परिहार-निराकरण से शुद्धि होती है, वह परिहार विशुद्धि संयम हे । (आ. सा. 5 / 142)

प्रश्न-10- सूक्ष्मसाम्पराय संयम किसे कहते हैं?

उत्तर-

  1. जिस चारित्र में कषाय अतिसूक्ष्म हो वह कम साम्पराय चारित्र है । (सर्वा. 9 / 18)
  2. सूक्ष्म अतीन्द्रिय निज शुद्धात्मा के बल से न्ल्यू लोभ नामक साम्पराय-कषाय का पूर्ण रूप से उपशमन वा क्षपण सो ख्त साम्पराय चारित्र है । (वृ. द्र. सं. 35)
  3. मोह कर्म का उपशमन या क्षपण करते हुए न्ल्यू लोभ का वेदन करना न्ल्यू साम्पराय संयम है । ७- 1? 375)

प्रश्न-11- यथाख्यात संयम किसे कहते हैं?

उत्तर-समस्त मोहनीय कर्म के उपशमन या क्षय से जैसा आत्मा का स्वभाव है उस अवस्था रूप जो चारित्र है वह यथाख्यात चारित्र है । जिस प्रकार आत्मा का स्वभाव अवस्थित है उसी प्रकार यह कहा गया है, इसे यथाख्यात कहते हैं । (सर्वा. 9 / 18)
अशुभ रूप मोहनीय कर्म के उपशान्त अथवा क्षीण हो जाने पर जो वीतराग संयम होता है, उसे यथाख्यात संयम कहते है । (पं. सं. प्रा. 133)

प्रश्न-12- संयमासंयम संयम किसे कहते हैं?

उत्तर-चार सचलन और नव नोकषायों के क्षयोपशम सज्ञा वाले देशघाती स्पर्धकों के उदय से संयमासंयम की उत्पत्ति होती है । (ध. 7 / 94)

अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण रूप आठ कषायों के स्पर्धकों का उदयाभावी क्षय तथा आगामी काल में उदय आने वाले सर्वघातिस्पर्धकों का सदवस्था रूप उपशम, प्रत्याख्यान कषाय का उदय, संज्वलन कषाय के देशघाती स्थर्धकों का उदय और यथासम्भव नोकवाय का उदय होने पर विरत अविरत (संयमासंयम) परिणाम उत्पन्न करने वाला क्षायोपशमिक संयमासंयम होता है । ( रा. वा. 2 / 5)

प्रश्न-13- असंयम किसे कहते हैं?

उत्तर- जीव चौदह भेद रूप हैं और इन्द्रियों के विषय अट्ठाईस हैं । जीवघात से और इन्द्रियविषयों से विरत नहीं होने को असंयम कहते हैं । (गो. जी. 478)

चारित्रमोह के उदय से होने वाली हिंसादि (पापों) में और इन्द्रिय विषयों में प्रवृत्ति असंयम है । (रा. वा. २ / ६)

तालिका संख्या 37

सामायिक-छदोपस्थापना

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 1 मनुष्यगति
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रिय
3 काय 1 त्रस
4 योग 11 4 म. 4 व. 3 का. औदारिक तथा आहारकद्बिक होते हैं।
5 वेद 3 स्री. पु. नपुं.
6 कषाय 13 4 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 4 म. श्रु. अ. मन:
8 संयम 1 स्वकीय सामायिक में सामायिक......
9 दर्शन 3 च. अच. अव. केवलदर्शन नहीं है ।
10 लेश्या 3 पी. प. शु.
11 भव्य 1 भव्य
12 सम्यक्त्व 3 क्षा. क्षयो. उप.
13 संज्ञी 1 सैनी
14 आहार 1 आहारक
15 गुणस्थान 4 छठे से नौवें तक
16 जीवसमास 1 सैनी पंचेन्द्रिय
17 पर्याप्ति 6 आ.श.इ.श्वा.भा.म.
18 प्राण 10 5 इ. 3 बल, श्वा. आ.
19 संज्ञा 4 आ. भ. मै. पीर.
20 उपयोग 7 4 ज्ञानो. 3 दर्शनो.
21 ध्यान 8 3 आ. 4 ध. 1 शु. निदान आर्तध्यान नहीं है।
22 आस्रव 24 13 क. 11 योग
23 जाति १४ लाख मनुष्य सम्बन्धी
24 कुल १४ ला.क मनुष्य सम्बन्धी


प्रश्न-1- क्या सामायिक संयम वालों के भी वेद का अभाव हो सकता है?

उत्तर- हाँ , सामायिक संयम वाले के भी नवम गुणस्थान के अवेद भाग में वेद का अभाव हो जाता है ।

प्रश्न-2- छदोपस्थापना संयमी में कितनी कषायें होती हैं? उत्तर- छदोपस्थापना संयम में अधिक से अधिक 13 कषायें होती हैं - चार संज्वलन की तथा नौ नोकषाय की ।

प्रश्न-3- सामायिक संयमी मतिज्ञानी के कितने गुणस्थान होते हैं?

उत्तर-सामायिक संयमी मतिज्ञानी के छठे से नौवें गुणस्थान तक चार गुणस्थान होते हैं ।

प्रश्न-4- सामायिक संयम में शुक्ल लेश्या कहाँ- कहाँ पाई जाती है?

उत्तर-सामायिक संयम में शुक्ल लेश्या छठे गुणस्थान से नवमें गुणस्थान तक पाई जाती है ।
आठवें-नवमें गुणस्थान में मात्र शुक्ल लेश्या ही पाई जाती है ।

प्रश्न-5- सामायिक- छेदोपस्थापना संयमी को उपशम सम्यक्त्व कैसे हो सकता है क्योंकि उपशम सम्यक्त्व तो मिथ्यादृष्टि को ही होता है?

उत्तर-यह सत्य है कि प्रथमोपशम सम्यक्त्व मिथ्यादृष्टि को ही होता है लेकिन यदि कोई सादि या अनादि मिथ्यादृष्टि (द्रव्य से) मुनिलित्र धारण करने के बाद प्रथमोपशम सम्यक्त्व के साथ ही साथ तीन चौकड़ी कषायों का अभाव भी कर लेता है तो उसके प्रथमोपशम सम्यक्त्व के साथ ही साथ तीन चौकड़ी कषायों का अभाव भी कर लेता है तो उसके प्रथमोपशम सम्यक्त्व के साथ सामायिक-छेदोपस्थापना संयम हो जाता है । (सर्वा. के आधार से)
क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि मुनि यदि उपशम सम्बूकव प्राप्त करता है तो उसके द्वितीयोपशम सम्यक्त्व के साथ सामायिक- छेदोपस्थापना संयम बन जाता ।

प्रश्न-6- ऐसे कौन- कौन से स्थान हैं जहाँ सामायिक संयम के साथ सात प्राण नहीं हो सकते हैं?

उत्तर-पाँच स्थानों में सामायिक संयम के साथ सात प्राण नहीं होते हैं -

  1. सातवें गुणस्थान से नौवें गुणस्थान तक के सामायिक संयमी के ।
  2. चार मनोयोगी, चार वचनयोगी, औदारिक तथा आहारक काययघोईा के ।
  3. मनःपर्ययज्ञान वाले सामायिक संयमी के ।
  4. सीवेदी तथा नपुसक वेदी सामायिक संयमी के ।
  5. उपशम सम्बक्ल वाले सामायिक संयमी के ।

इन स्थानों में आहारक मिश्र काययोग नहीं बनता है इसलिए इनके सात प्राण नहीं हो सकते है ।


क्या ऐसे कोई सामायिक- छेदोपस्थापना संयमी हैं जिनके केवल दो संज्ञाएँ ० ०.

