15सरस्वतीस्तोत्र

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सरस्वती स्तोत्र

वंशस्थवृत्त छंद
जयत्यशेषामरमौलिलालितं सरस्वति त्वत्पदपंकजद्वयम् ।
हृदि स्थितं यज्जनजाड्यनाशनं रजोविमुक्तं श्रयतीत्यपूर्वताम् ।।१।।

अर्थ —समस्त प्रकार के जो देव उनके जो मुकुट उन करके लालित अर्थात् जिनको समस्त देव मस्तक नवाकर नमस्कार करते हैं ऐसी हे सरस्वती मात: ! आपके दोनों चरणकमल सदा इस लोक में जयवंत हैं जो चरण कमल मन में तिष्ठते हुए मनुष्यों की समस्त प्रकार की जड़ताओं के नाश करने वाले और रजकर रहित अपूर्वता को आश्रय करते हैं।

भावार्थ —कमल तो स्वयं जड होते हैं इसलिये वे दूसरों की जडता का नाश भी नहीं कर सकते किंतु सरस्वती के चरणकमल मन में स्थित होने पर ही समस्त प्रकार की जड़ता के नाश करने वाले हैं और कमल जो रज (धूलि) कर सहित हैं किंतु सरस्वती के चरण कमल रज कर रहित हैं और जिन चरणकमलों को समस्त देव मस्तक नवाकर नमस्कार करते हैं इसलिये आचार्य वर सरस्वती के चरण कमलों की आशीर्वादात्मक स्तुति करते हैं कि इस प्रकार आश्चर्य के करने वाले सरस्वती के चरण कमल सदा इस लोक में जयवंत हैं ।।१।।

अपेक्षते यन्न दिनं न यामिनीं नचांतरं नैव बहिश्च भारति
न तापकृज्जाड्यकरं न तन्मह: स्तुवे भवत्या: सकलप्रकाशकम् ।।२।।

अर्थ —हे सरस्वति ! जो आपका तेज न तो दिन की अपेक्षा करता है और न रात्रि की अपेक्षा करता है और न भीतर की अपेक्षा करता है और न बाहर की अपेक्षा करता है जो तेज न जीवों को संताप का देने वाला है और न जड़ता का करने वाला है तथा समस्त प्रकार के पदार्थों का प्रकाश करने वाला है आचार्य कहते हैं कि इस प्रकार के सरस्वती के तेज को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं अर्थात् ऐसा सरस्वती का आश्चर्य करने वाला तेज मेरी रक्षा करे ।

भावार्थ —यद्यपि संसार में सूर्य आदि बहुतों के तेज मौजूद हैं किंतु वे एक दूसरे की अपेक्षा करने वाले हैं जिस प्रकार सूर्य का तेज तो दिन की अपेक्षा करने वाला है तथा चंद्रमा का तेज रात्रि की अपेक्षा करने वाला है और सूर्य तथा चंद्रमा दोनों के तेज मनुष्यों को नाना प्रकार के संतापों के देने वाले हैं अर्थात् सूर्य के तेज से तो मनुष्य मारे गर्मी के व्याकुल हो जाते हैं तथा चंद्रमा का तेज कामोत्पादक होने के कारण कामी पुरुषों को नाना प्रकार के संतापों का देने वाला होता है और सूर्य तथा चंद्रमा के तेज बाह्य के ही प्रकाशक हैं अंतरंग के प्रकाशक नहीं है तथा सूर्य चंद्रमा के तेज थोड़े ही पदार्थों के प्रकाशक हैं समस्त पदार्थों के प्रकाशक नहीं हैं। किंतु सरस्वती का तेज न तो दिन की अपेक्षा करता है और न रात की अपेक्षा करता है और न वह भीतर तथा बाहर की ही अपेक्षा करता है और जीवों को संताप का भी देने वाला नहीं है और न जड़ता का करने वाला है तथा समस्त पदार्थों का प्रकाश करने वाला है इसलिये आचार्यवर कहते हैं कि ऐसे सरस्वती के तेज के लिये मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं ।।२।।

तव स्तवे यत्कविरस्मि साम्प्रतं भत्प्रसादादिव लब्धपाटव: ।
सवित्रि गंगासरितेऽर्घदायको भवामि तत्तज्जलपूरिताञ्जलि: ।।३।।

अर्थ —हे सरस्वति मात: ! आपकी कृपा से ही प्राप्त किया है चातुर्य जिसने ऐसा जो मैं इस समय आपकी स्तुति करने में कवि हुआ हूं उससे ऐसा मालूम होता है कि गंगा नदी के जल से पूरित (भरी हुई) हैं अंजिली जिसकी ऐसा मैं गंगा नदी के लिये ही अर्घ देने वाला हुआ हूं।

भावार्थ —जिस प्रकार गंगानदी से पानी लेकर उसी को अर्घ देते हैं उसी प्रकार हे मात: सरस्वति आपकी कृपा से ही चातुर्य प्राप्त कर आपकी स्तुति में ही मैं कवि हुआ हूं ।।३।।

श्रुतादिकेवल्यपि तावकीं श्रियं स्तुवन्नशक्तोऽहमिति प्रपद्यते ।
जयेति वर्णद्वयमेवमादृशा वदंति यद्देवि तदेव साहसम् ।।४।।

अर्थ —हे सरस्वति मात: ! आपकी शोभा की स्तुति करता हुआ श्रुत है आदि में जिसके ऐसा केवली भी अर्थात् श्रुत केवली भी जब ‘‘मै सरस्वती की शोभा की स्तुति करने में’’ असमर्थ हूं ऐसा अपने को मानता है तब मुझ सरीखे मनुष्यों की तो क्या बात है ? अर्थात् मुझ सरीखे मनुष्य तो आपकी स्तुति कर ही नहीं सकते किंतु हे देवि ! जो मुझ सरीखे मनुष्य आपके लिये जय इन दो वर्णों को भी बोलता हैं वही मेरे सरीखे मनुष्यों का एक बड़ा भारी साहस है ऐसा समझना चाहिये ।

