15.स्याद्वाद चन्द्रिका मे अनेकान्त एवं स्याद्वाद नय निरूपण

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स्याद्वाद चन्द्रिका मे अनेकान्त एवं स्याद्वाद नय निरूपण

अनेकान्त जैनागम का प्राण है। आ0 अमृतचन्द्र जी ने कहा है-

परमागमस्य जीवं निशिद्ध जात्यन्धसिन्धुरविधानम्।
सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम्।।पुरुशार्थ सिद्धि-2।।

मैं (आचार्य अमृतचन्द्र) परमागम के प्राण, जन्मान्धों द्वारा किये गये हाथी विशयक स्वरुप विधान, जो कि एक एक अंग के ग्रहण करने से विहित हुआ, का निशेध करने के समान है तथा सम्पूर्ण नयों में प्रकट होने वाले विरोध का नाष करने वाले अनेकान्त को नमस्कार करता हूँ।

जैनधर्म प्रामाणिक विचार और आचार का समन्वित योगभूत प्रयोग है। यह जीवमात्र की प्रगति हेतु आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक विष्लेशण एवं पोशण करता है। इसने अनेकान्त के प्रस्तुतिकरण से सूक्ष्मातिसूक्ष्म मनोगत भावों और शद्धि के लिए मार्ग प्रषस्त किया है। अनेकान्त के सफल प्रयोग को स्याद्वाद कहते है जो वाणी को अहिंसक, मैत्रीपूर्ण तथा दुराग्रह रुपी ग्रह से मुक्त करता हुआ आत्मा को उसके चरम लक्ष्य मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। अनेकान्त का निवास मन, मस्तिश्क व बुद्धि में है वह कण्ठ, वाणी एवं शब्दों में स्याद्वाद के रूप में अथवा सापेक्षवाद का परिवेष धारण कर अवतरित होता है। नाना वचन विलास रूपी कलेवरों की आत्मा अनेकान्त है। अनेकान्त सापेक्षवाद का जनक है। सापेक्षवाद अर्थात् किसी अपेक्षा से सम्मुखासीन व्यक्ति के कथन के दृश्टिकोण को दुराग्रह से न ठुकराने से विष्व के मानव समुदाय में अषांति का प्रष्न ही उपस्थित नहीं होता।

अनेकान्त का उद्गम अनेक धर्म वाली वस्तु के परस्पर में विरुद्ध दिखने वाले किन्तु सत्यभूत स्वभावों की समश्टि से होता है आगम के आधार से कुछ परिभाशायें दृश्टव्य है- ‘‘ को अणेयंतो णाम? जच्चंतर ’’।

अनेकान्त किसको कहते हैं, जात्यन्तर भाव को अनेकान्त कहते है। अनेक धर्मों (स्वभावों) के एकरसात्मक मिश्रण से जो स्वाद (जात्यन्तर भाव) प्रकट होता है उसे अनेकान्त कहते हैं।

‘‘ यदेव तत् तदेवातत् यदेवैकं, तदेवानेकं, यदेव सत् तदेवासत्, यदेव नित्यं तदेवानित्यं इत्येकवस्तुनि वस्तुत्वनिश्पादकपरस्परविरुद्धषक्तिद्वयप्रकाषनमनेकान्तः।’’ (समयसार आत्मख्याति परिषिश्ट)

जो वस्तु तत् है वही अतत् है जो एक है वही अनेक है, जो सत् है वही असत् है जो नित्य है वही अनित्य है, इस प्रकार एक ही वस्तु में वस्तुत्व की उत्पादक परस्पर विरुद्ध दो “शक्तियों का प्रकाषन अनेकान्त है।

‘‘अनेके अन्ताः धर्मा सामान्यविषेशपर्यायाः गुणा यस्येति सिद्धानेकान्तः।’’


जिसके सामान्य विषेश पर्याय व गुणरूप अनेक अन्त या धर्म हैं वह पदार्थ अनेकान्त रूप सिद्ध होता है। अनेकान्त को प्रमाण भी कहते हैं। (अनेकान्तः तावत् प्रमाणं) एक-एक अंग के ज्ञान को नय कहते हैं। आ० समन्तभद्र ने कहा है।

अर्थस्यानेकरूपस्य धीः प्रमाणं तदंषधीः।
नयो धर्मान्तरापेक्षी दुर्णयस्तन्निराकृतिः।। अश्ट सहस्री ?

अनेक रूप वाले पदार्थ का ज्ञान प्रमाण या अनेकान्त है तथा उसके अंष ज्ञान को नय कहते है। नय सापेक्ष होता है वह विरोधी अन्य धर्मों का आपेक्षी होता है। अन्य विरोधी स्वभाव का निराकरण करने वाला दुर्नय है। प्रमाण सकलादेषी है, नय विकलादेषी है। उदाहरणार्थ अग्नि में उश्णता प्रताप, प्रकाष, आदि गुण धर्म हैं तथा इनके विरोधी भी गुणधर्म हैं भले ही वे विभाव हों। इन सभी को प्रमाण या अनेकान्त युगपत् ग्रहण करता है। अलग-अलग इनको ग्रहण करने हेतु भिन्न-भिन्न नय चाहिए। कहा भी है, ‘‘प्रमाणंाष नया उक्ताः’’। अर्थात नय प्रमाणके अंष हैं।

नयों को दृश्टिकोण ;च्वपदजे व िअपमूद्ध कह सकते हैं, जैसे विभिन्न कोणों ;ब्वतदमतेद्ध से किसी पदार्थ के चित्र लिए जाते हैं। यद्यपि ये चित्र सभी उसी पदार्थ के हैं तथापि वे सभी भिन्न-भिन्न दिखाई पड़ते हैं। कुछ चित्र तो बिल्कुल विरोधी ज्ञात होते हैं। उनको देखकर दर्षक को ऐसा लगता है मानों वे चित्र किन्हीं पृथक् पदार्थों के हों। परन्तु तथ्य यह है कि वे सब उसी एक पदार्थ के हैं तथा विरुद्ध होते हुए भी अविरुद्ध हैं। इसी प्रकार नयों के द्वारा जब पदार्थो के निरूपण किये जाते हैं तो विरोधी भी ज्ञात होते हैं। कभी- कभी ज्ञाता संषय में पड़ जाता हैं। किन्तु जिसने प्रमाण के द्वारा पदार्थ को ग्रहण कर लिया है उसके लिए वे दृश्टियाँ विस्मयकारी न होकर वस्तु को सिद्ध करने वाली है। कहा भी है,

‘‘प्रमाणप्रकाषितार्थविषेशप्ररूपको नयः।’’
‘‘ प्रमाणप्रविभक्तार्थविषेशव्यन्जको नयः।’’

प्रमाण से गृहीत अनन्त धर्मात्मक जीवादि पदार्थों के जो विषेश धर्म है, उनका निर्दोश कथन करने वाला नय है। नय सापेक्षवादी है। जैसे एक पिता के कई पुत्र भिन्न-भिन्न सत्ता वाले हैं फिर भी उनमें भाई चारे का नाता है उसी प्रकार सभी नय प्रमाण के पुत्र या अंष है सापेक्ष हैं। तभी वे सम्यक् कहलाते हैं।

नयों के मूल में दो भेद हैं। द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक। द्रव्य ही जिसका प्रयोजन है वह द्रव्यार्थिक तथा पर्याय ही जिसका प्रयोजन है वह पर्यायार्थिक कहलाता है। द्रव्यार्थिक के 10 भेद एवं पर्यायार्थिक के छः भेद है। आचार्य ने तŸवार्थसूत्र में नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, षब्द, सममिरूढ और एवंभूत, सात नयों का उल्लेख किया है2।इन सबका स्वरूप आगम से अवलोकनीय है। ये मूल नयों के उत्तर भेद हैं। अध्यात्म में मूल दो नय हैं। निष्चय एवं व्यवहार।

”निष्चिनोतीति निष्चयः“। जो निःषेश रूप से चुन लेता है अर्थात् अभेदग्राही है वह निष्चय नय है। ”भेदोपचाराभ्यां व्यवहृतीति व्यवहारः“। जो भेद और उपचार से कथन करता है, व्यवहार करता है वह व्यवहार है। संक्षेप में निम्न प्रकार छः नय जानना चाहिए।

1. शुद्व निष्चय नय-जैसे सब जीव शुद्व बुद्व एक स्वभाव वाले हैं।

2. अषुद्ध निष्चय नय-रागदि ही जीव हैं।

3. अनुपचरित शुद्ध सद्भूत व्यवहार नय-जीव के केवल ज्ञान आदि गुण हैं।

4. उपचरित अषुद्ध सद्भूत व्यवहार नय-जीव के मतिज्ञान आदि विभाव गुण है।

5. अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नय-संष्लेश सहित शरीरादि पदार्थ जीव के है।

