17.ब्रह्मचर्यरक्षावर्ती

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ब्रह्मचर्यरक्षावर्ती


।।बारहवाँ अधिकार।।
(१)
जिन राजाओं की भौं टेढ़ी होने से शत्रू वश होते।
उन राजाओं को कामदेव भी अपने वश में कर लेते।।
उन कामदेव रूपी योद्धा को बिना शस्त्र के जो जीते।
ऐसे शांतात्मा मुनियों को मेरा शत बार नमन होवे।।
(२)
जो निज शरीर से निरासक्त मुनि की जो ज्ञानरूप आत्मा।
वह अंतरंग ब्रह्मचर्य कहा जो मुनि के मन की तन्मयता।।
वृद्धा स्त्री को माता सम माने और उम्र समान बहिन।
जो छोटी हो पुत्री सदृश ऐसे होते ब्रह्मचारीगण।।
(३)
यदि रात्री में सपने में भी मुनि के कोई अतिचार लगे।
तो रात्री का विभाग करके शास्त्रानुसार प्रायश्चित्त ले।।
यदि जागी हुई अवस्था में रागादि व खोटे आश्रय से।
कर्मों के वश अतिचार लगे तो भारी संशोधन करते।।
(४)
भोजन कर ब्रह्मचर्य विनशे नहिं भोजन से यह व्रत पलता।
ऐसी नहिं बात जिनागम में, दृढ़ मन से संयम है पलता।।
बलवान सिंह मांसादिक खा रति वर्ष में एक बार करता।
कापोत पक्षि पत्थर खाता पर रति दिन रात किया करता।।
(५)
ज्ञानी मुनिगण जो यथाशक्ति पालते मूल उत्तर गुण हैं।
वह बाह्यरूप मन का संयम और उससे जनित आनंद गुण हैं।।
उस आनंद से चैतन्य तथा मन के समरसी भाव से जो।
मन का जो संयम होता है अंतरमन का संयम है वो।।
(६)
जिस तरह मनुष मदिरा पीकर चित में भ्रांती को धरता है।
वैसे ही स्त्री भी मनुष्य का चित्त भ्रांत कर देती है।।
अतएव स्त्रियों की संगति से व्रत की संभावना नहीं।
जो तपोभूमि को प्राप्त हुए उनको स्त्री का त्याग सही।।
(७)
स्त्री मुक्ती का द्वार रोकने हेतु अर्गला कही गयी।
संसार वृक्ष को िंसचित करने में नाली सम कही गयी।।
यह नरमृग के बंधन हेतू है मोह व्याध का जाल कहा।
जग में क्या-क्या नहिं कर सकती सज्जन मुनि का मन नष्ट किया।।
(८)
जब तक यति प्रीती से सुन्दर स्त्री को नहीं देखता है।
तब तक उसकी यशवृद्धि तथा गुण निष्कलंक भी रहता है।।
तब तक ही उसका मन पवित्र और निर्मल तप भी रहता है।
उसकी ही धर्मकथा शोभित दर्शन के योग्य यति रहता है।।
(९)
जिस स्त्री का स्मरण मात्र आत्मा का तेज नाश करता।
और सभी व्रतों का नाश करे मुक्ती का मारग च्युत करता।।
उसका सानिध्य विलोचन वचनालाप और स्पर्श आदि।
नाना संक्लेशों को करके क्या-क्या अनर्थ करता है यति।।
(१०)
यदि मुनि वेश्यालोलुपी बने तो धनाभाव से नहिं मिलती।
जो स्त्री पहले त्याग चुके यति बनने से वह नहिं मिलती।।
और अगर पराई स्त्री में रति करे दण्ड नृप से मिलता।
इसलिए नारि का त्याग करो दोनों जन्मों में दुख मिलता।।
(११)
स्त्री से ही घर बनता है स्त्री से सहित गृहस्थ कहा।
जो स्त्री त्यागी यती बना वह ब्रह्मचर्य पालन करता।।
यदि ब्रह्मचर्य में कहीं दोष आ जाए तो ना यती रहे।