भावार्थ —यद्यपि श्रुत केवली समस्त शास्त्र के पारंगत होते हैं किंतु हे मात: आपकी लक्ष्मी (शोभा) इतनी अधिक है कि वे भी आपकी शोभा का वर्णन नहीं कर सकते और जब वे ही आपकी शोभा का वर्णन नहीं कर सकते तो मुझ सरीखे मनुष्यों की तो बात ही क्या है अर्थात् मैं तो अल्पज्ञानी हूं इसलिये मैं तो आपकी शोभा का वर्णन कर ही नहीं सकता और हे देवि ! हम सरीखे मनुष्यों में इतनी भी शक्ति नहीं है जो आपके लिये जय ये दो अक्षर भी कह सकें किंतु जो हम आपके लिये जय ये दो अक्षर कहते हैं वह हम सरीखे मनुष्यों का बड़ा भारी साहस है ऐसा समझिये ।।४।।

त्वमत्र लोकत्रयसद्मनि स्थिता प्रदीपिका बोधमयी सरस्वति ।
तदंतरस्थाखिलवस्तुसंचयं जना: प्रपश्यन्ति सदृष्टयोप्यत: ।।५।।

अर्थ —हे सरस्वति मात: ! आप तीनो लोकरूपी घर में स्थित सम्यग्ज्ञानमय उत्कृष्ट दीपक हैं जिस दीपककी कृपा से सम्यग्दृष्टि जीव उन तीनों लोकों के भीतर रहने वाले जीवाजीवादि पदार्थों को भलीभांति देखते हैं।

भावार्थ —नाना प्रकार के पदार्थों से भरे हुये घर में यदि अधंकार के समय में दीपक रख दिया जाय तो नेत्रवाला पुरुष जिस प्रकार दीपक की सहायता से समस्त पदार्थों को भली भांति देख लेता है उसी प्रकार यह तीनों लोक भी एक प्रकार का घर हैं तथा इसमें एक कोने से लेकर दूसरे कोने पर्यंत भलीभांति जीवादि पदार्थ भरे हुए हैं उस त्रिलोकरूप घर में समस्त पदार्थों के प्रकाश करने में हे मात: ! आप उत्कृष्ट दीपक के समान हैं क्योंकि आपकी कृपा से सम्यग्दृष्टि पुरुष त्रिलोक में भरे हुए समस्त पदार्थों को भलीभांति देख लेते हैं ।।५।।

सरस्वती के चरण कमल सदा इस लोक में जयवंत हैं

नभ:समं वर्त्म तवगतिनिर्मलं पृथुप्रयातं विबुधैर्न कैरिह ।
तथापि देवि प्रतिभासतेतरां यदेतदक्षुण्णमिव क्षणेन तत् ।।६।।

अर्थ —हे देवि ! आपका जो मार्ग है वह आकाश के समान अत्यंत निर्मल है और अत्यंत विस्तीर्ण है उसमार्ग में ऐसे कौन से विबुध हैं जो नहीं गये हों अर्थात् सबही गये हैं किंतु मात: तो भी वह मार्ग क्षणभर में ऐसा मालूम होता है कि अक्षुण्ण ही है अर्थात् कोई भी उस मार्ग से नहीं गया है।

भावार्थ —जिस प्रकार आकाश का मार्ग अत्यंत निर्मल तथा विस्तीर्ण है और उस पर अनेक प्रकार के अनेक देव भी गमन करते हैं किंतु वह क्षणमात्र में ऐसा मालूम पड़ता है कि इस मार्ग से कोई भी नहीं गया है उसी प्रकार हे सरस्वति ! हे मात:! आपका मार्ग भी अत्यंत निर्मल है और विस्तीर्ण है और अनेक विद्वान उस मार्ग से गये भी हैं तो भी वह मार्ग क्षणभर में ऐसा मालूम होता है कि उस मार्ग से कोई भी नहीं गया है अर्थात् हे सरस्वति मात: ! आपका मार्ग अत्यंत गहन है ।।६।।

तदस्तु तावत्कवितादिकं नृणां तव प्रभावात्कृतलोकविस्मयम् ।
भवेत्तदप्याशु पदं यदिष्यते तपोभिरुग्रैर्मुनिभिर्महात्मभि: ।।७।।

अर्थ —हे मात: सरस्वति ! समस्त लोक को आश्चर्य के करने वाले कविता आदिक गुण मनुष्यों को आपकी कृपा से हों इसमें किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं हैं किन्तु हे मात: ! जिस पद को बड़े -२ मुनि कठिन- २ तप करके प्राप्त करने की इच्छा करते हैं वह पद भी आपकी कृपा से बात की बात में प्राप्त हो जाता है।

भावार्थ —हे मात: ! जो मनुष्य आपके उपासक हैं और जिनके ऊपर आपकी कृपा है उन मनुष्यों को आपके प्रसाद से समस्त लोक को आश्चर्य करने वाली कविता आदि की प्राप्ति होती है अर्थात् कविता आदि से वे समस्त लोक को आश्चर्य सहित करते हैं। तथा आपकी कृपा से मनुष्यों को उस मोक्ष पद की प्राप्ति होती है जिस मोक्ष पद की बड़े- २ मुनिगण उग्रतपों के द्वारा प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं ।।७।।

भवत्कला यत्र न वाणि मानुषे न वेत्ति शास्त्रं स चिरं पठन्नपि ।
मनागपि प्रीतियुतेन चक्षुषा यमीक्षसे कैर्न गुणै: स भूष्यते ।।८।।

अर्थ —हे सरस्वति ! हे मात: जिस मनुष्य में आपकी कला नहीं अर्थात् जो मनुष्य आपका कृपापात्र नहीं है वह चिरकाल तक पढ़ता हुवा भी शास्त्र को नहीं जानता है किंतु जिसको आप थोड़ा भी स्नेह सहित नेत्र से देख लेती हो अर्थात् जो मनुष्य थोड़ा भी आपकी कृपा का पात्र बन जाता है वह मनुष्य संसार में किन- २ गुणों से विभूषित नहीं होता है ? अर्थात् बिना ही प्रयत्न के वह केवल आपकी कृपा से समस्त गुणों का भंडार हो जाता है ।

भावार्थ —हे मात: ! आपकी बिना कृपा के यदि मनुष्य चाहे कि मैं पढ़- २ कर विद्वान हो जाऊं तथा वास्तविक तत्त्वों का मुझे ज्ञान हो जावे यह कभी भी नहीं हो सकता किन्तु जिस मनुष्य पर आपकी थोड़ी भी कृपा रहती है वह मनुष्य बिना ही पढ़े विद्वत्त आदि अनेक गुणों को बात-की-बात में प्राप्त कर लेता है इसलिये आपकी कृपा ही मनुष्यों के कल्याण की करने वाली है ।।८।।