छ '

ही नवमें हप वाले सामायिक-छेदोपस्थापना

०'०' ० मात्र ०००८ दो संज्ञाएँ ही पाई जाती हैं । यहाँ सवेद भाग तक ही दो संज्ञाएँ समझना चाहिए ।

क्या ऐसे कोई सामायिक- छेदोपस्थापना संयम वाले हैं जिनके न आर्त्तध्यान होते हैं न शुक्ल ध्यान होते हैं?

ही, सप्तम गुणस्थानवर्ती सामायिक-छेदोपस्थापना संयम वालों के न आर्त्तध्यान होते हैं और न शुश्ता ध्यान, क्योंकि आर्त्तध्यान छठे गुणस्थान तक ही होते हैं और शुक्ल ध्यान आठवें गुणस्थान से प्रारम्भ होता है । सातवें गुणस्थान में मात्र धर्मध्यान ही होते हैं ।

क्या सामायिक संयम में एक संज्ञा भी हो सकती है?

उत्तर-ही, सामायिक संयम वालों के नवमें गुणस्थान की अवेद अवस्था में मात्र एक परिग्रह संज्ञा ही होती है ।

सामायिक- छेदोपस्थापना संयम में कम-से- कम कितने आसव के प्रत्यय होते ??

सामायिक छेदोपस्थापना संयम में कम- से- कम आसव के दस प्रत्यय होते हैं -

जब नवमें गुणस्थान में तीनों वेद एव सज्वलन क्रोध, मान, माया कषाय की म्युच्छित्ति हो जाती है तब चार मनोयोग, चार वचन योग, औदारिक काययोग तथा एक सज्वलन लोभ, ये आसव के दस कारण बचते हैं ।

सामायिक संयम में किन- किन स्थानों का मात्र एक- एक भेद पाया जाता है? सामायिक संयम में दस स्थानों का मात्र एक-एक भेद पाया जाता है?

गति इन्द्रिय - काय संयम

भव्यत्व -

मनुष्यगति (6) संज्ञी पंचेन्द्रिय (7) आहार त्रस काय (8) जीवसमास - सामायिक (9) जाति

भव्य (1०) कुल

सैनी आहारक सैनी पंचेन्द्रिय 14 लाख मनुष्य सम्बन्धी (एक गति सम्बन्धी) 14 लाख करोड़ (एक गति सम्बन्धी)


संयम मार्गणा? 211

तालिका संख्या 38

स्थान गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय ज्ञान संयम दर्शन लेश्या भव्यत्व सम्बक्ल संज्ञी आहार गुणस्थान

पर्याप्ति प्राण सज्ञा उपयोग ध्यान


?? जाति 14 ला. कुल 14 लाक

पारहारावशुांद्धे संयम विशेष मनुष्यगति पंचेन्द्रिय त्रस 4 म. 4 व. 1 काय. औदारिककाययोग होता है । पुरुषवेद सी एवं नपुंसक वेद नहीं हैं । 4 संज्वलन 7 नोक. म श्रु अव स्वकीय परिहारविशुद्धि च. अच. अव. केवलदर्शन नहीं है । पी. प. शु. भव्य क्षा. क्षायो. सैनी आहारक छठा, सातवीं सैनी पंचेन्द्रिय आशइश्वाभाम. 5 इन्द्रिय 3 बलश्वाआ. आभमैपरि. 3 ज्ञानी. 3 दर्शनो. 3 आ. 4 धर्म. निदान आर्त्तध्यान नहीं है । 11 क. ० योग मनुष्य सम्बन्धी ? मनुष्य सम्बन्धी

प्रश्न- : क्या सभी छठे- सातवें गुणस्थान वालों के परिहारविशुद्धि संयम होता है?

उत्तर : नहीं, सभी छठे-सातवें गुणस्थान वालों के परिहार-विशुद्धि संयम नहीं होता है क्योंकि परिहारविशुद्धि संयम प्राप्त करने के लिए कुछ विशेषताएँ प्राप्त करना आवश्यक हैं -

।वेशेषताएँ :

जिसने तीस वर्ष तक घर में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया हो,

(उसके बाद) दीक्षा लेकर वर्ष पृथक्च (3 से 8 वर्ष की अवधि) तक तीर्थंकर के पादमूल में प्रत्याख्यान नामक पूर्व का अध्ययन किया हो, जिसको जन्तुओं की उत्पत्ति, विनाश, स्थान, काल, परिमाण, जन्म, योनि तथा द्रव्य के स्वभाव का ज्ञान हो ।

जो अप्रमादी, महाशक्तिशाली, परम निर्जरा करने वाला हो ।

दुष्कर चर्या अनुष्ठान करने में तत्पर हो और तीनों संध्या कालों को छोड्‌कर प्रतिदिन दो कोस गमन करते हों उन साधुओं के परिहारविशूद्धि संयम होता है । (रा. वा. 9718)

नोट - परिहारविशुद्धि संयम का काल 38 वर्ष कम एक पूर्व कोटि वर्ष कहा है । इससे लगता है कि वर्ष पृथक्ल से आठ वर्ष लेना चाहिए ।

परिहारविशुद्धि संयम के साथ क्या- क्या विशेषताएँ नहीं होती हैं?

उत्तर-परिहारविशुद्धि संयम के साथ मनःपर्ययज्ञान, प्रथमोपशम सम्यक तथा आहारकद्बिक काययोग, ये तीनों विशेषताएँ नहीं होती हैं । अर्थात् इन चारों में से किसी एक के होने पर शेष तीन मार्गणाएँ नहीं होती हैं । (पं. सं. प्रा. 1? 194)

परिहारविशुद्धि के साथ तैजस समुद्‌घात, आहारक समुद्‌घात तथा विक्रिया ऋद्धि भी नहीं होती है । (ब. 47123)

परिहारविशुद्धि संयम को छोड़े बिना उपशम श्रेणी पर चढ़ने के लिए दर्शन मोह का उपशम भी सभव नहीं है । अर्थात् परिहारविशुद्धि संयम के साथ उपशम सम्बक्ल एव उपशम श्रेणी होना संभव नहीं है । ७. ' 327)

क्या परिहारविशुद्धि संयम को छोड़े बिना क्षायिक सम्यग्दृष्टि उपशम श्रेणी चढ़ सकता ई?

उत्तर-आठवें आदि श्रेणीगत गुणस्थानों में परिहारविशुद्धि संयम नहीं होता है, क्योंकि परिहार विशुद्धि संयम प्रमत्त एव अप्रमत्त मुनिराज के ही होता है । ४- 17375) दूसरी बात परिहार- विशुद्धि संयम के साथ उपशम सम्बक्ल का निषेध किया है उपशम चारित्र का नहीं । इसलिए परिहारविशुद्धि की क्षमता वाला अर्थात् परिहारविशुद्धि संयम वाला क्षायिक सम्यग्दृष्टि उपशम श्रेणी चढ़कर नीचे आकर पुन: परिहारविशुद्धि संयम को प्राप्त कर ले तो कोई बाधा नहीं है

क्या सामायिक छेदोपस्थापना संयम वाले से परिहारविशुद्धि संयम वाले साधु में कुछ अन्तर आ जाता है?

