13.सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार

अथ सम्यक्त्वमार्गणाधिकार:

अधुना सम्यक्त्वमार्गणायां सामान्येन सम्यग्दृष्टिस्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
सम्मत्ताणुवादेण सम्माइट्ठी णाम कधं भवदि ?।।६८।।
उवसमियाए खइयाए खओवसमियाए लद्धीए।।६९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-दर्शनमोहनीयस्य उपशमेन उपशमसम्यक्त्वं भवति, क्षायिकेण क्षायिकं, क्षयोपशमेण वेदकसम्यक्त्वं च। एतेषां त्रयाणां सम्यक्त्वानां यदेकत्वं स सम्यग्दृष्टिः नाम। तस्य सम्यग्दृष्टेः इमे त्रयो भावा येन सन्ति तेन सम्यग्दृष्टिः उपशामिकया क्षायिकया क्षायोपशमिकया लब्ध्या भवतीति उक्तं भवति।
कथमेकस्य त्रयो भावाः ?
नैतद् वक्तव्यं, पृथग्भूतसामान्यस्य एकस्य अक्रमेण अनेकवर्णाणां यथा विरोधो नास्ति तथा एकस्य सम्यग्दर्शनस्य बहुपरिणामैः विरोधाभावात्।
त्रिविधानां सम्यग्दृष्टीनां भावप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
खइयसम्माइट्ठी णाम कधं भवदि ?।।७०।।
खइयाए लद्धीए।।७१।।
वेदगसम्माइट्ठी णाम कधं भवदि ?।।७२।।
खओवसमियाए लद्धीए।।७३।।
उवसमसम्माइट्ठी णाम कधं भवदि ?।।७४।।
उवसमियाए लद्धीए।।७५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-दर्शनमोहनीयस्य निःशेषविनाशः क्षयः। तस्मिन् उत्पन्नजीवपरिणामः लब्धिर्नाम। तया लब्ध्या क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्भवति। सम्यक्त्वदेशघातिस्पर्धकानां अनन्तगुणहान्या उदयागतानां अत्यल्पदेश-घातित्वेन उपशांतानां येन क्षयोपशमसंज्ञा, तेन तत्रोत्पन्नजीवपरिणामः क्षयोपशमलब्धिसंज्ञितः। तया लब्ध्या वेदकसम्यक्त्वं भवति। दर्शनमोहनीयस्य उपशमेन उत्पन्नजीवपरिणामः उपशमलब्धिः, तया लब्ध्या उपशमसम्यक्त्वं भवति।
सासादनादित्रिगुणस्थानवर्तिनां स्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
सासणसम्माइट्ठी णाम कधं भवदि ?।।७६।।
पारिणामिएण भावेण।।७७।।
सम्मामिच्छाइट्ठी णाम कधं भवदि ?।।७८।।
खओवसमियाए लद्धीए।।७९।।
मिच्छादिट्ठी णाम कधं भवदि ?।।८०।।
मिच्छत्तस्स कम्मस्स उदएण।।८१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र पूर्ववत् निक्षेपान् कृत्वा नोआगमतः भावसासादनसम्यग्दृष्टिर्गृहीतव्यः। ‘सो कधं भवदि’ केन प्रकारेण भवतीति पृच्छासूत्रं कथितं। एषः सासादनपरिणामः क्षायिको न भवति, दर्शनमोहक्षयेणानुत्पत्तेः। न क्षायोपशमिकोऽपि, देशस्पर्धकानामुदयेनानुत्पत्तेः। उपशामिकोऽपि न भवति, दर्शनमोहोपशमेनानुत्पत्तेः। औदयिकोऽपि न भवति, दर्शनमोहस्योदयेनानुत्पत्तेः। पारिशेषन्यायात् पारिणामिकेन भावेन सासादनो भवति।
कश्चिदाह-अनंतानुबंधिनामुदयेन सासादनगुणस्थानस्योपलंभात् औदयिको भावः किन्न भवति ?
तस्य समाधानं क्रियते-नैतद् वक्तव्यं, दर्शनमोहनीयस्य उदय-उपशम-क्षय-क्षयोपशमैः विना उत्पद्यते, इति सासादनगुणस्थानस्य पारिणामिकभावाभ्युपगमात्। नानन्तानुबंधिनामुदयः सासादनगुणस्थानस्य कारणं, चारित्रमोहनीयस्य तस्य दर्शनमोहनीयत्वविरोधात्।
कश्चिदाह-अनंतानुबंधिचतुष्कं तदुभयमोहनं चेत् ?
आचार्यःप्राह-भवतु नाम, किंतु नेदमत्र विवक्षितं। अनंतानुबंधिचतुष्कं चारित्रमोहनीयं चैवेति विवक्षायाः सासनगुणः पारिणामिकः भणितः।
कश्चिदाशंकते-सम्यग्मिथ्यात्वस्य सर्वघातिस्पर्धकानामुदयेन जीवः सम्यग्मिथ्यादृष्टिर्यतो भवति तेन तस्य क्षायोपशमिको भावो न युज्यते ?
आचार्यः समाधत्ते-भवतु नाम सम्यक्त्वं प्रतीत्य सम्यग्मिथ्यात्वस्पर्धकानां सर्वघातित्वं, किंतु अशुद्धनये विवक्षिते न सम्यग्मिथ्यात्वस्पर्धकानां सर्वघातित्वमस्ति, तेषामुदये सत्यपि मिथ्यात्वसंबलितसम्यक्त्व-कणस्योपलंभात्। तानि सर्वघातिस्पर्धकानि उच्यन्ते येषामुदयेन सर्वं घात्यते। न चात्र सम्यक्त्वस्य निर्मूलविनाशं पश्यामो वयं, सद्भूतासद्भूतपदार्थेषु तुल्यश्रद्धानदर्शनात्। ततो युज्यते सम्यग्मिथ्यात्वस्य क्षायोपशमिको भावः इति।
मिथ्यात्वकर्मणः उदयेन मिथ्यादृष्टिर्भवति इति त्रिविधगु
णस्थानवर्तिनां भावाः क्रमेण पारिणामिकः क्षायोपशमिकः औदयिकश्च प्रकीर्तिताः सन्ति।
एवं सम्यक्त्वमार्गणायां स्वामित्वभावनिरूपणत्वेन चतुर्दशसूत्राणि कथितानि।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां सम्यक्त्वमार्गणानाम द्बादशोऽधिकार: समाप्त:।

