18.ऋषभ जिनेन्द्र स्तोत्र

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ऋषभ जिनेन्द्र स्तोत्र


।।तेरहवाँ अधिकार।।

(१)
श्री नाभिराय सुत तीनों लोकों के घर के दीपक समान।
और धर्मतीर्थ की प्रवृति करी ऐसे श्री ऋषभदेव भगवान।।
जयवंत रहें इस लोक में वे निर्मल गुण रत्न खजाने हैं।
ऐसे हे नाथ ! कृपा करिए चरणों में नमन तुम्हारे हैं।।
(२)
सुर असुरों के मुकुटों की मणियों की किरणों से जो चित्रित।
ऐसा िंसहासन है जिनका, ऐसे उन नाथ की जो स्तुति।।
करते हैं तथा देखते हैं जप ध्यान आपका करते हैं।
वे धन्यवाद के पात्र कहे विरले ही जग में होते हैं।।
।।श्लोक का तात्पर्य।।
(३)
जो नर अर्हंत देव आदिक की पुष्प से पूजा करता है।
परभव में मंद हास्ययुत देवांगना से पूजित होता है।।
जो एक बार दर्शन करता तीनों जग में पूजा जाता।
और ध्यान करे जो एक बार सब कर्मों से वह छुट जाता।।
(४)
इन चर्मचक्षुओं से प्रभुवर जो दर्श आपका होता है।
उसकी सीमा है थोड़ी सी पर हर्ष बहुत ही होता है।।
फिर ज्ञाननेत्र से हे जिनेन्द्र ! जब सर्व रूप दिख जाता है।
उस हर्ष की सीमा है अपार त्रय जग में नहीं समाता है।।
(५)
हे जिनवर ! तुमने सभी वस्तु विस्तार सहित है जान लिया।
उस अनंत ज्ञान का है जिसने भी सचमुच गुणस्तवन किया।।
वह ऐसा मालुम पड़ता है वूâप स्थित मेढ़क सागर का।
गुणगान कर रहा अरु समझे बस कुएं को ही सागर जैसा।।
(६)
हे प्रभो ! आपके गुण कीर्तन में ही तो इतनी शक्ती है।
जिससे हम जैसे मानव से आदेश मांगती लक्ष्मी है।।
फिर जो मनुष्य साक्षात् आपको प्राप्त करे फिर कहना क्या।
उसको मिलती अंतरंग और बहिरंग लक्ष्मी विस्मय क्या।।
(७)
हे जिनवर ! ऐसा लगता है जब आप स्वर्ग तजकर आये।
सर्वार्थसिद्धि की शोभा भी बिन प्रभो आपके नश जाये।।
और इस पृथ्वीतल की आज्ञा तेरे आने से बढ़ जाती।
ये महिमा केवल तेरी है यह धरा स्वर्ग सी बन जाती।।
(८)
इस पृथ्वी का वसुमती नाम बस पड़ा आपके ही कारण।
क्योंकी महाराज नाभिगृह में इंद्रों ने बरषाया था धन।।
पन्द्रह महिनों तक रत्नों की वर्षा से प्रजा धनाढ़य हुई।
तुम सा सुत पाकर ये पृथ्वी वसुमति से जगविख्यात हुई।।
(९)
शचि ने जिस पद में नमन किया उन माँ का पद सबसे ऊँचा।
जिस गर्भ में वास किया तुमने मरुदेवी का आंगन सींचा।।
जितनी भी पुत्रवती जग में पर मरुदेवी सी कोई नहीं।
अब और अधिक क्या कहें प्रभो! सबका गौरव बस तुमसे ही।।
(१०)
जिस समय इंद्र ने गोदी में लेकर देखा प्रभु के मुख को।
नेत्रों को पलक रहित करके बस रहा देखता श्रीमुख को।।
इससे भी तृप्ती नहीं हुई तब नेत्र हजार बनाये थे।