स सर्ववित्पश्यति वेत्ति चाखिलं नवा भवत्या रहितोऽपि बुध्यते ।
तदत्र तस्यापि जगत्त्त्रयप्रभोस्त्वमेव देवि प्रतिपत्तिकारणम् ।।९।।

अर्थ —संसार में जो केवली भगवान समस्त पदार्थों को भलीभांति देखते हैं तथा समस्त पदार्थों को भलीभांति जानते हैं वे भी आपकी ही कृपा से हे देवि ! जानते तथा देखते हैं किन्तु आपकी कृपा के बिना न वे जानते हैं और न देखते ही हैं इसलिये हे मात: इस संसार में तीनों जगत के प्रभु उन केवली के ज्ञान तथा दर्शन में भी आप ही कारण हैं ।

भावार्थ —हे सरस्वति ! यदि आप न होती तो समस्त जगत के प्रभु केवली भगवान भी समस्त पदार्थों को न तो देख ही सकते थे और न जान ही सकते थे इसलिये केवली भगवान के समस्त पदार्थों के जानने में तथा दर्शन में आप ही आसाधारण कारण हैं ।।९।।

चिरादति क्लेशतैर्भवाम्बुधौ परिभ्रमन् भूरि नरत्वमश्नुते ।
तनूभृदेतत्पुरुषार्थसाधनं त्वया विना देवि पुन: प्रणश्यति ।।१०।।

अर्थ —चिरकाल से इस संसाररूपी समुद्र में भ्रमण करता हुवा यह जीव सैकड़ों क्लेशों से इस मनुष्य जन्म को पाता है तथा वह मनुष्य भव ही समस्त पुरुषार्थों का साधन है किंतु हे देवि ! आपके बिना यह पाया हुवा भी मनुष्यभव नष्ट ही हो जाता है।

भावार्थ —यद्यपि गति चार हैं परंतु उन सब में मनुष्य गति (मनुष्य भव) अत्युत्तम है क्योंकि इस मनुष्यभव में ही जीव कर्मों से छूटने का उपाय कर सकते हैं तथा सबसे उत्तम जो स्थान मोक्ष है उसको भी जीव इसी मनुष्य भव में प्राप्त करते हैं किंतु इस मनुष्यभव की प्राप्ति बड़ी कठिनाई से होती है तथा इस मनुष्य भव की प्राप्ति का फल यथार्थ तत्त्वज्ञानी बनना और तत्त्वज्ञानी बनने का उपाय सरस्वती की सेवा है इसलिये आचार्य कहते हैं कि हे मात: सरस्वति ! यदि आपकी कृपा न होवे तो मनुष्य का मनुष्य भव पाना व्यर्थ ही है क्योंकि वह मनुष्य बिना आपकी कृपा से यथार्थज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है और यथार्थ ज्ञान के बिना जो मनुष्य भव की प्राप्ति का फल है वह उसको नहीं मिल सकता है ।।१०।।

कदाचिदंव त्वदनुग्रह विना श्रुते ह्यधीतेऽपि न तत्त्वनिश्चय: ।
तत: कुत: पुंसि भवेद्विवेकता त्वया विमुक्तस्य तु जन्म निष्फलम् ।।११।।

अर्थ —हे मात: ! आपके अनुग्रह के बिना शास्त्रों के भली प्रकार अध्ययन करने पर भी वास्तविकतत्त्व का निश्चय नहीं होता है और वास्तविकतत्त्व के निश्चय न होने के कारण मनुष्य में हिताहित का विवेक नहीं हो सकता है ? इसलिये हे देवि! आपके अनुग्रहकर रहित जो पुरुष है उसका मनुष्य जन्म पाना निष्फल ही है ।

भावार्थ —जिस समय मनुष्य को वास्तविक तत्त्वका निश्चय (श्रद्धान) होता है उसी समय उस मनुष्य को यह पदार्थ त्यागने योग्य है तथा यह पदार्थ ग्रहण करने योग्य है इस प्रकार का विवेक होता है और दोनों बातें शास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होती हैं बिना शास्त्र के अध्ययन के नहीं किंतु आचार्यवर सरस्वती की स्तुति करते हैं कि हे मात: ! यदि मनुष्य के ऊपर आपकी कृपा न होवे तो वह मनुष्य भलीभांति शास्त्र का पाठी ही क्यों न हो ? उसको कदापि वास्तविक तत्त्वों का निश्चय नहीं हो सकता है और जब उसको वास्तविक पदार्थों का निश्चय ही नहीं हो सकता है तब उसको हेय तथा उपादेय का ज्ञान तो होई नहीं सकता और आपकी कृपा के बिना उस मनुष्य का बड़े क्लोशों से पाया हुवा मनुष्य भव भी व्यर्थ ही है इसलिये हे मात: ! आप ही तो जीवों के तत्त्व के निश्चय में कारण हैं तथा आप ही उनके हिताहित विवेक में कारण हैं तथा आपकी ही कृपा से मनुष्य का मनुष्यभव भी सर्वथा फलीभूत है ।।११।।

विधाय मात: प्रथमं त्वदाश्रयं श्रयंति तन्मोक्षपदं महर्षय: ।
प्रदीपमाश्रित्य गृहे तमस्तंते यदीप्सितं वस्तु लभेत मानव: ।।१२।।

अर्थ —जिस प्रकार मनुष्य, जो घर अंधकार से व्याप्त है ऐसे घर में दीप के आश्रय से इष्ट वस्तु को प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार हे मात: ! बड़े- २ ऋषि पहले आपके आश्रय को करते हैं पीछे सर्वोत्कृष्ट उस प्रसिद्ध मोक्षस्थान को वे पाते हैं।

भावार्थ —जिस घर में बहुतसा अंधकार भरा हुवा है यदि उस घर में से, कोई मनुष्य चाहे कि मैं बिना दीपक के ही अपनी इष्ट वस्तु को निकालकर ले आऊं जो वह मनुष्य कदापि नहीं ला सकता किंतु दीपक की सहायता से ही ला सकता है इसलिये जिस प्रकार वह मनुष्य दीपक की चाह करता है उसी प्रकार हे मात: सरस्वति ! यदि बड़े- २ मुनि इस बात को चाहें कि बिना ही आपकी कृपा के सीधे मोक्ष पद को चले जावें तो वे कदापि नहीं जा सकते किंतु आपकी सहायता से, कृपा से, ही वे जा सकते हैं इसलिये वे सबसे प्रथम आपका आश्रय करते हैं पीछे मोक्ष को जाते हैं इसलिये अत्यंत तपस्वी भी मुनियों की मोक्ष की प्राप्ति में आप ही कारण हैं ।।१२।|