6. उपचरित असद्भूत व्यवहार नय-संष्लेश संबंध रहित पुत्र, गृह आदि जीव के है।

कौन सा नय किस अवस्था में प्रयोजनीय है इसे दृश्टि में रखकर आ0 कुन्दकुन्द देव समयसार में कहते है,-

सुद्धो सुद्धादेसो णायव्वो परमभाव दरिसीहिं।
व्यवहार देसिदा पुण जे दु अपरमेठ्ठिदा भावे।।

अर्थ - जो शुद्ध नय तक पहुँचकर श्रद्धा-ज्ञान-चारित्रवान् हो गये हैं,अर्थात् परमभावदर्षी है उनको तो शुद्ध द्रव्य का कथन करने वाला शुद्धनय जानने योग्य है किन्तु जो अपरम भाव में (गृहस्थ की अपेक्षा पाँचवें गुणस्थान तक तथा मुनि की अपेक्षा छठवें-सातवें गुणस्थान में स्थित हैं। उनके लिए व्यवहार नय का उपदेष करना चाहिए।

प्रमाण शस्त्रों में कहा है कि प्रष्नवषात् एक ही वस्तु में विधि निशेध कल्पना सप्तभंगी है। पदार्थ के विशय में सात ही प्रष्न उपस्थित हो सकते हैं अतः सातों का समाधान रूप सप्तभंगी नय का विधान है। इसे स्याद्वाद कहते हैं। सापेक्ष कथन को स्यात् पद से युक्त कर स्याद्ववाद का प्रयोग होता हैं। स्यात् का अर्थ ‘कथंचत्’ या किसी अपेक्षा से है। जितने भी वाक्य प्रयोग हैं उनमें सदैव अपेक्षा समाविश्ट रहती है। बिना अपेक्षा के शब्द या वाक्य प्रयोग होता ही नहीं है। वस्तुतः जब ज्ञाता का अभिप्राय असमीचीन होता है तब वह उसी वाक्य को निरपेक्ष रूप में सर्वथा सत्य घोशित करता है। एक धर्म को मुख्य करना और दूसरे विरोधी धर्म को गौण करना अभीश्ट है। न कि नाष करना या निशेध करना।

सारांष यह है कि अनेकान्त हृदय है तो सापेक्षनय या स्याद्वाद उसका मुख है। पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने स्याद्वाद चन्द्रिका में उपर्युक्त अनेकान्त और स्याद्वाद का प्रयोग प्रतिपल पग-पग पर किया है। प्रस्तुत टीका की संज्ञा स्याद्वाद चन्द्रिका सार्थक ही है। इसमें पद-पद पर व्यवहार निष्चय नयों की, व्यवहार निष्चय क्रियाओं की और व्यवहार-निष्चय मोक्षमार्ग की परस्पर में मित्रता होने से इसका विशय स्याद्वाद सहित है। माता जी समन्वित दृश्टिधारक, विषाल हृदय एवं नय-निश्पक्ष व्यक्तित्व की धनी हैं। वे परम विदुशी न्याय प्रभाकर हैं उनका सर्वांगीण दृश्टिकोण अनेकान्त के प्ररूपण में सर्वत्र प्रकट होता है।आग्रह तो तो उनको छू तक नहीं गया है। वे आगम की वाणी को अपनी वाणी मानती हैं अपनी वाणी को आगम नहीं। उनकी नयों की निश्पक्षता ही तत्व की साधक है।

नियमसार प्राभृत निष्चय प्रधान ग्रन्थ है। इसमें सम्यग्दर्षन और सम्यक्चारित्र का वीतराग स्वरूप मुख्य रूप से विवक्षित है। आ० कुन्दकुन्द स्वामी ने प्रवचनसार और चारित्र पाहुड में सराग रत्नत्रय को प्रधान मानकर वर्णन किया है अतः उससे पृथक् नियमसार के नाम के अनुरूप ही साधुओं को व्यवहार से ऊपर उठकर निष्चय मोक्षमार्ग अपनाने को उपदेष दिया है। निष्चय के कथन को ही पाठक सर्वथा रूप में ग्रहण न कर ले इसी दृश्टिकोण को सामने रखकर पू० माता जी ने यथास्थान प्रायः निष्चय के साथ व्यवहार के कथन को भी युक्ति के आधार पर प्रस्तुत किया है। दोनों नयों में मध्यस्थता ही जिनेन्द्र प्रभु की देषना का फल प्राप्त करने का उपाय है।

शुद्ध नय आत्मा के स्वरूप में विद्यमान कर्मोपाधि निरपेक्ष सामान्य शुद्ध स्वभाव पर दृश्टि डालता है इसकी अपेक्षा सर्व संसारी जीव शुद्ध हैं। पू० माता जी गाथा संख्याक 6 की टीका के अन्तर्गत कहती है, यहाँ नय विवक्षा दृश्टव्य है।

”इतो विस्तरः - इमेऽश्टादष दोशाः नैते जीवस्वभावाः यद्यपि अषुद्धनयेन सर्वसंसारिजीवेशु दृष्यन्ते तथापि ”सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया” इति वचनात् शुद्धनयाभिप्रायेण तेशामपि न सन्ति। किच एते औपाधिकभावा एव।”

यहाँ यह अवलोकनीय है कि व्यवहार की उपादेयता का इस टीका में पर्याप्त वर्णन करते हुए भी वे शुद्ध नय को भूलती नहीं हैं। पू० माता जी ने मंगलाचरण में ही”वाक्यषुद्ध्यैनयसिद्ध्यै च स्याद्वादामृतगर्भिणीम्।“ कहकर स्पश्ट किया है कि वाणी स्याद्वाद रूपी अमृत से परिपूर्ण होती है। उसके आश्रय से ही प्रमाण और नय की सिद्धि हो सकती है। यही लक्ष्य है।

आगे “लोक संख्या 5 में”भेदाभेदत्रिरत्नानां“ का उल्लेख कर यह मन्तव्य प्रकट किया है कि निष्चय के साधक के रूप में व्यवहार रत्नत्रय का प्ररूपण इस टीका के अन्तर्गत किया जायेगा। इससे भी अनेकान्त निरूपण का भाव स्पश्ट होता है।

गाथा क्रमांक 18 की टीका के अन्तर्गत प्रातः स्मरणीय आचार्य कुन्दकुन्द देव के आषय के अनुकूल ही माता जी व्यवहार नय से जीव को कर्म का कत्र्ता और भोक्ता तथा अषुद्ध नय से क्रमषः कर्मज भावों का कर्ता भोक्ता और शुद्ध नय से शुद्ध भावों का कत्र्ता-भोक्ता निरूपित करती हैं। वर्णन अवलोकनीय है उन्हीं का स्वोपज्ञ हिन्दी अनुवाद निम्न है -

”टीका - पूर्वोक्त गुणपर्यायों से सहित यह जीवात्मा, जिसके उपादान कारण पुद्गल हैं ऐसे पौद्गलिक द्रव्य कर्मों का करने वाला और भोगने वाला होता है। यह व्यवहार नय का कथन है।“

शंका - तब तो निष्चय नय से यह कत्र्ता और भोक्ता नहीं है। यह बात अर्थापत्ति से सिद्ध हो गई है।

समाधान - ऐसी बात नहीं है बल्कि निष्चय नय से यही आत्मा कर्म से उत्पन्न हुए रागद्वेश आदि भावकर्मों का करने वाला और भोगने वाला होता है। यहाँ अषुद्ध निष्चय नय समझना चाहिए।“


”यह आत्मा अनादिकाल से कर्मां से बंधा हुआ होने से कर्म का कत्र्ता होता है .................।“

पृश्ठ 66 पर भी अवलोकनीय है -

”इसलिए ये सभी अपने अपने गुणस्थान के योग्य उदय में आये हुए कर्मों के भोक्ता कहलाते हैं। यह सब कथन व्यवहार नय की अपेक्षा से ही है।

किन्तु निष्चय नय से कर्म के उदय से उत्पन्न हुए मोहरागद्वेश आदि भावों के और ज्ञान दर्षन में किए गये प्रदोश, निन्हव, मात्सर्य, अन्तराय आदि भावों के भी कत्र्ता होते हैं। ये सभी भाव पूर्व में संचित किये गये कर्मों के उदय से होते हैं। अतः ये कर्म के लिए कारणरूप भी कहलाते हैं। सभी जीव पुद्गल कर्म के उद्य से उत्पन्न हुए इश्ट-अनिश्ट पंचेन्द्रिय विशयों को और उनसे होने वाले सुख दुःख को भोगते हैं इसलिए भोक्ता कहलाते हैं।

