15 सितम्बर 2018 दशलक्षण धर्म के प्रवचन

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मांगीतुंगी सिद्धक्षेेत्र में उमड़ रहा है भक्तों का सैलाब- पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने प्रात:कालीन मंगल सभा में लाखों भक्तों को मार्दव धर्म का महत्व बताया। माताजी ने कहा भव्यात्माओं! दशलक्षण पर्व का आज दूसरा दिन है, मार्दव धर्म-मृदुता का भाव कोमलता का भाव मार्दव धर्म कहलाता है। यहाँ मान अहंकार का गलन होता है, विनय गुण प्रकट होता है। यही मार्दव धर्म की पहचान है। संसार की समस्त वस्तुएँ क्षणिक है, लेकिन इनको क्षणिक विनश्वर जानकर मान नहीं करना मार्दव गुण कहलाता है। पूज्य बड़ी माताजी ने कन्नड़ की १२ भावना में बनार्ई है, उसमें कहा है राजाओं का वैभव देवों का विमान, ऐश्वर्य, बल, आज्ञा का पालन ये सभी निमिष मात्र में क्षण हो जाते हैं। जैसे आकाश में बिजली एक क्षण के लिए चमकती है और नष्ट हो जाती है। उसी प्रकार से इस संसार में सारी वस्तुएँ नष्ट होने वाली है, हे प्राणियों तुम सतत पालन करो साधना करो, जिससे मुक्ति की प्राप्ति एक दिन हो सकती है। रावण जैसे अर्धचक्र्री का भी मान नहीं रहा। अगर हमारे अंदर मृदुता है तो हम हर जगह श्रद्धा के पात्र बन सकते हैं। जैसे आदिवासी भील ने एक साधु का सान्निध्य पाकर नियम लेकर उसने कौएं के मांस का त्याग कर दिया। वह मरकर मगध सम्राट श्रेणिक बन गया, जिन्होंने भगवान के समवसरण में जाकर ६० हजार प्रश्न किए।

पूज्य चंदनामती माताजी ने मृदुता धर्म के ऊपर चेतन और अचेतन के बारे में सुंदर कविता में बताया है कि- जंगल में चलते-चलते एक पथिक को मिल गई पगडंडी पहाड़ की। पथिक ने चढ़ना शुरू किया पहाड़ पर। थोड़ी दूर चलकर पूछता है अरे पर्वत देख मैं तेरी छाती को रौंद्र रहा हूँ। तुझे अपनी चोटे सौंपे रहा हूँ। सुनकर पथिक को अपने प्रति दया आई, स्मरण हो आई पथिक को अपनी पुरी यादें-मैं सदा से अपनी छाती से चोट सहकर हर पर्वतारोही को ऊपर तक पहुँचा रहा हूँ। सभी को उसकी मंजिल दिला रहा हूँ। इस पथिक को भी ऊपर तक पहुँचाऊंगा, इसे विनय सिखलाऊँगा। कठोर रहकर भी झुकना सिखाऊँगा, बड़े होकर भी चोट सहना सिखाऊँगा। वह बोला सुन मेरे नादान बच्चे-

मुक्तक-जो पर्वत चोट सहता है, वही तो पूज्य बनता है।
जो पत्थर चोट सहता है, वही तो मूर्ति बनता है।
अरे देखो ऋषभगिरि पर जो सबसे ऊँची मेरत है।
वह जिनशासन की युग-युग तक बन गई सच्ची कीरत है।
अगर वह चोट न सहती, तो वैâसे दर्श हम पाते।
शिल्पी के हाथ में जाकर कड़ा भी नरम हो जाता है।

सोचता है पथिक सच तो कह रहा है, जिसे कठोर समझ रहा था, वह तो है नरम-नरम। स्वादिष्ट भोजन खाकर भी कड़क बात कठोर बात बोलता हूं, अपनी वाणी को नहीं तोलता हूँ। पथिक ने पर्वत से कहा-हे मेरे शिक्षक पर्वतराज! तुमने बताई आज पते की बात। अब मैं मृदु बनूँगा, कोमलता को धारण करूँगा। अपने मधुर व्यवहार से शत्रु के दिल को जीतूँगा। हे भाई-अब मैंने यह जान लिया है सकारात्म्क सोच बनाएंगे, सकारात्मक बनेंगे अपनी सोच को पासिटिव बनायेंगे। मृदुता भाव धारण करके मनुष्य सारे गुण पा लेते हैं।

आज भारतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सर्वप्रथम उत्तम मार्दव धर्म की जाप्य सभी भक्तों से करवाई। ॐ ह्रीं उत्तम मार्दव धर्मांगाय नम:। उत्तम मार्दव धर्म क्या है-मृंदोर्भाव: मार्दव: अर्थात् मृदुता का भाव मृदुता है। यह मार्दव धर्म मानरूपी शत्रु का मर्दन करने वाला है, यह आठ प्रकार के मद से रहित होता है और चार प्रकार के विनय से सहित होता है। रावण भी एक दिन मान के वश में आकर नष्ट हो गया। इसलिए मान का त्याग सभी को करना चाहिए। इसके पश्चात् माताजी ने गौतम गणधर वाणी जो चतुर्थकालीन वाणी हैं, आज दूसरी अध्याय में पूज्य माताजी ने कृतिकर्म विधि बताई-अहोरात्र के नित्य के साधुओं के २८ कृतिकर्म होते हैं। १ कृतिकर्म में २ प्रणाम, १२ आर्वत, ४ शिरोनति होती है। माताजी ने विस्तार से कृतिकर्म पर प्रकाश डाला है। माताजी ने सभी को प्रेरणा दी, इसको सीखना जैन समाज के लिए आवश्यक है। यही मेरी प्रेरणा और मंगल आशीर्वाद है।