उत्तर-ही, परिहारविशुद्धि चारित्रधारी मुनि छह काय के जीव समूह वाले स्थान में विहार करने पर भी पाप (हिंसा) से लिप्त नहीं होते हैं । जैसे- कमलपत्र जल में रहकर भी जल से लिप्त नहीं होता है । (गो. जी. 473) लेकिन सामायिक-छेदोपस्थापना संयम वालों में ऐसी सामर्थ्य नहीं होती है ।

परिहारविशुद्धि संयम की उत्पत्ति कैसे होती है?

उत्तर-जो संयम के विरोधी नहीं हैं ऐसे बादर संज्वलन कषाय के देशघाती स्पर्धकों के उदय से सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि संयम उत्पन्न होते हैं । (गो. जी. 467)

परिहारविशुद्धि संयमी किसे कहते ई?

उत्तर-सर्व सावद्य योग का सर्वथा परित्याग करने वाला जो जीव पाँच समिति और तीन गुप्ति को धारण कर उनसे युक्त रहकर सदा सावद्य का त्याग करता है उस पुरुष को परिहार- विशुद्धि संयमी कहते हैं अर्थात् ऐसे जीवों के परिहारविशुद्धि संयम उत्पन्न होता है । (गो. जी. 473)

आठवें आदि गुणस्थानों में परिहारविशुद्धि संयम क्यों नहीं होता है?

उत्तर-( 1) जिनकी आत्माएँ ध्यान रूपी सागर में निमग्र हैं, जो वचनयम (मौन) का पालन करते हैं और जिन्होंने आने-जाने रूप सम्पूर्ण शारीरिक व्यापार संकुचित कर लिया है, ऐसे जीवों के शुभाशुभ क्रियाओं का परिहार बन ही नहीं सकता है, क्योंकि गमनागमन रूप क्रियाओं में प्रवृत्ति करने वाला ही परिहार कर सकता है, प्रवृत्ति नहीं करने वाला नहीं । इसलिए ऊपर के आठवें आदि गुणस्थानों में परिहारविशुद्धि संयम नहीं बन सकता है । ( ध. 1 377)

( 2) यद्यपि आठवें आदि गुणस्थानों में परिहारविशुद्धि पाई जाती है, परन्तु वहाँ पर परिहार करने रूप कार्य नहीं पाया जाता है इसलिए आठवें आदि गुणस्थानों में इस संयम का अभाव है । (ध. 17378)

परिहारविशुद्धि संयमी की क्या विशेषताएँ होती हैं?

उत्तर-परिहारविशुद्धि संयमी की विशेषताएँ - ( 1) इसका काल अडूतीस वर्ष कम पूर्व कोटि वर्ष प्रमाण कहा गया है । कोई आचार्य सोलह वर्षों से और कोई बाईस वर्षों से कम पूर्व कोटि प्रमाण कहते हैं । ४.? 167

(2) तीस वर्ष के बिना परिहारविशुद्धि का होना सम्भव नहीं है । (थ. 5३३

(3) यह संयम छठे-सातवें इन दो गुणस्थानों में ही होता है । (ध. 1३१५

(4) ये साधु वसतिका, आहार, संस्तर, पीछी व कमण्डलु के अतिरिक्त अन्य कुछ भी ग्रहण नहीं करते ।

(5) धैर्य पूर्वक उपसर्ग सहन करते हैं तथा वेदना का प्रतिकार भी नहीं करते हैं ।

(6) पीछी से शरीर को पोंछने की क्रिया नहीं करते हैं ।

(7) अपनेसाधर्मियोंकेअतिरिक्तअन्यसबकेसाथआदान, प्रदान, वन्दनऔर अनुभाषण आदि समस्त व्यवहारों का त्याग करते हैं ।

(8) धर्मकार्य में आचार्य से अनुशा लेना, विहार में मार्ग पूछना, वसतिका के स्वामी से आज्ञा लेना, योग्य-अयोग्यउपकरणों के लिए निर्णय करना तथाकिसी का सन्देह दूर करने के लिए उत्तर देना, इन कार्यों के अतिरिक्त वे मौन रहते हैं ।

(9) चार-पाँच साधु सघ में इस संयम को धारण करते हैं । उनमें से एक आचार्य होते

( 1०) जहाँ छह भिक्षाएँ अपुनरुक मिल सकें, ऐसे स्थान में रहना ही योग्य समझते हैं 1? भ. आ. वि. 1  ?ए

. प्रश्न : पारहारावेशुद्धि संयम में उपशम सम्बक्म क्यों नहीं होता है?

उत्तर-' -५३ ० ० परिहारविशुद्धि संयम का होना सम्भव नहीं है । और न उतने काल तक उपशम सम्यक का अवस्थान रहता है, जिससे कि परिहारविशुद्धि संयम के साथ उपशम सम्बक्च की उपलब्धि हो सके । दूसरी बात यह है कि परिहारविशुद्धि संयम को नहीं छोड़ने वाले जीव के उपशमश्रेणी पर चढ़ने के लिए दर्शन मोहनीय कर्म का उपशम होना भी सम्भव नहीं है, जिससे कि उपशम श्रेणी में उपशम सम्बक्ल और परिहारविशुद्धि संयम इन दोनों का संयोग बन सके । (ध. 57327)

परिहारविशुद्धि संयम में 7 प्राण क्यों नहीं होते हैं?

उत्तर-परिहारविशुद्धि संयम में यद्यपि छठा गुणस्थान भी होता है लेकिन परिहारविशुद्धि संयम में आहारक ऋद्धि नहीं होती है और आहारकमिश्र योग में ही सात प्राण होते हैं । अत: ०० संयम में सात प्राण नहीं होते हैं ।

ताांलेका संख्या 39

स्थान गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय शान संयम दर्शन लेश्या भव्यत्व सम्बक्ल संज्ञी आहार गुणस्थान जीवसमास

पर्याप्ति प्राण सज्ञा उपयोग ध्यान आसव जाति


? साम्पराय विवरण मनुष्य गति पंचेन्द्रिय त्रस 4 म. 4 व. 1 का.

संज्वलन लोभ म. श्रु. अ. मन:? स्वकीय च. अच. अव. शुक्ल लेश्या भव्य क्षायिक, उपशम सैनी आहारक दसवाँ सैनी पंचेन्द्रिय आ. श. इ. श्वा. भा. म. 5 इन्द्रिय 3 ब. श्वा. आ. परिग्रह 4 ज्ञानो. 3 दर्शनो. प्रथम शुक्ल ध्यान 1 कषाय 9 योग

14 लाख मनुष्य सम्बन्धी 14 लाक. मनुष्य सम्बन्धी सूक्ष्म साम्पराय संयमी किसे कहते हैं?

संयम

औदारिक काययोग होता है।

केवलज्ञान तथा 3 कुज्ञान नहीं हैं । ख्स साम्पराय

संज्वलन लोभ है ।

जिन उपशम श्रेणी वाले अथवा क्षपक श्रेणी वाले जीवों के सूक्ष्म कृष्टि को प्राप्त लोभ कषाय (अणुमात्र लोभ) के उदय का अनुभव होता है उनको प्लसाम्परायसंयमी कहते हैं । इनके परिणाम यथाख्यात चारित्र वाले जीव के परिणामों से कुछ ही कम होते हैं । (गो. जी. 474)

प्रश्न-इस संयम में कषाय कैसी होती है?