यहाँ निष्चय शब्द से अषुद्ध निष्चय लेना चाहिए। ................ षुद्ध निष्चय से तो यह जीव सहज शुद्ध निज ज्ञान, दर्षन सुख, वीर्य, सत्ता आदि भावों का कत्र्ता-भोक्ता है।

शुद्ध निष्चय से आत्मा शरीर रहित निश्क्रिय है ऐसी स्थिति में वह शुद्ध भावों का कत्र्ता और भोक्ता कैसे हो सकता है ? यह शंका उपस्थित होने पर माता जी ने समाधान किया है कि मुक्त जीवों के कर्म निमित्त से होने वाली क्रियायें नहीं है किन्तु स्वाभाविक क्रिया ऊध्र्वगमन तथा स्वभावोत्थ अनन्त ज्ञान एवं सुख के अनुभव रूप आदि क्रियायें तो उनमें भी हैं अतः उनके भी शुद्ध भावों का कत्र्तापना और भोक्तापना अच्छी तरह घटित होता है। दूसरी बात यह है कि अनेकान्त होने से हम जैनों के यहाँ कोई दोश नहीं आता है (किच अनेकांतत्वात् न कष्चिद् दोशोऽवतरति अस्माकम्) आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने भी कहा है ”स्याद्वादिनो नाथ तवैव युक्तं।“ एवं वचनों की निर्दोशता का कारण भी अनेकान्त ही है।

इसी प्रकरण में नय विवक्षा एवं गुणस्थान परिपाटी से जीव के कत्र्तृत्व और भोक्तृत्व का विस्तृत निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त हिन्दी भाशा में पृथक् से (टीका के अतिरिक्त खुलासा) नियमसार में कुन्दकुन्द स्वामी के तथा गोम्मटसार में आ० नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती के आषय को स्पश्ट करते हुए कहा है कि कर्म का कत्र्तृत्व सयोग केवली तक भी है, और उदयागत फल के अनुभव में रति-अरति का अभाव होने से हर्श-विशाद न होने से इन्द्रिय जन्य सुख-दुःख भी नहीं होते हैं। अतः दषवें गुणस्थान तक ही कर्म का कर्तृत्व और भोक्तृत्व, समम्यना चाहिए। इसमें भी दषवें गुणस्थान तक बुद्धिपूर्वक कर्म का कत्र्तत्व और भोक्तृत्व, निर्विकल्प ध्यान में शुद्धोपयोग होने से संभव नहीं है। अुबद्धि पूर्वक अवष्य है। इन्हीं सब विशयों का स्याद्वाद चन्द्रिका टीका में गुणस्थान एवं नयों की अपेक्षा किया गया है। अध्यात्म एवं आगम-सिद्धान्त दोनों के कथन को ध्यान में रखकर ही निरूपण है।

अध्यात्म के शुद्धनय के निरूपण को ही एकान्त से सर्वथा सत्य मानने वाले निष्चयाभासियों के लिए माता जी का उक्त उपदेष, मार्गदर्षन है। पंडित प्रवर बनारसी दास ने भी कहा है -

जैसे सांख्यमती कहै अलख अकत्र्ता है

सर्वथा प्रकार करता न होय कबही।

तैसे जैनमती गुरूमुख एकान्त पक्ष सुनि
ऐसे ही मानै सो मिथ्यात्व तजैं कबही।
जौलों दुरमती तौलों करम को करता है
सुमती सदा अकरतार कह्यौ सबही।
जाके हिय ज्ञायक स्वभाव जग्यो जब ही सौं'

सो तौ जगजाल सौं निरालो भयो तब ही।।

आचार्य अमृतचन्द्र जी का निम्न कथन भी पू० माता जी के समर्थन में अवलोकनीय है -

निष्चयमबुध्यमानो यो निष्चयतः तमेव संश्रयति।
नाषयति करण-चरणं स एव बहिरालसो बालः।।

नियमसार की गाथा क्रमांक 26 ”अत्तादि अत्तमज्झं“ इत्यादि की टीका में परमाणु का अनेकान्त के परिप्रेक्ष्य में जो स्वरूप स्पश्टीकरण स्याद्वाद चन्द्रिका में किया गया है वस्तुतः अत्यन्त प्रामाणिक है। माता जी ने निरूपण किया है कि परमाणु में पुनः दूसरा भेद नहीं हो सकता है अतः वह कथचत् अन्त्य है, प्रदेष भेद का अभाव होने पर भी इसमें गुणों से भेद होता है अतः वह कथंचित् सूक्ष्म होते हुए भी स्थूल कार्य की उत्पत्ति होने में कारण होने से कथ×िचत् स्थूल है। द्रव्यत्व को नहीं छोड़ने से यह कथचत् नित्य है। बन्ध पर्याय की अपेक्षा से एक गुण दूसरे गुण से संक्रमण करता है अतः कथ×िचत् अनित्य है। प्रदेष रहित पर्याय की अपेक्षा से कथ×िचत् एक है अनेक प्रदेषी स्कन्ध रूपी परिणमन की शक्ति वाला होने से कथचत्् अनेक हैं। कार्य हेतु से अनुमान का विशय होने से कथ×िचत् कार्य लिंग है और प्रत्यक्ष ज्ञान की विशय ऐसी पर्यायों की अपेक्षा से कथ×िचत् कार्यलिंग नहीं है।

उपरोक्त वर्णन में पदार्थ में विद्यमान परस्पर दो विरुद्ध शक्तियों का प्रकाषन कर्था×िचत् वाद या स्याद्वाद से किया गया है। यह अनेकान्त शैली का श्रेश्ठ उदाहरण यहाँ अपेक्षाओं को स्पश्ट करना आवष्यक समझकर माता जी ने यह विधि अपनाई है। वही जैनी नीति है। कहा भी है -

तदेव च स्यान्न तदेव च स्यात्

तथा प्रतीतेस्तव तत्कथचत्।
नात्यन्तमन्यत्वमनन्यता च

विधेर्निशेधस्य च शुन्यदोशात्।।

जिनागम में काल द्रव्य को वत्र्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व का कारण निरूपित किया गया है। जीवों की आयु को भी संचालित करने वाला कालद्रव्य निष्चय और व्यवहार रूपों में दो प्रकार का है। आयुकर्म के निशेकों की निर्जरा काल द्रव्य ही करवाता है। इस प्रकरण को गाथायुग्म संख्या 31-32 के भावार्थ को स्तुत्य ढंग से माता जी ने लिखा है। प्रथम ही हम उन गाथाओं को यहाँ उद्धृत करना चाहेंगे -

समयावलिभेदेण दु दुवियप्पं अहव होइ तिवियप्पं।

तीदो संखेज्जावलि हदसंठाण (सिद्धाण) प्पमाणं तु।।
जीवादु पुग्गलादोऽणंतगुणा भावि संपदी समया।

लोयायासे संति य परमट्टो सो हवे कालो।। 32।।

समय और आवलि के भेद से काल दो प्रकार का है अथवा तीन प्रकार का है। अतीत काल संख्यात आवली से गुणित संस्थान प्रमाण है जीव और पुद्गल से अनन्त गुणा भविश्यत् काल है। वत्र्तमान काल समय मात्र है। जो लोकाकाष के एक प्रदेष पर स्थित हैं वे कालाणु परमार्थ काल है।

इसकी टीका का भावार्थ अवलोकनीय है -

“निष्चयव्यवहाररूपं कालद्रव्यं सदाप्रवाहरूपेण आगच्छत् सत् जीवस्यायुर्निशेकान् निर्जरयति इति विज्ञाय निजायुशः क्षणं प्रत्येकमनघ्र्यमिति निष्चित्य कालस्यैकापि कला धर्ममन्तरेण न यापनीया।”

इसका आषय यह कि अपनी आयु के प्रत्येक क्षण अमूल्य मानकर काल की एक कला (अंष) भी धर्म के बिना नहीं बितानी चाहिए।

आगमानुसार ही माता जी की यह अवधारणा है कि जिनेन्द्रदेव का उपदिश्ट तत्त्वज्ञान व्यवहार और निष्चय दोनों नयों के आधीन है। किसी एक नय के द्वारा ही सदैव वस्तुतत्त्व का विवेचन जिनमत से बाहर की वस्तु है। स्याद्वाद चन्द्रिका में गाथा क्रमांक 46 के तात्पर्यार्थ के निम्न अंष में यह निर्दिश्ट किया है कि असंयत सम्यग्दृश्टि जीव उभयनयायत्त पारमेष्वरी देषना को अंगीकार करता है। शब्दों का अवलोकन करें -