ले जाकर के सुमेरु गिरि पर अपने में ही इठलाए थे।।

(११)
जिस समय आपका मेरू पर इन्द्रादि करें जन्माभिषेक।
तीर्थत्वपने को प्राप्त किया उस मेरू का वह जलाभिषेक।
और इसीलिए सूरज चंदा उसकी प्रदक्षिणा करते हैं।
हे प्रभो ! आपके ही कारण जग के सब तीरथ बनते हैं।।
(१२)
जो मेरुशिखर से जल उछला उससे जो ताड़ित हुए देव।
उस ताड़न से जो देवों की थी दशा हुई लगता था देख।।
मानो चउतरफ हो गया है आकाश व्याप्त इस पृथ्वी पर।
ऐसा श्री पद्मनंदि मुनिवर लिख रहे ऋषभ की स्तुति कर।।
(१३)
हे नाथ ! आपके जन्म स्नान के समय भुजाएं पैâलाकर।
जो इंद्रों ने था नृत्य किया उससे ही मेघ हैं क्षणभंगुर।।
इस क्षणभंगुरता का कारण जो मेघ भग्न उस समय हुए।
वह आज भी दिखते हैं नभ में नहिं स्थिर जग में कभी हुए।।
(१४)
जिन प्रजागणों की आजीविका दश कल्पवृक्ष से होती थी।
उनको श्री आदिनाथ प्रभु ने शिक्षा देकर पूरी की थी।।
इसलिए आप ही कल्पवृक्ष इस कर्मभूमि की रचना के।
बस एक आप ही सृष्टा हो इस भौतिक जग संरचना के।।
(१५)
यह पृथ्वी हुई सनाथ आपको पा करके हे ऋषभदेव।
जैसे नवीन मेघों से हो वे श्वासों में रोमांच सदैव।।
जिस समय आप पृथ्वीतल पर अवतरित हुए थे हे जिनेन्द्र।
रोमांच हुआ था हृदयों में नर हो नारायण या सुरेन्द्र।।
(१६)
हे वीतराग ! जिस तरह मेघ में बिजली लख नश जाती है।
बस उसी तरह से नीलांजना भी नृत्य दिखा नश जाती है।।
दूसरी नृत्य करने वाली वैसी ही नर्तकी आई थी।
पर प्रभो आपने जान लिया नश्वर लीला दर्शाई थी।।
(१७)
जिस दिन तुमको वैराग्य हुआ पृथ्वी को तृणसम त्याग दिया।
तब से नदियों की कलकल ध्वनि जैसे पृथ्वी ने विलाप किया।।
क्योंकी हो नाथ सभी के तुम इसलिए वियोग न सहन करे।
तुमसे त्यागे जाने पर यह वसुधा भी तुम बिन दुखित रहे।।
(१८)
हे भगवन ! जब कायोत्सर्ग मुद्रा धरकर वन में थे खड़े।
ऐसा मालुम होता था तब धर्मध्वज के स्तंभ खड़े।।
जिस तरह मूल खंभे पर ही घर का आधार टिका होता।
बस उसी तरह से आप ही के द्वारा यह धर्म टिका रहता।।
(१९)
हे जिन! भौरों के समूह सम मस्तक पर केशों का समूह।
वह ऐसा मालुम पड़ता है ध्यानाग्नि से जलकर तन समूह।।
उसका जो काला धुआँ उठा वह केश समान धुएं छल्ले।
यह कवि का अलंकार उपमा वरना हम वैâसे कुछ कह लें।।
(२०)
जब तक इस आत्मा में अखंड नहिं केवलज्ञान प्रगट होता।
तब तक यह आत्मा लोक अलोक वस्तू को नहीं जान सकता।।
निर्मल समाधि से जब चारों घातिया कर्म नश जाते हैं।
तब सम्यग्ज्ञान प्रगट होता अरिहंत अवस्था पाते हैं।।
(२१)
जिस समय आपने जड़ से इन घातिया कर्म थे नष्ट किये।
उस समय चार जो शेष रहे वह मृत सम डरकर भाग गये।।
