त्रैलोक्य वंदना

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त्रैलोक्य वंदना

-नरेन्द्र छंद (परमपरंज्योति)-
जय जय तीर्थंकर त्रिभुवन के चूड़ामणि जिनस्वामी।

जय जय जिनवर केवलज्ञानी त्रिभुवन अंतर्यामी।।
जय जय चिंतामणि जिनप्रतिमा मनचिंतित फल देतीं।
जय जय जिनमंदिर शाश्वत उन भक्ती शिव फल देती।।१।।

जय जय भवनवासि के जिनगृह अधोलोक में शोभें।
जय जय सात करोड़ बहत्तर लाख भविक मन लोभें।।
जय जय असुर कुमार देव के चौंसठ लाख जिनालय।
जय जय नागकुमारों के चौरासी लाख जिनालय।।२।।

जय जय जय सुपर्णदेव के जिनगृह लाख बहत्तर।
जय जय द्वीप कुमार सुरों के जिनगृह लाख छियत्तर।।
जय जय उदधिकुमार इंद्र के लाख छियत्तर जिनगृह।
जय जय जय स्तनित देव के लाख छियत्तर जिनगृह।।३।।

जय जय विद्युत्कुमारेन्द्र के जिनगृह लाख छियत्तर।
जय जय दिक्कुमार इंद्रों के जिनगृह लाख छियत्तर।।
जय जय अग्निकुमार देव के छियत्तर लाख जिनालय।
जय जय वायु कुमार इंद्र के छ्यानवे लाख जिनालय।।४।।

जय जय मध्यलोक के जिनगृह चार शतक अट्ठावन।
जय जय अकृत्रिम मणिमय जिनमंदिर जन मन भावन।।
जय जय पाँचमेरु के अस्सी जिनमंदिर सुखकारी।
जय जंबूशाल्मलि तरु आदिक दश जिनगृह दु:ख हारी।।५।।

जय जय कुलपर्वत के जिनगृह तीस अकृत्रिम शोभें।
जय जय गजदंतों के जिनगृह बीस भव्य मन लोभें।।
जय जय जय वक्षार गिरी के अस्सी जिनगृह सुंदर।
जय जय जय विजयार्ध अचल के जिनगृह इक सौ सत्तर।।६।।

जय जय इष्वाकार अचल के चार जिनालय शाश्वत।
जय जय मनुजोत्तर पर्वत के चार जिनालय भास्वत।।
जय जय नंदीश्वर के बावन जिनमंदिर अभिरामा।
जय जय कुंडलगिरि रुचक गिरी के चार-चार जिनधामा।।७।।

जय जय व्यंतर के जिनमंदिर संख्यातीत महाना।
भवन भवनपुर आवासों में जिनगृह सौख्य निधाना।।
भूतजाति व्यंतर के नीचे चौदह सहस जिनालय।
राक्षस व्यंतर के तल में हैं सोलह सहस जिनालय।।८।।

शेष व्यंतरों के न भवन हैं, भवनपुरावासा हैं।
सब व्यंतर के मध्यलोक में त्रयविध आवासा हैं।।
अथवा किन्नर आदि सात विध व्यंतर अधोलोक में।
असंख्यात जिनभवन इन्होंके रत्नप्रभा खरभू में।।९।।

पंकभाग में राक्षसेंद्र के लाख असंख्य नगर हैं।
सबमें जिनमंदिर अकृत्रिम वंदे नित सुरगण हैं।।
इन व्यंतर के मध्यलोक में द्वीप अचलसागर में।
देश नगर घर गली जलाशय वन उपवन मंदिर में।।१०।।

जल थल नभ में ये सब व्यंतर करें निवास निरंतर।
जय जय जय व्यंतर के जिनगृह असंख्यात अतिसुंदर।।
जय जय सूरज चंद्र नखत ग्रह तारा के जिनमंदिर।
जय जय नभ में विमान चमवेंâ उनके मध्य सुमंदिर।।११।।

मध्यलोक के अंतिम तक ये ज्योतिर्वासि विमाना।
जय जय इनके असंख्यात जिनधाम सर्वसुख दाना।।
जय जय ऊध्र्व लोक के जिनगृह अकृत्रिम अभिरामा।
जय चौरासी लाख सत्यानवे हजार तेइस धामा।।१२।।

जय सौधर्म स्वर्ग के बत्तीस लाख जिनालय सुंदर।
जय ईशान स्वर्ग के लाख अठाइस जिनगृह मनहर।।
जय जय सानत्कुमार दिव में बारह लक्ष जिनालय।
जय जय जय माहेन्द्र स्वर्ग के आठ लक्ष जिनआलय।।१३।।

जय जय ब्रह्म कल्प में चार लाख मणिमय जिनआलय।
जय जय लांतव युगल स्वर्ग में लाख पचास जिनालय।।
जय जय महाशुक्रयुग दिव में चालिस सहस जिनालय।
जय जय सहस्रार युग दिव में छह हजार जिनआलय।।१४।।

जय जय आनत प्राणत आरण अच्युत दिव के जिनगृह।
जय जय जय ये सात शतक हैं मणिमय शाश्वत जिनगृह।।
जय जय तीन अधोग्रैवेयक इक सौ ग्यारह जिनगृह।
जय मध्यम त्रय ग्रैवेयक में इकसौ सात सुजिनगृह।।१५।।


जय उपरिम त्रय ग्रैवेयक में इक्यानवे जिनालय।
जय जय जय जय नव अनुदिश के जिनमंदिर सुख आलय।।
जय जय विजय आदि सर्वारथ सिद्धी के जिनआलय।
जय जय ये सर्वार्थसिद्धिकर पंच अनुत्तर आलय।।१६।।

जय जय त्रिभुवन के जिनमंदिर आठ कोटि गुणराशी।
छप्पन लाख हजार सत्यानवे चार शतक इक्यासी।।
जय जय जय जिनगृह में प्रतिमा नव सौ पच्चिस कोटी।
त्रेपन लाख, हजार सताइस नवसौ अड़तालिस ही।।१७।।

जय जय अकृत्रिम जिनमंदिर अकृत्रिम जिन प्रतिमा।
मणिमय रत्नमयी पद्मासन नमूँ नमूँ जिनमहिमा।।
जय जय जय कृत्रिम जिनमंदिर जय कृत्रिम जिनप्रतिमा।
इक सौ सत्तर कर्मभूमि में त्रयकालिक जिन महिमा।।१८।।

जय पैंतालिस लाख सुयोजन सिद्धशिला सुखकारी।
सिद्ध अनंतानंत विराजें, नमूँ नमूँ भवहारी।।
नमूँ नमूँ मैं नित्य नमूँ मैं, हाथ जोड़ शिर नाऊँ।
नमूँ अनंतों बार नमूँ मैं, बार बार शिर नाऊँ।।१९।।

हे प्रभु! मुझ पर कृपा करो अब भवसमुद्र से तारो।
हे प्रभु! स्वात्मसंपदा देकर, स्वात्मसौख्य विस्तारो।।
हे प्रभु! परमानंद सुखामृत देकर तृप्ती कीजे।
‘‘ज्ञानमती’’ ज्योति प्रगटित हो, सुख अज्ञान हरीजे।।२०।।

-दोहा-

त्रैकालिक कृत्रिम सभी, जिनप्रतिमा जिनधाम।
कहे अनंतानंत ही, तिन्हें अनंत प्रणाम।।२१।।