उत्तर-इस संयम में अत्यन्त न्ल्यू कषाय यानी दसम गुणस्थानवर्ती महामुनि ने कषाय के विषांकुरों को खोंट दिया है, त्त्व मोहनीय कर्म के बीज को भी नाश के मुख में ढकेल दिया है, ऐसा परम न्ल्यू लोभ कषाय युक्त यह साधु है । यहाँ कषाय लोभाणुमात्र है । (सर्वा. 9? 18)

क्या सभी मनुष्यों के सूक्ष्म साम्पराय संयम हो सकता है?

उत्तर-नहीं, न्ल्यू साम्पराय संयम प्राप्त करने के लिए कुछ विशेषताएँ होना आवश्यक हैं -

( 1) अवसर्पिणी के चौथे काल में जन्म लिया हो ।

( 2) उत्सर्पिणी के तीसरे काल में जन्म लिया हो ।

( 3) तीन उत्तम संहनन वाला हो,

(4) निकटभव्य कर्मभूमिज मनुष्य हो,

( 5) आठ वर्ष से अधिक उम्र वाला हो,

( 6) 24 कषायों का उपशम या क्षय कर चुका हो (संज्वलन लोभ को छोड्‌कर)

नोट - 1 हुण्डावसर्पिणी काल के प्रभाव से भगवान आदिनाथ स्वामी आदि अनेक मनुष्यों ने तृतीय काल में जन्म लेकर तीसरे ही काल में ख्तसाम्पराय संयम को प्राप्त कर लिया था ।

2. यदि क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव उपशम श्रेणी चढ़ता है तो उसके अनन्तानुबन्धी का क्षय हो चुका है । अत: वह इक्कीस कषायों का ही उपशम करता है ।

क्या संसार में ऐसे कोई जीव हैं जिनके मनःपर्यय ज्ञान हो लेकिन सूक्ष्मसाम्पराय संयम न हो?

उत्तर-ही, छह गुणस्थानवर्ती जीवों के मनःपर्यय ज्ञान पाया जाता है लेकिन न्ल्यू साम्पराय संयम नहीं पाया जाता है - छठा, सातवाँ, आठवीं, नवमी, ग्यारहवीं तथा बारहवीं ।


सूक्ष्मसाम्पराय संयम में कम-से-कम कितने ज्ञानोपयोग हो सकते हैं?

उत्तर-ख्तसाम्पराय संयम में कम-से-कम दो ज्ञानोपयोग हो सकते हैं - मतिज्ञानोपयोग, श्रुतशानोपयोग । क्योंकि अवधिज्ञानोपयोग तथा मनःपर्ययज्ञानोपयोग को प्राप्त किये बिना भी ख्तसाम्पराय संयम हो सकता है ।

सूक्ष्मसाम्पराय संयम में कौन- कौन से आसव के प्रत्यय नहीं होते हैं?

उत्तर-सूक्ष्मसाम्पराय संयम में आसव के सैंतालिस प्रत्यय नहीं होते हैं - 5 मिथ्यात्व 12 अविरति 24 कषाय 6 योग (आहारकद्बिक, वैक्रियिकद्विक औदारिकमिश्र तथा कार्मण)

-. प्रश्न : सूक्ष्म साम्पराय संयम में किन-किन स्थानों के सभी भेद पाये जाते हैं?

उत्तर : न्ल्यू साम्पराय संयम में दो स्थानों के सभी उत्तर भेद पाये जाते हैं -

(1) पर्याप्ति (2) प्राण

तालिका संख्या 4०  ?

स्थान.... गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय ज्ञान संयम दर्शन लेश्या भव्यत्व सम्बक्ल संज्ञी आहार गुणस्थान जीवसमास पर्याप्ति प्राण सज्ञा उपयोग ध्यान आसव

3? : तै6578 र 9. 1० 11 12 13 14 15. 16. 17. 18. 19. 2०. 21. 22. 23. 24.


1 1 1 11 ० ० 5 1 4 1 1 2 1 2 4 1 6 1० ० 9 4

यथाख्यात संयम

मनुष्यगति पंचेन्द्रिय त्रस

11 14 लाख

4 म. 4 व. 3 का. मधुअमन:, केवल स्वकीय चअचअवकेव. शुक्ल लेश्या भव्य क्षायिक, उपशम सैनी

14 ला.क

आहारक, अनाहारक म्यारहवें से चौदहवें तक सैनी पंचेन्द्रिय आ. श. इ. श्वा. भा. म. 5 इ. 3 बल. श्वा. आ. 5 ज्ञानो. 4 दर्शनो. शुक्ल ध्यान योग सम्बन्धी मनुष्यगति सम्बन्धी ?? मनष्यगति सम्बन्धी

औदारिकद्बिक तथा कार्मण काय योग है ।

तीन मिथ्याज्ञान नहीं है। यथाख्यात

सैनी-असनी से रहित भी होते हैं । चउबीस ठाणा? 218

प्रश्न-यथाख्यात संयम किसके होता है?

उत्तर-अशुभ रूप मोहनीय कर्म के सर्वथा उपशम हो जाने से -बारहवें गुणस्थानवर्ती जीवों के और सर्वथा क्षीण हो जाने से बारहवें गुणस्थानवर्ती जीवों के तथा तेरहवें-चौदहवें गुणस्थान वाले जीवों के यथाख्यात संयम होता है । (गो. जी. 475)

यथाख्यात संयमी किन-किन नामों से कहे जा सकते हैं?

उत्तर-यथाख्यात संयमी कई नामों से कहे जा सकते हैं, जैसे -

( 1) यथाख्यात विहार शुद्धि सयत ( 2) यथाख्यात विहार ( 3) यथाख्यात शुद्धि संयत । यथाख्यात विहार शुद्धि संयत - जो यथाख्यात विहार वाले होते हुए शुद्धि प्राप्त संयत हैं वे यथाख्यात विहारशुद्धि संयत कहलाते हैं ।

यथाख्यात विहार - परमागम में विहार अर्थात् कषायों के अभाव रूप अनुष्ठान का जैसा प्रतिपादन किया है तदनुकूल विहार जिनके पाया जाता है उन्हें यथाख्यात विहार कहते ??

यथाख्यात शुद्धि संयत - अशुभ मोहनीय कर्म के उपशान्त अथवा क्षय हो जाने पर ग्यारहवें, बारहवें गुणस्थानवर्ती छद्‌मस्थ और तेरहवें चौदहवें गुणस्थानवर्ती जिन यथाख्यात शुद्धि सयत होते हैं । (ध. 17373 - 75)

ग्यारहवें तथा बारहवें गुणस्थान वाले के यथाख्यात संयम में क्या अन्तर है? सामान्य रूप से दोनों के यथाख्यात संयम में कोई अन्तर नहीं है क्योंकि यह संयम अवस्थित विशुद्धि वाला होता है । कषाय का अभाव हो जाने से उसकी वृद्धि हानि के कारण का अभाव हो गया है ।

ग्यारहवें गुणस्थान वालों का यथाख्यात संयम निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है लेकिन बारहवें गुणस्थान वालों का यथाख्यात संयम निश्चित रूप से केवलज्ञान प्राप्त कराने वाला होता है ।

ग्यारहवें गुणस्थान वाले के यथाख्यात संयम के साथ उपशम तथा क्षायिक दोनों सम्बक्च होते हैं लेकिन बारहवें गुणस्थान में केवल एष्क क्षायिक सम्बक्च ही होता