अब हमको भी जाना होगा यह सोच अशक्त समान हुए।
हे प्रभो ! आपके तप से ही नहिं कर्म आपके दास हुए।।
(२२)
जो समवसरण था रचा इन्द्र ने नाना मणि से शोभ रहे।
उस समवसरण में हे प्रभुवर ! जितने भी मुनिगण राज रहे।।
उन मुनियों के ऊपर सबसे बीचोंबिच शोभित होते हैं।
और बढ़ जाती उसकी शोभा जब आप विराजित होते हैं।।
(२३)
जिस तरह पुष्प में कमल पुष्प सूरज की किरणों को पाकर।
महिमा को प्राप्त हुआ करता वैसे ही तुमको भी पाकर।।
हे प्रभो ! बहुत सुन्दर होती है समवसरण की रचना भी।
पर आपके चरणों को पाकर बढ़ जाती उसकी महिमा भी।।
(२४)
हे प्रभो ! आप निर्दोष तथा सब कर्मकलंक रहित होते।
जड़ता से रहित हुए फिर भी चंदा सम तुमको सब कहते।।
जिस तरह चन्द्रमा पर्वत के शिखरों पर शोभित होता है।
वह पृथ्वी भी शोभित होती जहाँ अचल िंसहासन होता है।।
(२५)
जिन भव्य जीव के हृदयों में है ज्ञानज्योति स्पुâरायमान।
जो भविजन चरणों में करते निज माथ झुका करके प्रणाम।।
वे भी केवल उपदेश श्रवण करके हो जाते रहित शोक।
फिर क्यों नहिं हो जड़ वृक्ष आपके सन्निध रह करके अशोक।।
(२६)
हे प्रभो ! आपके तीन छत्र निर्मल मुक्ताफल सम लगते।
जिस समय देखते हैं इनको आनंदाश्रू झर-झर बहते।।
इतना आनंदित होते हैं नयनों में नहीं समाते हैं।
आँखों से अमृतबिन्दू की वर्षा करने लग जाते हैं।।
(२७)
हे भगवन् ! जिन चमरों को लख ये नयन कमल र्हिषत होते।
जिनको इंद्रादिक ढोर रहे वे इतने स्वच्छ धवल होते।।
जैसे लगता है शरद ऋतू के चंदा की किरणें पैâलीं।
उन किरणों से ही बने हुए चंवरों की शोभा है होती।।
(२८)
जिन कामदेव के पंचबाण तेरे आगे सब विफल हुए।
वह कामदेव सब देवों को अपने बाणों से वश में किए।।
इसलिए आपके ऊपर वह पुष्पों के बाण को पेंâक रहा।
पुष्पों की वर्षा मत समझो वह अपने घुटने टेक रहा।।
(२९)
हे भगवन् ! जो दुंदुभि बजती तीनों लोकों में कहती है।
हे भविजीवों ! परमात्मा है तो आदिनाथ भगवन ही है।।
निंह इससे भिन्न दूसरे मत और देव के मिथ्या वचन सुनो।
यदि सुनना है तो आदीश्वर भगवन के सम्यक वचन सुनो।।
(३०)
हे प्रभो ! सूर्य की प्रभा मनुष्यों को संताप दिया करती।
और चंद्रकिरण की शीतलता जड़ता को है प्रदान करती।।
पर हे प्रभुवर निंह तुम जैसा इस जग में कोई प्रभाशाली।
जो ताप और जड़ता दोनों को होती है हरने वाली।।
(३१)
हे प्रभो! आपकी दिव्यध्वनी रूपी वाणी ऐसी होती।
मंदराचल से मंथन करके गंभीर समुन्दर सी होती।।
हे नाथ! आपकी वाणी ही शुभ अरु उत्तम कहलाती है।
बाकी वाणी विष के सदृश संसार को और बढ़ाती है।।
(३२)
हे प्रभो ! आपकी वाणी को यदि अज्ञानी भी सुन लेते।
