13.सिद्ध परमेष्ठी का स्तवन

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सिद्ध परमेष्ठि का स्तवन

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।।अष्टम अधिकार।।

(१) जो अवधिज्ञानि अत्यंत सूक्ष्म अणुसम पदार्थ भी देख सके। उनको भी सिद्ध नहीं दिखते फिर हम वैâसे स्तवन करें।। और जिनके ज्ञान की महिमा में त्रैलोक्य नक्षत्र समान दिखे। ऐसे अप्रमेय तेजधारी की भक्तीवश स्तुती करें।। (२) देवों के मुकुटों की मणियों से जिनके चरण कमल पूजित। ऐसे तीर्थंकर भगवन भी जिस पद प्राप्ती में लगे सतत।। जो लोकशिखर पर हैं राजित विस्तीर्ण ज्ञान निकलंक प्रभो। ऐसे क्षायिक गुण के धारी सिद्धों को भक्ती से प्रणमो।। (२) धर्मास्तिकाय के कारणवश लोकाग्र भाग में स्थित हैं। स्वाभाविक ज्ञान और दर्शन से जिनका रूप सुशोभित है।। कृतकृत्य प्रभो जिनकी उपमा कोई भी धार नहीं सकता। मंगलकारी अविनाशी ऐसे सिद्धों को मैं नमन करता।। (३) जिन सिद्धप्रभु ने कर्मशत्रु को जीत सिद्ध पद प्राप्त किया। अरु जन्म मरण आदिक अठरह दोषों को जिनने नाश किया।। जो अनन्तज्ञान से सहित हुए अचिन्त्य ऐश्वर्य के धारी हैं। वे तीन जगत के शिखामणी श्री सिद्धप्रभू सुखकारी हैं।। (४) सिद्धों का ज्ञान प्रमाणरूप और आत्मा ज्ञेय प्रमाण कही। इसलिए आत्मा व्यापक है अव्यापक भी आत्मा है कही।। सिद्धों की आत्मा के प्रदेश अंतिम शरीर से कम रहते। ऐसे दोनों धर्मोंकरयुत श्री सिद्ध प्रभू जयंवत रहें।। (५) पहले दोनों जब कर्म नशे तो दर्श ज्ञान गुण प्रगट हुआ। मोहनी कर्म के क्षय होने से सुख अनंत भी प्राप्त हुआ।। वीर्यान्तराय से अनंतवीर्य अरु नामकर्म से र्मूित नहीं। आयु से जन्म मरण नशाते अरु गोत्र से कोई गोत्र नहीं।। वेदनीय कर्म के नशने से सिद्धों के सुख दुख नहिं होते। जब तक ये अष्टकर्म रहते तब तक वे सिद्ध नहीं बनते।। (६) जिन कर्मों के कृपा प्रसाद से जीव बहुत दुख सहते हैं। वास्तविक रूप का ज्ञान नहीं नहिं सच्चा रूप देखते हैं।। दुर्धर्ष ध्यान से कर्मों को जिन सिद्ध प्रभू ने नष्ट किया। वे सिद्ध अनंत चतुष्टय के धारी शिवपथ को प्राप्त किया।। (७) इक इंद्रिय से दो इंद्रिय में है ज्ञान अधिक तो सुख ज्यादा। कुछ एक दुखों की शांती से आगे आगे है सुख ज्यादा।। फिर सिद्ध प्रभू जिनने समस्त कर्मों को निज से नष्ट किया। वे सबसे अधिक सुखी ज्ञानी होंगे ही मुक्ती वरण किया।। (८) जब कोई व्यक्ती किसी व्यक्ति को नख से शिख तक कस डाले। कुछ इक बंधन की यदि कोई भी रस्सी ढीली हो जाए।। तब सुख माने प्राणी वैसे ही सिद्ध प्रभू बंधन विरहित। क्यूं ना अनंत सुख भोगें वे