16 सितम्बर 2018 दशलक्षण धर्म के प्रवचन

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मांगीतुंगी सिद्धक्षेेत्र में उमड़ रहा है भक्तों का सैलाब-

मांगीतुंगी ऋषभदेवपुरम् में प्रात:कालीन पारस चैनल के माध्यम से सभी देशवासी एवं दशलक्षण पर्व में पधारे भक्तगण पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ सान्निध्य में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ दशलक्षण पर्व मनाया जाता है। सुबह से लेकर शाम तक भक्तगण पुण्य अर्जित कर रहे हैं। रात्रि में पूज्य माताजी की आरती में सभी श्रावकगण झूम उठते हैं। तत्पश्चात् सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता है। पूज्य चंदनामती माताजी ने आर्जव धर्म पर बहुत ही सुमधुर वाणी से भक्तों को ज्ञानार्जन करवाया। आर्जव धर्म के विषय का शुभारंभ हुआ है। ये मन को स्थिर करने वाला है इस भव् में आर्जव धर्म को आचरण में लाओ, उसका पालन करो, इस भव में आर्जव धर्म को धारण करो। पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ने दशधर्म पुस्तक में हर एक धर्म को बहुत ही सुंदर ढंग से लिखा है। पूज्य माताजी ने सिद्धान्तचिंतामणि टीका के ३५०० पेज लिखकर दिए हैं। आर्यिका सुलोचना के समान ११ अंश की धारिणी है। माताजी कहती हैं-

ऋजुता का भाव आर्जव है, उसे कैसे धारण करें।

मन, वचन, काय को सरल बनाओ ,क्योंकि कुटिलता से तिर्यंच योनि की प्राप्ती होती है।

हे नाथ मेरे स्वामी आपसे वरदान एक चाहूँ।

ऋजुता हृदय में लाकर आर्जव धर्म निभाऊँ।

अनमोल इस रतन को अब न गवाने पाऊँ।

हमने जब क्षमा धारण कर ली, परिणामों में मृदुता धारण की, हे प्राणी सरलता को धारण करो, कुटिलता को छोड़ो।

णमोकार मंत्र का अपमान करने वाले सुभौम चक्रवर्ती ने मन में कुटिलता लाकर अपनी नरक आयु का बंध कर लिया। वह छह खण्ड का स्वामी था, उसने अपने मन पर विजय नहीं प्राप्त कर पाई थी। हम सभी लोग जिनेन्द्र भगवान से यही प्रार्थना करते हैं , आपकी स्तुति करते हैं कि हमारे परिणाम कुटिल न हों, सरल परिणाम हो, यही भावना करते हैं।

तत्पश्चात् गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी ने मंत्रोचारण करवाया|एवं आर्जव धर्म पर प्रकाश डाला |पुनः माताजी ने गौतम गणधर वाणी का सार सभी भक्तों को अपने मुखारविन्द से सुनाया|सभी भक्त अपने को बहुत ही धन्य मान रहें है|