17 अगस्त 2017 प्रवचन

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प्रवचन-17 अगस्त 2017 (मुंबई में)

प्रात:काल की मंगल बेला है-

बंधुओं जैनम हॉल में पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी विराजमान हैं। उनके पावन सान्निध्य में नित ही उत्सव और महोत्सव का कार्यक्रम चलता रहता है।

आज पूज्य चंदनामती माताजी ने सर्वप्राचीन दीक्षित आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की जीवन गाथा एवं उनकी ६३वीं पुण्यतिथि पर प्रकाश डाला। शांतिसागर जी महाराज क्षुल्लक और ऐलक अवस्था में ६ वर्ष ३९ दिन तक रहे। पुनः १९२० में उन्होंने मुनि दीक्षा धारण किया ३५ वर्ष ६ माह कठिन तपस्या करी। मनुष्य की पर्याय में लगभग वह ८२ साल तक रहे। उन्होंने १२ वर्ष की सल्लेखना धारण करी थी। तत्पश्चात् वुंâथलगिरि में आचार्यश्री की सल्लेखना हुई। आचार्यश्री को सन् २०२० में दीक्षा लेकर १०० वर्ष पूर्ण हो जायेंगे। उनकी ६३वीं पुण्यतिथि भाद्रपद शुक्ला दूज २३ अगस्त को मनाई जायेगी। पूज्य माताजी ने बताया कि आचार्यश्री ने अपनी समाधि के १२ दिन पूर्व अंतिम संदेश प्रचारित-प्रसारित किया था।

उन्होंने कहा हे भव्यात्माओं! संयम धारण करा, भिऊ नका-२ डरो मत, डरो मत जितनी शक्ति है, उतना संयम धारण करो। हम लोगों के ऊपर आचार्यश्री ने बहुत उपकार किये हैं।

स्वस्तिश्री रविन्द्रकीर्ति स्वामी ने आचार्य श्री पर प्रकाश डाला-उन्होंने कहा कि आज वर्तमान में जितने भी साधु हैं, सद आचार्यश्री के उपकार के कारण हैं। यह महाराष्ट्र और कर्नाटक की धरती बहुत ही पुण्यशाली है।

स्वामीजी ने दशलक्षण पर्व के बारे में भक्तगणों को बताया कि १९९७ में जो दृश्य राजधानी दिल्ली के अंदर था, ९६ प्रतिमाएं विराजमान करके २४ समवसरण बनाये गये थे। कल्पद्रुम महामण्डल विधान जो कि मुम्बई महानगर के जैनम हॉल में वही विधान माताजी की प्रेरणा से २६ से प्रारंभ होगा।

पूज्य ज्ञानमती माताजी ने बहुत ही हर्ष का अनुभव करते हुए आचार्यश्री के बारे में बताया कि माताजी ने कहा मेरा बहुत ही पुण्य योग था। कि आचार्यश्री की समाधि के पहले उनके चरण सान्निध्य में १ महीने रहकर के उनकी तपश्चर्या देखी है। भव्यात्माओं! बहुत सौभाग्य है कि उनके द्वितीय शिष्य आचार्य नेमिसागर जी महाराज उन्होंने पोदनपुर में शांतिसागर जी का स्मारक बनवाया और तीनमूर्ति बनाकर एक तीर्थ बनाया। माताजी ने कहा कि मेरे दीक्षा गुरु वीरसागर महाराज कहते थे कि भव्यत्व की परीक्षा के लिए सम्मेदशिखर की यात्रा करो गुरुओं में गुरुणागुरु ऐसे आचार्य शांतिसागर जी के दर्शन करो, मूर्तियों में मूर्ति ऐसे गोम्मटेश्वर बाहुबली की मूर्ति के दर्शन करो। आचार्यश्री का जितना भी गुणानुवाद किया जाये, हमारी आत्मा की विशुद्धि आत्मा की सिद्धि के लिए होगा।