ग्यारहवें गुणस्थान वाले का यथाख्यात संयम कषायों के उपशम से प्रकट होता है लेकिन बारहवें गुणस्थान वाले का यथाख्यात संयम कषायों के सर्वथा क्षय से प्रकट होता है ।

' - ' १४० ' प स ध म म कम- स- कम ०८००. यथाख्यात संयम में कम- से-कम एक योग हो सकता है - औदारिक काययोग । जब अरहत भगवान ल्लम काययोग में स्थित होते हैं उनकी अपेक्षा एक योग जानना चाहिए । अथवा यथाख्यात चारित्र वाले अयोगी भी होते हैं - चौदहवें गुणस्थानवर्ती भगवान । यथाख्यात संयमी भुतज्ञानी के दर्शन ज्यादा होते हैं या यथाख्यात संयमी केवल ज्ञानी के? यथाख्यात संयमी केवलज्ञानी की अपेक्षा यथाख्यात संयमी भुतज्ञानी के दर्शन ज्यादा होते हैं क्योंकि यथाख्यात संयमी के ग्यारहवें तथा बारहवें गुणस्थान में श्रुतज्ञान पाया जाता है, वहाँ उनके तीन दर्शन होते हैं - चक्षु दर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन। तथा केवलज्ञानी के तो मात्र एक ही दर्शन होता है - केवलदर्शन । यथाख्यात संयम में सभ्य? की विवेचना किस प्रकार करनी चाहिए? यथाख्यात संयम में सम्बक्च की विवेचना - ( 1) ग्यारहवें गुणस्थान में उपशम तथा क्षायिक दोनों सम्बक्ल होते हैं । ( 2) बारहवें गुणस्थान से चौदहवें गुणस्थान तक केवल एक क्षायिक सम्बक्ल ही होता यथाख्यात संयम वाले के अनाहारक अवस्था कितने गुणस्थानों में होती है? यथाख्यात संयम में अनाहारक अवस्था दो गुणस्थानों में होती है - 13 वें गुणस्थान में - समुद्‌घात के समय कार्मण योग में तथा चौदहवें गुणस्थान में । यथाख्यात संयम में किस- किस स्थान के उत्तर भेदों के साथ केवल एक- एक गुणस्थान पाया जाता है? यथाख्यात संयम में पाँच स्थानों के उत्तर भेदों के साथ केवल एक-एक गुणस्थान पाया जाता है - ( 1) योग - अयोगी जीवों में केवल चौदहवीं गुणस्थान । औदारिक मिश्र तथा कार्मण काय योग में केवल तेरहवीं गुणस्थान । ( 2) लेश्या - अलेश्व जीवों के एक चौदहवीं गुणस्थान । ( 3) सम्बकव - उपशम सम्बक्म में ग्यारहवीं गुणस्थान । ( 4) प्राण - चार तथा दो प्राण-तेरहवाँ गुणस्थान । एक प्राण- चौदहवीं गुणस्थान । चउबीस ठाणा? 22०



( 5) ध्यान - तीसरा शुक्ल ध्यान - तेरहवीं गुणस्थान । चौथा शुक्ता ध्यान - चौदहवीं गुणस्थान । नोट - दूसरा शुक्ल ध्यान ग्यारहवें गुणस्थान में भी कोई आचार्य मानते हैं, अन्यथा दूसरे शुक्ल ध्यान में भी एक ही बारहवीं गुणस्थान होता है । जिन यथाख्यात संयमी के केवल आयु प्राण होता है उनके कितने शुक्ल ध्यान होते हैं? जिनके केवल आयु प्राण होता है उनके केवल एक शुक्ल ध्यान होता है - ष्णुपरत क्रिया निवृत्ति - चौदहवें गुणस्थान की अपेक्षा । लि- सु 9 ' 40) बुद्धि पूर्वक सावद्य योग के त्याग को संयम कहना तो ठीक है । यदि ऐसा न माना जाये तो काष्ठ आदि में भी संयम का प्रसंग आ जायेगा । किन्तु केवली में बुद्धिपूर्वक सावद्ययोगकी निवृत्ति तो पायी नहीं जाती है इसलिए उनमें यथाख्यात संयम का -डे-.. ---७-, ?ऐ

यह काइ दाष नहीं है, क्योंकि चार अघातिया कर्मों के विनाश करने की अपेक्षा और समय- समय में असख्यात गुण श्रेणीरूप से कर्मनिर्जरा करने की अपेक्षा सम्पूर्ण पापक्रिया के निरोध स्वरूप पारिणामिक गुण प्रगट हो जाता है । इस अपेक्षा से वहाँ संयम का उपचार किया जाता है । अत: वहाँ संयम का होना दुर्घट (कठिन) नहीं है । अथवा प्रवृत्ति के अभाव की अपेक्षा वहाँ पर मुख्य संयम है । इस प्रकार जिनेन्द्र में प्रवृत्ति- अभाव से मुख्य संयम की सिद्धि करने पर काष्ठ से व्यभिचार दोष भी नहीं आता है, क्योंकि, काष्ठ में प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है, तब उसकी निवृत्ति भी नहीं बन सकती हे । (ध. 17374)

संयम मार्गणा? 221

तालिका संख्या 41

स्थान गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय

ज्ञान संयम दर्शन लेश्या भव्य सम्बक्म संज्ञी आहार गुणस्थान

पर्याप्ति प्राण संज्ञा उपयोग ध्यान आसव जाति कुल

1. प्रश्न : उत्तर :


 1  3  3  1  3  1  1  1  1  6  1० मै  6  11  37  18

1 5 7- 2 लाक.

संयमासंयम

विवरण तिर्य. मनु. पंचेन्द्रिय त्रस 4 म. 4 व. 1 स्त्री. पू. नपु. 8 क. 9 नोक.

म. सु. अव. स्वकीय च. अच. अव. पी. प. शु. भव्य क्षा. क्षयो. उप. सैनी आहारक पचम गुणस्थान सैनी पंचेन्द्रिय आ. श.. श्वा

5 इन्द्रिय. 3 बलश्वाआ आ. भ. मैं. पीर. 3 ज्ञानो. 3 दर्शनो. 4 आ. 4 री. 3 धर्म 11 अ. 17 क. 9 योग

मनुष्य एवं तिर्यस्थ पंचे. सम्बन्धी 43 .ई. लाकतिर्यव्वपंचे. र्ला

विशेष

औदारिक काययोग है ।

अनन्तानुस्थी और अप्रत्ययाख्यानावरण नहीं हें।

संयमासबम केवलदर्शन नहीं है

क्षायिक सम्बक्ल मनुष्य में ही है।

संयमासंयम गुणस्थान

संस्थान विचय धर्मध्यान नहीं है।

संयमासंयम को किन-किन नामों से कहा जाता है? संयमासंयम को अनेक नामों से कहा जाता है - चउबीसठाणा. 222 (1) सयतासयत (2) देशसंयत (3) अणुव्रत (4) देशव्रत (5) विरताविरत (6) सेयमार्संयम । प्रश्न : देशसंयत किसे कहते हैं? उत्तर : जो पाँच अणुव्रत, तीनगुणव्रत और चार शिक्षाबतों से संयुक्त हुए असंख्यात गुणश्रेणी कर्म निर्जरा करते हैं ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव देशविरत कहे जाते हैं । ४.३०५ प्रश्न : इसको विरताविरत क्यों कहते हैं?