बाह्याभ्यंतर जब कर्म रहित।। (९) आत्मा के इक प्रदेश में भी इतने परमाणू व्याप्त रहे। सर्वज्ञ सिवा कोई नहिं गिन सकता उस सुख को रोक रहे।। आत्मा में कर्म चिपटने से वह कुछ भी देख नहीं सकता। जिनने कर्मों को उड़ा दिया उन सिद्धों को ही सुख मिलता।। (१०) जिन संसारी के कर्मजनित क्षुध तृषा आदि व्याधी रहती। उसकी शांती के लिए अन्न जल पर काया आश्रित रहती।। पर सिद्धप्रभू के कर्म नहीं नहिं जल अन्नादिक ग्रहण करें। सुखरूपी अमृत में निमग्न उनकी आत्मा तो तृप्त रहे।। (११) जो निर्मल ज्ञान स्वरूप र्मूित सम सिद्ध ज्योति के पाने को। योगीजन ध्यान लगाते जब उन सिद्धों सम बन जाते वो।। जैसे स्पुâरित दीप बत्ती उस दीपपने को प्राप्त करे। वैसे त्रिलोक के चूड़ामणि सुरनमित सिद्ध पद प्राप्त करें।। (१२) जो सिद्ध ज्योति सूक्षम भी है अरु वृहत् तथा है शून्य वही। अरु शून्य नहीं है नश्वर भी अस्ती नास्ति और नित्य वही।। यह एक अनेकरूप धर्म को लिए हुए स्याद्वादयुत है। ऐसी यह ज्ञानस्वरूप अर्मूितक ज्योति किसी को मिलती है।। (१३) स्यादवादमयी जल से पूरित महासागर में स्नान करके। जिसकी बुद्धी है स्वच्छ हुई वह ही जाने गुण आत्मा के।। वह बुद्धिमान उन सिद्ध के गुण साक्षात रीति से प्राप्त करे। और तेरा मेरा भेद रहित आत्मा का सिद्ध स्वरूप गहे।। (१४) जैसे सोने से बना पात्र सोना स्वरूप ही है होता। और लोह पात्र लोहास्वरूप शुद्धात्मरूप तत्सम होता।। जो तत्वज्ञानि की दृष्टि वही अविनाशी पद दिलवाती है। इससे जो भिन्न दृष्टि उनको तिर्यंचगती पहुँचाती है।। (१५) जैसे सुनार दूसरी धातु में मिले स्वर्ण को जुदा करे। वैसे ही जो विद्वान पुरुष श्रुतज्ञान चक्षु से जब देखे।। षट्द्रव्यों में जो मिले द्रव्य उनसे आत्मा को जुदा करे। शास्त्रों को बिना पढ़े देखे उत्कृष्ट रूप को नहीं लखे।। (१६) यह वस्तु त्यागने योग्य तथा यह ग्रहण योग्य है ज्ञान जिसे। जो ग्राह्य रूप वो ग्रहण करे सिद्धावस्था हो प्राप्त उसे।। लेकिन जो भिन्न हेय वस्तू को तजने में संदेह करे। वे अज्ञानी उत्कृष्ट मोक्ष स्थान कभी ना प्राप्त करें।। (१७) जितना भी अंग उपांगयुत श्रुत सिद्धत्व प्राप्ति में है कारण। पर अज्ञानी की अन्य अर्थ के हेतु कल्पना निष्कारण।। निर्वाण मार्ग से भ्रष्ट उन्हें नहिं अंश मात्र भी ज्ञान कहा। जो भी होते हैं विचारशील उसको होता श्रुतज्ञान महा।। (१८) जो सदाकाल हैं सुखी तथा आराधन का फल प्राप्त किया। ऐसे सिद्धों के बारे में मुझ अज्ञानी ने गान किया।। यह थोड़ी सी स्तुति मुझको मुक्तिपथ पर ले जाएगी। जो सर्व शास्त्ररूपी संपति का धारी मुझे