आगे कवि कहते हैं--

त्वयि प्रभूतानि पदानि देहिनां पदं तदेकं तदपि प्रयच्छति ।
समस्तशुक्लापि सुवर्णविग्रहा त्वमत्र मात: कृतचित्रचेष्टिता ।।१३।।

अर्थ —हे मात: ! यद्यपि तुझमें अनेक पद हैं तो भी तू जीवों को एक ही पद देती है तथा यद्यपि तू चौतर्फा शुक्ल है तो भी तू सुवर्णविग्रहा (सुवर्ण के समान शरीर को धारण करने वाली) है इसलिये तू इस संसार में आश्चर्यकारी चेष्टा को धारण करने वाली है ।

भावार्थ —इस श्लोक में विरोधाभास नामक अलंकार है इसलिये आचार्यवर शब्द से विरोध दिखाते हैं कि जो अनेक पदों का धारण करने वाला होगा ? वह जीवों का एक ही पद क्यों देगा तथा जो चौतर्फा सफेद होगा वह सुवर्ण के रंग के समान शरीर को धारण करने वाला कैसा होगा ? अब आचार्यवर उस विरोध का अर्थ से परिहार करते हैं कि हे मात: ! यद्यपि आप में अनेक पद (सुवंत तथा तिड.तरूप) मौजूद हैं तो भी अपने भक्तों को आप एक मोक्ष पद को देती हैं और यद्यपि आप शुक्त (उज्ज्वल) हैं तो भी आप सुवर्णविग्रहा (श्रेष्ठ ‘‘वर्ण’’ अक्षररूपी शरीर को धारण करने वाली) हो इसलिये आपकी इस प्रकार की चेष्टा आश्चर्य करती है।

सारार्थ —हे मात: ! आप अनेक सुवंत तथा तिड.तस्वरूप पदों को धारण करने वाली हो तथा भव्य जीवों को मोक्ष को देने वाली हो और आप सर्वथा निर्मल हो तथा श्रेष्ठवर्णरूपी शरीर को धारण करने वाली हो ।।१३।।

समुद्रघोषाकृतिरर्हति प्रभौ यदा त्वमुत्कर्षमुपागता भृशम् ।
अशेषभाषात्मतया त्वया तदा कृतं न केषां हृदि मातरद्भुतम् ।।१४।।

अर्थ —हे मात: ! सरस्वति ! जिस समय तू भगवान् अर्हंत में अत्यंत उत्कर्ष को प्राप्त हुई थी अर्थात् जिस समय समवसरण में तू भगवान अर्हंत के मुख से दिव्य ध्वनिरूप में प्रकट हुई थी उस समय तेरी ध्वनि समुद्र के समान धीर तथा गंभीर थी और उस समय तू अनेक भाषास्वरूप थी इसलिये किसके मन में तेने उस समय आश्चर्य नहीं किया था अर्थात् तुझको सुनकर समस्त जीव आश्चर्य करते थे ।

भावार्थ —जिस समय ज्ञानावरणादि चार घातिया कर्म नष्ट हो जाते हैं उस समय केवली ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा उन केवली के बिना ही इच्छा के दिव्यवाणी प्रगट होती है उसी समय का ध्यानकर ग्रंथकार सरस्वती की स्तुति करते हैं कि हे मात: ! जिस समय आप केवली के मुख से दिव्य ध्वनिरूप परिणत होकर निकलती है उस समय आपकी ध्वनि समुद्र की ध्वनि के समान होती है जिससे दूर भी बैठे हुवे पशु पक्षी भली भांति सुन सकते हैं तथा उस समय आप समस्त भाषा स्वरूप परिणत होकर उन केवली के मुख से प्रकट होती हो । इसलिये समस्त पशु पक्षी आदिक अपनी-२ भाषा में आपको समझ लेते हैं तथा उनको असली तत्त्व का भली भांति निश्चय हो जाता है और आपको इस स्वरूप में परिणत सुनकर वे लोग बड़ा आश्चर्य करते हैं ।।१४।।

सचक्षुरप्येष जनस्त्वया बिना यदंध एवेति विभाव्यते बुधै: ।
तदस्य लोकत्रितयस्य लोचनं सरस्वति त्वं परमार्थदर्शने ।।१५।।

अर्थ —हे मात: सरस्वति ! आपके बिना नेत्रों सहित भी इस पुरुष को विद्वान लोग अंधा ही समझते हैं इसलिये हे सरस्वति ! इस तीनों लोक के वास्तविक दर्शन में आप ही नेत्र हैं ।

भावार्थ —यद्यपि इस लोक में अनेक पदार्थ भरे हुवे हैं किन्तु उन सब पदार्थों में परमपदार्थ जो मोक्ष है वही उत्तम पदार्थ है तथा उस परमपदार्थ का दर्शन ही नेत्र का फल है यदि मोक्ष स्थान का दर्शन नेत्र से न होवे तो वह नेत्र ही नहीं है आंखों से मोक्षरूप परमपुरुषार्थ का दर्शन हो नहीं सकता इसलिये आंखों के होते भी आपके बिना उस पुरुष को विद्वान लोग अंधा ही कहते हैं तथा वह परमार्थ का दर्शन हे सरस्वति ! आपकी कृपा से ही होता है इसलिये परमार्थ के दर्शन में आप ही नेत्र हैं ।।१५।।

गिरा नरप्राणितमेति सारतां कवित्ववक्तृत्वगुणे च सा च गी: ।
इदं द्वयं दुर्लभमेव ते पुन: प्रसादलेशादपि जायते नृणाम् ।।१६।।

अर्थ —मनुष्य का जो जीवन है वह वाणी से सफल समझ जाता है और कवित्व तथा वक्तृत्वगुण के होने पर वाणी सारभूत समझी जाती है किन्तु इस संसार में कविपना तथा वक्तापना दोनों ही दुर्लभ हैं परन्तु आपके तो थोड़े से ही प्रसाद (अनुग्रह) से यह दोनों गुण बात-की-बात में प्राप्त हो जाते हैं।