. प्रश्न :


ईसासे विरतहै औरस्थावर जीवों कीहिंसा से अविरत है, वह विरताविरत है। (गोजी. ३ टैटण्ण्टट की उत्पत्ति का कारण क्या है? ०८००८० में संयम भाव की उत्पत्ति का कारण त्रस हिंसा से विरति भाव है और असंयम ' उत्पत्ति का कारण स्थावर हिंसा से अविरत भाव है । इसलिए सैयतासयत नाम का ण्न्ध्यँ गुणस्थान माना जाता है। (ब. 1११४

5. प्रश्न : सम्यग्दृष्टि जीव तिर्यक्तों में उत्पन्न नहीं होता है तो वहाँ संयमासंयम कैसे हो सकता

6. ००


उत्पन्न होने के बाद सम्यग्दर्शन प्राप्त करके संयमासंयम को भी उत्पन्न कर सकते हैं । ०० कोई बाधा नहीं है । कहा भी है - लब्ध्यपर्यातकों को छोड्‌कर शेष चार प्रकार के तिर्यच्चों के पाँचों ही २१४२ होते हैं । (य. 1) 2०8)

क्या कोई ऐसे पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके संयमासंयम नहीं हो सकता है?
संयमासंयम प्राप्त नहीं करने योग्य पंचेन्द्रिय जीव -

( 1) देव-नारकी (2) लस्थ्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यल्द ( 3) संयमासंयम प्राप्त करने के वय से कम आयु वाले मनुष्य-तिर्यच्च (4) भोग भूमिया मनुष्य-तिर्यव्व ( 5) ०' पंचेन्द्रिय जीव (6) क्षायिक सम्यग्दृष्टि तिर्यब्ज ( 7) देव आयु को छोड्‌कर जिन्होंने उप आयु का बन्ध कर लिया हे स्सै लमय्-प्तर्यब्ज ( 8) सातवें नरक से निकलकर '

हुए जीव.... आदि । नोट - ( 1) संयमासंयम प्राप्त करने के लिए मनुष्य तथा तिर्यव्यों की अलग-अलग कही गई है । (2) प्लेच्छ खण्ड के तिर्यब्ज- मनुष्य आर्यखण्ड में आकर संयमासंयम

संयम मार्गणा? 223 . प्रश्न : क्या ००१५४-४१ हैं जिनको ०० नहीं हो सकता है लेकिन संयमासंयम

. प्रश्न


10. ००

हो सकता है? ही, ऐसे भी मनुष्य हैं जिनको केवलज्ञान नहीं हो सकता है लेकिन संयमासंयम हो सकता ( 1) पाँचवें नरक से निकलकर आये हुए मनुष्य ( 2) विद्या सहित विद्याधर । ( 3) द्रव्य से सी तथा नपुसक वेद वाला (4) पाँचवें काल का मनुष्य' ( 5) वजबृषभनाराच सहनन को छोड्‌कर शेष पाँच संहनन वाले मनुष्य (6) प्लेच्छ खण्ड से आये हुए मनुष्य आदि । क्या सभी पंचेन्द्रिय तिर्यच्चों के संयमासंयम हो सकता है? ही, सभी पर्यातक संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यच्चों के संयमासंयम हो सकता है, जैसे - जलचरों में - मछली, मक्य, मेंढक आदि । थलचरों में - शेर, साँप, गाय, हाथी, सियार आदि । नभचरों में - गिद्ध (जटायु को हुआ था,) तोता, कबूतर आदि । क्या ऐसे कोई संयमासंयम वाले जीव हैं जिनको अवधिज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता है? ही, संज्ञी सम्पूर्च्छन पर्यातक संयमासंयमी जीवों के अवधिज्ञान नहीं पाया जाता है । संज्ञी समपि पर्यातकों में सबमासंयम के समान अवधिज्ञान और उपशम सम्बक्ल की सभवता का अभाव है अर्थात् उनके संयमासंयम के समान अवधिज्ञान और उपशम सम्बक्म नहीं पाया जाता है । इसका भी कारण यह है कि अवधिज्ञान को उत्पन्न करा के अन्तर के प्ररूपण करने वाले आचार्यो का अभाव है अर्थात् किसी भी आचार्य ने इस प्रकार अन्तर की प्ररूपणा नहीं की है । (य. 5? 118)

संयमासंयमी जीवों के कितने सभ्य? होते हैं? संयमासंयमी जीवों के कम- से-कम 1 सम्बक्म होता है- क्षायोपशमिक सम्बक्ल । यह एक सम्बक्ल समर्चन जन्म वाले संयमासंयमी तिर्यंचों के होता है । उपशम अष्ट गर्भज जीवों के ही हौएता है तथा क्षायिकसम्बक्ल भोगभूमिया तिर्यच्चों के ही होता है इसलिए इन जीवों के ये दोनों सम्बक्ल नहीं होते हैं तथा अधिक-से-अधिक 3 ०न्म होते हैं - -शिक्र ?एइ -ग्' --ऐाण्क्ति '

1 वर्तमान समय का जानना चाहिए । चउबीस ठाणा? 224

1. प्रश्न

12. ००

13. प्रश्न

क्षायिक सम्बश्ल मनुष्यों की अपेक्षा होता है । क्षायोपशमिक सम्यक संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों तथा मनुष्यों की अपेक्षा होता है तथा औपशमिक सम्यक गर्भज संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यच्च तथा मनुष्यों की अपेक्षा होता है । संयमासंयम में कितने उपयोग होते हैं? ५ संयमासंयम में कम-से-कम 4 उपयोग होते हैं - मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, चखुदर्शनोपयोग, अचखुदर्शनोपयोग । ये चार उपयोग समर्चन जन्म वाले संयमासंयमी तिर्यच्चों के होते हैं । तथा अधिक-से- अधिक 6 उपयोग होते हैं - मतिज्ञानोपयोग, श्रुतज्ञानोपयोग, अवधिज्ञानोपयोग, चखुदर्शनोपयोग, अचक्षुदर्शनोपयोग तथा अवधिदर्शनोपयोग । ये छह उपयोग गर्भज संयमासंयमी तिर्यच्च तथा मनुष्यों के होते है । संयमासंयम में कम-से-कम कितने आसव के प्रत्यय होते हैं? संयमासंयम में कम-से-कम 35 आसव के प्रत्यय होते है - 11 अविरति (त्रस अविरति के बिना) 1६ कषाय प्र कषाय 7 नोकषाय 1

9 थ न (4 म. 4 व. 1 औदारिक काययोग) सम्पूर्च्छन पंचेन्द्रिय तिर्यच्चों के एक ही वेद होता है इसलिए दो (सी तथा पुरुष) वेद किये गये हैं कम । जो अतिथि संविभाग व्रत का पालन करता है उसके कितने जाति एवं कुल हो सकते हैं? जो अतिथि संविभाग व्रत का पालन करता है उसके 18 लाख जातियाँ एव 57 -ा?लाख करोड़ कुल होते हैं जातियाँ - 4 लाख तिर्यब्ज तथा 14 लाख मनुष्यों की । कुल - 43 -2 लाख करोड़ तिर्यच्चों के तथा 14 लाख करोड़ मनुष्यों के ।

संयम मार्गणा? 225 ं

तालिका संख्या 42

स्थक्?म्मआन कश्त??ल्लषाय दर्शन लेश्या भव्यत्व सभ्यक्ल संज्ञी आहार गुणस्थान जीवसमास पर्याप्ति प्राण संज्ञा उपयोग ध्यान


84 लाख 1 199 - 2 ला.क.