अथ सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार

अब सम्यक्त्वमार्गणा में सामान्य सम्यग्दृष्टियों का स्वामित्व बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यक्त्वमार्गणानुसार जीव सम्यग्दृष्टि किस कारण से होते हैं।।६८।।

औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक लब्धि से जीव सम्यग्दृष्टि होते हैं।।६९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दर्शनमोहनीय के उपशम से उपशम सम्यक्त्व होता है, क्षय से क्षायिक सम्यक्त्व होता है और क्षयोपशम से वेदक सम्यक्त्व होता है। इन तीनों सम्यक्त्वों का जो एकत्व है, उसी का नाम सम्यग्दृष्टि है। चूँकि उस सम्यग्दृष्टि के ये तीन भाव होते हैं, इसीलिए सम्यग्दृष्टि औपशमिक, क्षायिक व क्षायोपशमिक लब्धि से समन्वित होता है, ऐसा कहा गया है।

शंका-एक ही सम्यग्दृष्टि के तीन भाव कैसे होते हैं ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि जैसे पृथग्भूत सामान्य एक के साथ एक अनेक वर्णों के होने में कोई विरोध नहीं आता, उसी प्रकार एक ही सम्यग्दर्शन के अनेक परिणामरूप होने में कोई विरोध नहीं है।

अब तीन प्रकार के सम्यग्दृष्टियों का भाव प्रतिपादित करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव क्षायिकसम्यग्दृष्टि किस कारण से होते हैं ?।।७०।।

क्षायिकलब्धि से जीव क्षायिकसम्यग्दृष्टि होते हैं।।७१।।

जीव वेदकसम्यग्दृष्टि किस कारण से होते हैं ?।।७२।।

क्षायोपशमिक लब्धि से जीव वेदकसम्यग्दृष्टि होते हैं।।७३।।

जीव उपशमसम्यग्दृष्टि किस कारण से होते हैं ?।।७४।।

औपशमिक लब्धि से जीव उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं।।७५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीकादर्शनमोहनीय कर्म के नि:शेष-सम्पूर्ण विनाश को क्षय कहते हैं और क्षय से जो जीव का परिणाम उत्पन्न होता है, वह क्षायिक लब्धि कहलाती है। उसी क्षायिक लब्धि से जीव क्षायिक सम्यग्दृष्टि होता हे।

सम्यक्त्वप्रकृतिरूप देशघाती स्पर्धकों की अनन्तगुणी हानि होने से उदय में आये हुए अति अल्प देशघातिपने की अपेक्षा उपशान्त हुए उन सम्यक्त्व प्रकृति के स्पर्धकों का चूॅूंकि क्षयोपशम नाम दिया गया है, इसीलिए उस क्षयोपशम से उत्पन्न जीवपरिणाम को क्षयोपशम लब्धि कहते हैं। उसी क्षयोपशम लब्धि से वेदक सम्यक्त्व होता है। दर्शनमोहनीय कर्म के उपशम से उत्पन्न जीव का परिणाम उपशमलब्धि है, इसी लब्धि से उपशम सम्यक्त्व की उत्पत्ति देखी जाती है।

