18.शांतिनाथस्तोत्र

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श्री शांतिनाथ स्तोत्र

शार्दूलविक्रीडित छंद
त्रैलोक्याधिपतित्वसूचनपरं लोकेश्वरैरुद्धृतं यस्योपर्युपरीन्दुमण्डलनिभं छत्रत्रयं राजते ।
अश्रांतोद्गतकेवलोज्जवलरुचा निर्भर्सितार्कप्रभं सोऽस्मान् पातु निरञ्जनो जिनपति: श्री शांतिनाथ: सदा ।।१||

अर्थ — जिन शांतिनाथ भगवान के मस्तक के ऊपर तीनों लोक के स्वामीपने के प्रकट करने में तत्पर तथा देवेन्द्रों द्वारा आरोपित चंद्रमा के प्रतिबिम्ब के समान तीन छत्र शोभित होते हैं और निरंतर उदय को प्राप्त ऐसा जो केवलज्ञान उसकी जो निर्मलकांति उससे जिनने सूर्य की प्रभा को भी नीचे कर दिया है और जो समस्त पापों कर रहित हैं ऐसे वे श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्र सदा हम लोगों की रक्षा करें ।

भावार्थ —श्री शांतिनाथ भगवान तीनों लोक के स्वामी हैं इस बात को प्रकट करने के लिये जिन श्री शांतिनाथ भगवान के मस्तक के ऊपर देवेन्द्रों ने चंद्रमा के समान तीन छत्र आरोपित किये हैं और जिन्होंने सदा उदय को प्राप्त ऐसे अपने केवलज्ञान की कांति से सूर्य की प्रभा को भी नीचे कर दिया है और ज्ञानावरणादि कर्म जिनके पास भी नहीं फटकने पाते इसीलिये जो कर्मों से उत्पन्न हुई कालिमा से रहित हैं ऐसे श्री शांतिनाथ भगवान सदा हमारी रक्षा करें अर्थात् ऐसे श्री शांतिनाथ भगवान को नमस्कार है ।।१।।

देव: सर्वविदेष एव परमो नान्यस्त्रिलोकीपति: संत्यस्यैव समस्ततत्त्वविषया वाच: सतां सम्मता: ।
एतद्धोषयतीव यस्य विबुधैरास्फालितो दुन्दुभि: सोस्मान् पातु निरंजनो जिनपति: श्री शांतिनाथ:सदा ।।२||

अर्थ — देवताओं कर ताड़ित (बजाई हुई) जिस श्रीशांतिनाथ भगवान की दुन्दुभि (नक्काड़ा) संसार में मानों इस बात को प्रकट करके कह रहा है कि समस्त पदार्थों को जानने वाले तथा उत्कृष्ट और तीनों लोक के पति यदि है तो शांतिनाथ भगवान ही हैं किंतु इनसे भिन्न न कोई समस्त पदार्थों का जानने वाला है और न उत्कृष्ट तथा तीनों लोकों का पति ही है तथा समस्त तत्त्वों को वर्णन करने वाले इसी (भगवान) के वचन सज्जनों को सम्मत हैं किंतु इनसे भिन्न किसी के वचन सम्मत नहीं है ऐसे वे समस्त कर्मोंकर रहित श्रीशांतिनाथ भगवान सदा हमारी रक्षा करें ।।२।।

आचार्य शांतिनाथ भगवान की स्तुती करते हैं|--

दिव्यस्त्रीमुखपंकजैकमुकरप्रोल्लासिनानामणिस्फारीभूतविचित्ररश्मिरचितानम्रामरेन्द्रायुधै: ।
सच्चित्रीकृतवातवर्त्मनि लसत्ंसिंहासने य: स्थित: सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति: श्री शांतिनाथ:सदा ।।३||

अर्थ — जो श्रीशांतिनाथ भगवान, देवागनाओं के जो मुखकमल वे ही हुए एक दर्पण उनमें देदीप्यमान जो नाना प्रकार के रत्न उनकी जो चारों ओर फैली हुई किरणें उन करके बनाये हुए, तथा चारों ओर से मुड़े हुए, ऐसे जो इन्द्र धनुष, उनसे चित्रविचित्र जो आकाश, उसमें देदीप्यमान सिंहासन में विराजमान होते हुवे ऐसे वे समस्त पापों की रहित श्रीशांतिनाथ भगवान सदा हमारी रक्षा करें।

भावार्थ — जिस समय भगवान को देवांगना आकर नमस्कार करती हैं उस समय उनके भूषणों के रत्नों की किरणो से चित्रविचित्र आकाश ऐसा मालूम पड़ता है मानों उसमें इन्द्रधनुष ही पड़े हों तो इस प्रकार इन्द्र धनुषों के समान चित्रविचित्र आकाश में जो शांतिनाथ भगवान सिंहासन पर विराजमान होते हुवे ऐसे वे समस्त पापों कर रहित श्रीशांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें अर्थात् ऐसे शांतिनाथ भगवान को मस्तक झुकाकर नमस्कार है ।।३।।