भावार्थ —इस संसार में बड़े कष्टों से तो जीवन प्राप्त होता है यदि उस जीवन में वाणी की प्राप्ति न होवे तो वह दु;खों से पाया हुवा भी मनुष्य जन्म निस्सार ही समझा जाता है इसलिये मनुष्य के जीवन की तो सफलता वाणी से है और उस वाणी की सफलता कविपने से तथा वक्तावनने से होती है क्योंकि सुंदरवाणी की भी प्राप्ति हुई किन्तु सुंदर कविता करना तथा अच्छी तरह बोलना नहीं आया तो उस वाणी का मिलना न मिलना एक सा ही है किन्तु ये दोनों बातें ‘‘अर्थात् कविपना तथा वक्तापना’’ संसार में अत्यंत दुर्लभ है किन्तु हे मात सरस्वति ! आपकी कृपा से इन दोनों बातों को मनुष्य बात की बात में पा लेता है अर्थात् जिस मनुष्य पर आपकी कृपा होती है वह मनुष्य प्रसिद्ध कवि भी बन जाता है और अच्छी तरह बोलने वाला भी वह मनुष्य हो जाता है ।।१६।।

नृणा भवत्सन्निधिसस्कृतं श्रवो विहाय नान्यद्धितमक्षयं च तत् ।
भवेद्विवेकार्थमिदं परं पुनर्विमूढतार्थं विषयं स्वमर्पयत् ।।१७।।

अर्थ —हे मात: सरस्वति ! जिस कान का आपके समीप में संस्कार किया गया है अर्थात् जो कान आपके सहवास से शुद्ध एवं पवित्र किया गया है वही कान हित का करने वाला तथा अविनाशी है किन्तु उससे भिन्न कान न हितकारी है और न अविनाशी है और आपके सहवास से पवित्र ही कान मनुष्यों को विवेक के लिये होता है किन्तु उससे भिन्न अपने विषयों की ओर झुकता हुवा कान विवेक के लिये नहीं होता किन्तु विशेषता से मूढ़ता के लिये ही होता है|

भावार्थ —हे मात: ! जिस कान से आपके असली-२ तत्त्व सुने जाते हैं वही कान मनुष्यों को हित का करने वाला होता है अर्थात् उस कान से असली तत्त्वों को सुनकर मनुष्य खोटे मार्ग में प्रवृत नहीं होते किन्तु हितकारी मार्ग से ही गमन करते हैं तथा वही कान अविनाशी है अर्थात् उसका कभी भी नाश नहीं होता किन्तु उससे भिन्न कान अर्थात् जिस कान से आपके असली तत्त्व नहीं सुने जाते वह कान न तो मनुष्यों को हित का करने वाला होता है और न अविनाशी ही होता है तथा हे सरस्वति ! आपके असली तत्त्वों से पवित्र ही कान मनुष्यों को विवेक के लिये होता है अर्थात् उस कान से असली तत्त्वो को समझकर मनुष्य यह बात वस्तु हमको त्यागने योग्य है तथा यह वस्तु हमको ग्रहण करने योग्य है किंतु उस कान से भिन्न कान मनुष्यों के विवेक के लिये नहीं होता मूढ़ता के लिये ही होता है क्योंकि वह कान अपने अन्य विषयों में अर्थात् खोटे-२ गायन तथा खोटे-२ शब्दों के सुनने में प्रवृत्त हो जाता है इसलिये उस कान की कृपा से मनुष्य अधिक मूढ़ ही बन जाते हैं ।।१७।।

ग्रंथकार सरस्वती की स्तुति करते हैं

कृत्वापि ताल्वोष्ठपुटादिभिर्नृणां त्वमादिपर्यंतविवर्जितस्थिति: ।
इतित्वयापीदृशधर्मयुक्तया स सर्वथैकान्तविधिर्विचूर्णित: ।।१८।।

अर्थ —हे मात: सरस्वति ! यद्यपि तू मनुष्यों के तालू तथा ओष्ठ पुटों से की गई है तो भी तेरी स्थिति आदि तथा अंतकर रहित ही है अत: इस प्रकार के धर्मों कर संयुक्त हे सरस्वति ! तुने सर्वथा एकान्तमार्ग का नाश कर दिया ऐसा भलीभांति प्रतीत होता है।

भावार्थ —अनेक महाशयों का यह सिद्धांत है कि सरस्वति कंठ तालु आदि स्थानों से ही पैदा हुई है किंतु यह एकांत सिद्धांत उनका वास्तविक सिद्धांत नहीं क्योंकि यदि ऐसा ही माना जाए तो सरस्वती आदि अंतकर रहित नहीं हो सकती किंतु अनेकांत मत को मानकर ऐसा ही स्वीकार करना चाहिये कि किसी रीति से सरस्वती कंठ तालु आदिक स्थानों से उत्पन्न भी हुई है तथा किसी रीति से आदि अंतकर रहित भी है अर्थात् द्रव्य श्रुत की तो तालू कंठ आदि स्थानों से उत्पन्न है किंतु भावश्रुत ज्ञानात्मक है इसलिये शुद्ध निश्चयनय से वह आदि तथा अंतकर रहित है इसी आशय को लेकर इस श्लोक से आचार्यवर सरस्वति माता की स्तुति करते हैं कि हे मात: यद्यपि आप किसी स्वरूप से कंठ तालु आदि स्थानों से उत्पन्न हुई हो तो भी आप किसी स्वरूप से आदि अंत कर रहित ही हो इसलिये इस प्रकार के धर्मों को धारण करने के कारण आपने एकांत विधि का सर्वथा नाश कर दिया है ।।१८।।

अपि प्रयाता वशमेकजन्मनि द्युधेनुचिंतामणिकल्पपादपा: ।
फलंति हि त्वं पुनरत्र चापरे भवे कथं तैरुपमीयसे बुधै: ।।१९।।

अर्थ —हे सरस्वति मात: ! किसी रीति से वश को प्राप्त ऐसे कामधेनु, चिंतामणि तथा कल्पवृक्ष एक ही भव में मनुष्यों को इष्टफल के देने वाले होते हैं किंतु आप इस भव में तथा परभव में (दोनों भव में) मनुष्यों के इष्ट फलों को देने वाली हो इसलिये आपको कामधेनु, आदि की उपमा कभी भी नहीं दी जा सकती है।