अब सासादन आदि गुणस्थानवर्तियों का स्वामित्व प्रतिपादन करने के लिए छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव सासादनसम्यग्दृष्टि किस कारण से होते हैं ?।।७६।।

पारिणामिक भाव से जीव सासादनसम्यग्दृष्टि होते हैं।।७७।।

जीव सम्यग्मिथ्यादृष्टि किस कारण से होते हैं ?।।७८।।

क्षायोपशमिक लब्धि से जीव सम्यग्मिथ्यादृष्टि होते हैं।।७९।।

जीव मिथ्यादृष्टि किस कारण से होते हैं ?।।८०।।

मिथ्यात्व कर्म के उदय से जीव मिथ्यादृष्टि होते हैं ?।।८१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ पहले के समान निक्षेपों को करके नोआगमभाव से सासादनसम्यग्दृष्टि का ग्रहण करना चाहिए। वह सासादनसम्यग्दृष्टि कैसे होते हैं अर्थात् किस प्रकार से होते हैं, ऐसा पृच्छा सूत्र कहा गया है। यह सासादनपरिणाम क्षायिक नहीं होता, क्योंकि दर्शनमोहनीय के क्षय से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है। सासादनपरिणाम क्षायोपशमिक भी नहीं है, क्योंकि दर्शनमोहनीय के देशघाती स्पर्धकों के उदय से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है। सासादनपरिणाम औपशमिक भी नहीं है, क्योंकि दर्शनमोहनीय के उदय से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है। सासादनपरिणाम औदायिक भी नहीं है, क्योंकि दर्शनमोहनीय के उदय से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है। अतएव पारिशेष न्याय से पारिणामिक भाव से सासादन परिणाम होता है।

यहाँ कोई शंका करता हैै-

अनन्तानुबंधी कषायों के उदय से सासादन गुणस्थान उपलब्ध होता है, अतएव उसे औदायिक भाव क्यों नहीं कहते हैं ?

उसका समाधान करते हैं-

ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह दर्शनमोहनीय के उदय, उपशम, क्षय व क्षयोपशम के बिना उत्पन्न होता है, इसलिए सासादनगुणस्थान का पारिणामिक भाव स्वीकार किया है। नियम से अनन्तानुबंधी का उदय सासादनगुणस्थान का कारण नहीं है, क्योंकि वह चारित्रमोहनीय है, इसलिए उसे दर्शनमोहनीय मानने में विरोध आता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-

अनन्तानुबंधी दर्शन और चारित्र दोनों का मोहन करने वाला है ?

इसका आचार्य समाधान करते हैं कि-

भले ही अनन्तानुबंधी चतुष्क उभयमोहनीय हो, किन्तु यहॉँ वैसी विवक्षा नहीं है। अनन्तानुबंधी चतुष्क चारित्रमोहनीय ही है, इसी विवक्षा से सासादन गुणस्थान को पारिणामिक कहा है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-चूँकि सम्यग्मिथ्यात्व नामक दर्शनमोहनीय प्रकृति के सर्वघाती स्पर्धकों के उदय से जीव सम्यग्मिथ्यादृष्टि होता है, इसलिए उसके क्षायोपशमिक भाव नहीं बनता है ?

आचार्य समाधान देते हैं-सम्यक्त्व की अपेक्षा सम्यग्मिथ्यात्व के स्पर्धकों में सर्वघातीपना भले ही हो, किन्तु अशुद्धनय की विवक्षा से सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के स्पर्धकों में सर्वघातीपना नहीं होता है, क्योंकि उसका उदय रहने पर भी मिथ्यात्वमिश्रित सम्यक्त्व कण पाया जाता है। सर्वघाती स्पर्धक तो उन्हें कहते हैं जिनका उदय होने से मूल का (प्रतिपक्षी गुण) घात हो जाता है। किन्तु सम्यग्मिथ्यात्व में तो हम सम्यक्त्व का निर्मूल विनाश नहीं देखते, क्योंकि यहाँ सद्भूत और असद्भूतपदार्र्थोें में समान श्रद्धान होता देखा जाता है। इसलिए सम्यग्मिथ्यात्व का क्षायोपशमिक भाव बन जाता है।

मिथ्यात्व कर्म के उदय से जीव मिथ्यादृष्टि होता है, इस प्रकार तीनों गुणस्थानवर्ती जीवों के भाव क्रम से पारिणामिक, क्षायोपशमिक और औदयिक माने जाते हैं।

इस प्रकार सम्यक्त्वमार्गणा में स्वामित्वभाव का निरूपण करने वाले चौदह सूत्र कहे गये हैं।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणिटीका में सम्यक्त्वमार्गणा नाम का बारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।