”असंयतसम्यग्दृश्टिजीवः व्यवहारनिष्चयोभयनयायत्तां देषनामवाप्य“
आदि। आगे हिन्दी अनुवाद के भावार्थ में यह प्रकट किया है कि सभी जीवों में शुद्ध निष्चय नय से स्वभाव स्थान आदि असंख्यात लोक प्रमाण विभाव एवं शरीर संस्थान आदि नहीं हैं जो भी संसारी-मुक्त भेद, पर्यायों के सुख दुःख आदि हैं वे व्यवहार नय या अषुद्ध निष्चय नय से ही हैं। अतः सुखी होने का उपाय करना उचित है। मनुश्य जन्म की यही सफलता है।“

अनेकान्त जिनषासन ही ऋशिगणसम्मत आर्श मार्ग है। जैनागम का चिन्ह ही अनेकान्त है। पदार्थ में विद्यमान परस्पर विरोधी धर्म भी नय विवक्षा से अस्तित्व में सिद्ध होते हैं। व्यवहार नय से संसारावस्था में प्राप्त शरीर ही आत्मा का आकार है तथा वह साकार है किन्तु कर्मोदय जन्य निमित्त आकार से रहित होने के कारण निष्चय नय से आत्मा निराकार वर्णित किया जाता है। आर्यिका जी ने, ”आर्शतो नयविवक्षातो न कष्चिद्दोशोऽवकाषं लभते।“ आर्श वचन में नय विवक्षा से दोश नहीं है, कहकर हमें आर्श मार्ग के प्रति ही निश्ठावान किया है।

ऊपर कहा जा चुका है कि शुद्ध नय से सभी संसारी जीव शुद्ध हैं इस विशय में भ्रम निवारण की आकांक्षा से अथवा कहीं पाठक एकान्त निष्चयाभासी होकर सर्वथा शुद्ध न मान ले इसके निरसन हेतु गाथानुक्रम 47 की टीका के भावार्थ में उन्होंने कहा है, ”व्यवहार नय से जीव दो प्रकार के हैं, संसारी और मुक्त न कि निष्चय नय से। अतः दोनों नयों के बल से परस्पर में विरुद्ध का भी अविरुद्ध करके जो श्रद्धान करते हैं, जानते हैं और मानते हैं वे ही सग्यग्दृश्टि हैं और एकान्त से जो जीव को सिद्ध सदृष मानते हैं वे मिथ्यादृश्टि हैं, अपने तथा पर के “शत्रु हैं उनके मोक्षमार्गपना कभी भी सिद्ध नहीं होता है।“ इस प्रकरण की पुश्टि में निम्न उदाहरण प्रस्तुत है -

जीवष्चेत् सर्वतः शुद्धो मोक्षादेषो निरर्थकः।
नेश्ट मिश्टत्वमत्रापि तदर्थं वा वृथा श्रमः।।

अर्थ - यदि जीव सर्वथा शुद्ध है तो मोक्ष का उपदेष निरर्थक है किन्तु यह इश्ट नहीं है अर्थात् मोक्ष का उपदेष सार्थक ही है। दूसरे, मोक्षहेतु श्रम करना भी व्यर्थ होगा। स्पश्ट ही है सभी महापुरुशों ने मोक्ष मार्ग के लिए कठोर तपष्चर्या रूप श्रम किया है इसलिए वे श्रमण कहलाते हैं।

“उपरोक्त गाथा के वर्णन से स्पश्ट है कि टीकाकत्र्री ने स्याद्वाद चन्द्रिका टीका के द्वारा आ० कुन्दकुन्द के नियमसार के अन्तर्गत गूढ़ रहस्यों को अनेकान्त नय निरूपण के द्वारा उजागर किया है। उनका यह हितकर मार्ग दर्षन कितना प्रषंसनीय है कि अत्यन्त कठिन भी नयचक्र को गुरु के प्रसाद से प्राप्त कर अपनी “ाक्ति अनुसार चारित्र का अवलम्बन लेकर अपने शुद्ध आत्मा का अभ्यास करना चाहिए।“ बिना चारित्र के शुद्ध आत्मतत्त्व का अभ्यास अषक्य है। एकान्त निष्चयावलम्बन से पंडित बनारसीदास ने ‘अर्ध कथानक’ में अपनी दुर्दषा की भावाभिव्यक्ति निम्न शब्दों में की है -

करनी को रस मिट गयो मिल्यो न आतम स्वाद।
भई बनारसी की दसा जथा ऊँट को पाद।।

इस जैनागम में आ० कुन्दकुन्द देव ने आत्मा के शुद्ध भाव की चर्चा की है (षुद्ध उपयोग अधिकार) निष्चय एवं व्यवहार नयों से शुद्ध स्वरूप एवं विभाव स्वभाव वर्णन किया है। उस निरूपण के हार्द को स्पश्ट करने हेतु माता जी द्वारा की गइ टीका बहुत महत्वपूर्ण है। उसमें उन्होंने द्रव्य-गुण-पर्यायों का विस्तार करके स्थिति स्पश्ट की है। शंका समाधान “ौली में यह अवलोकनीय हैं। गाथा 49 की टीका का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है -

शंका - जीव द्रव्य तो त्रिकाल शुद्ध है उसकी गुण पर्यायें ही अषुद्ध है। इसलिए द्रव्यार्थिक नय से जीव द्रव्य शुद्ध है और पर्यायार्थिक नय से अषुद्ध है, ऐसा कहना चाहिए ?

समाधान - ऐसा नहीं है।

शंका - क्यों ?

समाधान - आर्श ग्रन्थों में सुना जाता है ”गुण और पर्यायों वाला ही द्रव्य है।” ऐसा सूत्र का कथन है। इसका अर्थ है कि गुण-पायायों का समूह ही द्रव्य है। तन्मय है1। पुनः द्रव्य तो तीनों काल शुद्ध रहे और गुण-पर्यायें अषुद्ध रहें यह कैसे सम्भव है, क्योंकि गुण-पर्यायों के बिना द्रव्य का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होता। इसलिए जब अथवा जिस नय से द्रव्य शुद्ध है तब उसी नय से गुण-पर्यायें भी शुद्ध है।“

आगे इसी प्रकरण में आलाप पद्धति’ के कथन को निम्न प्रकार प्रस्तुत किया है जिसमें नयों के भेद सोदाहरण निरूपित किए है।

1. कर्मोपाधि निरपेक्ष शुद्ध द्रव्यार्थिक संसारी जीव सिद्ध के समान शुद्धत्मा है।

2. कर्मोपाधि निरपेक्ष स्वभावाऽनित्य सिद्ध पर्याय समान संसारी जीवों के भीशुद्धर्यायार्थिक पर्यायेंशुद्ध है।

3. कर्मोपाधि सापेक्षऽषुद्ध द्रव्यार्थिक क्रोधादि कर्मजनित भाव आत्मा है।

4. कर्मोपाधि सापेक्ष स्वभावोऽनित्याषुद्ध जैसे संसारी जीवों के जन्म मरण हैं।

इस कथन से जाना जाता है कि शुद्ध द्रव्यार्थिक और शुद्धपर्यायार्थिक इन दोनों नयों से सभी संसारी जीव सिद्धों के समान शुद्ध है, उनकी गुण पर्यायें भी सिद्धों की गुण-पर्यायों सदृष शुद्ध ही है। उसी प्रकार अषुद्ध द्रव्यार्थिक नय से और अषुद्ध पर्यायार्थिक नयों से संसारी जीव अषुद्ध है उनकी गुण पर्यायें भी अषुद्ध ही है।

गुण धु्रव रूप और पर्यायें उत्पाद-व्यय हैं और इन सबका आधार द्रव्य ही है। इनके प्रदेष द्रव्य से भिन्न नहीं हैं। यहाँ कुन्दकुन्द स्वामी के प्रवचनसार की गाथा क्रमांक 129 को माता जी के कथन के समर्थन में उद्धृत करना अप्रासंगिक न होगा,

उप्पादट्ठिदि भंगा विज्जन्ते पज्जएसु पज्जाया।
दव्वे हि संतिणियदं तम्हा दव्वं हवे सव्वं।। 129।।

उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य पर्यायों में विद्यमान है और पर्यायें द्रव्य में नियम से होती है अतः द्रव्य ही सब कुछ है वही उत्पाद रूप, व्यय रूप और ध्रौव्य रूप है।

गाथा 49 की टीका के अन्त में माता जी ने तात्पर्यार्थ रूप एक उपादेय विचार दिया है -

”सिद्धसद्षोऽहं इति मत्वा अहंकारवषेन प्रमादीभूय विशयकशायमयगृहस्थाश्रमे एव न आसक्तिर्विधेया।“

