16.निश्चय पंचाशत

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निश्चय पञ्चाशत्

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।।ग्यारहवाँ अधिकार।। (१) जैसे हीरे के मध्य भाग में जल प्रवेश नहिं कर सकता। बाहरी भाग में रह जाता चेतन का भी स्वरूप वैसा।। जैसे कवियों की वाणी भी बाहरी भाग में रह जाती। चैतन्य तेज अति दुर्लभ है उसमें प्रवेश निंह कर पाती।। (२) चैतन्य तेज का सब प्राणी मन से चिंतवन न कर सकते। जो तन से है सर्वथा भिन्न वचनों से भी नहिं कह सकते।। है मात्र स्वानुभवगम्य तेज हम सबकी रक्षा सदा करे। इसको योगी ही पा सकते हम सबसे यह है बहुत परे।। (३) धन धान्य शरीरादिक पदार्थ में जब तक मोह लगा रहता। तब तक प्राणी चैतन्य तेज का अनुभव कभी न कर सकता।। लेकिन जिस समय शरीरादिक से मोह ममत्व छूट जाता। उत्कृष्ट तेज का अनुभव कर सुखसागर में गोता खाता।। (४) जिस अंधकार को सूर्य चंद्र आदिक भी नष्ट न कर सकते। ऐसे मोहान्धकार को झट गुरुओं के वचन नष्ट करते।। इस लोक में ऐसे उत्तम गुरु को नमस्कार मैं करता हूँ। गुरुओं के जगद्गुरू को मैं अपने मस्तक पर धरता हूँं।। (५) जो जीवों को है जरा मरण का दुख होता वह दुख ही है। पर विषयों में जो सुख माने वह भी सचमुच में दुख ही है। क्योंकी सच्चा सुख मोक्ष में है वह मोक्ष बहुत दुख से मिलता। सुखिया जीवन से मोक्ष न हो तप करने से ही सुख मिलता।। (६) चिरकाल से जिनको सुना और जाना जिनको अनुभवन किया। ऐसी समस्त विकथा आदिक सब सुलभ रीति से प्राप्त किया।। पर मुक्ति के हेतू शुद्ध आत्मज्योती का मिलना दुर्लभ है। क्योंकी न इसे जाना समझा इसलिए प्रयत्न करो सब है।। (७) आत्मा तो है अत्यन्त गहन उसका वर्णन नहिं कर सकते। क्योंकी जिसका है ज्ञान नहीं उसको कैसे हम कह सकते।। फिर अनुभव भी कैसे होगा जिसका वर्णन और ज्ञान नहीं। इसलिए आत्मा का बोध और वर्णन अनुभव सब दुर्लभ ही।। (८) आत्मा है एक अखण्ड वस्तु इसके नहिं कोई भेद कहे। अज्ञानीजन को समझाने में नय व्यवहार प्रयोग करें।। निश्चयनय कर्मों को नशता इसलिए मुक्ति में कारण है। उस निश्चयनय को कहने में मुक्ती की इच्छा कारण है।। (९) जो वस्तू जैसी है वैसी उसको ना माने अभूतार्थ। व्यवहार नयाश्रित जीव कभी नहिं कर सकते हैं मोक्ष प्राप्त।। निश्चयनय से जो भी पदार्थ जैसा है वैसा ही माने। सत्यार्थभूत निश्चयनय से मुनि मोक्ष परम पदवी पावें।। (१०) निश्चयनय से जो तत्व कहे वचनों से न उनको कह सकते। व्यवहारनयापेक्षा वचनों से उनका वर्णन कर सकते।। गुणपर्यायादिक विवरण से उनकी पर्यायें बहुत कहीं। जिस तरह वृक्ष है एक मगर उसकी शाखाएं बहुत कहांr।। (११) व्यवहार से ही निश्चयनय है इसलिए उसे भी पूज्य कहा। क्योंकी कुछ भी समझाने में होता व्यवहार प्रयुक्त