12.देशव्रतोद्योतन अधिकार

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देशव्रतोद्योतन

<poem>

(१) बाह्याभ्यंतर परिग्रह तज करके चार घातिया नाश किया। अरु शुक्ल ध्यान से जिनप्रभु ने सर्वज्ञपने को प्राप्त किया।। जिनधर्म निरूपण करने में उनके ही वचन सत्य माने। संदेह करें वे हैं पापी अथवा अभव्य उनको जानें।। (२) निज पाप कर्म से दुखित मनुष यदि सम्यग्दर्शन से युत है। वह सम्यग्दृष्टी एक बहुत ही आदर पाने योग्य कहें।। प्रत्युत मिथ्यामत में स्थित संप्रति में बहुत सुखी दिखता। वह बहुत बड़ी मात्रा में हो फिर भी नहिं आदर योग्य कहा।। (३) जिनप्रभु ने सम्यग्दर्शन को है मोक्ष वृक्ष का बीज कहा। अरु मिथ्यादर्शन को प्रभु ने संसार वृक्ष का बीज कहा।। क्योंकी नरकादि योनियों में भ्रम रहा अनादीकालों से। इसलिए करो रक्षा इसकी जो मिला बहुत ही कालों में।। (४) इस जग में काल अनंत बीत जाये तब मनुज जन्म मिलता। उस पर यदि सम्यग्दर्श मिले तो मुक्ति हेतु तप को करना।। यदि िंनदा अथवा मोहकर्म का उदय अशक्तपना होवे। तो भी श्रावक षट्कर्मों के जो योग्य व्रतादि अवश्य करे।। (५) जो सम्यग्दर्शन सहित भव्य हैं अष्ट मूलगुण के पालक। और पाँच अणुव्रत गुणव्रत त्रय शिक्षाव्रत चारों के धारक।। अरु सात शीलव्रत को पाले रात्रि में भोजन नहीं करे। जल छना हुआ ही पीता हो और यथाशक्ति मौनादि धरे।। (६) जो व्रती जीव निजकार्य हेतु स्थावर जीव मारते हैं। दो इंद्रिय आदिक त्रस जीवों की हरदम रक्षा करते हैं।। अरु सत्य बोलना अचौर्यव्रत निज स्त्री का सेवन करते। सामायिक प्रोषध दान और भोगोपभोग गुणव्रत धरते।। (७) यद्यपि धनवान श्रावकों के पुण्योपार्जन के हेतु बहुत। जिनपूजा और प्रतिष्ठा आदिक करते हैं सत्कार्य बहुत।। पर भवसिंधू से तरने को नौका सम जो मुनिश्रेष्ठ कहे। उनको आहारदान आदिक देना सबसे ही श्रेष्ठ कहें।। (८) सब जीवों की कामना यही हमको जग में सुख शांति मिले। पर यह सुख मोक्षमार्ग में है जो रत्नत्रय धर के ही मिले।। और रत्नत्रय की प्राप्ति सदा निर्गं्रथवेष में होती है। साधूचर्या श्रावकगण के आहारदान से चलती है। (९) इच्छानुसार भोजन विहार औषधि से तन निरोग रहता। पर आज्ञा नहीं साधुओं को अतएव शरीर अशक्त रहता।। पर धर्मात्मा उत्तम औषधि निर्मल जल से गुरुभक्ति करें। ऐसे उत्तम श्रावकजन से इन साधुगणों की प्रवृति चले।। (१०) जो धर्मी श्रावक शास्त्रों का व्याख्यान करें या पाठ करें। पुस्तक छपवाकर साधुजनों को भक्तीपूर्वक दान करे।। थोड़े ही भव में तीन लोक में लक्ष्मी को वरने वाले। वैâवल्यज्ञान की प्राप्ती हो जो शास्त्रदान देने वाले।। (११) सब जीवों की करुणापूर्वक जो भय से रक्षा की जाती। वह अभयदान सब दानों में है श्रेष्ठ प्ररूपण की जाती।। क्योंकी आहार औषधी से भी बीमारी का भय भगता। इसलिए दान ये तीनों ही, इसमें ही है र्गिभत रहता।। (१२) आहारदान के देने से इन्द्रादि सुखों की प्राप्ती हो। औषधीदान से परभव में तन सुन्दर और निरोगी हो।। अरु शास्त्रदान से विद्वत्ता मिलती अद्भुत विस्मयकारी। अरु अभयदान दे सारे सुख अंतिम सुख मोक्ष मिले भारी।। (१३) सैंकड़ों पाप कर्मों को कर नाना प्रकार दुख को सहकर। वारिधि पर्वत और पृथ्वी पर भ्रम करके बहुत कष्ट सहकर।। धन संचय करता पर वह धन स्त्री पुत्रादिक से प्यारा। उस धन को व्यर्थ न खर्च करो है दान धर्म सबसे न्यारा।। (१४) यह दान ही है श्रावक का गुण दोनों लोकों में चमकाता। बिन