भावार्थ —हे सरस्वति ! बहुत से कवि जिस समय आपका वर्णन करते हैं उस समय आपको कामधेनु चिंतामणि तथा कल्पवृक्ष की उपमा दिया करते हैं किंतु उस प्रकार की आपके लिये उपमा देने योग्य नहीं है क्योंकि यदि किसी रीति से कामधेनु तथा कल्पवृक्ष और चिंतामणि मनुष्यों के ऊपर संतुष्ट हो जावें तो वे इतना ही काम कर सकते हैं कि उस मनुष्य को इसी भव में इष्ट फलों को दे सकते हैं दूसरे भव में नहीं किन्तु हे मात: ! यदि आप किसी जीव पर संतुष्ट हो जावो तो उसको इस भव में तथा परभव में दोनों भवों में इष्ट फल को देती हो इसलिये वे कदापि आप की समता को धारण नहीं कर सकते ।।१९।।

अगोचरो वासरकृन्निशाकृतो जनस्य यच्चेतसि वर्तते तम: ।
विभिद्यते वागधिदेवते त्वया त्वमुत्तमज्योतिरिति प्रगीयसे ।।२०।।

अर्थ —हे वागधि देवते ! हे सरस्वति ! जो अंधकार सूर्य तथा चंद्रमा के भी गोचर नहीं है अर्थात् जिस अंधकार को सूर्य देख सकता है और न चंद्रमा देख सकता है ऐसा मनुष्यों के चित्त में अंधकार विद्यमान है उस अंधकार को तू नाश करती है इसलिये संसार में तू ही उत्तम ज्योति है ऐसा (विद्वान मनुष्य) तेरा गुणगान करते हैं ।

भावार्थ —यद्यपि संसार में सूर्य चंद्र दीपक रत्न आदिक बहुत से पदार्थ हैं जो अंधकार को नाश करते हैं किंतु वे वाहरी अंधकार को ही नाश करते हैं मनुष्यों के मन में स्थित जो भीतरी अंधकार है उसको नाश नहीं कर सकते क्योंकि वह अंधकार उनके अगोचर है किंतु हे मात: ! आप उस भीतरी अंधकार को भी नाश करती हो इस लिये सूर्य चंद्र आदि समस्त ज्योतियों में आप ही उत्तम ज्योति हो ऐसा बड़े- २ विद्वान कवि आपका गुणगान करते हैं ।।२०।।

जिनेश्वरस्वच्छसर:सरोजिनी त्वमंगपूर्वादिसरोजराजिता ।
गणेशहंसब्रजसेविता सदा करोषि केषां न मुदं परामिह ।।२१।।

अर्थ —हे मात: सरस्वति ! तू जिनेश्वररूपी जो निर्मल सरोवर उसकी तो कमलिनी है और ग्यारह अंग चौदह पूर्वरूपी जो कमल उन करके शोभित है और गणधररूपी जो हंसों का समूह उस करके सेवित है इसलिये तू इस संसार में किसको उत्तम हर्ष को करने वाली नहीं है ?

भावार्थ —जो कमलिनी उत्तम सरोवर में उत्पन्न हुई है और जिसके चारों ओर भांति- २ के कमल शोभा बढ़ा रहे हैं तथा अत्यंत मनोहर हंसों का समूह जिसकी सेवा कर रहा है ऐसी कमलिनी जिस प्रकार सबों के चित्तों को प्रसन्न करने वाली होती है उसी प्रकार हे मात: ! आप भी जिनेश्वररूपी उत्तम सरोवर से पैदा हुई हो अर्थात् आपको भी केवली भगवान ने प्रगट किया है तथा आप ग्यारह अंग चौदह पूर्व को धारण करने वाली हो और बड़े- २ गणधर आपकी सेवा करते हैं फिर भी आप मनुष्यों के चित्तों को क्यों नहीं प्रसन्नता की करने वाली होगी ? अर्थात् अवश्य ही मनुष्य आपको सुनकर प्रसन्न होंगे ।।२१।।

परात्मतत्त्वप्रतिपत्तिपूर्वकं परं पदं यत्र सति प्रसिध्द्यति ।
कियत्ततस्ते स्फुरत: प्रभावतो नृपत्वसौभाग्यवरांगनादिकम् ।।२२।।

अर्थ —हे मात: सरस्वति ! जब आपकी कृपा से परमात्मतत्त्व का जो ज्ञान उस ज्ञान पूर्वक परमपद (मोक्ष पद) की सिद्धि हो जाती है तब आपके देदीप्यमान प्रभाव के सामने राजापना, सौभाग्य तथा उत्तम स्त्री आदि की प्राप्ति क्या चीज है ?

भावार्थ —यद्यपि संसार में राजापना तथा सौन्दर्य और उत्तम स्त्री आदि की प्राप्ति भी अत्यंत कठिन है किन्तु हे मात: आपके देदीप्यमान प्रभाव के सामने इनकी प्राप्ति कोई कठिन नहीं है अर्थात् जिसके ऊपर आपकी कृपा है वह भाग्यशाली बिना ही परिश्रम से इन पदार्थों को प्राप्त कर लेता है क्योंकि सबसे कठिन परात्मतत्त्व का ज्ञान तथा मोक्ष पद की प्राप्ति है जब मनुष्य आपकी कृपा से परमात्म ज्ञान को तथा मोक्ष पद को भी बात-की-बात में प्राप्त कर लेता है तब उनकी अपेक्षा अत्यंत सुलभ नृपत्व सौभाग्य आदि चीजों का प्राप्त करना उसके लिये क्या कठिन बात है ? ।।२२।।

त्वदंघ्रिपद्मद्वयभक्तिभाविते तृतीयमुन्मुलति बोधलोचनम् ।
गिरामधीशे सह केवलेन यत्समाश्रितं स्पर्धमिवेक्षतेऽखिलम् ।।२३।।

अर्थ —हे मात: सरस्वति ! जो भव्य जीव मनुष्य आपके दोनों चरण कमलों की भक्ति तथा सेवा करता है उस मनुष्य के तीसरा सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्र प्रकट होता है जो सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्र केवलज्ञान के साथ ईर्ष्या करके ही मानो समस्त पदार्थों को देखता जानता है ऐसा मालूम पड़ता है।

