15 - लेश्या मार्गणासार

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लेश्या मार्गणासार

लेश्या का लक्षण—जो आत्मा को पुण्य पाप से लिप्त करे ऐसी कषायोदय से अनुरक्त योग (मन, वचन काय) की प्रवृत्ति लेश्या है।

लेश्या के दो भेद हैं—द्रव्यलेश्या, भावलेश्या। द्रव्यलेश्या शरीर के वर्णरूप है और भावलेश्या आत्मा के परिणामस्वरूप है। लेश्या के छह भेद हैं—कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म, शुक्ल। इनके अवांतर भेद असंख्यात लोक प्रमाण हैं।

द्रव्यलेश्या का वर्णन—वर्ण नामकर्म के उदय से जीव के शरीर का वर्ण द्रव्यलेश्या है। सम्पूर्ण नारकी कृष्ण वर्ण हैं। कल्पवासी देवों की द्रव्यलेश्या, भावलेश्या सदृश है। भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी, मनुष्य, तिर्यंच इनकी द्रव्य लेश्या छहों हैं। विक्रिया से रहित देवों के शरीर छहों वर्ण के हो सकते हैंं। उत्तम भोगभूमियों-उत्तर कुरु के मनुष्य तिर्यंचों का वर्ण सूर्य के समान, मध्यम भोगभूमि-हरि-रम्यक् वालों का चंद्र के समान, जघन्य भोगभूमि-हैमवत-हैरण्यवत् वालों का हरित वर्ण है।

भावलेश्या का वर्णन—अशुभ तीन लेश्या में तीव्रतम, तीव्रतर और तीव्र ये तीन स्थान होते हैं। शुभ लेश्या में मंद, मन्दतर, मन्दतम ये तीन स्थान होते हैं।

कृष्णलेश्या—तीव्र क्रोधी, वैर न छोड़े, युद्धाभिलाषी, धर्मदया से शून्य, दुष्ट और किसी के वश में न होवे यह कृष्णलेश्या के लक्षण हैं।

नीललेश्या—काम करने में मंद हो, स्वच्छंद हो, विवेक, चतुरता रहित हो, इंद्रियलम्पट, मानी, मायाचारी, आलसी हो, गूढ़ अभिप्रायी, निद्रालु, वंचक, विषयों का लोलुपी हो ये सब नीललेश्या के लक्षण हैं।

कापोतलेश्या—दूसरे पर क्रोध करना, निंदा करना, दु:ख देना, वैर करना, शोकाकुलित रहना, भयग्रस्त होना, दूसरों के ऐश्वर्यादि को न सह सकना, दूसरे का तिरस्कार करना, अपनी प्रशंसा करना, स्तुति में संतुष्ट होना आदि इस लेश्या के लक्षण हैं।

पीतलेश्या—अपने कार्य-अकार्य, सेव्य-असेव्य को समझना, सबके विषय में समदर्शी होना, दया और दान में तत्पर होना, मन वचन काय से कोमल परिणामी होना ये सब पीतलेश्या के चिन्ह हैं।

पद्मलेश्या—दान देने वाला हो, भद्र परिणामी, उत्तम कार्य करने का स्वभावी हो, कष्टरूप व अनिष्ट उपसर्गों का सहन करने वाला हो, मुनिजन, गुरुजन की पूजा में प्रीतियुक्त हो ये सब पद्मलेश्या के लक्षण हैं।

शुक्ललेश्या—पक्षपात न करना, निदान को न बाँधना, सब जीवों में समदर्शी होना, इष्ट से राग अनिष्ट से द्वेष न करना, स्त्री, पुत्र आदि में स्नेह रहित होना ये सब शुक्ललेश्या के लक्षण हैं।

किस लेश्या वाले के कैसे भाव होते हैं इसका दृष्टांत से स्पष्टीकरण—

कृष्णादि लेश्या वाले छह पथिक वन में मार्ग भूल जाने से एक फलों के भार से युक्त वृक्ष के पास जाकर इस प्रकार क्रिया करते हैं।