वहाँ।। नहिं जनम से होते हैं कोई, सब बुद्धिमान जग में प्राणी। उपदेशादिक बल के द्वारा समझाता है उसको ज्ञानी।। (१२) आत्मा में निश्चय बोध और स्थितीरूप रत्नत्रय है। संसार नाश में हेतु कहे निंह इससे पृथक और कुछ है।। जिन भव्य जीव की बुद्धी इस भूतार्थ मार्ग में स्थित है। उन भवि जीवों की आत्मा ही रत्नत्रय स्वरूप में चित है।। (१३) परमात्मा के आराधक को रत्नत्रय प्राप्त स्वत: होते। ये आत्मा के ही अखंड रूप आत्मा से भिन्न नहीं होते।। इस रत्नत्रय की प्राप्ती से कृतकृत्य सभी हो जाते हैं। करने को रहा न कुछ बाकी तब वे ही आप्त कहाते हैं।। (१४) जैसे अग्नी में उष्णपना आत्मा में ज्ञान स्वभावी है। ऐसी जो दृढ़प्रतीति रखते वे ही तो सम्यग्दृष्टी हैं।। और आत्मा का जो ज्ञान वही तो सम्यग्ज्ञान कहाता है। इन दोनों की जो आत्मा में स्थिति चारित्र कहाता है।। (१५) जैसे कोई अभ्यास करे बाणों से लगा निशाने को। पर सफल तभी समझा जाता वह बाण छेद दे बैरी को।। बस उसी तरह शुद्धात्म रूप संग्राम में सफल वही होता। जो दर्शन आदिक बाणों से कर्मारी को परास्त करता।। (१६) पंचेन्द्रिय हिंसा का त्यागी वन में रह रहा अकेला हो। तरु के समान स्थिर रहकर उपसर्ग सहे अलबेला हो।। पर जब तक सम्यग्ज्ञान नहीं वह सिद्ध नहीं बन सकता है। इसलिए सिद्धपद के इच्छुक को केवलज्ञान भी तजता है।। (१७) जो पुरुष शुद्ध निश्चयनय में अवलम्बन करने वाला है। वह जल में पड़े कमल दल सम जल से अस्पृष्ट निराला है।। जो आत्मा को अस्पृष्ट अबद्ध कर्मों से भिन्न देखता है। अविशेषी आत्मा है ऐसा निश्चय से सही देखता है।। ।।दृष्टांत समयसार कलश का।। स्वपर भेद विज्ञान से सिद्ध हुए जो जीव। स्वपर भेद विज्ञान बिन बंधे हुए कुछ जीव।।१।। (१८) जैसे सुवर्ण से स्वर्णपात्र लोहे से लोहपात्र बनता। पर दोनों में जो कारण है बस उसी प्रकार कार्य होता।। बस इसी तरह शुद्धात्मा का जो ध्यान शुद्ध आत्मा लभता। और अशुभ ध्यान से मनुजों को आत्मा अशुद्ध ही है मिलता।। (१९) जब तक नहिं सूर्य उदित होता रात्री का अंधकार रहता। बस उसी तरह इस आत्मा को तब तक संसार भ्रमण रहता।। जब तक रत्नत्रय प्राप्ति न हो संसार भ्रमण नहिं रुकता है। जिस समय शुद्ध रत्नत्रय की प्राप्ती हो अजन्मा बनता है।। (२०) इस आत्मभूमि में कर्म बीज से चित्त तरू में फल लगते। संसार रूप फल से जो जन छुटने की इच्छा हैं रखते।। इसलिए मुमुक्षू को चहिए इस भेदज्ञान की अग्नि से। उस चित्त तरू को भस्म करे आचार्य कहें सब भविजन से।। (२१) जिस तरह फिटकरी के द्वारा गंदा जल साफ किया जाता। वैसे ही भेदज्ञान से इस आत्मा से कर्म नशा जाता।। यद्यपि ज्ञानावरणादि कर्म आत्मा को मलिन कर रहे हैं। जिनको है स्व-पर भेदज्ञान वे इनसे बिल्कुल भी नहिं डरते हैं।। (२२) इस जग में सबसे