भावार्थ —सरस्वती की कृपा से जीवों को श्रुतज्ञान की प्राप्ति होती है और उस श्रुतज्ञान से केवलज्ञान के समान समस्त पदार्थ जाने जाते हैं भेद इतना ही है कि केवलज्ञान तो पदार्थों को प्रत्यक्षरूप से जानता है क्योंकि केवल आत्मा की सहायता से होने वाला केवलज्ञान प्रत्यक्षज्ञान कहा गया है तथा श्रुतज्ञान पदार्थों को परोक्षरूप से जानता है क्योंकि वह मन की सहायता से होता है इसलिये वह परोक्ष ज्ञान कहा गया है किंतु पदार्थों के जानने में दोनों ज्ञान हैं समान ही। इसलिये आचार्यवर स्तुति करते हैं कि हे मात: ! जो मनुष्य आपके दोनों चरण कमलों का भक्त है उस मनुष्य को श्रुतज्ञान की प्राप्ति होती है और उस श्रुतज्ञान से वह मनुष्य केवल ज्ञान के समान समस्त पदार्थों को भलीभांति जानता है ।।२३।।

त्वमेव तीर्थं शुचिबोधवारिमत्समस्तलोकत्रयशुद्धिकारणम् ।
त्वमेव चानंदसमुद्रबर्धने मृगांकमूर्ति: परमार्थदर्शिनाम् ।।२४।।

अर्थ —हे मात: सरस्वति ! सम्यग्ज्ञानरूपी जल से भरा हुवा तथा समस्त लोकों की शुद्धि का कारण तू ही तो पवित्र तीर्थ है तथा जो पुरुष परमार्थ को देखने वाले हैं उन मनुष्यों के आनंदरूपी समुद्र के बढ़ाने में तू ही चंद्रमा है।

भावार्थ —जिससे भव्य जीव तरें उसी का नाम तीर्थ है इसलिये लोग जिस प्रकार अत्यंत निर्मल जल से भरे हुवे गंगा आदि तीर्थों को तीनों लोक की शुद्धि का कारण समझते हैं उसी प्रकार हे मात: सरस्वति ! सम्यग्ज्ञानरूपी जल से भरी हुई और समस्त लोक की शुद्धि का कारण तू भी तीर्थ है अर्थात् जो मनुष्य तुझ में गोता लगाते हैं वे मनुष्य अत्यंत शुद्ध हो जाते हैं तथा जिस प्रकार चंद्रमा के उदित होने पर समुद्र वृद्धि को प्राप्त होता है उसी प्रकार हे मात: ! जो मनुष्य देखने वाले हैं उन मनुष्यों के आनंद रूपी समुद्र के बढ़ाने में तू चंद्रमा के समान है ।।२४।।

त्वयादिबोध: खलु संस्कृतो ब्रजेत् परेषु बोधेष्वखिलेषु हेतुतां ।
त्वमक्षि पुंसामति दूरदर्शने त्वमेव संसारतरो: कुठारिका ।।२५।।

अर्थ —हे भगवति सरस्वति ! तेरे द्वारा अत्यंत पवित्र किया हुवा मतिज्ञान ही बाकी के बचे हुवे समस्त श्रुत, मन:पयर्य आदि ज्ञानों में कारण है और अत्यंत दूर देखने में तम ही मनुष्य का नेत्र है और संसार रूपी वृक्ष के काटने के लिये तू ही कुठार है।

भावार्थ —हे मात: ! समस्तज्ञानों में तू ही कारण पड़ती है अर्थात् तेरी ही कृपा से समस्तज्ञान आत्मा में प्रगट होते हैं और जितने भर दूर पदार्थ हैं उनके देखने में तू ही नेत्र है क्योंकि जितने भर मेरू आदिक देश से दूर तथा राम और रावण आदि काल से दूर तथा परमाणु आदि स्वभाव से दूर पदार्थ हैं उन सबका दर्शन तेरी ही कृपा से होता है और संसार के नाश करने में भी तू ही कारण है अर्थात् जो मनुष्य तेरे भक्त तथा आराधक हैं वे मनुष्य यथार्थ तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर निर्विघ्न रीति से सीधे मोक्ष को चले जाते हैं अर्थात् उनका संसार सर्वथा छूट जाता है ।।२५।।

यथाविधानं त्वमनुस्मृता सती गुरूपदेशोयमवर्णभेदत: ।
न ता: श्रियस्ते न गुणा न तत्पदं प्रयच्छसि प्राणभृते न यच्छुभे ।।२६।।

अर्थ —हे शुभे ! हे सरस्वति ! यह गुरु का उपदेश है कि जो पुरुष शास्त्राानुसार अकार से लेकर अंततक आपका स्मरण करने वाला है उस पुरुष के न तो कोई ऐसी लक्ष्मी है जिसको आप न देवे और न कोई उत्तम गुण तथा उत्तम पद ही है जो कि आपकी कृपा से वह जीव न पा सके।

भावार्थ —हे मात: ! जो मनुष्य शास्त्रानुसार आपकी सेवा करने वाला है उस मनुष्य को अंतरंग केवलज्ञानादि तथा बहिरंग समवसरणादि समस्त प्रकार की लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तथा वह मनुष्य आपकी कृपा से औदार्य धैर्य आदिक समस्त गुणों को भी प्राप्त कर लेता है और आपकी ही कृपा से उसको मोक्षपद की प्राप्ति भी शीघ्र हो जाती है ।।२६।।

अनेकजन्मार्जितपापपर्वतो विवेकवज्रेण स येन भिद्यते ।
भवद्वपु:शास्त्रघनान्निरेति तत्सदर्थवाक्यामृतभारमेदुरात् ।।२७।।

अर्थ —हे मात: ! हे सरस्वति ! अनेक भवों में संचय किया हुवा जो पापरूपी पर्वत है वह जिस विवेकरूपी वज्र के द्वारा तोड़ा जाता है वह विवेकरूपी वज्र श्रेष्ठ अर्थ तथा वाक्यरूपी जो जल उसका जो भार उससे वृद्धि को प्राप्त ऐसा आपका शरीर स्वरूप जो शास्त्र वही हुवा मेघ उससे निकला है।

भावार्थ —जिस प्रकार उत्तम पानी के धारण करने वाले मेघ से वज्र उत्पन्न होता है तथा वह वज्र पर्वत को छिन्न भिन्न कर देता है उसी प्रकार हे मात: ! श्रेष्ठ अर्थ तथा वाक्यों से परिपूर्ण ऐसे आपके शास्त्र से मनुष्यों को हिताहित का विवेक होता है तथा उस विवेक से अनेक जन्मों में संचित भी पाप का समूह पलभर में नष्ट को जाता है ।।२७।।