मैं सिद्ध समान हूँ ऐसा मानकर अहंकार के वष से प्रमादी होकर विशय कशायमय ऐसे गृहस्थाश्रम में ही आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। (

जिन सिद्धान्तनुसार जीव के पाँच असाधारण भाव है। औपषमिक, क्षायिक, क्षायोपषमिक, औदयिक, पारिणामिक। इनमें से औदयिक भाव, बन्ध के कारण हैं किसी अपेक्षा से किन्हीं औदयिक भावों को मंगल का कारण भी कहा गया है यथा -

”औदयिकादि भावैः मंगलम्।“ (धवला पुस्तक 1. मंगलाचरण) पारिणामिक भाव निश्क्रिय हैं बन्ध और मोक्ष के हेतुओं में इनका हस्तक्षेप नहीं है शोक तीन भाव मोक्ष के हेतु हैं, यथा -

मोक्षं कुर्वन्ति मिश्रौपषमिकक्षायिकाभिधाः।
बन्धमौदयिको भावो निश्क्रियो परिणामिकः।। पच्चाध्यायी।

‘स्याद्वाद चन्द्रिका में माता जी ने इनकी हेयोपादेयता वर्णित की है। आ० कुन्दकुन्द देव ने नियमसार प्राभृत की गाथा क्रमांक 50 के अन्तर्गत तत्त्व अर्थात् शुद्ध पारिणामिक भाव को उपादेय कहा है जो कि शुद्ध, ध्येयरूप है। पू० माता जी का एतद्विशयक स्पश्टीकरण दृश्टव्य है -

”पहले ही कहा है कि शुद्धनय से जीव को कर्म मल का सम्पर्क नहीं है अतः ये भी सभी सम्यक्त्व, चारित्र आदि (मनुश्य गति आदि प्रषस्त औदयिक, औपषमिक, क्षायिक, मिश्रभाव) भाव हेय ही हैं, किन्तु अषुद्ध नय से हेय नहीं है क्योंकि व्यवहार नय से जीव के कर्म बन्ध है, अतः उसको दूर करने के लिए रत्नत्रय के अन्तर्गत होने से सम्यक्त्व आदि भाव उपादेय भी है। ऐसा जानकर एकान्त दुराग्रह न हो जावे इसलिए अपनी योग्यता के अनुसार नयों का आश्रय लेकर व्यवहार मोक्षमार्ग रूप साधन के बल से निष्चय मोक्षमार्ग का साधन करके सिद्धि प्रसाद पर आरोहण करना चाहिए।“

इस निरुपण से रत्नत्रय के अंगभूत तीनों सम्यक्त्व, संयमासंयम, सराग संयम, उपषम चारित्र, क्षायिक चारित्र की अपेक्षित उपादेयता नय विवक्षा से सिद्ध होती है। जिनागम को पढ़ने से पूर्व एवं सदैव ही नयों की निश्पक्षता आवष्यक है। ज्ञानमती माता जी जितनी दृढ़ता से व्यवहार एवं अषुद्ध नय का प्रतिपादन करती हैं उतनी ही दृढ़ता से निष्चय नय एवं शुद्धनय का पक्ष प्रस्तुत कर उसका समर्थन करती हैं। उन्हें दोनों नयों में मध्यस्थता है। किसी भी नय का आग्रह उन्हें छू तक नहीं गया है। आगम में यह कहा भी गया है कि जो व्यवहार और निष्चय को तत्त्वरूप से जानकर मध्यस्थ (निश्पक्ष) होता है यही षिश्य जिन देषना के सम्पूर्ण फल को प्राप्त करता है।

मध्यस्थता सहित ज्ञान को ही सम्यग्ज्ञान कहा जाता है ‘स्याद्वाद चन्द्रिकाकत्र्री’ सम्यग्ज्ञान के दोश संषय, विमोह, विभ्रम, वर्णित कर नय सापेक्षता स्थापित करती हैं। गाथा संख्या 51 की टीका पर दृश्टिपात करना योग्य है -

”उभय कोटि स्पर्षी ज्ञान को संषय कहते हैं, जैसे यह ठूंठ है या पुरुश। परस्पर सापेक्ष दोनों नयों से वस्तु का ज्ञान न होना विमोह है। जैसे गमन करते हुए पुरुश के तृण लग जाने पर ‘कुछ लग गया है’ ऐसा विकल्प होना या दिषाभ्रम हो जाना। अनेकान्तात्मक वस्तु को यह नित्य ही है या क्षणिक ही है ऐसा एकांत रूप से ग्रहण करना विभ्रम है जैसे सीप में चाँदी का ज्ञान कर लेना। इन तीनों दोशों से रहित जो ज्ञान है वह सम्यग्ज्ञान है।

आत्मस्वरूप या अनन्त चतुश्टय को प्राप्त करना ही मोक्ष है। उसकी प्राप्ति हेतु व्यवहार और निष्चय दोनों की उपयोगिता प्रस्तुत कृति में गाथा सं० 52 में वर्णित करते हुए कहा गया है -

”इदमत्रतात्पर्यं-व्यवहारनयेन आप्तादिश्रद्धानं दृढीकृत्य निष्चयनयेन सिद्धसदृषनिजपरमात्मतत्त्वस्य भावनया स्वषक्तिमुपबृह्ंयता सता त्वया स्वानन्तचतु- श्यव्यक्त्यर्थं प्रयत्नो विधेयः।“

प्रकृत टीकांष से आगे हिन्दी अनुवाद में व्यवहार का यथायोग्य महत्त्व स्थापित करते हुए उसे निष्चय के साधन हेतु से वर्णित किया गया है।

”भावार्थ - यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि महान् अध्यात्म षिरोमणि श्री कुन्दकुन्द देव इस ग्रन्थ के कत्र्ता हैं और यह नियमसार भी अध्यात्म ग्रन्थ है। फिर भी यहाँ पर उन्होंने सम्यग्दर्षन के तीनों लक्षण ही व्यवहारपरक किए हैं। जो व्यवहार सम्यग्दर्षन को हेय दृश्टि से देखते हैं उन्हें इन पर विचार करना चाहिए। तथा कुन्दकुन्द से भी पहले गुणधर आचार्य हुए हैं उन्होंने भी व्यवहार परक ही लक्षण किया है (टीका देखें) खास बात यही है कि इस व्यवहार सम्यग्दर्षन से ही निष्चय सम्यग्दर्षन प्राप्त होता है। अतः इनमें परस्पर में साध्यसाधन भाव या संबंध है। व्यवहार सम्यग्दर्षन साधन है ओर निष्चय सम्यग्दर्षन साध्य है ऐसा समझना।

इस विशय में आगम में अनेकों प्रमाण हैं आगम प्रमाण तो निर्णय हेतु अन्तिम प्रमाण है। जहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान, तर्क आदि से निर्णय न हो सके वहाँ आगम ही निर्णायक प्रमाण होता है। आगम को न मानकर, सूत्रों को देखकर भी जो निष्चय-व्यवहार की साध्य साधकता को स्वीकार नहीं करता है उसका श्रद्धान मिथ्या ही है। केवल शुद्ध अध्यात्म या निष्चय की चर्चा करने से ही सम्यक्त्व नही होता हैं साध्य-साधकता के विशय में पू० माता जी ने अनेकों उद्धरण प्रस्तुत किये हैं, फिर भी ‘पंचास्तिकाय1’ के अंषों को यहाँ विशय की पुश्टि करने हेतु प्रस्तुत करना मुझे अभीश्ट प्रतीत होता है। गाथा 160 की उत्थानिका -

”निष्चयमोक्षमार्गसाधनभावेन पूर्वोद्दिश्टव्यवहारमोक्षमार्गनिर्देषोऽयम्।“

निष्चय मोक्षमार्ग के साधन रूप से पूर्वोद्दिश्ट व्यवहार मोक्षमार्ग का यह निर्देष है। इसी प्रकार गाथा 161 की उत्थानिका -

”व्यवहारमोक्षमार्गसाध्यभावेन निष्चयमोक्षमार्गोपन्यासोऽयम्।“

“व्यवहार मोक्षमार्ग से साधित निष्चय मोक्षमार्ग का यह स्वरूप दिखाया जाता है।“ कितना स्पश्ट है आ० अमृतचन्द्र जी का उल्लेख। इन दोनों गाथाओं की पूरी टीका अवष्य पठनीय है। यहाँ विस्तार के भय से नहीं लिखी है। पुनष्च पू० माता जी ने स्याद्वाद चन्द्रिका में स्थान स्थान पर इन नयों का साध्य साधन भाव सिद्ध किया है।