तो मोक्षरूप उत्तम फल को निश्चित ही प्राप्त वे कर लेते।।
जिस तरह नदी वृक्षों में अपने जल से फल को देती है।
उस तरह आपकी वाणी भी नदियों के जल सम होती है।।
(३३)
हे प्रभो ! आपके वचनों में श्रद्धान जो प्राणी रखता है।
वह पल भर में संसार रूप सागर को भी तर सकता है।।
जिस तरह निकट जिनके जहाज वह ही सागर को पार करे।
वरना सागर हो या भव का सागर न कभी भी पार करे।।

(३४)
हे जिनवर ! वचन आपके ही अनेकांत रूप को कहते हैं।
तुमसे अतिरिक्त सभी मत में एकांतवादि ही रहते हैं।।
हे प्रभुवर ! तब सर्वज्ञपना जन जन का हृदय प्रकाश करे।।
और वही यथार्थज्ञान होता ऐसा हमको आचार्य कहें।।
(३५)
हे भगवन् ! जो मति श्रुत ज्ञानी हैं तुच्छ बुद्धि के होकर भी।
तुम वचनों में विवाद करते वह वाद विवाद निरर्थक ही।।
जैसे कोई अंधा प्राणी क्या पक्षि की गणना कर सकता।
वैसे ही केवलज्ञानी से प्रतिवाद न कोई कर सकता।।
(३६)
हे प्रभो ! आपके नय परवादी के नयरूप वैरियों को।
तीनों लोकों के मध्य अगर विजयी होते आश्चर्य हो क्यों।।
क्योंकी आपस में भिन्न विरोधीगण जिनमें नहिं एका है।
उसको योद्धा परास्त करते जिसके समूह में एका है।।
(३७)
इस जग में कौन पुरुष समर्थ जो आपका वर्णन कर सकता।
जो उत्तमज्ञान के धारी हैं वो वृहस्पती ही हो सकता।।
गुणगान आपका करने में उस जैसा कोई कवी नहीं।
हम जैसे साधारण जन की जिह्वा तो प्रभो असमर्थ सही।।
(३८)
हे प्रभो ! आपसे उपदेशित जो मार्ग स्वच्छ और चोर रहित।
क्योंकी सबसे बलवान मोहरूपी चोरों से सभी व्यथित।।
उनसे बचने का मार्ग तीन रत्नत्रय के जो धारी हैं।
वे बिना रुकावट के जाते जो मोक्षमार्ग सुखकारी है।।
(३९)
हे कृपानिधान ! जिस समय तुमने मोक्ष खजाना खोल दिया।
तब ऐसा कौन मनुज होगा जो राज्यादिक नहिं छोड़ दिया।।
उसको तब राज्यादिक वैभव सब जीर्ण शीर्ण तृण सम लगते।
जो मोक्ष खजाने के इच्छुक उनको नहिं कुछ रुचिकर लगते।।
(४०)
हे जिनवर ! जो जन प्रबल मोह रूपी सर्पों से डसे गये।
अर्थात् जो अतिमोही जन हैं किस तरह ज्ञान वह प्राप्त करें।।
जिनको नहिं ज्ञान हिताहित का उस पर यदि पँâसे कुदेवों में।
तो नहीं कभी भी हो सकता चैतन्यज्ञान उनको सच में।।
(४१)
भवसागर में गिर रहे जीव को इक धर्ममात्र ही साधन है।
और इससे भिन्न जो अन्य धर्म प्राणी को दुख के कारण हैं।।
जिस तरह भील का धनुष मनुष्यों का घातक कारण बनता।
वैसे ही धर्म का असल रूप भवतारण का कारण बनता।।
(४२)
हे प्रभो ! आपके नख व केश सर्वथा प्रमाण में रहते हैं।
वे नहिं घटते नहिं बढ़ते हैं जबकी वे अचेतन रहते हैं।।
फिर आपकी महिमा जो जाने खुद की महिमा वैâसे गावे।
नहिं आपके सम्मुख बोल सके वाचाल अधिक वो कहलावे।।