इसलिए अगर नहिं पाल सके तो श्रावक ही बस बने रहें।।
(१२)
यदि रूप से र्गिवत सुन्दरियों को दो दिन भोजन नहीं मिले।
तो उनका अति सुन्दर शरीर मुर्दे समान दिखलाई पड़े।।
इसलिए मुने ! उनके वुंâकुम काजल की रचना मत देखो।
लावण्य रूप का अति चंचल स्त्री से कभी न मोह करो।।
(१३)
जब तक शरीर जीवित रहता तब तक ही लगे मनोहर है।
जब मृत बन जाता है शरीर तब लगता बड़ा भयंकर है।।
‘केले के तंभ, कमल तंतू, चन्द्रमा, कमल बेकार रहे।
ऐसी स्त्री को मरण बाद क्षण भर भी नहिं स्वीकार करे।।
(१४)
यद्यपि स्त्री का तन उत्तम यौवन लावण्य सहित होता।
उस पर आभूषण से शोभित वह मूढ़ पुरुष को ही रुचता।।
सज्जन को नहीं हर्ष होता वैसे ही राजहंस होते।
कौए श्मशान भूमि में जैसे मुर्दे खाकर खुश होते।।
(१५)
यदि कोई चीज पवित्र और सुन्दर होती तो राग करो।
स्त्री के बाल जुआं का घर मुख और कपाल चाम्र का हो।।
दो नेत्र छिद्र स्तन मांसिंपड हड्डी से बनी भुजाएँ हैं।
मलमूत्र पिटारा जघन पेट इनमें वैâसे सुख पाएं हैं।।
(१६)
जो कार्य अकार्य विचारशून्य मन जिसका उसे कहें क्या हम।
स्त्री के मुख की लार पिये रागी का होता अंधापन।।
मुख और कपाल चाम्र वेष्टित कवि उपमा देते चंदा की।
उन कवियों को कुकवि है कहा नहिं होतीं योग्य प्रशंसा की।।
(१७)
रागांध व्यक्ति कामी होकर क्या-क्या अनुचित नहिं कार्य करे।
ऐसे में कविगण और अधिक शृंगार आदि रस पाठ करे।।
क्योंकी उनको नहिं रंचमात्र परमार्थ तत्व का ज्ञान सही।
इसलिए काव्य रचना उनकी मानव मन को भ्रमता सच ही।।
(१८)
धन स्त्री का परिग्रह जिनके व्यापार आदि में भी रत है।
ऐसा गृहस्थ भी यदि परधन परस्त्री से विरक्त भी है।।
तो भी वह देव कहा जाता फिर मुनियों का तो कहना क्या।
नहिं स्त्री और नहीं है धन रत्नत्रयधारी देव महा।।
(१९)
कामिनी आदि के बिना दुक्ख यह समझ उन्हें स्वीकार करे।
पर स्त्री आदिक का जो सुख वह पराधीन दुख मान रहे।।
इसलिए अंत में विरस तथा थोड़ा जो विषयजन्य सुख है।
उसको तज तत्वज्ञानियों का उपमा से रहित आत्मसुख है।।
(२०)
यद्यपि संसार में वे मनुष्य भी धन्य और पुण्यात्मा हैं।
जो यौवन से शोभित स्त्री के दिल में रहने वाला है।।
पर उनसे भी है धन्य यती स्त्री को पास न आने दे।
तन से आत्मा को पृथक््â समझ मन में विकार नहिं आने दे।।
(२१)
जिस नरभव में हैं दुख बहुत आयू भी थोड़ी कही गयी।
और ज्ञान भी होता थोड़ा है अरु अंत समय का पता नहीं।।
बुद्धी भी भ्रष्ट बुढ़ापे में पर तप प्राप्ती नरभव से है।
इसलिए करो निर्मल तप को मिलता साक्षात मोक्षसुख है।।
(२२)
जिस तरह नेत्र रोगी उत्तम वैद्यों से बनी सलाई का।
सेवन करते हैं वैसे ही अधिकार कहा है भलाई का।।
‘‘श्री पद्मनंदि मुनि’’ वैद्य हुए बाइस श्लोक वचन जल से।
इस कामरोग को शमन करें ब्रह्मचर्य सदा धारें मन में।।

।।इति ब्रह्मचर्य रक्षावर्ति अधिकार।।