दान के दोनों लोकों में केवल विनाश ही करवाता।। क्योंकी व्यापार आदि कार्यों में बहुत पाप हो जाते हैं। उन पापकर्म का क्षालन ही सत्पात्र दान कर पाते हैं।। (१५) जो धन उत्तम दानादिक के हेतू उपयोग किया जाता। उसको ही उत्तम धन कहते परलोक में साथ सदा जाता।। विद्वान लोग ये भी कहते ये दान अनंतगुणा फलता। जो भोगविलासों में खर्चे वह सब बेकार चला जाता।। (१६) पहले भी बड़े बड़े राजा पुत्रों को राज्यपाट देकर। याचकजन को भी धन देकर सब जन को अभयदान देकर।। उत्तम तप करके मोक्ष गये इसलिए दान पहला कारण। इस हेतू धन को क्षणिक मान इससे ही करो भवदुख वारण।। (१७) नरभव को पाकर जो नर मुक्ती हेतु नहीं उद्यम करते। अत्यन्त मूढ़बुद्धी वाले घर में ही पड़े रहा करते।। जिस घर में दान नहीं देते वह घर कारागृह सदृश कहा। अपने सामथ्र्यनुसार दान भवजलधि पोत सम उसे कहा।। (१८) जो नहीं देवदर्शन करते ना ही उनका स्मरण करें। ना ही उनकी पूजन करते और ना उनका स्तवन करें।। सामथ्र्यवान होकर भी जो नहिं साधूजन को दान ही दे। पत्थर की नौका के समान भविंसधु में डूबेंगे ही वे।। (१९) िंचतामणी रत्न कामधेनू पारस पत्थर अरु कल्पवृक्ष। ये परोपकार करने वाले हैं सुना है ना देखा प्रत्यक्ष।। पर िंचतामणी समान मनोवांछित जो दान देने वाला। दाता अवश्य देखे जाते इसलिए उसी में सब आता।। (२०) जिस नगर देश में श्रावकजन रहते हैं जिनमंदिर होता। अरु जहां जैनमंदिर होता यतिगण का भी निवास होता।। यतियों में धर्मवृत्ति रहती संचयति पाप जिसे नशते। पापों के नशने से श्रावक को स्वर्गमोक्ष के सुख मिलते।। (२१) इस दु:खमा नामक काल में जब जिनधर्म क्षीण हो जाने से। ध्यानी साधूगण विरले हैं मिथ्यांधकार पैâलाने से।। जिनप्रतिमाएं जिनमंदिर को जो भक्ति सहित बनवाते थे। अब विरले हैं वे भव्यपुरुष वंदन के योग्य कहाते वे।। (२२) विम्बादल के सम छोटे से छोटा मंदिर जो बनवाये। उसमें जौ के प्रमाण प्रतिमा भी पुण्य का फल वो पाये।। जिसके वर्णन की बात ही क्या खुद सरस्वती नहिं कह सकती। फिर जो ऊँचे शिखरों वाले मंदिर बनवाएं पुण्य मही।। (२३) जहाँ जिनमंदिर के होने पर यात्रा से अरु अभिषेकों से। अरु बड़े-बड़े उत्सव करके पूजा चरु और चांदने से। ध्वज आरोहण कलशारोहण अरु घंटा वाद्य चमर दर्पण। इनसे मंदिर की शोभा कर भविजन करते हैं पुण्यार्जन।। (२४) जो षट् आवश्यकपूर्वक अणुव्रत धरने वाले श्रावक हैं। वे स्वर्गों में चिरकाल रहें होते ऋद्धी के धारक हैं।। फिर मृत्युलोक में आ करके मनुकुल में रत्नत्रय धरकर। सिद्धालय में जा बसते हैं बाह्याभ्यंतर परिग्रह तजकर।। (२५) चारों पुरुषार्थों में उत्तम सुख देता मोक्ष है अविनाशी। उससे विपरीत अर्थ कामादिक तजो मोक्ष के अभिलाषी।। लेकिन यदि धर्म से भी भोगादिक वस्तु प्राप्त ही होती है। तो भी वह व्यर्थ कहा लेकिन इस धर्म से मुक्ति भी मिलती है।। (२६) जो भव्य मोक्ष की प्राप्ति हेतु अणुव्रत महाव्रत धारण करते। निश्चयनय से सुख की प्राप्ती के लिए मोक्ष को ही लभते।। क्योंकी अणुव्रत व महाव्रत के आचरण सफल तब ही होते। यदि मुक्तीसुख के लिए किया वरना जग में दुख ही देते।। (२७) यह ‘‘देशव्रतोद्योतन’’ क्रम से इंद्र अरु अहमिन्द्र बना करके। सबका कल्याण करे एवं अंतिम सुख का भंडार भरे।। दुर्लभ मनुष्य भव पा करके जिस मोक्षमार्ग की प्राप्ती हो। ‘‘श्री पद्मनंदि गुरु’’ की रचना इस जग में सदा जयवंती हो।।

।।इति देशव्रतोद्योतन अधिकार।।