15.सदबोध चंद्रोदयाधिकार

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सदबोध चंद्रोदयाधिकार


।।दशवीं अधिकार।।
(१)
यह आत्मतत्त्व है कठिन बड़ा साधारण जन की बात ही क्या।
खुद वृहस्पती वाणी भी वर्णन करने में असमर्थ तथा।।
विस्तृत इतनी आकाश सदृश नहिं हृदय में धारण कर सकते।
विरले ही प्राणी अति अद्भुत इस आत्मतत्त्व को पा सकते।।
(२)
यह आत्मतत्त्व नित्य अरु अनित्य हल्का एवं भारी होता।
इकरूप अनेकरूपपन से सत् और असत् से गहन बड़ा।।
यह पूर्ण तथा यह शून्य भी है यह आत्मतत्व जयवंत रहे।
जो अखिल शास्त्र के ज्ञाता भी इस आत्मतत्त्व को पा न सवेंâ।।
(३)
जो आत्मा अणिमा महिमादिक ऋद्धी की इच्छा नहिं करता।
मुक्ती में दृष्टि लगा करके समता में सदा लीन रहता।।
ऐसी आत्मा को नमस्कार आत्मा सम हंस दृष्टि रखता।
अति सुन्दर पंकजवन को तज निज हंसिनि में हो रुचि रखता।।
(४)
सामान्यतया देखा जाए तो सबमें आत्मतेज रहता।
पर जो चैतन्य तेज सारे रागादि भाव नशकर होता।।
वह चौतरफा है प्रकाशरूप कल्याणप्रदायक होता है।
उस आत्मतेज को नमस्कार यह महामुनि को होता है।।
(५)
जो आत्मतेज सारे पदार्थ को है प्रकाश देने वाला।
यह अंतरहित है तथा स्वयं को भी प्रकाश करने वाला।।
यदि मिल जाए समस्त वाणी तो भी वर्णन नहिं कर सकती।
चैतन्य तेज जयवंत रहे जो केवलज्ञानी को होती।।
(६)
है सब प्रकार से र्नििवकल्प चैतन्य तेज जो होता है।
वह किसी तरह से भी मन से देखने योग्य निंह होता है।।
फिर कर्माश्रित है विकल्प रूप वो जड़ स्वरूप को क्या दिखता ।
इसलिए स्वानुभवगम्य तेज मन के गोचर भी नहिं रहता।।
(७)
नहिं वचन और मन के गोचर तो इसका कुछ अस्तित्व नहीं।
ऐसी शंका के होने पर आचार्य हमें कह रहे यही।।
मन वचन अगोचर होकर भी यह तेज स्वानुभव गोचर है।
आकाश पुष्प सम नास्तित्व नहिं अस्तित्व कह रहे गुरुवर हैं।।
(८)
परमात्मा में स्थित जो मन उस समय नाश मन का होता।
अतएव वो मन परमात्मा को तज इधर उधर भ्रमता रहता।।
क्योंकी मरने से डरते हैं इस भूतल पर सारे प्राणी।
फिर मन भी क्योंकर नहीं डरे मरने से क्योंकी अज्ञानी।।
(९)
निश्चय से यदि देखा जाए चैतन्य तत्व आत्मा में है।
आत्मा से भिन्न जगह दूजी जो प्राणी उसे समझते हैं।।
वे मूढबुद्धि वैसे ही हैं जैसे मुट्ठी में रखी वस्तु।
जंगल में जा करके ढूंढें निज में रहता चैतन्य तत्व।।
(१०)
इच्छित मारग को छोड़ अगर दूसरे मार्ग पर जाएगा।
तो वह मानव इच्छित स्थल पर पहुँच कभी ना पाएगा।।
जो आत्मा में आसक्त नहीं उत्कृष्ट ध्यान निंह कर सकते।
उत्कृष्ट ध्यान के प्रेमी ही आत्मा में स्थित रह सकते।।
(११)
अत्यन्त गहन चैतन्य रूप आत्मा में लक्ष्य नहीं जिनका।
वे तपसी साधुरूप में जड़ नाटक का वेष लगे उनका।।

जैसे नाटक का पात्र कभी राजा और रंक रूप धरते।
वैसे ही अज्ञानी प्राणी साधू का वेष व्यर्थ धरते।।
(१२)
चैतन्य तत्व को जान के भी अज्ञानीजन भवभ्रमण करें।
इसलिए ग्रंथकर्ता कहते इस अतिशय तेज को ग्रहण करें।।
जैसे अंधे मानव को हाथी के स्वरूप का पता नहीं।
वैसे ही अज्ञानी द्वारा चैतन्य रूप का पता नहीं।।
(१३)
जो कर्मबंध से सहित हुई भी बंधन रहित आतमा है।