तमांसि तेजांसि विजित्य वाड्.मयं प्रकाशयद्यत्परमं महन्मह: ।
न लुप्यते तैर्नच तै: प्रकाश्यते स्वत: प्रकाशात्मकमेव नंदतु ।।२८।।

अर्थ —हे सरस्वति ! अधंकार तथा अन्य तेजों को जीतकर प्रकाश करता हुवा तथा सर्वोत्कृष्ट, तेरी वाणी स्वरूप तेज इस लोक में जयवंत प्रवर्त हो क्योंकि जो तेज न तो अंधकार से नाश होता है और न किसी दूसरे तेज से प्रकाशित होता है किंतु स्वत: प्रकाश स्वरूप ही है ।

भावार्थ —यद्यपि सूर्य चन्द्र आदि बहुतों के तेज संसार के अंदर मौजुद हैं किंतु हे मात: ! आपके वाणी रूपी तेज की तुलना दूसरा कोई भी तेज नहीं कर सकता है क्योंकि वे समस्त तेज अंधकार द्वारा विनाशीक हैं तथा कई एक तेज दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं और आपका तेज न तो प्रबल से प्रबल अंधकार द्वारा ही विनाशीक है और दूसरे तेज की अपने प्रकाश होने में सहायता भी नहीं चाहता किन्तु स्वत: प्रकाशमान है इसलिये हे सरस्वति ! ऐसा आपका तेज सदा इस लोक में जयवंत रहे ।।२८।।

तव प्रसाद: कवितां करोत्यत: कथं जडस्तत्र घटेत मादृश: ।
प्रसीद यत्रापि मयि स्वनन्दने न जातु माता विगुणेपि निष्ठुरा ।।२९।।

अर्थ —हे सरस्वति ! हे मात: ! तेरा प्रसाद ही कविता का करने वाला है इसलिये मेरे (ग्रंथकर्ता के) समान वज्रमूर्ख उस कविता के करने में कैसे चेष्टा को कर सकता है ? अत: इस कविता के करने में तू मुझ पर प्रसन्न हो क्योंकि यदि अपना पुत्र निर्गुणी भी होवे तो भी माता उसके ऊपर कठोर नहीं बनती ।

भावार्थ —पुत्र कैसा भी निर्गुणी तथा अविनीत क्यों न हो तो भी जिस प्रकार माता उसके ऊपर रुष्ट नहीं होती सदा उसके ऊपर दयालु ही रहती है उसी प्रकार हे सरस्वति ! आप भी मेरी माता हो। इसीलिये यद्यपि मैं कैसा भी कविता करने में वज्र मूर्ख क्यों न हूँ तो भी आपको मेरे ऊपर कृपा ही करनी चाहिये क्योंकि यदि मैं चाहूं कि आपकी कृपा का कुछ न सहारा रखकर कविता करने लगूं सो ही नहीं सकता क्योंकि कविता करने में आपकी कृपा ही कारण है अत: मेरे ऊपर प्रसन्न हो ।।२९।।

इमामधीते श्रुतदेवतास्तुतिं कृतिं पुमान् यो मुनिपद्नंदिन: ।
स याति पारं कवितादिसद्गुणप्रबंधसिन्धो: क्रमो भवस्य च ।।३०।।

अर्थ —जो पुरुष मुनिवर श्री पद्मनंदि द्वारा की गई इस श्रुत देवता की स्तुतिरूपी कृति को पढ़ता है वह पुरुष कविता आदिक जो उत्तम गुण उनका जो प्रबन्धरूपी समुद्र उसके पार को प्राप्त हो जाता है तथा क्रम से संसाररूपी समुद्र के पार को भी प्राप्त हो जाता है।

भावार्थ —ग्रंथकार श्री पद्मनंदी आचार्य कहते हैं कि मैंने बड़ी भक्ति से इस श्रुत देवता स्तुतिरूपी कृति का निर्माण किया है जो भव्य जीव इस कृति को पढ़ने वाला है वह भव्य जीव कविता आदि जितने गुण हैं उन समस्त गुणों में प्रवीण हो जाता है तथा क्रम से वह संसार का भी नाश कर देता है अर्थात् इस श्रुत देवाता की स्तुति की कृपा से मोक्ष पद को प्राप्त होकर अव्याबाध सुख का भोगने वाला हो जाता है इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।।३०।।

कुठास्तेऽपि बृहस्पतिप्रभृतयो यस्मिन् भवंति ध्रुवं तस्मिन् देवि तव स्तुतिव्यतिकरे मंदा नरा: के वयम् ।
तद्वाक्चापलमेतदश्रुतवतामस्माकमम्ब त्वयाक्षंतत्यं मुखरत्वकारणमसौ येनातिभक्तिग्रह: ।।३१।।

अर्थ —हे देवि ! हे सरस्वति ! जिस आपके स्तवन के करने में बड़े- २ विद्वान वृहस्पति आदिक भी निश्चय से कुंठ अर्थात् मंदबुद्धि हो जाते हैं तब आपके स्तवन के करने में हम सरीखे मंदबुद्धियों की तो बात ही क्या है ? अर्थात् हम तो आपकी स्तुति कर ही नहीं सकते किंतु थोड़े शास्त्र के जानकार हमारी यह (स्तुति नहीं) वाणी की चपलता है इसलिये हे मात: ! इस हमारे वावदूकपने को क्षमा कीजिये क्योंकि आप में हमारी अत्यंत भक्ति है।

भावार्थ —हे मात: ! जब आपकी स्तुति बड़े- २ वृहस्पति आदि भी विद्वान नहीं कर सकते तब हम सरीखे मदं बुद्धियों की क्या कथा है ? अर्थात् हम तो आपकी स्तुति तुषमात्र भी नहीं कर सकते किंतु यह तो स्तुति के व्याज से हमने अपनी वाणी की चपलता की है वह आपकी भक्ति के वश होकर की है क्योंकि आपमें हमारी विशेष भक्ति है अत: आप इस हमारे बावदूकपने को क्षमा कीजिये ।।३१।।

इस प्रकार श्रीपद्मनंदिआचार्यविरचित श्री पद्मनंदिपञ्चविंशतिका में सरस्वतिस्तवननामक अधिकार समाप्त हुआ।

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