ज्यादा प्रिय अपना ही सुत समझा जाता। फिर जब वे ही दुख देते हैं तो वैरी से कैसा है नाता।। बस उसी तरह जग में सबसे ज्यादा प्रिय है अपना शरीर। जब वह ही दुख देने वाला तो बाह्य वस्तु से क्यों अधीर।। (२३) व्याधी शरीर को नशती है आत्मा को नष्ट नहीं करती। आकाश द्रव्य निंह जलता है बाहर की कुटिया है जलती।। इसलिए रोग के आने पर ज्ञानी ना कभी विषाद करें। आत्मा तो अर्मूितक है उसका रोगादिक नहीं बिगाड़ करें।। (२४) मैं निर्मल ज्ञानस्वरूपी हूँ बस क्षुधा तृषा आदिक दुख है। निश्चयनय से न शरीर मेरा ये सब शरीर के ही दुख हैं।। यदि कर्म असाता के कारण जो दुख शरीर में होते हैं। उन सब बाधा से रहित हूँ मैं सब तन के आश्रित होते हैं।। (२५) आत्मा स्वभाव से नहिं क्रोधी नहिं मानी आदिक होता है। कर्मों के बंधन से आत्मा क्रोधी मानी हो जाता है। जैसे सफेद स्फटिक मणी के निकट रखा हो लाल पुष्प। तो लाल रंग की दिखती है वरना स्वभाव से श्वेत शुद्ध।। (२६) जिस तरह मलिन मुख के संयोग से दर्पण नहीं मलिन होता। वैसे ही कर्मों के विकल्प से आत्मा नहीं विकल होता।। वह दर्पण के समान सुन्दर और स्वच्छ बना ही रहता है। मेरी आत्मा है शुद्ध रूप कोई विकार नहिं रहता है।। (२७) स्त्री पुत्रादिक बाह्य वस्तु ये सब तो मुझसे भिन्न सही। क्योंकि जब मेरी प्रिय वस्तू मेरा तन वचन विकल्प नहीं।। कर्मों के द्वारा करी गई सारी उपाधियों से विरहित। कुछ भी निंह मेरा है जग में मैं हूँ विशुद्ध अरु कर्म रहित।।

(२८) कर्मों से जनित सुक्ख दुख में मोही अति हर्ष विषाद करे। जो ज्ञानी पुरुष कर्म अरु उनके कार्य को अपना नहिं माने।। ये कर्म और उनसे सुख दुख जड़ वस्तु सभी कहलाती है। मैं चेतन हूँ सर्वथा भिन्न मुझसे सब वस्तु कहाती है।। (२९) जब तक कर्मों के सुख दुख को अपना मानेगा ये प्राणी। तब तक वह सुखी नहीं होगा जग में भटकेगा वो प्राणी।। लेकिन कर्मों के कार्यों को जो अपना नहीं मानते हैं। तब वही मुमुक्षू जन सब जग में परम सुखी हो जाते हैं।। (३०) कर्मों के द्वारा राग द्वेष सुख दुख आदिक जो कार्य कहे। कर्मों के द्वारा कत्र्ता है आत्मा से कत्र्ता नहीं कहे।। मेरी आत्मा अत्यन्त शुद्ध और निर्मल ज्ञान का धारी है। अरु सभी उपाधी से विरहित कर्मों की कही उपाधी हैं।। (३१) जो मनुज धतूरा खा लेता उसको पत्थर सोना दिखता वैसे ही जो मनुष्य मोही हित अहित का ज्ञान नहीं रहता।। उसको धन धान्य पुत्र स्त्री सब जड़ पदार्थ अपने दिखते। निश्चय से बाह्य विकृती है आत्मा का नहिं संबंध इनसे।। (३२) निश्चयनय से मैं एक तथा सब चिंताओं से रहित हूँ मैं। ऐसा मुमुक्षु चिंतन करते चिंता के दुख से रहित हूँ मैं।। चिंता से कर्म बंध होते कर्मों से जन्म मरण होता। ये चिंता दूजी वस्तु की है पर की चिंता से दुख