और रागद्वेष से मलिन हुई भी निर्मल स्वच्छ जो आत्मा है।।
निज देह सहित होने पर भी यह आत्मा है शरीर विरहित।
वह आत्मा एक अनेक धर्मयुत मानो ये विश्वास सहित।।
(१४)
जो अनेकांत से नाश रहित होकर भी नाश सहित आत्मा।
परद्रव्य अपेक्षा शून्यरूप स्वद्रव्य अपेक्षा पूर्ण आत्मा।।
निश्चयनय से है एक तथा व्यवहार नयापेक्षा अनेक।
इस रीती से इस आत्मा में स्थित रहते हैं धर्म अनेक।।
(१५)
र्मूिच्छत मनुष्य जिस तरह चेतना में आकर वस्तू ढूंंढे।
फिर शांत हृदय होकर स्वरूप में स्थित होकर के बैठे।।
वैसे ही काल अनादी से भूला जो चेतन आत्मा को।
उसका ही आश्रय कर क्रमश: धारण करता है समता को।।
(१६)
जिस समय चित्त में इच्छाएँ जन्में उस क्षण ही त्याग करो।
क्योंकी इच्छा से रागद्वेष आदिक उपाधि आत्मा में हो।।
जब तक उपाधि है आत्मा को तब तक स्वरूप की प्राप्ति न हो।
इसलिए ज्ञान दर्शन से पूर्ण चैतन्य तत्व को प्राप्त करो।।


(१७)
पाँचों इन्द्रियाँ तथा मन के और स्वासोच्छ्वास संकुचन से।
आत्मा का जो निर्मल स्वरूप शोभित होता है खिल करके।।
ऐसा वह निश्चल आत्मतत्व भवरूपी वन को भस्म करे।
जैसे जंगल में लगी अगनि सारे ही वन को भस्म करे।।
(१८)
मैं सभी कर्म से रहित मुक्त अथवा कर्मों से सहित हूँ मैं।
यह भी विकल्प है और संयमी इस विकल्प को तजते हैं।।
जब तक विकल्प से रहता है तब तक नहिं मुक्ति मिले उसको।
इसलिए मोक्ष अभिलाषी जन आश्रय लें र्नििवकल्प पद को।।
(१९)
मैं एक तथा मैं द्वैतरूप दोनों संसार के कारण हैं।
क्योंकी ये कर्मजनित उपाधि से पैदा हुए अकारण हैं।।
इसलिए मोक्ष के अभिलाषी दोनों भावों का त्याग करें।
और र्नििवकल्प पदवी धरकर अपना भवभ्रमण समाप्त करें।।
(२०)
जो शुद्धभाव से परमात्मा का ध्यान करे शुभ पद मिलता।
और भाव अशुद्ध धरे जो जन सुर नरकादिक पद वो लभता।।
जैसे सुवर्ण से स्वर्णपात्र लोहे से लोहपात्र बनता।
वैसे ही संसारीजन को शुभ अशुभ भाव का फल मिलता।।
(२१)
जो दिव्यज्ञानमय चक्षु से कर्मों को सर्वथा भिन्न समझे।
परमार्थ तत्त्व के ज्ञाता जो योगी दुख को दुख ना समझे।।
सुख दुख को कर्मजनित माने आत्मा में सुख दुख नहिं होता।
यह मात्र कल्पना है जग की वह सच्चा वैरागी होता।।
(२२)
जिस तरह सूर्य आवरण रहित पथ में ही गमन किया करता।
उसकी जो किरणप्रभा जग में कोई भी रोक नहीं सकता।।
बस उसी तरह जिस योगी का मन निरालंब पथ गमन करे।
उसको ज्ञानावरणादि रूप नहिं अंधकार भी रोक सके।।
(२३)
नाना प्रकार के मेघों से नभ में नहिं कोई विकार बने।
आकाश अर्मूितक है इससे मेघों के सभी विकार कहे।।
बस उसी तरह रुग जरा आदि तन के ही सभी विकार रहे।।
आत्मा के कोई विकार नहीं क्योंकी शरीर से भिन्न कहें।।
(२४)
जैसे मकान में लगी हुई अग्नी से घर ही जलता है।
पर उसके भीतर रहा हुआ आकाश द्रव्य नहिं जलता है।।
वैसे ही तन की व्याधी से आत्मा का नाश नहीं होता।
बस नशता है शरीर केवल आत्मा सदैव स्थित रहता।।
(२५)
जो अखिल उपाधी से विरहित बोधी स्वरूप जो कोई वस्तु।
वह ही मेरी और उससे भिन्न है नहीं मेरी थोड़ी भी वस्तु।।
इस तरह योग का निश्चय ही मुक्ती का कारण कहा गया।
पर इससे भिन्न योग कोई भी मोक्ष हेतु नहिं कहा गया।।