गंधाकृष्टमधुव्रतब्रजरुतैर्व्यापारिता कुर्वती स्तोत्राणीव दिव्य:सुरै: सुमनसां वृष्टिर्यदग्रेऽभवत् ।
सेवापातसमस्तविष्टपपतिस्तुत्याश्रयस्पर्धया सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति: श्रीशांतिनाथो जिन: ।।४।।

अर्थ — जिन श्री शांतिनाथ भगवान के आगे आकाश में देवों द्वारा की हुई फूलों की वर्षा इस प्रकार से होती हुई मानों सेवा में आये हुये जो समस्त लोक के स्वामी देवेन्द्रादिक उनकी स्तुति से उत्पन्न ईर्षा से, सुगंध से खैंचे हुए जो भ्रमर उनका जो समूह उनके शब्दों से स्तोत्रों को ही कर रही हो इसलिये इस प्रकार समस्त पापों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करो।

भावार्थ — आचार्यवर उत्प्रेक्षा करते हैं कि जिस समय भगवान के ऊपर पुष्पवृष्टि होती है उस समय उसकी सुगंधि से आये हुये जो भ्रमर उनके जो गुंजार शब्द वे गुंजार शब्द नहीं हैं किंतु तीनों लोक के पति देवेन्द्र नरेन्द्र धरणेन्द्र आकर भगवान की स्तुति करते हैं उस समय उनकी स्तुति की ईर्षा से पुष्पवृष्टि भी भगवान की मानों स्तुति कर रही है ऐसी मालूम होती है।।४।।

खद्योतौ किमुतानलस्य कणिके शुभाभ्रलेशौवथ सूर्याचंद्रमसाविति प्रगुणितौ लोकाक्षियुग्मै:सुरै: ।
तर्क्येते हि यदग्रतोतिविशदं तद्यस्यभामण्डलं सोऽस्मान्पातु निरंजनो जिनपति श्रीशांतिनाथ: सदा ।।५||

अर्थ — जिस श्री शांतिनाथ भगवान के मामंडल के आगे सूर्य तथा चन्द्रमा को लोगों के नेत्र तथा देव ऐसा मानते थे कि क्या ये सूर्य चंद्रमा दो खद्योत (जुगनू) हैं अथवा अग्नि के दो फुलिंगे हैं वा सफेद मेघ के ये दो टुकड़े हैं, ऐसा जिस शांतिनाथ भगवान का भामंडल था ऐसे वे समस्त पापों कर रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें।

भावार्थ — जिस श्री शांतिनाथ भगवान का भामंडल इतना देदीप्यमान था कि जिसके सामने अत्यंत प्रकाशमान सूर्य चंद्रमा भी जुगुनू तथा अग्नि के फुलिंगे और सफेद मेघ के टुकड़ों के समान जान पड़ते थे ऐसे वे समस्त कर्मों से पैदा हुई कालिमा से रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ।।५।।

ग्रंथकार उत्प्रेक्षा करते हैं--

यस्याशोकतरुर्विनिद्रसुमनोगुच्छप्रसक्तै क्वणद्भृंगैर्भक्तियुत: प्रभोरहरहर्गायन्निवास्ते यश: ।
शुभ्रं साभिनयोमरुच्चललतापर्यंतपाणिश्रिया सोऽस्मान्पातु निरंजनो जिनपति श्रीशांतिनाथ: सदा ।।६।।

अर्थ — जिन शांतिनाथ भगवान का भक्ति सहित अशोकवृक्ष खिले हुए जो फूल उनके जो गुच्छे उन पर बैठे हुए जो शब्द करते हुए भ्रमर उनसे प्रभू के निर्मल यश को गान कर रहा है ऐसा मालूम होता है और पवन से कंपित जो लता उनके जो अग्रभाग वे ही हुए हाथ उनसे ऐसा जान पड़ता है मानों नृत्य ही कर रहा हो ऐसे वे समस्त पापों कर रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ।

भावार्थ — जिसके खिले हुवे फूलों के गुच्छों पर भ्रमर गुंजार कर रहे हैं और जिसके शाखाओं के अग्रभाग पवन से हिल रहे हैं ऐसे अशोक वृक्ष के नीचे बैठे ध्यानरूढ़ भगवान को अपने मन में भावनाकर ग्रंथकार उत्प्रेक्षा करते हैं कि जो अशोक वृक्ष के फूले हुवे फूलों पर भ्रमर गुंजार शब्द कर रहे हैं वे शब्द उनके गुंजार के शब्द नहीं हैं किंतु भक्तिवश होकर अशोक वृक्ष भगवान के निर्मल यश का गान कर रहा है तथा वे जो पवन से अशोक वृक्ष की लताओं के अग्रभाग हिल रहे हैं वे लताओं के अग्रभाग नहीं है किन्तु वे अशोक वृक्ष के हाथ हैं तथा हाथ फैलाकर अशोक वृक्ष भक्तिवश होकर नृत्य कर रहा है इसलिये जिनका अशोक वृक्ष भक्तियुक्त होकर ऐसी चेष्टा कर रहा है ऐसे वे समस्त पापों कर रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ।।६।।