होता।। (३३) जैसी जैसी चिंता होती सब कर्मबंध करने वाली। मुझको चिंता से मतलब क्या मैं मुक्तिमार्ग का अभिलाषी।। मैं तो हूँ सदा एक मुझको नहिं पर से कोई प्रयोजन है। दोनों ही चिंता से होता प्राणी को सदा भव भ्रमण है।। (३४) यदि मन परद्रव्य नहीं होता तो कर्म विकार नहीं करते। पर मन तो है सर्वथा भिन्न ज्ञानादिक गुण विनष्ट करते।। उन दोनों को कैसे अपना मानूँ मैं तो विकार विरहित। मैं निर्मलज्ञान का धारी हूँ मेरी आत्मा सब कर्म रहित।। (३५) सब चिंता है त्यागने योग्य जब ऐसी बुद्धी होती है। उस बुद्धि से हो तत्व प्रगट चैतन्य की वृद्धी होती है।। जैसे चंद्रमा उदित होने से सागर वृद्धि को प्राप्त करे। वैसे ही तत्त्वज्ञान से ही आत्मा वृद्धी को प्राप्त करे।। (३६) जो आत्मा कर्म विकारों से र्नििलप्त वही चैतन्य हूँ मैं। उसके नहिं जन्म मरण होते इसलिए सदा निश्चित हूँ मैं।। (३७) रे आत्मा यदि तू बंधा हुआ तो इसमें कृपा कर्म की है। यदि मन को तू वश में कर ले संदेह नहीं छूटा ही है।। (३८) जग का दुख बड़ा क्षुधा दुख है हे पथिक ग्रहण कर अमृत फल। जिससे यह भूख शांत होती रे मन तू व्यर्थ विषाद न कर।। मानवरूपी तरु के नीचे जो विषयभोग सुख की छाया। तू क्यों संतुष्ट हुआ बैठा जग दुखों का घर कहलाया।। (३९) सब दोषरहित मुनियों का चित र्नििवकल्प मार्ग में गमन करे। उस समय सभी अज्ञानादिक अंधियारा मन का दूर करें। जैसे सूरज जब गमन करे बादल समूह नहिं ढके उसे। तब अंधकार नश जाता है राहू भी जब नहिं ग्रसे उसे।।

(४०) इस कर्म मोम को तनरूपी मूसा के भीतर भर देवें। नीचे से सम्यग्ज्ञान रूप अग्नी से उसे तपा देवे।। तब कर्म सभी जल जायेंगे बस आत्मा ही रह जायेगा। उस आत्मा को ध्याके योगी सिद्धात्मा पद को पायेगा।। (४१) मैं ही चैतन्य स्वरूप तथा मेरे चित्रूप का आश्रय मैं। निंह उनसे भिन्न स्वरूप मेरा और निंह आश्रय हैं मेरे वे।। क्योंकी वे जड़ हैं उसमें मेरी प्रीति कभी नहिं हो सकती। चैतन्य में की हुई प्रीति ही मुझको सच्चा सुख दे सकती।। (४२) जिस समय आत्मा में स्व पर का भेदज्ञान हो जाता है। जो त्याग योग्य है त्याग करे तब आत्मरूप को पाता है।। उस क्षण स्वाभाविक ज्ञानरूप में ही चैतन्य ठहर जाता। और स्वयंबुद्ध होकर आत्मा सिद्धालय में जाकर बसता।। ।।इसी श्लोक का समयसार के श्लोक द्वारा वर्णन।। (४३) चेतन आत्मा और जड़ शरीर उनके विभाग को करने से। आत्मा का ज्ञान स्वभाव तथा रागादिभाव होते तन के।। इसको जो भलीभाँति जाने उनके ही भेदज्ञान होता। और वही भव्य आत्मा को लख पर से संबंध रहित होता।। (४४) पर तत्त्व हेय है अरु चैतन्यस्वरूप स्वतत्त्व है उपादेय। इस स्व पर विवेक भावना से जो रहित कहा है वही ज्ञेय।। क्योंकी जिस समय शुद्ध निश्चय नय का आश्रयण किया जाता। उस ही निकलंक