(२६)
इस ध्यान योग से ही मनुष्य बंधन को प्राप्त किया करता।
अरु इसी योग से ही मनुष्य मुक्ती को प्राप्त किया करता।।
इस तरह ध्यान का मार्ग विषय पर जो मुमुक्षु अभिलाषी है।
वह गुरुओं की वाणी सुनकर ही ध्यान करे उसमें हित है।।
(२७)
जो शुद्ध बोधमय वस्तू है रमणीय है थल वह ही मेरा।
पर जो इसके अतिरिक्त रमे वह केवल कहा प्रमाद तेरा।।
क्योंकी जो मोहकर्म के वश उसको परवस्तू प्रिय लगती।
रमणीय वस्तु है ज्ञानरूप वह ही प्राणी का हित करती।।
(२८)
हे भव्यजीव ! यदि तुम अपने पापों का नाश चाहते हो।
तो अद्भुत आत्मज्ञानरूपी तीरथ में तुम स्नान करो।।
जो अंतरंग मल अन्य कोटि तीर्थों में नष्ट नहीं होता।
वह ज्ञानतीर्थ में एक बार ही करने से निश्चित होता।।
(२९)
जैसे समुद्र तट पर रहने वालों को रत्न मिला करते।
वैसे ही योगी आत्मा के िंचतन से रत्न प्राप्त करते।।
सम्यग्दर्शन अरु ज्ञान चरण ये तीनों रत्न कहे जग में।
इन तीनों रत्नों से साधू नहिं पाते हैं दुर्गति सच में।।
(३०)
जो परमात्मा में निश्चय एवं ज्ञान तथा स्थिती कही।
उसको ही रत्नत्रय कहते निश्चय से आत्मस्वरूप यही।।
केवलज्ञानी भगवान स्वयं अपने स्वरूप को जान रहे।
केवलदर्शन से देख रहे इस हेतु उन्हें हम मान रहे।।
(३१)
जिस तरह धनुष के बाणों से वैरी को नष्ट किया जाता।
और कर्मशत्रु को नशने में जो बाण प्रयुक्त किया जाता।
रत्नत्रय रूपी बाण कहे अरु बुद्धी रूपी धनुष कहा।
और शास्त्ररूप प्रत्यंचा से जीते चेतन संग्राम महा।।
(३२)
निश्चयनय से मुनि की प्रवृत्ति मन वचन काय से रहित कही।
लेकिन जब वे प्रमाद धरते मन वचन काय से सहित वही।।
क्योंकी प्रमाद के द्वारा ही कर्मों का बंधन होता है।
इसलिए प्रमाद तजो भविजन गुरुओं का कहना होता है।।
(३३)
जिन योगी को चर अचर जगत परमाणु सदृश मालुम पड़ता।
ऐसा वह योगी ज्ञानरूप सागर में है समाधि धरता।।
जैसे चंद्रमा उदित होने से सागर वृद्धी प्राप्त करे।
वैसे ही श्रेष्ठ समाधी से योगी का ज्ञान प्रकाश करे।।
(३४)
जैसे सूखे तृण के समूह को अग्नि शीघ्र ही भस्म करे।
वैसे ही योगी के मन में जब भेदज्ञान की अग्नि जले।।
उस पर जब परम समाधि रूप वायू से ज्ञान उदय होवे।
तब आत्मा से इक पल में ही सारे ही कर्म जुदे होवें।।
(३५)
जिस तरह वनों के कल्पवृक्ष हाथी के द्वारा नष्ट न हों।
उस दुष्ट ज्ञानरूपी अग्नी से योग कल्पतरु भस्म न हो।।
तब यह समाधि उत्तम फल को देने वाली अवश्य होगी।
मन को वश कर आचरण करे अन्यथा मुक्तिफल नहिं देगी।।
(३६)
आचार्य प्ररूपण करते हैं विद्वतजन शास्त्र पढ़ें इससे।
जिससे परमात्मज्ञान उनको मिल जावे पर अभिन्न उससे।।
जिस समय चित्त में नहिं होता परमात्मज्ञान से भेद प्राप्त।
तब तक ज्ञानी की बुद्धि रूप नदि दौड़ दौड़ करे शास्त्र प्राप्त।।
(३७)
चैतन्य रूप जिस दीपक का स्पर्श पवन ने नहीं किया।
और जिसमें सम्यग्ज्ञान रूप जलता है दैदीप्यमान दीया।।
ऐसा चैतन्यमयी दीपक मोहान्धकार को नाश करे।
फिर वह दीपक सारे जग को भी क्यों ना प्रकाशवान करे।।
(३८)
जो बाह्य शास्त्र रूपी वन में विचरण करने वाली बुद्धी।
खोटे विकल्प धारण करने वाली वह बुद्धी है कुबुद्धि।।