असंयम विवरण विशेष नतिमदे. एद्वीत्रीचतुप. 5 स्थावर 1 त्रस 4 म. 4 व. 5 का. आहारकद्विक नहीं है । सीपुनपुं. 16 क. 9 नोक. 3 ज्ञा. 3 कुज्ञान स्वकीय असंयम चअचअव. केवल दर्शन नहीं है। कृनीकापीपशु. भव्य, अभव्य क्षाक्षायोउसामिश्रमि. सैनी, असैनी आहारक, अनाहारक पहले से चौथे तक 14 स्थावरों के, 5 त्रसों के आशइश्वाभाम. 5 इन्द्रिय 3 बल श्वाआ. आभमैपरि. 6 ज्ञानो. 3 दर्शनो. 4 आ. 4 री. 2 ध. आज्ञाविचय तथा अपायविचय धर्मध्यान हैं । 5 मि. 12 अ. 25 क. 13 यो. चारों गति सम्बन्धी चारों गति सम्बन्धी चउबीस ठाणा? 226

प्रश्न

. प्रश्न

. प्रश्न

4. प्रश्न

5. ००-

ऐसे कौन-कौन से ज्ञान हैं जो केवल असंयम में ही पाये जाते हैं? तीन ज्ञान केवल असंयम में ही पाये जाते हैं -

कुमति, कुसुत, कुअवधिज्ञान । संयमासंयम एवं असंयम में मनःपर्ययज्ञान क्यों नहीं होता है? नहीं, क्योंकि संयमासैयम और असंयम के साथ मनःपर्ययज्ञान की उत्पत्ति मानने में विरोध आता है । इसी प्रकार सभी संयमियों के भी मनःपर्ययज्ञान नहीं होता है, क्योंकि मनःपर्ययज्ञान की उत्पत्ति में केवल संयम ही कारण नहीं है, किन्तु संयम के अतिरिक्त विशेष जाति के द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि भी कारण हैं । (वे सभी संयमियों के नहीं पाये जाते हैं इसलिए सभी संयमियों को भी मनःपर्ययज्ञान नहीं होता है ।) (ध. 1? 366) असंयमी जीवों के कितने सम्बक्ल में एक ही गुणस्थान पाया जाता है? असंयमी जीवों के सभी सम्बक्लों में एक-एक ही गुणस्थान पाया जाता है - क्षायिक, क्षायोपशमिक तथा उपशम सम्यक में - चौथा गुणस्थान । सासादन सम्बक्ल में - दूसरा गुणस्थान ।

सम्बग्मिथ्यात्व में - तीसरा गुणस्थान । मिथ्यात्व में - पहला गुणस्थान । असंयम में कम- से- कम कितनी पर्याप्तियाँ होती है? असंयम में कम-से-कम चार पर्याप्तियाँ होती हैं - ( 1) आहार पर्याप्ति ( 2) शरीर ०2० ( 3) इन्द्रिय पर्याप्ति (4) श्वासोच्चवास पर्याप्ति । ये चार पर्यातियाँ एकेन्द्रिय की ०० कही गयी है । असंयमी जीवों के कितने प्राण होते हैं? असंयमी जीवों के 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 तथा दस प्राण भी हो सकते हैं ।

एकेन्द्रिय अपर्यातक के । एकेन्द्रिय पर्यातक तथा द्वीन्द्रिय अपर्यातक के । त्रीन्द्रिय अपर्याप्तक के । द्वीन्द्रिय पर्यातक तथा चतुरिन्द्रिय अपर्यातक के । संज्ञी असंज्ञी अपर्याप्तक तथा त्रीन्द्रिय पर्याप्तक के । चतुरिन्द्रिय पर्यातक के । असंज्ञी पर्याप्तक के । संज्ञी पर्याप्तक के ।

संयम मार्गणा? 227

वचन योग वाले असंयमी जीवों के कितने प्राण होते हैं? वचन योग वाले असंयमी जीवों के कम-से-कम 6 प्राण होते हैं - 2 इन्द्रिय (स्पर्शन, रसना) 2 बल (वचन तथा काय) 1 श्वासोच्चवास 1 आयु (तिर्यच्च) यद्यपि द्वीन्द्रिय जीवों के कम-से-कम चार प्राण होते हैं लेकिन वचन योग की प्राप्ति होने पर छह प्राण हो जाते हैं । तथा अधिक-से- अधिक दस प्राण होते हैं । (संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के) असंयमी जीवों के कितने उपयोग होते हैं? असंयमी जीवों के अधिक-से- अधिक 9 उपयोग होते हैं- 6 ज्ञानोपयोग - 3 कुशानोपयोग एव 3 ज्ञानोपयोग 3 कुज्ञानो. - मिथ्यादृष्टि एव सासादन सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा । 3 ज्ञानो. - चतुर्थगुणस्थानवर्ती सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा । 3 दर्शनोपयोग - चखुदर्शनोपयोग, अचक्षु दर्शनोपयोग तथा अवधिदर्शनोपयोग चक्षुदर्शनोपयोग - चतुरिन्द्रिय से असंयत सम्यग्दृष्टि तक अचक्षुदर्शनोपयोग - एकेन्द्रिय से असंयत सम्यग्दृष्टि पर्यन्त अवधिदर्शनोपयोग - तृतीय-चतुर्थ गुणस्थानवर्ती जीवों के । असंयमी जीवों के कम- से-कम 3 उपयोग होते हैं - 2 ज्ञानोपयोग - कुमतिज्ञानोपयोग, कुसुतज्ञानोपयोग । 1 दर्शनोपयोग - अचखुदर्शनोपयोग । वसु-दर्शन वाले असंयमी जीवों के कितने आसव के प्रत्यय होते हैं? चक्षु-दर्शन वाले असंयमी जीवों के कम से कम 34 आसव के प्रत्यय होते हैं - 12 अविरति, 21 कषाय (अनन्तानुबन्धी कषाय बिना) 1 योग (अनाहारक अवस्था में अथवा निर्वृत्यपर्याप्तावस्था में) तथा अधिक-से- अधिक 55 आसव के प्रत्यय होते हैं । इसमें आहारकद्बिक सम्बन्धी आसव के प्रत्यय नहीं होते हैं । चउबीस ठाणा. 228 - समुच्चय प्रश्नोत्तर - प्रश्न : सिद्ध भगवान के २२: संयम ग्रहण करना चाहिए?

अन्ननास! भावपचमगुणस्थानवर्तीकेहीपायाजाताहैअन्यत्रनहीं । असयतभावसंसारी ०0अ पर्यन्त स्थित जीवों को छोड़ अन्यत्र सभव नहीं है । (य. २४५) उन्हें '2 नहीं कह सकते; क्योंकि आत्मा प्रमत्त या अप्रमत्त सयत भी नहीं है । ससार .) अत: वे संयत आदि विकल्पों से अतीत हैं । छ बुद्धिपूर्वक निवृत्ति का अभाव होने से जिसलिए (जिस कारण) वे संयत नहीं हैं, ० सयतासैयत भी नहीं हैं और असंयत भी नहीं हैं, क्योंकि, उनके सम्पूर्ण पापरूप ०सँ नष्ट हो चुकी हैं (य. 1३८० ही, उन्हें अमल चारित्री कहा जा सकता है ।


3. उ०

4. ००


हो जनता है?