उपरोक्त भाव को आवष्यक क्रियाओं भक्ति, वंदना आदि के माध्यम से सिद्ध करते हुए माता जी ने लिखा है -

”तथा चाग्रे निष्चयपरमावष्यकाधिकारो वक्ष्यते, सोऽपिव्यवहारमन्तरेण कथं संभवेत्।“

आगे निष्चय परमावष्यक अधिकार कहा जावेगा, वह भी बिना व्यवहार आवष्यक क्रिया के कैसे संभव होगा। अर्थात् नहीं होगा। गाथा क्रमांक 79 और व्यवहार चारित्राधिकार का तात्पर्य लेखिका ने बहुत ही निर्देषक पद्धति से प्रस्तुत किया है। अनेकान्त से ही सिद्धि है। का हिन्दी अनुवाद अनुषीलन करने योग्य है।

”यहाँ तात्पर्य यह हुआ कि जो लोग व्यवहार रत्नत्रय के बिना निष्चय रत्नत्रय को प्राप्त करना चाहते हैं वे जिन “ाासन से बहिर्मुख अपनी वंचना करने वाले ही हैं। ऐसा जानकर सर्व तात्पर्य से भेद चारित्र का पालन करके हे भव्य जीवो। तुम लोग सिद्धि पत्तन की निकट कर लेवो।“

नय चक्र में यही बात स्याद्वाद चन्द्रिका टीका के उपरोक्त अंष के समर्थन हेतु अवलोकनीय है -

णो ववहोरण विणा णिच्छय सिद्धी कया वि णिद्विट्ठा।
साहणहेऊ जम्हा तम्हा य सो भणिय ववहारो।।माइल्ल धवल कृत।।

यहाँ स्पश्टीकरण है कि निष्चय का साधन हेतु होने से ही व्यवहार संज्ञा होती है।

गाथा सं० 88 की टीका के अन्तर्गत बृहत्प्रतिक्रमण के “उम्मग्गं परिवज्जामि- सम्यग्दर्षन-ज्ञान-चारित्रलक्षणो जिनोक्तस्वर्गापवर्गमार्गः ततोऽन्य एकान्तवादि परिकल्पित उन्मार्गः“ वाक्यांष के आषय को स्पश्ट करते हुए पू० माता जी ने युक्ति, उदाहरण और तर्क द्वारा इसी विशय को पुश्ट किया है, उसमें नयों की अपेक्षा से निम्न भाव गर्मित हैं -

निष्चय का साधक होने से व्यवहार रत्नत्रय जिनमार्ग ही है उन्मार्ग नहीं। ऊपर संस्कृत टीका में स्वर्ग और मोक्ष दोनों को प्रदान करने वाला मार्ग कहा गया है। भक्तामर स्तोत्र में भी भगवान की दिव्य ध्वनि का ”स्वर्गापवर्गगममार्गविमार्गणेश्टः सद्धर्मतत्त्व कथनैकपटुस्त्रिलोक्या।“ के अनुसार यही भाव व्यक्त किया गया है। अर्थात् स्वर्ग को प्रदान करने वाला एवं परम्परा से मोक्ष का साधक व्यवहार धर्म भी सद्धर्म है, जिनमार्ग है। जैसे कुम्हार के चक्र, चीवर, दण्ड आदि के बिना घड़ा आदि नहीं बन सकता उसी प्रकार व्यवहार के अभाव में निष्चय की सिद्धि नहीं हो सकती इसलिए व्यवहार और निष्चय की परस्पर तीव्र मित्रता ही जानकर अपनी पदवी अनुसार हम सभी को व्यवहार रूप जिन “ाासन में प्रवृत्ति विधेय है। पुनः मुनि अवस्था में निष्चय रत्नत्रय अथवा निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर नयातीत अवस्था प्राप्त करनी योग्य है। वही परमार्थ प्रतिक्रमण, कारण समयसार होता है।

यहाँ माता जी के कथन समर्थन में दो निम्न आगमोल्लेख करना चाहूँगा।

1. स्याद्वादकौषलसुनिष्चलसंयमाभ्यां

यो भावयति अहरहः स्वमिहोपयुक्तः।
ज्ञानक्रियापरस्परतीव्रमैत्री -

पात्रीकृतः श्रयति भूमिमिमां स एकः।।

अर्थ - स्याद्वाद के कौषल और सुनिष्चल संयम के द्वारा जो अपनी आत्मा को तल्लीन होकर भाता है और ज्ञान एवं क्रिया की मित्रता अर्थात् दोनों की समश्टि ने जिसे पात्र बना दिया है ऐसा कोई एक (विरला) इस भूमिका को प्राप्त करता है। यहाँ स्पश्ट है कि ज्ञान का संबध स्याद्वाद से है तथा क्रिया का तात्पर्य दृढ़ मुनिचर्या से है।

2. कम्मं बद्धमबद्धं जीवे एवं तु जाण णयपक्खं।
पक्खातिक्कंतो पुण भणिदो जो सो समयसारो।।

अर्थ - कर्म जीव में बंधा है या नहीं बँधा है यह नयपक्ष है। जो समयसार बतलाया गया है वह तो पक्षातिक्रान्त है। (न वहाँ व्यवहार का प्रयोग है न निष्चय का) प्रस्तुत पूर्वोक्त साध्य साधक भाव को स्याद्वाद चन्द्रिका में प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, आलोचना एवं चारित्र आदि के प्रकरणों में शुद्धपयोग रूप शुक्लध्यान संभव न होने से साधुवर्ग एवं श्रावक वर्ग सभी के लिए व्यवहार को शरण रूप में प्रतिपादित करती हैं। प्रायः भावार्थ में निष्चय आराधना आदि रूपों को ही परम उपादेय स्वीकारती है निम्न वाक्य ध्यान देने योग्य है,

”पुनः निष्चयालोचनासिद्ध्यर्थं भावना भावनीया निरन्तरं भवता।“

यहाँ यह साफ तौर पर प्रकट है कि जो मात्र व्यवहार में डूबे हैं क्रिया कांड में ही मग्न हैं तथा निष्चय का लक्ष्य जिनको नहीं है वे व्यवहाराभासी हैं सम्यक्त्व से दूर हैं। निष्चय मोक्षमार्ग की, स्वात्मपरिणाित की जिनकी भावना निरन्तर है उनका व्यवहार वस्तुतः व्यवहार है नियमसार टीका में सर्वत्र यही अभिप्राय है।

टीकाकत्र्री आर्यिका ज्ञानमती माता जी ने नियमसार के मुख्य अभिधेय निष्चय मोक्षमार्ग, अभेद रत्नत्रय या निर्विकल्प ध्यान को ही अंतिम सारांष रूप में स्थापित किया है। कहीं भी व्यवहार को पृथक से मोक्षमार्ग नहीं कहा है। इसकी सीमा मात्र निष्चय तक पहुँचने की है। साक्षात् मोक्षमार्ग तो निष्चय मोक्षमार्ग ही है। इसीलिए चतुर्थ, पच्चम, एवं स्वस्थान अप्रमत्त व्यवहार मोक्षमार्गीय गुणस्थानों को मोक्षमार्ग नहीं कहा गया है। मोक्षमार्ग का अंषमात्र प्रतिपादित किया है जो कि कुन्दकुन्द के निष्चयपरक व्याख्यान का सार है। माता जी ने गाथा संख्या 4 की टीका में प्रवचनसार जी के आधार पर इसी आषय सो निम्न वाक्य लिखा है -

”अथवा प्रमत्ताप्रमत्त मुनीनामपि मोक्षमार्गो व्यवहारनयेनैव परम्परया कारणत्वात्।“

अथवा छठे सातवें गुणस्थान वत्र्ती प्रमत्त और अप्रमत्त मुनियों के भी मोक्षमार्ग व्यवहार नय से ही है क्योंकि वह परम्परा से (मोक्ष का) कारण है। निष्चय से तो अयोग केवलियों के अन्तिम समयवर्ती रत्नत्रय परिणाम ही मोक्षमार्ग है। क्योंकि वह साक्षात् अनन्तर क्षण में मोक्ष को प्राप्त कराने वाला है अथवा भाव मोक्ष की अपेक्षा से अध्यात्म भाशा में क्षीण कशायवत्र्ती मुनि का अन्तिम समयवत्र्ती परिणाम भी निष्चय मोक्षमार्ग है। इसको उपादेय करके भेद रत्नत्रय स्वरूप व्यवहार मोक्षमार्ग का आश्रय लेना चाहिए।