(४३)
हे प्रभो ! आपकी काया जो अत्यन्त स्वच्छ सोने जैसी।
उस पर जीवों के नीलनयन की छाया पड़ती है ऐसी।।
जैसे नेत्रों के प्रतीबिम्ब नहिं होकर नीलकमल वे हों।
उससे पूजित तव चरण कमल ऐसी कवि की कल्पना है वो।।
(४४)
इंद्रों से पूजित जो नख है उनकी जो प्रभारूप सरवर।
उनके मधि में जो स्थित है उन चरण कमल में क्षुधित भ्रमर।।
आ करके बारम्बार गिरे जैसे वे नमन ही करते हैं।
वैसे इंद्रों के श्याम नेत्र भंवरे समान ही लगते हैं।।

(४५)
हे प्रभो ! देव से रचित स्वर्ण कमलों पर जब तुम चलते हो।
वह गमन सर्वथा युक्त कहा उपदेश के हेतु निकलते हो।।
जैसे हैं स्वर्ण कमल उत्तम वैसे ही चरण कमल श्रीयुत।
प्रभुवर के घातिया कर्मों के नशने से देव करें प्रस्तुत।।
(४६)
हे भगवन् ! हे जिनेन्द्र ! जिनके यशगान से कर्ण सुखी होते।
स्वर्गों में इंद्र देवता भी तेरा गुणगान किया करते।।
तब ऐसा मालुम पड़ता है उसको सुनने के लिए गये।
भूमंडल को तजकर चंदा पर मृग जाकर के लीन हुए।।
(४७)
हे भगवन् ! तव पद कमलों में जो लक्ष्मी शोभित होती है।
यह बात सर्वथा झूठी है लक्ष्मी कमलों पर रहती है।।
जो चरण कमल में शिर धरते उनको ही लक्ष्मी मिलती है।।
क्योंकी प्रभु के नख की किरणें वह ही तो लक्ष्मी होती है।।
(४८)
चन्द्रमा सर्वथा पृथ्वी को आनंद को ही देने वाला।
पर जो प्राणी है रोगग्रस्त उनको न चन्द्रमा सुख वाला।।
सो जैसे चंदा से विद्वेष में उनका रोग ही कारण है।
वह मूर्ख ही हैं जो द्वेष करें उसका नहिं कोई निवारण है।।
(४९)
यदि वन में अग्नी लग जावे और नदी का जल उपलब्ध न हो।
तो जैसे कुछ भी जलने से नहिं बचता भस्म सभी कुछ हो।।
वैसे ही आपके चरणों की स्तुति रूपी यदि नदी न हो।
तो मरण रूप अग्नी से जग में किसी का भी उद्धार न हो।।
(५०)
जिस समय भव्यजन तव सम्मुख दोनों हाथों को मुकुलित कर।
मस्तक पर अपने धरते हैं तब स्वर्ग मोक्ष मिलता सुखकर।।
(५१)
जो भव्य नवाकर मस्तक को तव चरणों में प्रणमन करते।
उनकी आत्मा से मोहरूप धूली के कण झर-झर झरते।।
जब तक जीवों को रंचमात्र हेयोपादेय का ज्ञान नहीं।
तब तक स्त्री पुत्रादिक में मोही रहता विक्षिप्त सा ही।।
(५२)
यह ब्रह्मा विष्णु आदि संज्ञा हे प्रभो ! आपकी कही गयी।
पर अन्य चतुर्मुख के ब्रह्मा विष्णू आदिक भगवान नहीं।।
क्योंकी खद्योत प्रकाश नहीं चंदा सम शीतल होता है।
ऐसा माने जो वह मानव अपनी मूरखता कहता है।।
।।आदिनाथ स्तोत्र में यही कहाँ है।।
(५३)
हे प्रभो ! आपका ज्ञान सर्व व्यापक है अत: विभू तुम हो।
निंह िंचतन कोई कर सकता अतएव अिंचन्त्य आप ही हो।।
युग की आदी में हुए आप ब्रह्मा ईश्वर हो अंत रहित।
