14.आलोचनाधिकार

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आलोचनाधिकार

<poem>

।।नवमां अधिकार।। (१) हे प्रभो अगर सज्जन के मन में आपका ही अवगाहन हो। और आपका नाम स्मरण रूप महामंत्र ही मन में भावन हो।। अरु आपके द्वारा प्रकट किए रत्नत्रयरूपी मोक्षमार्ग। इन यदि गमन की अभिलाषा तो रोक न सकता कोई काम।। (२) हे भगवन् ! जग से मुक्ति हेतु सारे परिग्रह का त्याग किया। और रागभाव को त्याग आपने समता को भी धार लिया।। फिर अनंतज्ञान, सुख, वीर्य और दर्शन गुण तुममें प्रगट हुए। इस क्रम से तुम ही शुद्ध तथा सज्जन की सेवा पात्र हुए।। (३) हे तीन लोक के ईश ! अगर मैं आपकी सेवा में दृढ़ हूँ। तो कोई भी बलवान जगत वैरी को जीत मैं सकता हूँ।। क्योंकी जलवर्षण से उत्तम फव्वारा यंत्र सहित घर में। सुख मिलता है तब तीक्ष्ण धूप ना त्रास दे सके जीवन में।। (४) यह सार असार परीक्षा में हो एकचित्त जो बुद्धिमान। त्रैलोक्य के सभी पदार्थों को बाधा विरहित करके विचार।। उस व्यक्ति की दृष्टि में हे भगवन् ! बस सारभूत इक आप ही हैं। तुमसे सब भिन्न असारभूत संतोष का आश्रय आप ही हैं।। (५) जिन योगीश्वर ने अपनी योगदृष्टि से तुमको देख लिया। क्योंकी तुमने ही अनंत दर्श सुख बल अतिशय कर प्राप्त किया।। काया भी है दैदीप्यमान तुमको देखा सब देख लिया। फिर कुछ भी रहा नहीं बाकी देखने योग्य कुछ रह न गया।। (६) हे भगवन् ! तुम हो त्रिजगदपति स्वामी और आप जिनेश्वर हो। तुम ही को केवल नमन करूँ और हर क्षण ध्यान हृदय में हो।। सेवा स्तुति भी करता हूँ अब मुझको अपनी शरण में लो। यदि जग में कुछ मिलता हो मुझे ना उससे कोई प्रयोजन हो।। (७) मैंने भ्रम से जो भूत भविष्यत वर्तमान में पाप किये। कृत कारित अनुमोदन द्वारा मन वचन काय से करवाये।। उन पापों का अनुभव करके मैं अपनी िंनदा करता हूँ। हे प्रभो ! मेरे वे पाप सभी मिथ्या हों याचना करता हूँ।। (८) हे भगवन् ! तुम अनंत भेदयुत लोकालोक सकल जानो। और मेरे सारे दोषों को भी तुम ही भलीभाँति जानो।। फिर भी मैं अपने पापों का आलोचन तुमसे करता हूँ। यह नहीं सुनाने के खातिर मनशुद्धी हेतू करता हूँ।। (९) व्यवहार नयाश्रित मूल और उत्तरगुण को धरने वाला। मुझ मुनि के जो भी दोष लगे आलोचन हेतू मैं आया।। क्योंकी ज्ञानी को अपना मन त्रयशल्य रहित रखना चहिए। हे प्रभो ! आपके सन्मुख सब निर्मल मन से कहना चहिए।। (१०) हे भगवन् ! जग में जितने व्यक्त अरु अव्यक्त हैं विकल्प कहे। और उन्हीं विकल्पों सहित जीव ने उतने ज्यादा दुक्ख सहे।। पर जितने पाप नहीं उतने प्रायश्चित कहे जिनागम में। इसलिए सभी दोषों की शुद्धी होती प्रभु तब आंगन में।। (११) मन और इन्द्रियाँ जब तक बाह्य पदार्थों में हैं लगी हुई। तब तक निंह कोई भी प्राणी निर्मल स्वरूप को देख सके।। जो सर्व परिग्रह से विरहित और सब शास्त्रों का जो ज्ञाता। वह ही निज में स्थिर रहकर प्रभु की