विस्तीर्णखिलवस्तुतत्त्वकथनापारप्रवाहोज्ज्वला निश्शेषार्थिनिषेवितातिशिशिरा शैलादिवोत्तुंगत: ।
प्रोद्भता हि सरस्वती सुरनुता विश्वं पुनाना यत: सोऽस्मान्पातु निरञ्जनो जिनपति: श्रीशांतिनाथ: सदा ।।७||

अर्थ — जो अत्यंत विस्तीर्ण है तथा समस्त तत्त्वों को जो कथन वहीं हुवा प्रवाह उससे उज्जवल है और जिनकी समस्त अर्थिजन (याचक) सेवा करते हैं और जो अत्यंत शीतल है तथा जिनकी समस्त देव स्तुति करते हैं और जो समस्त जगत को पवित्र करने वाली है ऐसी सरस्वती (गंगा) अत्यंत ऊंचे पर्वत के समान जिन श्री शांतिनाथ भगवान से प्रकट हुई है ऐसे वे समस्त पापों कर रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें।

भावार्थ — जिस प्रकार गंगा नदी अत्यंत लंबी चौड़ी है और जिसका पार नहीं ऐसे प्रवाह से उज्ज्वल है तथा जिसकी याचकगण सेवा करते हैं और जो अत्यंत शीतल है तथा जिसकी बड़े-२ देव स्तुति करते हैं और जो समस्त जगत को पवित्र करने वाली है तथा अत्यंत उन्नत ऐसे हिमालय पर्वत से प्रकट हुई है उसी प्रकार सरस्वती भी है क्योंकि यह भी अत्यंत विस्तीर्ण है तथा समस्त तत्त्वों का जो कथन वही हुवा प्रवाह उस से अत्यंत निर्मल है। इसके भक्तलोग इसकी भी सेवा करते हैं और यह अत्यंत शीतल है और इसकी बड़े- २ देव स्तुति करते हैं तथा समस्त जगत को पवित्र करने वाली है और अत्यंत उन्नत श्री शांतिनाथ हिमालय से उत्पन्न हुई है इसलिये जिनसे इस प्रकार गंगा नदी के समान सरस्वती उत्पन्न हुई है ऐसे वे समस्त पापों कर रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ।।७।।

आगे आचार्य कहते हैं|

लीलोद्वेल्लितबाहुकंकणरणत्कारप्रहृष्टै:सुरैश्चंचच्चन्द्रमरीचिसंचयसमाकारैश्चलच्चामरै: ।
नित्यं य: परिवीज्यते त्रिजगतां नाथस्तथाप्यस्पृह: सोऽस्मान्पातु निरंजनो जिनपति: श्रीशांतिनाथ: सदा ।।८||

अर्थ — जिन शांतिनाथ भगवान के ऊपर लीला से कंपित जो भुजा उनमें पहिने हुवे जो कंकण उनका जो रणत्कार शब्द उनसे अत्यंत हर्षित ऐसे देव, देदीप्यमान जो चन्द्रमा उसकी जो किरणें उनका जो समूह उसके समान रूप को धारण करने वाले चंचल चमरों को ढ़ोरते हैं और जो तीनों लोक के नाथ हैं तो भी जो निरीह हैं अर्थात् समस्त पदार्थों में इच्छाकर रहित हैं ऐसे वे समस्त पापों कर रहित श्री शांतिनाथ भगवान सदा हमारी रक्षा करें अर्थात् ऐसे श्री शांतिनाथ भगवान को नमस्कार है।

भावार्थ — जिन श्री शांतिनाथ भगवान के ऊपर समस्त आभूषणों कर सहित देवेन्द्र, चंद्रमा की किरणों के समान निर्मल चमरों को ढोरते हैं और जो तीनों लोक के नाथ हैं तो भी जिन भगवान की किसी पदार्थ में इच्छा नहीं है ऐसे वे समस्त प्रकार के पातकों कर रहित श्री शांतिनाथ भगवान सदा हमारी रक्षा करें ।।८।।

निश्शेषश्रुतबोध वृद्धमतिभि: प्रात्यैरुदारैरपि स्तोत्रैर्यस्य गुणार्णवस्य हरिभि: पारो नहि प्राप्यते ।
भव्यांभोरुहनंदिकेवलरविर्भक्त्या मयापि स्तुत: सोऽस्मान्पातु निरंजनो जिनपति: श्रीशांतिनाथ:सदा ।।९||

अर्थ — समस्त शास्त्रों के ज्ञान से जिनकी बुद्धियां अत्यंत विशाल हैं ऐसे इन्द्र भी अत्यंत उत्कृष्ट तथा बड़े-२ स्तोत्रों से जिन शांतिनाथ के गुणरूपी समुद्र का पार नहीं पा सकते ऐसे उन भव्यरूपी कमलों को अथवा भव्यपद्मनंदी को आनंद के करने वाले केवलज्ञानरूपी सूर्य के धारी श्री शांतिनाथ भगवान की मैंने स्तुति की है इसलिये समस्त पापों कर रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ।।९।।

इस प्रकार श्री पद्मनंदिआचार्यद्वारा विचरित श्री पद्मनंदिपंचविंशतिका में शांत्यष्टकस्तोत्र समाप्त हुआ।