जैसे घर से बाहर स्त्री परिभ्रमण से दूषित हो जाती।
इसलिए बुद्धि भ्रमने नहिं दें तब वही सुबुद्धी हो जाती।।
(३९)
जो भव्य हेय अरु उपादेय वस्तू का हर क्षण ध्यान करे।
इन दोनों में क्या त्याग योग्य क्या ग्रहण योग्य सुविचार करे।।
उसकी बुद्धी उत्तम गुरु के उपदेश से स्थिर पद पाती।
जो अविनाशी चैतन्यरूप वह मोक्ष परम पद दिलवाती।।
(४०)
जब तक यह जीव मोहनिद्रा में मग्न नहीं कुछ दिखता है।
अपने से भिन्न पुत्र स्त्री आदिक को अपना कहता है।।
पर वही जीव जब जाग रहा तब सब क्षणभंगुर लगता है।
गुरु के वचनों को धर करके परवस्तू भिन्न समझता है।।
(४१)
आचार्यवर्य अब कहते हैं अब और अधिक कहने से क्या।
हे बुद्धिमान ! गर योग प्राप्त करने की तुमको अभिलाषा।।
तो कर्मों से उत्पन्न सभी नाना उपाधि का त्याग करो।
और साम्यभाव का अवलम्बन लेकर भवभ्रमण समाप्त करो।।
(४२)
परमात्म नाम के कथन मात्र से चिरसंचित सब पाप नशें।
फिर उनकी सिद्धी करने से दुर्लभ सारे ही काम बनें।।
इस आत्मा में जो विद्यमान रत्नत्रयरूपी रत्न कहे।
उनसे बन जाता जगतपती ऐसा हमको गुरुजन कहते।।
(४३)
जिस योगी का मन चित्स्वरूप मुक्ती के पद में लगा हुआ।
वह योगी नायक योगीश्वर इत्यादि नामयुत कहा गया।।
संसार सुखों से जो विरक्त वह ही है बस सच्चा योगी।
जग के सब जीवों को अपने सम देख रहा वह ही योगी।।
(४४)
यह लोक सभी जीवों से घृत के घट समान है भरा हुआ।
उन जीवों को अपने समान जो माने वह ही साधु हुआ।।
पर जो अपने से तुच्छ जीव की रक्षा नहीं किया करता।
उसके नहिं कार्य सिद्ध होते जो स्वपर में भेद किया करता।।
(४५)
अपने द्वारा उत्पन्न किए जो विविध रूप के कर्म कहे।
उनसे यह लोक बहुत भावोंयुत इसका यही स्वभाव रहे।।

जिस योगी को यह भलीभाँति आत्मा का ज्ञान हुआ जानो।
जड़वत संसार देख मन में नहिं क्षोभ जरा भी तुम मानो।।
(४६)
यह लोक मोहरूपी प्रगाढ़ निद्रा में सोया पड़ा हुआ।
जो काल अनादी बीत गये नहिं ज्ञान उसे है तनिक हुआ।।
इसलिए हमें आचार्य कहें जो हुआ सो हुआ अब जागो।
शास्त्रों का कर स्वाध्याय आत्मसुख को भविजन अब पहिचानो।।
(४७)
जिस तरह चन्द्रमा की किरणों से नभ रमणीय दिखा करता।
वैसे ही ‘‘पद्मनंदि मुनि’’ के वचनों में दिखती सुन्दरता।।
उनके यह रम्यवचन जग में चिरकाल तलक जयवंत रहें।
मुखरूपी चंदा से वचनों की किरणें सब नभ में पैâलें।।
(४८)
जिनने सब परिग्रह त्याग दिए और जिनके निकट शांति धन है।
त्रयगुप्ती से जो शोभित है शुद्धात्म प्राप्ति आतम में है।।
नहि अंशमात्र भी इच्छा है वह है निर्मल बुद्धी का धारी।
उसे मुक्ति शीघ्र ही मिल जाती यदि विघ्न न हरे मोह बैरी।।
(४९)
यह आत्मतत्त्व सब तरह की अभिलाषा भय भ्रम दुख दूर करे।
अत्यन्त अद्भुत चैतन्य तत्व परमेश्वर द्वारा कहे गये।।
यदि मेरे मन में स्थित है तो तीनों जग के कोई देव।
जिससे मुझको भय होवे वह कोई सर्प हो नर हो या कुदेव।।
(५०)
‘‘सद्बोधचंद्रोदय अधीकार’’ है श्रेष्ठ ज्ञानरूपी चंदा।
योगी के तत्वज्ञान से जब आत्मा में रहे नहिं कुछ तृष्णा।।
सागर की लहरें जब बढ़तीं उदयाचल में उगता चंदा।
तृष्णा मन कमल संकुचित कर वैâरवकुल करे विकास उनका।।

इति सद्बोध चंद्रोदय अधिकार