समीपता को पाता।। (१२) जिसने पूरब भव में कष्टों से संचित किया पुण्य भारी। उसने तुमको पा लिया प्रभो हो उत्तम पद की उसे प्राप्ति।। जिसको निश्चय से ब्रह्मा विष्णु महेश आदि भी पा न सवेंâ। फिर हे जिनेन्द्र बतलाओ मुझे जिससे मन बाहर ना भटके।। (१३) इस जग में दुक्ख बहुत ही है पर सुखप्रद मोक्ष एक ही है। इसलिए उसी की प्राप्ति हेतु छोड़े धन धान्य परिग्रह हैं।। हमने तपवन में व्रत धारण कर सारे संशय त्याग दिए। फिर भी सिद्धी नहिं मिली मुझे क्यों मेरा मन भरमाय रहे।। (१४) जब तक आत्मा में कर्मों का है आवागमन दुखी करता। उन कर्मों से मन बाह्य वस्तु रमणीक मान रागी बनता।। जब इंद्रिय रूपी गांव में है मन बसा हुआ जीवित रहता। तब मुनियों का मन भी कब तक कल्याण मार्ग में थिर रहता।। (१५) निर्मल अखंड बोधात्मरूप तुमको पाकर मन मर जाता। हे नाथ ! मोहवश मेरा मन तुमसे अन्यत्र भ्रमण करता।। क्या करूँ मृत्यु से सब डरते अतएव प्रार्थना करता हूँ। इस अहितकारि मोहनीय कर्म से छुटकारा दो कहता हूँ।। (१६) ज्ञानावरणादि सभी कर्मों में मोह बहुत बलशाली है। इस मोह के वश से यह चंचल मन यहाँ वहाँ फिरता ही है। और डरता है मरने से भी यह नहिं हो कोई न जिए मरे। इस जग को दोनों दृष्टी से देखा है आप ही मोह हरें।। (१७) वायू से व्याप्त समुद्र और उसकी जल लहरी के समान। सब काल और सब क्षेत्रों में क्षणभंगुर और विनाशवान।। ऐसा विचार कर हे जिनेन्द्र ! तुममें रहने की इच्छा है। क्योंकी तुम ही हो र्नििवकार जग की स्थिति को परखा है।। (१८) जिस समय अशुभ उपयोग उस समय पाप की उत्पत्ती होती। और शुभ उपयोग जिस समय हो तब पुण्य की उत्पत्ती होती।। है पाप पुण्य से सुख और दुख दोनों संसार के कारण हैं। हे भगवन् ! मैं तुम सम पद का इच्छुक जो मोक्ष का कारण है।। (१९) आतमस्वरूप जो तेज न भीतर और न बाहर स्थित है। और नहीं दिशाओं में स्थित नहिं मोटा और महीन ही है।। निंह पुल्लिंग स्त्रीिंलग नपुंसक िंलग और ना भारी है। नहिं हल्का, नर्म स्पर्श, गंध, तन, गणना अरु वच धारी है।। जो निर्मल सम्यग्ज्ञान और दर्शनस्वरूप मूर्ती जिसकी। वैसी ही तेजस्वरूप मेरी आत्मा निंह भिन्न और कुछ भी।। (२०) आत्मा की उन्नति के नाशक बिन कारण के जो वैरी हैं। तुममें और मुझमें जो अंतर इन कर्मों के कारण ही है।। ये कर्म आपके हैं समक्ष इनको भगवन् अब नष्ट करो। है नीतिवान का धर्म यही हम सज्जन को निज सम ही करो।। (२१) नाना आकार विकारों के जो मेघ व्योम में रहते हैं। आकाश अर्मूितक है उसका कुछ नहिं बिगाड़ कर सकते हैं।। बस उसी तरह मेरी आत्मा तन से है भिन्न व ज्ञानवान। आधी व्याधि और जरा मरण उसका नहिं कर सकते विनाश।। (२२) जैसे स्थल पर पड़ी हुई मछली जल बिना तड़पती है। वैसे ही इस संसार रूप संताप से काया जलती है।। करूणा रूपी जल के संग से जो शीतल चरण कमल प्रभु के। जब तक मन उसमें लीन रहे तब तक ही सुखी वरना दुख में।।