अध्यात्म में मूल दो नय हैं। निष्चय और व्यवहार। नय (नयन, नेत्र) का पर्यायवाची होने से चक्षु के समान है। चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है। वह वर्ण और आकार को बिना स्पृश्ट किये असंलग्न रहकर ग्रहण करती है। उसी प्रकार नय भी ज्ञेय वस्तु को पकड़ते नहीं है। नय तो जानने के लिए हैं न कि पक्ष ग्रहण के लिए। एक समय में जो नय प्रयोजनवान होता है वह अन्य समय में अप्रयोजनीय होता है। निष्चय नय पदार्थ के मूल तत्व, शुद्धतत्त्व, पर संबध रहित तत्व को देखता है एवं व्यवहार नय पर के आश्रय सहित, मिले हुए संबंधात्मक रूप को विशय करता है। व्यवहार नय भी सत्य है किसी अवस्तु का कथन नहीं करता। यह किसी व्यक्ति के बाहरी फोटो के समान है। निष्चय नय तथ्य है। किसी मनुश्य के अन्तरंग एक्सरे फोटो के समान दोनों का विशय विरुद्ध है पर सापेक्षता से दोनों ही अविरुद्ध हैं। एक ही वस्तु का विवेचन गौण मुख्य कल्पना से ज्ञाता करता है किन्तु नयों की निश्पक्षता पथ्य है जिसका अत्यन्त महत्व है।1 आचार्य अमृतचन्द्र जी ने गोपिका के घी निकालने हेतु मथानी के रस्सी के छोरों को क्रमषः आकर्शित एवं ढीला करके किये गये प्रयत्न के समान जैनी नीति को बताया है। अर्थात् एक ही नय को सदैव ग्रहण नहीं किया है, मुख्य किये रहने से ही तत्त्व की प्राप्ति नहीं होती है। जिस समय निष्चय नय को मुख्य करते हैं तो व्यवहार को गौण करते हैं। तथा अनन्तर समय में निष्चय को गौण और व्यवहार को मुख्य करना ही पड़ता है। इससे स्पश्ट है कि कोई नय सर्वथा न तो उपादेय है न हेय। प्रयोजन से ही सत्यार्थता अथवा असत्यार्थता होती है। जब उभय नय कथ्य वस्तु का ही कथन करते हैं तब झूठ का तो प्रष्न ही नहीं उठता। नय तो शब्द है शब्द के अस्तित्व होने में झूठ - सच का प्रष्न ही नहीं उठता। एक नय की अपेक्षा दूसरा नय असत्यार्थ उल्लिखित किया जाता है। निष्चय की अपेक्षा व्यवहार असत्यार्थ है तो व्यवहार की अपेक्षा निष्चय भी असत्यार्थ है। किन्तु प्रमाण, जो दोनों का जनक है, की अपेक्षा दोनों ही सत्य है। किसी अकेले नय से काम नहीं चलता। सम्यग्दृश्टि व्यक्ति सभी जिनेन्द्र देव कथित अनेकान्तात्मक सम्पूर्ण नयात्मक निरूपण को निःषंक होकर सत्य मानता है यह सम्यक्त्व का निःषंकित अंग है कहा भी है,

सकलमनेकान्तात्मकमिदमुक्तं वस्तुजातमखिलज्ञैः।
किमु सत्यमसत्यं वा, न जातु शकेति कर्तव्या।। 23।।


उपरोक्त सम्पूर्ण विशयों की चर्चा सहित निश्पक्ष नय निरूपण पूज्य माता जी का ध्येय रहा है। वे पाठकों को नियमसार की विशय वस्तु को स्पश्ट दिखाना चाहती है। यहाँ मैं उनके कुछ शब्दों को हिन्दी अनुवाद के रूप में प्रस्तुत करना अभीश्ट समझता हूँ ताकि नयों के विशय में भ्रम न रहे। उनका समीचीन स्वरूप बोध हो सके। गाथा क्रमांक 165 की टीका से उद्धृत अंष निम्न है -

”इसी का विस्तार करते हैं यहाँ पर (अध्यात्म में) व्यवहार नय पराश्रित है और निष्चय नय अपने आश्रित है। इसी विवक्षा से यह कथन किया गया है। इसलिए अपने से भिन्न अनन्त सिद्ध जीव, अनन्त संसारी जीवों का समूह पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाष और काल द्रव्य तथा उनकी गुण पर्यायें ये सब ‘पर’ शब्द से कहे जाते हैं। ज्ञान-दर्षन और आत्मा पर को जानते हैं, देखते हैं, प्रकाषित करते है, यह कथन भी पर के आश्रित होने से पर निमित्त की अपेक्षा रखने से पराश्रित हैं। ऐसा व्यवहार नय ग्रहण करता है परन्तु यह नय अपनी मूल आत्मा को कदाचित् ग्रहण नहीं करता जैसे कि चक्षु इन्द्रिय रस को ग्रहण नहीं करती है उसी प्रकार निष्चय के द्वारा अपनी आत्मा से अतिरिक्त कुछ भी ग्रहण नहीं होता जैसे कि रूप को ग्रहण करने में रसना इन्द्रिय व्यापार नहीं करती।

तात्पर्य यह हुआ कि यहाँ पर व्यवहार नय असत्यार्थ है, मिथ्या है या असत्य है ऐसा नहीं ग्रहण करना चाहिए। बल्कि वह अपने विशय को कहने में समीचीन (सत्य) ही है। ऐसा जानकर परस्पर विरोधी भी नयों के समीचीन स्वरूप को समझकर मैत्री को स्थापित करते हुए आपको अनेकान्त से वस्तु स्वरूप को समझना चाहिए।“

व्यवहार के अन्तर्भेद उपचरित असद्भूत व्यवहार के प्रयोग का निम्न उदाहरण स्याद्वाद चन्द्रिका से यहाँ प्रस्तुत है -

”यद्यपि सिद्धाः परमात्मानः सर्वथाषक्तिमन्तः स्वाधीनास्तथापि उपचरितासद्भूत व्यवहारनयेन अनेनैव श्री कुन्दकुन्ददेवकथनानुसारेण च कथ×िचत् परद्रव्याश्रिता अपि गीयन्ते।“

यद्यपि सिद्ध भगवान सर्वषक्तिमान हैं, स्वाधीन है। तथापि उपचरित असद्भूत व्यवहार नय से और श्री कुन्दकुन्द देव की इसी कथानुसार वे कथंचित् पर के आश्रित भी कहे जाते हैं।

जिन पदार्थों का सम्बन्ध नहीं है बिल्कुल पृथक् हैं उनका भी अन्य पदार्थों से सम्बन्ध बताना उपचार कहलाता है जैसे घी का घड़ा। इसी प्रकार पर द्रव्य सिद्ध भगवान से पृथक् द्रव्य है उसके आश्रित सिद्ध भगवान को निरूपित करना उपचार है स्वरूप भिन्न होने से असद्भूत है। यह नय भी आ० कुन्दकुन्द को स्वीकार है। माता जी ने भ्रम निवारण हेतु प्रकृत स्थल पर नय विवक्षा को खोल दिया है ताकि नियमसार के हार्द को हृदयंगम किया जा सके। माता जी ने नय निरूपण में गाथा 19 की टीका में आलाप पद्धति के अनुसार द्रव्यार्थिक नय के 10 भेदों का तथा पर्यायर्थिक नय के छह मेदों का उल्लेख किया है उनका नामोल्लेख मात्र पाठकों हेतु सार रूप में यहाँ किया जाता है।


1. कर्मोपाधि निरपेक्षशुद्ध द्रव्यार्थिक संसारी जीव सिद्ध समान शुद्धत्मा है।

2. उत्पाद व्यय गौणत्व “शुद्धद्रव्यार्थिक द्रव्य नित्य है।

3. भेद कल्पना निरपेक्षशुद्ध द्रव्यार्थिक निज गुण पर्याय स्वभाव से द्रव्य अभिन्न है।

4. कर्मोपाधि सापेक्ष अषुद्ध द्रव्यार्थिक क्रोधादि कर्मज भाव आत्मा हैं।

5. उत्पाद व्यय सापेक्ष अषुद्ध द्रव्यार्थिक एक ही समय में द्रव्य उत्पाद-व्यय ध्रौव्यात्मक है।

6. भेद कल्पना सापेक्ष अषुद्ध द्रव्यार्थिक आत्मा के दर्षन ज्ञान आदि गुण हैं।

7. अन्वय द्रव्यार्थिक गुणपर्याय स्वभाव वाला द्रव्य है।

8. स्वद्रव्यादिग्राहक द्रव्यार्थिक स्वद्रव्यादि चतुश्टयादि की अपेक्षा द्रव्य अस्ति नास्ति है।

9. परद्रव्यादि ग्राहक द्रव्यार्थिक परद्रव्यादि चतुश्टयादि की अपेक्षा द्रव्य नास्ति रूप है।