अवस्था में कोई विकल्प नहिं रह जाता।। (४५) यद्यपि शास्त्रों में परम शुद्ध आत्मा का वर्णन किया गया। और उस परमात्म तत्व को भी मन से भी स्वीकृत किया गया।। फिर भी मन होता सवीकल्प निंह भलीभाँति कुछ जान सके। आत्मा होती है र्नििवकल्प इसलिए नहीं पहचान सके।। (४६) मैं हूँ बस एक अकेला ऐसी बुद्धी ही अद्वैत कही। कर्मों से सहित हूँ जो बुद्धी वह बुद्धि कही है द्वैत बुद्धि।। इन दोनों में अद्वैत बुद्धि मुक्ती का कारण कही गयी। और द्वैत बुद्धि भव की कारण आचार्यों द्वारा कही गयी।। (४७) मैं बंधा हुआ हूँ तथा मुक्त ऐसा निश्चय से द्वैत कहा। ऐसा जो जीव मुक्त होना चाहे निंह करे विकल्प कहा।। जिस समय द्वैत अद्वैत भाव का पूर्ण त्याग हो जाता है। उस समय मुक्ति मिल जाती है और सिद्ध अवस्था पाता है।। (४८) जो भूत भविष्यत के विकल्प से भाया हुआ रहित चित है। उन भावों से चैतन्यात्मा का चित परमानंदाकर है।। (४८) जो जीव आत्मा को कर्मों से बंधा हुआ है देख रहा। वह बंधा हुआ ही रहता है अरु जो जन मुक्त हैं देख रहा।। वह मुक्त आत्मा होती है जैसे जब पथिक गमन करता। जिस पुर को वो जाना चाहे वह ही गंतव्य उसे मिलता।। (४९) हे मन ! तू भीतर अरु बाहर मत गमन करो ऐसा कहते। समातरूपी जो अमृत है आनंद बड़ा है पीने में।। जिस तरह बने बस उसी तरह सारे विकल्प को तू तज दे। जिससे सारे विकार भागे मन को तू नहीं भटकने दे।। (५०) इस शास्त्र भूमि में बुद्धि नदी दौड़ती हुई वापस आती। उस समय बुद्धि नदि झट अपने चैतन्यरूप को पा जाती।। शास्त्रों में बुद्धि लगी जब तक आत्मा को प्राप्त नहीं करती। जब शास्त्र से व्यावृत हो जाती चैतन्य स्वरूप प्राप्त करती।। (५१) जो आत्मा तीनों कालों में अरु तीन जगत में व्याप रहा। एवं जो वाणी आत्मा के वर्णन में है असमर्थ सदा।। चैतन्य तेज को नमन मेरा जिससे मैं भी उसको पाऊँ। इसको अपने में अनुभव कर निज आत्मा में ही रम जाऊँ।। (५२) चैतन्य रूप को नमन करो जिसकी प्राप्ती के होने पर। मन के सारे विकल्प नशते ध्यानरूपी अग्नि से जलने पर।। जैसे वनाग्नि से वृक्ष सभी जल जाते हैं वैसे आत्मा। सारे कर्मों के नशने से बन जाती है वह परमात्मा।। (५३) चैतन्य रूप आत्मा कर्मों से बंधा हुआ और रहित भी है। यह नय विचार की विधी कही निश्चय से नय से रहित भी है।। उस समयसार शुद्धात्मा की प्राप्ती तब ही हो सकती है। जब पक्षपात से रहित शुद्ध आत्मा दोनों नय तजती है।। ।।नाटक समयसार में भी कहा है।। (५४) व्यवहार से आत्मा बंधा हुआ निश्चयनय से मुक्तात्मा है। इस तरह द्विविध जो पक्षपात इनसे विरहित जो आत्मा है।। वह तत्त्वों का सच्चा ज्ञाता और नय के पक्षों से विरहित। उसका चैतन्य ही निश्चय से चैतन्य कहा है विकल्प रहित।।