(२३) इंद्रिय समूह से सहित मेरा मन बाह्य पदार्थों से बंधता। उससे ही कर्मबंध होता वास्तव में सदा पृथक रहता। जिस तरह आपकी आत्मा से ये कर्म सर्वथा जुदे रहे। वैसे ही हे शुद्धात्मन ! मम स्थिती आपमें बनी रहे।। (२४) नहिं लोक व आश्रय और द्रव्य से आत्मन तुझे प्रयोजन है। इन्द्रिय, शरीर, अरु वचन, प्राण पुद्गल स्वरूप तू चेतन है।। यदि अपना मन इसे आश्रय ले बंधन से बंध जाएगा। ममता को त्याग निजातम ध्या शुद्धात्म रूप को पाएगा।। (२५) धर्म और अधर्म आकाश काल चारों ही द्रव्य हैं हितकारी। क्योंकी गति और स्थिती में अवकाश काल में सहकारी।। पर गति आदिक नोकर्म सहित पुद्गल ही मेरा वैरी है। इससे ही कर्मबंध होता निज ज्ञान से इनको भेदा है।। (२६) जिन राग द्वेष परिणामों से ये पुद्गल द्रव्य परिणमन करें। आकाश चतुष्टय र्मूित रहित में रागद्वेष नहिं परिणमते।। उन कर्मों से संसार भ्रमण और दुख बहुत सहने पड़ते। इन रागद्वेष का त्याग करो ये सबका बहुत अहित करते।। (२७) हे मन् ! तुझसे जो बाह्य वस्तु स्त्री पुत्रादिक पर पदार्थ। उसमें तू रागद्वेष मय हो करता विकल्प बहुविध प्रकार।। क्यों दुख के लिए कर्म बाँधे आनंदामृत सागर में रह। शुद्धात्मा में निवास करके बस उसमें ध्यान मगन तू रह।। (२८) पूर्वोक्त बात को भलीभाँति मन में धरकर जब ये प्राणी। अध्यात्म तुला पर चढ़ता है दूजे में कर्मरूप वैरी।। प्राणी को दोषी बना रहे दोनों के मध्य आप ही हैं। हे भगवन् ! न्याय करो मेरा चरणों की कृपा आपकी है।। (२९) सविकल्प ध्यान संसार रूप वास्तविक रीति से कहा गया। र्नििवकल्प ध्यान है मोक्षरूप संक्षेप में दोनों कहा गया।। निश्चयनय का अवलम्बन कर जब नाम रहित हो जाता है। व्यवहारनयों से उस ही का ब्रह्मादिक नाम कहाता है।। (३०) बिन कर्म नशे नहिं मुक्ति मिले कर्मों का नाश तप से होता। इस विषमकाल में हे भगवन् ! चारित्र नहीं मैं धर सकता।। पूर्वोर्पािजत कुछ पुण्य उदय से दृढ़भक्ति तव चरण मेरी। संसार रूप सागर तिरने में नाव आप ही हो मेरी।। (३१) संसार भ्रमण करके मैंने इंद्रादिक पदवी प्राप्त करी। नरकादि निगोद आदि योनि ना जाने कितनी बार धरी।। जो है अपूर्व मुक्ती पदवी वह अब तक प्राप्त नहीं की है। हे भगवन् ! इस पदवी को दो अब यही प्रार्थना मेरी है।। (३३) श्री वीरनाथ भगवान ने जो चित में उपदेश जमाया है। उसके आगे इस पृथ्वी का क्षणभंगुर राज्य न भाया है।। हे प्रभो ! उच्च पद प्राप्ति हेतु उपदेश आपका ही प्रिय है। तीनों लोकों का राज्यपाट अब लगता मुझको अप्रिय है।। (३३) जो प्राणी तीनों कालों में अर्हत सम्मुख यह पाठ करे। आलोचना नामक इस कृति को जो ‘‘पद्मनंदि आचार्य’’ रचें।। वह शीघ्र मोक्ष पद पाता है जिस पद को पाने की खातिर। योगीजन बड़ा यत्न करते चिरकालों तक तप को कर कर।।

।।इति आलोचना अधिकार।।