10. परमभाव ग्राहक द्रव्यार्थिक ज्ञानस्वरूप आत्मा है।

पर्यायार्थिक उदाहरण

1. अनादि नित्य पर्यायार्थिक मेरु आदि की भाँति पुद्गल पर्याय नित्य है।

2. सादि नित्य सिद्ध पर्याय नित्य है

3. सत्तागौणत्व सहित उत्पाद व्यय समय समय प्रति पर्यायें नाषवान हैं।

4. सत्तासापेक्ष स्वभाव नित्य अषुद्धएक ही समय में पर्याय त्रयात्मक है।

5. कर्मोपाधि निरपेक्ष स्वभाव नित्य षुद्ध सिद्ध पर्याय सदृष संसारी जीवों पर्यायार्थिक की पर्यायें है।

6. कर्मोपाधि सापेक्ष स्वभाव अनित्य संसारी जीवों के उत्पत्ति-मरण है।

अशुद्ध पर्यायार्थिक

‘स्याद्वाद चन्द्रिका’ टीका में माता जी ने यथास्थान स्याद्वाद रूप सप्तभंगी नय का भी प्रयोग पदार्थ निर्णय हेतु किया है वे सप्तभंग निम्न प्रकार हैं।

1. स्यादस्ति

2. स्यान्नास्ति

3. स्यादस्तिनास्ति

4. स्यादवक्तव्य

5. स्यादस्त्यवक्तव्य

6. स्यान्नास्त्यवक्तव्य

7. स्यादस्तिनास्त्यवक्तव्य।

इनका स्वरूप प्रस्तुत टीका ग्रन्थ व अन्य ग्रन्थों से ज्ञातव्य है। यहाँ प्रकृत उपयोगी लक्षण ज्ञातव्य हैं इनसे जैन दर्षन के महत्वपूर्ण अंग अनेकान्त एवं उसके परिवेष का स्वरूप अवबोधन होगा। कुछ पुनरावृत्ति भी हो तो दोश नहीं है।

1. अनेकान्त - यदेव तत् तदेवातत्, यदेवैकं तदेवानेकं, यदेव सत् तदेवासत्, यदेव नित्यं तदेवानित्यमित्येकवस्तुनि वस्तुत्वनिश्पादकपरस्परविरुद्ध “क्तिद्वय- प्रकाषनमनेकान्तः। (समयसार आत्मख्याति परिषिश्ट)

जो तत् है वही अतत् है, जो एक है वही अनेक है, जो सत् है वही असत् है, जो नित्य है वही अनित्य है इस प्रकार एक ही वस्तु में वस्तुत्व की निश्पादक (उत्पन्न करने वाली, सिद्धि करने वाली) परस्पर विरुद्ध दो “ाक्तियों का प्रकाषन अनेकान्त है।

2. स्याद्वाद - स्यात् कथ×िचत् विवक्षितप्रकारेणनेकान्तरूपेण वदनं वादो जल्पः कथनं प्रतिपादनमिति स्याद्वादः। (समयसार तात्पर्यवृत्ति स्याद्वाद अधिकार) स्यात् अर्थात कथ×िचत् या अपेक्षा से विवक्षित प्रकार से अनेकान्त रूप से, वदना बोलना, वाद करना, जल्प करना, प्रतिपादन करना स्याद्वाद है।
3. नय (1) अनिराकृतप्रतिपक्षो वस्त्वंषग्राही ज्ञातुरभिप्रायो नयः।

विरोधी धर्मों का निराकरण न करते हुए वस्तु के एक अंष या धर्म को ग्रहण करने वाला ज्ञाता का अभिप्राय नय है।

(2) वस्तुन्यनेकान्तात्मनि हेत्वर्पणात्साध्यविषेशस्य प्रापणप्रवणप्रयोगो नयः।

अनन्त धर्मात्मक वस्तु में हेतु की मुख्यता से साध्य विषेश को प्राप्त कराने में समर्थ प्रयोग नय है।

4. सप्तभंगी - एकस्मिन् वस्तुनि प्रष्नवषाद् दृश्टेनेश्टेन च प्रमाणेनाविरुद्धः विधिप्रतिशेधकल्पना सप्तभंगी विज्ञेया। (तत्त्वार्थ राज वात्र्तिक)

प्रष्न के अनुसार एक वस्तु में प्रमाण से अविरूद्ध विधि प्रतिशेध धर्मों की कल्पना सप्तभंगी है।

ग्रन्थ विस्तार के भय से यहाँ नाम मात्र लिखे हैं। सोदाहरण न्याय ग्रन्थों से है। कोमलता गुण से यह टीका आषीर्वाद रूप गुण प्रदान करती है जैसे चांदनी का स्पर्ष कोमल एवं सुखद होता है तद्नुरूप ही यह प्रभावकारी है। जैसे चन्द्रिका के प्रकाष में वस्तुओं का सम्यक् परिज्ञान होता है उसी प्रकार स्याद्वाद चन्द्रिका से अर्थावबोध सुगमता से होता है। जैसे नयनों का संबंध प्रकाष से होता है प्रकाष के द्वारा, चांदनी के द्वारा नेत्र इन्द्रियां अपना कार्य करने में सरलता, सहजता से ही समर्थ होती हैं। उसी प्रकार स्याद्वाद चन्द्रिका से नय ज्ञान को बल मिलता है। नय सिद्धि हेतु यह टीका अत्यंत उपयोगी है। अनेकान्त एवं स्याद्वाद नय का विशय अत्यंत कठिन है। नयचक्र के ज्ञान के बिना, उसके सही सटीक प्रयोग के बिना व्यक्ति अपनी ही हानि करता है। इसमें अर्थात नय प्रयोग में अत्यंत सावधानी की आवष्यकता है। सावधानी यहां यही है कि नयों के विशय में निश्पक्षता हो। आ० अमृतचन्द्र जी ने नयचक्र के असमीचीन प्रयोग के खतरे से निम्न आर्या में सावधान किया है,

अत्यन्तनिषितधारं दुरासदं जिनवरस्य नयचक्रं।
खण्डयति धार्यमाणं मूर्धानं झटिति दुर्विदग्धानां।।

स्याद्वाद चन्द्रिकाकत्र्री ने भी सर्वत्र इसी का ध्यान रखते हुए अर्थात् जिनेन्द्र भगवान का अत्यंत तीक्ष्ण धार वाला नयचक्र उसको धारण करने वाले अज्ञानी प्रयोक्ता का मस्तक काट देता है, उसकी अत्यंत हानि करता है, दृश्टिकोण सम्मुख रखते हुए नयप्रयोग कौषल का पाठ सिखाया है।

नयों की सीमा है यह तो शब्द रूप है। शब्द मात्र संकेत करने वाले होते हैं। जितने शब्द हैं उतने ही नय हैं1(अगले पृश्ठ पर)। सभी विकल्पात्मक हैं। नियमसार की प्रस्तुत टीका में व्यवहार से निष्चय और निष्चयोपरान्त निर्विकल्पता, निष्चय समाधि निष्चय आवष्यक आदि का विधान माता जी ने सुश्ठु स्पश्ट किया है।


नय शब्द की व्युत्पत्ति निम्न प्रकार है,

‘‘नयतीति नयः’’ - अर्थात् जो किसी एक लक्ष्य या वाच्य पदार्थ पर ले जाता है वह नय है। स्याद्वाद चन्द्रिका वस्तुतः स्याद्वाद शैली में नयों के प्रयोग द्वारा पदार्थ के विभिन्न पहलुओं, पाष्र्वों का निर्णय कराने की ओर अग्रसित करती है। इस टीका को नय समूह की विस्तारक या नयचक्र का पल्लवन कहना अधिक उपयुक्त होगा। जिस नियमसार के अध्यात्म रस में आ० कुन्दकुन्द देव ने पाठकों को डुबोने का लक्ष्य रखा है उस रस के स्थायी भाव, उद्दीपन भाव और संचारी भावों की समश्टि कर उसे आनंद विभोर करने का कार्य स्याद्वाद शैली से ज्ञानमती जी ने सफलता के साथ सम्पन्न किया है। मूल ग्रंथ में कहां क्या छिपा है उस पर माता जी की दृश्टि सहजता से ही पड़ी है, उसका प्रकटीकरण बिना नय विवक्षा से संभव नहीं था। इसके नामकरण में भी यही उद्देष्य प्रकट होता है। जैसे किसी वस्तु को चार आंखों से देखा जाता है उसके सभी पाष्वों को घुमा फिराकर अवलोकित किया जाता है ऐसे ही पदार्थवलोकन इसमें किया है।