15. जड़मति होत सुजान

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जड़मति होत सुजान

(काव्य अठारह से सम्बन्धित कथा)
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आधुनिक समय में पैतृक व्यवसाय बहुत कम लोग अपनाते हुए देखे जाते हैं!...आज कोई डाक्टर का पुत्र पैतृक बल पर ‘‘स्टैथिसकोप’’ रखकर रोगियों पर शासन जमा बैठे तो फिर कल्याण ही कल्याण है।... न मर्ज रहे, न मरीज। अस्तु-

उपरोक्त शीर्षक की कहानी का आधुनिक युग से गठ-बन्धन नहीं किया जा सकता।कहानी उस जमाने की है, जब पुत्र अपने पिता की सम्पत्ति, पद और ओहदा का नैसर्गिक अधिकारी होता था। राजा का कितना ही निकम्मा-कायर-बुजदिल पुत्र क्यों न हो- बादशाह बनकर गद्दी पर बैठेगा। राज्य के पुरोहितजी के पुत्र महाशय को चाहे काला अक्षर भैंस बराबर हो, पर वे बनेंगे राज्य-विप्र ही।

प्रमुख राज्य मंत्री सुमतिचन्द्र की मृत्यु के उपरान्त कुलिंग देश की बराबर नगरी के अधिपति चन्द्रकीर्ति ने उसके सुपुत्र को बुला भेजा।भद्रकुमार के दरबार में जाने के पूर्व ही उनकी माँ समझाने लगीं-‘‘बेटा भद्र! राज दरबार में अदब से जाना, ओहदे का ख्याल करना’’! पर सिखाये पूत कहाँ तक स्वर्ग जावेंगे!

भद्रकुमार राज-दरबार पहूँचे। अभी तक सोलह बसन्त उन्होंने पार किये थे। उनमें से बारह बसन्त तो खेल-खूद और पिताश्री की गोद में व्यतीत हुए थे। चार बसन्त जरूर घर का काम किया था। पर पिताजी ने तो घर के ढेर सारे पशुओं की गिनती और उनके देखरेख का काम उन्हें सौंपा था। दरबार के सभ्य वार्तालाप को कुछ समय तक पशुओं के स्वरों से मिलाते रहे और अन्त में कुछ न समझ कर एक कोने में दुबक रहे। राजा ने पूछा-‘‘भद्रकुमार! पिताजी के मंत्रित्व पद का भार वहन कर सकोगे?’’

भद्रकुमार ने उत्तर दिया-‘‘राजन्! मेरी माँ भी कहती थी कि तुम्हें मंत्री बनना चाहिये।’’ और, तब!

दरबारियों की हँसी सुनकर राजा ने कहा-‘‘भद्रकुमार! बिना ज्ञान के कैसे तुम यह गुरुतर कार्य कर सकोगे?’’ मनुष्य अपने को अधिक नहीं छिपा सकता।कितना ही अपने को दिखाये पर वार्तालाप उसके ज्ञान का भंडाभोड़ कर देती है।अन्त में भद्र बोला-‘‘राजन् ! मैं पिताश्री की लाखों कोशिशों के बावजूद भी साहित्य और व्याकरण से कोसों दूर रहा और आज इस योग्य नहीं कि मंत्री बन सवूँ। मुझे कोई अन्य कार्य दीजिये महाराज! जिससे मैं अपनी आजीविका चला सकू।

राजा ने कहा—‘‘मूर्खों को मेरे दरबार में स्थान नहीं।यदि यहाँ स्थान चाहते हो तो अध्ययन करना आवश्यक है भद्र!’’ तुलसी, सूर वाल्मीकि आदि जितने महान् पुरुष हुए सभी तो फटकार सुनकर एक प्रशस्त पथ की ओर बढ़े।भिखारी हो या बादशाह अपनी निन्दा वरदाश्त नहीं कर सकता। भद्रकुमार भी।निंदा का जहरीला कडवा घूंट पीकर एक मार्ग की ओर बढ़ चले और दुनियाँ से ऊब कर नग्न दिगम्बर मुनिराज की सेवा में जा उपस्थित हुए। चरण-रज माथे पर लगाकर विनयावनत हो बोले-‘‘भगवान् ! मुझे ज्ञान दो! जिससे मैं अपने पिता के मंत्रित्व पद को पा सकू।’’ और तब दयालु मुनिराज ने उपदेश किया-मिथ्यात्व को छोड़कर सम्यक्त्व की ओर पयान करो वत्स! जिनेन्द्र और जिनेन्द्र वचनों में विश्वास करो और इसके साथ ही महाप्रभावक भक्तामर जी का १८वाँ श्लोक पढ़कर सुनाया और कहा-इस श्लोक का इसकी ऋद्धि मंत्र सहित प्रतिदिन जाप्य व पाठ करने से तुम्हारे मनोरथ की सिद्धि होगी।

भद्र परिणामी भद्रकुमार तीन दिन तक लगातार जिन आराधना में लगे रहे, अन्त में जिनशासन की अधिष्ठात्री ‘वङ्काादेवी’ को सामने प्रकट होते देखा।

देवी ने कहा-’’ आप की अनुचरी हूँ-आज्ञा प्रदान कीजिये।’’ भद्रकुमार ने कहा-वरदान दीजिये कि मैं विद्धान बनूँ।

पाठक ! आगे के वृतान्त से परिचित हो ही गये होंगे। दरबार में राजा ने उसके इतनी जल्दी विद्वान होने का कारण पूछा। विनयावन्त हो भद्र बोले-राजन् जैन-धर्म के प्रभाव से बड़ी-बड़ी ऋद्धियाँ और महान् ज्ञान प्राप्त होता है फिर इस शास्त्रीय ज्ञान की क्या गणना है?