कृष्ण लेश्या वाला इस वृक्ष को जड़ से उखाड़कर फल खाने का इच्छुक होकर वृक्ष को जड़ से काटने लगा। नीललेश्या वाला वृक्ष के स्कंध को काटकर फल खाने का इच्छुक हो स्कंध काटने लगा। कापोतलेश्या वाला बड़ी-बड़ी शाखाओं को काटकर फल खाने लगा। पीतलेश्या वाला छोटी-छोटी शाखाओं को काटकर फल लेकर खाने लगा। पद्मलेश्या वाला फलों को वृक्ष से तोड़कर खाने लगा और शुक्ललेश्या वाला वृक्ष से स्वयं टूट कर पड़े हुए फलों को उठाकर खाने लगा। इस प्रकार से लेश्या के और भी उदाहरण समझना।

लेश्याओं का काल—सभी लेश्याओं का जघन्य काल अंतर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल तैंतीस सागर आदि है।

लेश्याओें के छब्बीस अंश और आयुबंध का अपकर्ष काल छहों लेश्याओं के जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट भेद की अपेक्षा अठारह भेद होते हैं। इनमें आठ अपकर्षकाल संबंधी अंशों के मिलाने पर छब्बीस भेद हो जाते हैं। जैसे—किसी कर्मभूमिया मनुष्य की भुज्यमान१ आयु का प्रमाण ‘‘छह हजार पाँच सौ इकसठ’’ वर्ष है। इसके तीन भाग में से दो भाग के बीतने पर और एक भाग शेष रहने पर, इस एक भाग के प्रथम समय से लेकर अंतर्मुहूर्त पर्यंत प्रथम अपकर्ष काल कहा गया है। इस अपकर्षकाल में परभव संबंधी आयु का बंध होता है। यदि यहाँ आयु न बंधी तो अवशिष्ट आयु के तीन भाग में से एक भाग शेष रहने पर दूसरा अपकर्ष काल आता है। यदि यहाँ भी आयु न बंधी तो शेष आयु के तीन भाग में से शेष एक भाग के रहने पर अपकर्षकाल आता है। यदि यहाँ भी न बंधी तो ऐसे ही चौथे, पाँचवें, छठे, सातवें, आठवें अपकर्ष में से परभव संबंधी आयु का बंध होता है। यदि इन आठ अपकर्ष कालों में से किसी में भी बंध न हुआ तो भुज्यमान आयु के अंतिम आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल से पूर्व के अन्तर्मुहूर्त में अवश्य ही आयु का बंध होता है यह नियम है। अगली आयु के बंध के बिना मरण असंभव है।

इन आठ अपकर्ष काल में से किसी में भी लेश्याओं के आठ मध्य- मांशों में से जो अंश होगा उसके अनुसार आयु का बंध होगा, अपकर्ष काल में होने वाले लेश्याओं के आठ मध्यम अंशों को छोड़कर बाकी के आठ अंश चारों गतियों के गमन के कारण होते हैं। यह सामान्य कथन है। शुक्ललेश्या के उत्कृष्ट अंश से संयुक्त जीव मरकर नियम से सर्वार्थसिद्ध को जाते हैं।

विशेष—कर्मभूमियाँ मनुष्य और तिर्यंच के लिये आयु के तीन भाग में से एक भाग शेष रहने पर ही आयु बंध के कारणभूत आठ अपकर्ष काल होते हैं। देव, नारकियों के आयु का छह महिना शेष रहने पर आठ अपकर्ष काल आते हैं। भोगभूमिया मनुष्य या तिर्यंच के आयु के नौ महीना शेष रहने पर ये आठ अपकर्ष काल आते हैं। इस प्रकार लेश्याओं के ये आठ अंश आयु बंध के कारण कहे गये हैं।

सिद्ध भगवान द्रव्यभाव लेश्या से रहित हैं—

जो कृष्णादि छहों लेश्याओं से रहित हैं अत: पंचपरिवर्तनरूप संसार समुद्र के पार हो गये हैं, अतीन्द्रिय, अनंतसुख से तृप्त, आत्मोपलब्धि रूप सिद्धपुरी को पहुँच चुके हैं वे अयोेगीकेवली या सिद्ध भगवान हैं।

लेश्याओं के प्रकरण को समझकर अशुभ लेश्या से बचकर शुभ लेश्या को धारण करते हुए लेश्यारहित शुद्धात्मा स्वरूप में स्थिर होने के लिये बार-बार प्रयत्न करना चाहिये। यह आत्मा वर्णादि से रहित शुद्ध परम स्वच्छ है। उसी का नित्य प्रति चिंतवन करना चाहिए।