(५५) परमार्थ परम आत्मा की सेवा कर परिपूर्ण ज्ञान मिलता। वह केवलज्ञान कहा जाता उत्कृष्ट अवस्था दिलवाता।। इससे उत्कृष्ट न वस्तु कही वह समयसार कहलाता। आत्मा का सार समझने से परमात्म तत्त्व मिल जाता है। (५६) ना तो मुझमें द्रव्र्यािथक अरु पर्यार्यािथक नय का विकल्प। और नहिं प्रत्यक्ष परोक्ष रूप है प्रमाण अरु नय का विकल्प।। नाम स्थापना द्रव्य भाव निक्षेप भी नहीं हैं मुझमें। मैं परमशांत उत्कृष्ट और अनुभवगोचर चैतन्य हूँ मैं।। ।।समयसार में भी कहा है।। (५७) चैतन्य तेज के अनुभव से नय भी न उदय को प्राप्त करे। दोनों प्रमाण हैं अस्त हुए निक्षेप न जाने कहाँ चले।। अब और अधिक क्या कहे द्वैत भी नहीं दिखाई पड़ता है। सब विषयों को कसने वाला चैतन्य दिखाई पड़ता है।। (५८) जिस आत्मतत्त्व के तेज से ही सारी वस्तू जानी जाती। और आत्मतेज के दर्शन से सारी वस्तू देखी जाती।। क्योंकी जो ज्ञेय पदार्थ कहे उनमें दर्शन और ज्ञान कहा। वे आत्मरूप ही है आत्मा से भिन्न न कोई स्वरूप कहा।। (५९) अत्यन्त मनोहर किसी वस्तु में प्रीति अधिक हो जाती है। जब तक मनुष्य परमात्मा को नहिं देखे तब तक रहती है।। लेकिन जिस क्षण में आत्मा का चैतन्यरूप दर्शन होता। उस ही क्षण बाह्य पदार्थों से प्रीति का समापन हो जाता।। (६०) यद्यपि कर्मों का सभी प्राणियों से संबंध समान कहा। फिर भी ज्ञानी की आत्मा में रहते न रहे संबंध कहा।। जैसे नदि का प्रवाह सब प्राणी हेतु इक सम भय वाला। फिर भी जो चतुर तैरने में उनको नहिं भय करने वाला।। (६१) कोई मनुष्य रोहण पर्वत पर रत्न ढूंढने को जाए। और मिलने पर यह ग्रहण योग्य अथवा छोड़े विचार आए।। वैसे ही जिसे वास्तविक तत्व की प्राप्ति भाग्यवश हो जाए। तब छोड़े या फिर ग्रहण करे ऐसे विचार मन में लाए।। (६२) ज्ञानावरणादिक कर्मों से संयुक्त मेरी आत्मा तो भी। गुरुवर की कृपादृष्टि से मैं बंधन से रहित जुदा हूँ भी।। यद्यपि मैं बहुत दरिद्री हूँ गुरु के प्रसाद से लक्ष्मिवान। तप से मैं दुखी तथा फिर भी गुरुचरण कृपा से सौख्यवान।। (६३) जो कुछ मैं कार्य कर रहा हूँ वह सब कर्मों की लीला है। नहिं ज्ञान से कोई कार्य करूँ जैसे नट द्वारा खेला है। नट द्वारा खींचा हुआ सूत्र पुतली को नाच नचाता है। वैसे आत्मा कर्मों के संग प्राणी को नाच नचाता है।। (६४) श्री ‘‘पद्मनंदि आचार्य’’ कहें मैंने बस भक्ती प्रगट करी। वस्तू के गुण ने मुझको आश्रित कर शब्दों की रचना की।। कई एक शब्द मिलकर ‘‘निश्चय पञ्चाशत’’ रचना पूर्ण हुई। नहिं इसमें मेरा कोई स्वार्थ गुरुओं की भक्ती कारण ही।। (६५) सब इच्छाओं से रहित एक चैतन्यरूप मन में यदि है। तो राजलक्ष्मि तृण के समान आगे क्या कहे लाभ नहिं है।। इंद्रादि संपदाएं भी मेरे लिए काम की चीज नहीं। बस इक चैतन्य आत्मा ही सबसे उत्तम है चीज कही।।

।।इति अनित्य पञ्चाशत अधिकार।।