हो कामदेव योगीश्वर अरु ध्यानी निर्मल हो ज्ञान सहित।।
(५४)
हे आदीश्वर भगवान ! आप ही बुद्ध आप ही शंकर हो।
तीनों लोकों में पूज्य तथा हे प्रभो ! आप क्षेमंकर हो।।
शिवमार्ग विधाता आप अत: हे धीर ! आप ब्रह्मा भी हो।
सब पुरुषों में उत्तम पुरुषोत्तम अत: आप विष्णू भी हो।।
(५५)
हे प्रभो ! आप ही मोक्षमार्ग के नेता तथा प्राणियों के।
सब जन के शरण आप ही हो निष्कारण वैद्य व्याधियों के।
ये तीन व्याधियाँ जन्म जरा एवं मृत्यू की कही गयीं।
इनका करके विनाश प्रभुवर बन गये वैद्य त्रिभुवन के ही।।
(५६)
हे जिनवर ! बड़े कष्ट से ही योगीजन तुमको पाते हैं।
पाकर इतना कृतकृत्य हुए कोई न काम रह जाते हैं।।
इसलिए आपसे भिन्न नहीं मुक्ती का दूजा कारण है।
संसार में होते कई देव नहिं होते मुक्ति के कारण हैं।।
(५७)
हे प्रभो ! आप हैं सूक्ष्म बहुत निंह कोई आपको देख सके।
जबकी वह परमाणू तक के अति सूक्ष्म पदार्थ भी देख सके।।
ऐसे ही आप गुरू इतने कि ज्ञानस्वरूप आपमें यह।
सारे पदार्थ ही समा गये इसलिए ज्ञान में झलक रहें।।
(५८)
सब वस्तुसमूह में जो मनुष्य हेयोपादेय का ज्ञाता है।
उसकी दृष्टी में सारभूत केवल इक आप विधाता हैं।।
जितने भी भिन्न हैं परपदार्थ वह सब असार सूखे तृण सम।
इसलिए जिन्हें हो गया ज्ञान वह मोक्षमार्ग में है सक्षम।।
(५९)
जिस नभ के गर्भ में तीन भुवन परमाणु के सदृश दिखते हैं।
वह नभ भी आपके ज्ञान में प्रभु परमाणु सदृश ही लखते हैं।।
आकाश अनंत प्रदेशी है उससे भी बड़ा है ज्ञान तेरा।
यह महिमा आपकी है भगवन् ! नहिं अन्य कोई ऐसा चेहरा।।
(६०)
भुवनत्रय में नहिं सरस्वती सदृश स्तुति करने वाली।
निंह अंत गुणों का है जिनके उनके गुणगान न कर पाती।।
फिर हम जैसे अज्ञानीजन वैâसे स्तुति कर सकते हैं।
यदि कर भी लें तो उस गाथा का अंत नहीं कर सकते हैं।।
(६१)
जैसे पक्षी नभ में उड़ते-उड़ते जिस जहाँ तलक जावे।
फिर भी आकाश अनंत तथा उसको वह पार न कर पावे।।
वैसे ही आपके गुण समूह भी हैं अनंत कोई अंत नहीं।
स्तुति करने में कवि की जिह्वा होती है असमर्थ सही।।

(६२)
हे प्रभो ! आपके गुणस्तोत्र करने में इंद्र भी नहिं समर्थ।
और महादेव अरु शेषनाग भी स्तुतिगान में हैं अशक्त।।
फिर मैं हूँ बुद्धिहीन प्राणी स्तवन गान क्या कर सकता।
जो साहस किया है लिखने का बस क्षमायाचना कर सकता।।
(६३)
हे जिनवर ! आप भव्य रूपी कमलों को आनंदित करते।
निर्दोष सूर्य सम, तेजोनिधि मोहांधकार को शम करते।।
‘‘श्री पद्मनंदि मुनिवर’’ भी हैं हम सब भव्यों को सुख देते।
मेरे ऊपर भी कृपा करो तव चरण कमल दुख को हरते।।

।।इति ऋषभस्तोत्र।।