साधु के २८ मूलगुण

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साधु के २८ मूलगुण

(अन्तर-ग्रंथों में)
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मूलाचार में २८ मूलगुणों के नाम-

पंचय महव्वयाइं समिदीओ पंच जिणवरुद्दिट्ठा।

पंचेविंदियरोहा छप्पि य आवासया लोओ[१]।।२।।

आचेलकमण्हाणं खिदिसयणमदंतघंसणं चेव।

ठिदिभोयणेयभत्तं मूलगुणा अट्ठवीसा दु।।३।।

अर्थ - पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रियों का निरोध, छह आवश्यक, लोच, आचेलक्य, अस्नान, क्षितिशयन, अदन्तधावन, स्थितिभोजन और एकभक्त ये अट्ठाईस मूलगुण जिनेन्द्रदेव ने यतियों-मुनियों के लिए कहे हैं।।२-३।। जिनसहस्रनाम स्तवन (पं. आशाधरविरचित) की प्रस्तावना में साधु परमेष्ठी के २८ मूलगुण भिन्न प्रकार से हैं- साधु परमेष्ठी के २८ गुण- दस सम्यक्त्वगुण, मत्यादि पाँच ज्ञानगुण और तेरह प्रकार का चारित्र, ये साधु के २८ गुण माने गए हैं। इनमें से सम्यक्त्व के दस गुण इस प्रकार हैं-

  1. आज्ञा सम्यक्त्व
  2. मार्ग सम्यक्त्व
  3. उपदेश सम्यक्त्व
  4. सूत्र सम्यक्त्व
  5. बीज सम्यक्त्व
  6. संक्षेप सम्यक्त्व
  7. विस्तारसम्यक्त्व
  8. अर्थ सम्यक्त्व
  9. अवगाढ़ सम्यक्त्व
  10. परमावगाढ़ सम्यक्त्व ।

मतिज्ञानादि पाँच ज्ञानगुण और पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिरूप तेरह प्रकार का चारित्र सर्वविदित ही है।

टिप्पणी

  1. मूलाचार पूर्वार्ध पृ. ५।