बनाएगी।। (१९) यद्यपि जो सिद्धस्वरूप तेज सबका ज्ञाता अरु दृष्टा है। और सबसे अंत में जो होता आत्मीक सुखों का भोक्ता है।। उत्पाद ध्रौव्य व्यय युक्त तथा मोक्षाभिलाषियों के मन में। वह एक रूप ही राजित है मुक्तात्मरूप आत्मधन में।। (२०) जो नय निक्षेप प्रमाणों के व्यापार तथा कारक छोड़े। सब संबंधों को एवं तू मैं आदि विकल्पों को छोड़े।। सब कर्मों की उपाधियों से हो विरहित आत्मलीन होकर। ऐसे वे सिद्ध सर्वगुण से वृद्धी को प्राप्त मुक्त होकर।। (२१) जिनने अंतरंग दृष्टि से उन सिद्धात्म तेज को नहिं देखा। उन मूर्खों को स्त्री सुवर्ण आदिक पदार्थ में सुख दिखा।। जिन भविजीवों का दृश्य सिद्धरूपी रस में है भीग गया। वे भव्यजीव तृणवत् समझें साम्राज्य व तन भव रोग कहा।। (२२) जो मनुज प्रीतिपूर्वक सिद्धों के नाम का भी सुमिरन करते। वे जग में वंदन योग्य गुणी और धन्य पुरुष समझे जाते।। अथवा जो मनुज शुद्ध मन से पर्वत की गुफा में ध्यान करें। नासाग्रदृष्टि रख करे ध्यान तब और भी धन्य कहायें वे।। (२३) जो तर्वâ व्याकरण सहित सभी शास्त्रों को पढ़कर जान लिया। सिद्धों का जो वास्तविक रूप विद्वानों ने पहचान लिया।। क्योंकी जो बाण बेधने में है कुशल बाण कहलाता है। वैसे ही सिद्धरूप को जो ना जाने मूढ़ कहाता है।। (२४) आत्मा प्रबुद्ध जिनकी ऐसे जो भव्य उन्होंने जान लिया। दैदीप्यमान ज्ञानधारी उत्कृष्ट सिद्ध को जान लिया।। ऐसा हो ज्ञान हृदय में जब तब बाह्य शास्त्र से मतलब क्या। जिनके हाथों में सूरज हो उसको दीपक का काम ही क्या।। (२५) सिद्धों के आत्म प्रदेशों से सब कर्मबंध हैं छूट गए। और जिनके आत्मप्रदेशों में है ज्ञान की किरणें पूâट गर्इं।। जो सम्यग्दर्शन के धारी सर्वत्र तेज स्पुâरायमान। आकुलतारहित तथा निश्चल हे सिद्ध ! मोक्ष कर दो प्रदान।। (२६) जो अंतरात्मा बहिरात्मा के भेदज्ञान को देख सके। आत्मा रूपी ऊँचा मकान िंचतवन रूप सीढ़ी चढ़ के।। उसमें जो चिदानंद रूपी स्त्री के साथ निवास करे। र्हिषत होकर निज आत्मा में आत्मा का ही आधार रहे।। (२७) सिद्धों की गति वह ही सुगती उनका सुख ही है सच्चा सुख। वे सिद्ध ही सम्यग्दर्शन हैं अरु सम्यग्ज्ञान रूप भी प्रिय।। उनके अतिरिक्त नहीं कुछ प्रिय ऐसा मन में श्रद्धान करूँ। सारे जग का भय छुट जाए वह सिद्ध अवस्था प्राप्त करूँ।। (२८) ऐसे इन सिद्ध परमेष्ठी की स्तुति वचनों से शक्य नहीं। फिर भी जो कुछ है लिखा गया नभ में आलेख्य कर रहा सही।। जब उनके नाम स्मरण मात्र से हर्ष बहुत है हो जाता। मैं ‘‘पद्मनंदि मुनि’’ भक्तीवश वाचाल क्यों नहीं हो जाता।।

।।इति सिद्धस्तुति रूप अधिकार।।