16. भरत ने मुनिदीक्षा धारण की

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भरत ने मुनिदीक्षा धारण की

(१९१)

भरतेश्वर मुनीभरत बनके, अब लगते पूर्ण विरागी थे।
अम्बरतज बने दिगम्बर वे, बन गये वनों के वासी थे।।
तब लिया हजारों राजागण, इनके ही साथ मुनिव्रत था।

मां वैकेयी ने भी दीक्षा ली, और गज ने धरा अणुव्रत था।।
(१९२)

सबने मिलकर श्रीरामलखन को, राजमुकुट पहनाया था।
सीता को आठ हजार रानियों, में पटरानी तभी बनाया था।।
सत्तरह हजार रानियों में, बन गयी विशल्या पटरानी।

शत्रुघ्न राज्य ले मथुरा का, सुख भोग रहे थे सब प्राणी।।
(१९३)

उस रामराज्य में स्वर्गों का, सुख उतर रहा था वसुधा पर।
खेला करते थे उस पुर में, थे साढ़े चार करोड़ कुंवर।।
सोलह हजार राजाओं से, सेवित थे चरणयुगल उनके।

इस वैभव से युत रामलखन, बैठे सिंहासन पर सुख से।।
(१९४)

आयी तब सखियों संग सीता, हे नाथ! स्वपन दो देखे हैं।
अष्टापद युगल प्रविष्ट हुआ, हे स्वामी मेरे मुख में है।।
दूसरे स्वप्न में पुष्पक विमान से, नीचे मैं गिर गयी नाथ।

इन दोनों का फल बतलाएँ, आयी हूँ लेकर यही आस।।
(१९५)

हे सीते ! सुनो प्रथम का फल, तुम शीघ्र युगलसुत माँ होगी।
पर शायद इसके साथ कोई, अनहोनी घटना भी होगी।।
पर तुम घबराओ नहीं प्रिये, शुभकार्य शांति के कर लेंगे।

हे प्रिये! दान पूजादिक से, सब शांत अशुभग्रह के होंगे।।
(१९६)

अब हर्षविषाद लिये सीता, शुभकार्यों में लग जाती है।
सुख से दिन उनके बीत रहे, पर तभी घड़ी वो आती है।।
इकदिन रघुवर ने पूछा प्रिय!, बोलो क्या तुमको जंचता है।

मैं पूर्ण करूंगा हर इच्छा, बोलो क्या रुचिकर लगता है।।
(१९७)

बोली सीता हे नाथ! यहाँ, जितने भी बने जिनालय हैं ।
उनमें सुवर्णमय पुष्पों से, अर्चना करूं इच्छा यह है।।
यह सुनते ही श्रीरामचन्द्र, सीता को लेकर साथ चले।

उत्तम पूजन सामग्री ले, जिनबिम्ब दर्श पूजा करते।।