यथाख्यात संयम । सामायिक छेदोपस्थापना में आहरकद्विक हैं लेकिन औदारिकमिश्र नहीं है । परिहारविशुद्धि तथा ख्तसाम्पराय संयम में आहारकद्बिक तथा औदारिकमिश्र दोनों नहीं हैं । कौन-कौनसे योग सभी संयमों में होते हैं? नौ योग सभी संयमों में होते हैं - 4 मनोयोग, 4 वचनयोग, 1 औदारिक काययोग । . 4 मनोयोग 4 वचनयोग - चारों गति की अपेक्षा असंयम में । . नौ योग - मनुष्य की अपेक्षा सभी संयमों में । . नौ योग - तिर्यंचों की अपेक्षा असंयम तथा संयमासंयम में । . यथाख्यात संयम में ग्यारहवें बारहवें गुणस्थान की अपेक्षा । . सत्य तथा ८ मनोयोग सत्य तथा ०८ वचनयोग और औदारिक काययोग

तेरहवें गुणस्थान वालों के भी होते हैं ।

यथाख्यात चारित्र और सामायिक चारित्र के योग में क्या अन्तर है?
दोनो संयमों के योगों की संख्या में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि दोनों में ग्यारह-८ योग पाये जाते हैं लेकिन उनके नामों में अन्तर है -

यथाख्यात संयम में - 4 मनोयोग, 4 वचन योग, औदारिकल्कि और कार्मण ०८८ सामायिक चारित्र में - 4 मनोयोग, 4 वचन योग, औदारिक काययोग तथा अध ये 11 योग होते हैं ।

संयम मार्गणा? ३29

8. १५१९

किस-किस संयम में कौन- कौन सी कषाय रह सकती है?


२२२?? -

०००००८ संयम ०,' संयम १११-४४१११ ??


९५२१ सज्वलन के उदय रहते हुए होते हैं । सज्वलन के उदय रहते हुए होता है लेकिन छठे- कं गुणस्थान में ही होता है । ०० संज्वलन लोभ के उदय रहते होता है । ' मोह अर्थात् 21 कषायों के उपशम या क्षय से होता है । '०' तथा सज्वलन के उदय रहते हुए होता है । 5 अथवा 21 कषायों के उदय रहते हुए होता है ।

सूक्ष्मसाम्पराय तथा यथाख्यात संयम ००८० क्या अन्तर. ख्स साम्पराय संयम में कषायों से अनुरंजित योग की प्रवृत्ति रूप लेश्या है जबकि यथाख्यात संयम में ' 'लिम्पति इति लेश्या' ' होती है । यथाख्यात संयम में कषाय का अभाव होने से उपचार से लेश्या कही गई है । (ध. 1 के आधार से) कौन-कौन से संयम में आहारक- अनाहारक दोनों होते हैं? असंयम तथा यथाख्यात संयम में आहारक- अनाहारक दोनों होते हैं - असंयम में - पहले, दूसरे तथा चौथे गुणस्थान की विग्रहगति में कार्मण काययोग के समय अनाहारक होते हैं । तथा पहले, दूसरे, चौथे गुणस्थान में विग्रहगति को छोड्‌कर शेष समय में तथा तीसरे गुणस्थान में आहारक होते हैं । यथाख्यात संयम में - जब तेरहवें गुणस्थान में समुद्‌घात के समय भगवान कार्मण काय- योग में स्थित होते हैं तब तथा चौदहवें गुणस्थान वाले जीव अनाहारक होते हैं और ग्यारहवें, बारहवें गुणस्थान वाले तथा कार्मण काययोग को छोड़ कर शेष समय में तेरहवेंगुणस्थान वाले भी आहारक ही होते हैं । किस- किस संयम में कितने- कितने प्राण होते हैं? संयम दा.

(2) परिहारविशुद्धि में (3) ख्तूरस्‌रुम्पराय में

छठे गुणस्थान में तथा क्के से नवमें आ- तक दस प्राण । 1० प्राण - छठे - सातवें गुणस्थान में । 1० प्राण - दसवें गुणस्थान में । 1, 2, 4, 1० प्राण । 1 प्राण- अयोगकेवली भगवान के । 2 प्राण-सयोगकेवली के समुद्‌धात अवस्था में 4 प्राण- सयोगकेवली के । चउबीस ठाणा -मैं. 23०

?? (5) संयमासंयम में - 1० प्राण-पंचमगुणस्थानवर्ती मनुष्य- तिर्यव्यों के । असंयम में प्राण - देखें? असंयम प्रश्न 5 । ऐसे कौनसे संयम हैं जिनमें संज्ञा नहीं पाई जाती है? यथाख्यात संयम में कोई संज्ञा नहीं पाई जाती है क्योंकि संज्ञाओं का सद्‌भाव मोह के उदय में ही होता है । यथाख्यात संयम में उपयोग ज्यादा है या सूक्ष्मसाम्पराय संयम में? यथाख्यात संयम में ख्तसाम्पराय संयम की अपेक्षा दो उपयोग ज्यादा हैं - यथाख्यात संयम में - 5 ज्ञान 4 दर्शन, ख्तसाम्पराय संयम में - 4 ज्ञान 3 दर्शन यथाख्यात संयम में केवलज्ञान - केवलदर्शन रूप उपयोग भी होते हैं । ऐसे कौनसे ज्ञानोपयोग हैं जो यथाख्यात संयमी के तो होते हैं लेकिन परिहारविशुद्धि वालों के नहीं होते हैं? दो ज्ञानोपयोग ऐसे हैं जो यथाख्यात संयमी के तो होते हैं लेकिन परिहारविशुद्धि वालों के नहीं होते - ( 1) मनःपर्यय ज्ञानो. (2) केवल ज्ञानोपयोग । ऐसे कौन-कौन से आसव के कारण हैं जो केवल असंयमी के होते हैं? आसव के इकतीस कारण ऐसे हैं जो केवल असंयमी के होते हैं - 5 मिथ्यात्व, 12 अविरति, 12 कषाय तथा 2 योग (वैक्रियिकद्विक काययोग) . इनमें से पाँच प्रत्यय असंयमी के साथ-साथ संयमासंयम में भी होते है - त्रस सम्बन्धी अविरति तथा प्रत्याख्यान चौकड़ी । संयमासंयमी को सकल संयम में नहीं लिया गया है । आसव के ऐसे कौन से प्रत्यय हैं जो संयमी और असंयमी दोनों के होते हैं? आसव के 24 प्रत्यय संयमी और असंयमी दोनों के होते हैं - 13 कषाय - 4 संज्वलन तथा 9 नोकवाय 11 योग - 4 मनोयोग, 4 वचनयोग, औदारिकद्विक तथा कार्मण काययोग । आहारकद्विक

. प्रश्न :

०. प्रश्न :


12. प्रश्न

13. प्रश्न


???? क्या सूक्ष्मसाम्पराय संयम के बराबर आसव के प्रत्यय सामायिक-छ०ब०० में भी हो सकते हैं? ही, जब नवमें गुणस्थान में संज्वलन क्रोध, मान, माया का क्षय हो जाता है; ० बादर लोभ का उदय रहता है उस समय सामायिक-छेदोपस्थापना संयम के साथ ख्तसाम्पराय संयम के समान नौ योग एवं एक कषाय रूप आसव के 1० प्रत्यय