18.श्रीमज्जिनवर स्तोत्र प्रश्नोत्तरी

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श्रीमज्जिनवर स्तोत्र

प्रश्न ४१२—नेत्रों की सफलता किसमें है ?
उत्तर—जिनेन्द्र भगवान स्वरूप उत्तम पदार्थों को देखने में ही नेत्रों की सफलता है।

प्रश्न ४१३—भव्य जीव को भगवान के दर्शन से कैसा आनन्द प्रतीत होता है ?
उत्तर—भगवान के दर्शन से भव्य जीव को मोक्ष के सुख के बराबर सुख प्रतीत होता है।

प्रश्न ४१४—भगवान के दर्शन से कौन सी वस्तु नष्टप्राय हो जाती है ?
उत्तर—भगवान के दर्शन से बड़ा भारी पाप भी पल भर में नष्ट हो जाता है।

प्रश्न ४१५—भगवान के दर्शन से किस वस्तु की प्राप्ति होती है ?
उत्तर—भगवान के दर्शन से ऐसे—ऐसे अपूर्व पुण्य की प्राप्ति होती है कि वे इस पुण्य की कृपा से इस लोक में तो तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि विभूतियों को प्राप्त करते हैं तथा परलोक में अणिमा, महिमा आदि ऋद्धियों के धारी इन्द्र, अहमिन्द्र आदि विभूतियों को पाते हैं।

प्रश्न ४१६—भगवान के दर्शन से किस प्रकार का सन्तोष उत्पन्न होता है ?
उत्तर—भगवान के दर्शन से ऐसा उत्तम सन्तोष मिलता है जिस सन्तोष के सामने इन्द्र का ऐश्वर्य भी तुच्छ है।

प्रश्न ४१७—जिस मनुष्य को भगवान के दर्शन से आनन्द नहीं होता उसे क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जिस मनुष्य को र्नििवकार, शान्त स्वभावी भगवान को देखकर आनन्द नहीं होता उस मनुष्य को अनन्तकाल तक इस संसार में परिभ्रमण करना पड़ता है।

प्रश्न ४१८—किस कारण से भगवान के दर्शन में भी आकुलता रहती है ?
उत्तर—संसार में जिनेन्द्र भगवान के दर्शन अलभ्य हैं और उनके दर्शन मिलने पर मन की एकाग्रता होनी चाहिए किन्तु पूर्वोर्पािजत कर्मों के प्रभाववश ही प्राणी का मन दूसरे—दूसरे कार्यों से व्याकुलित हो जाता है।

प्रश्न ४१९—जिनेन्द्र भगवान के प्रति विनय करने से क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जिनेन्द्रदेव के दर्शन में इतनी शक्ति है कि जो मनुष्य उन्हें विनयभाव से देखता है उस मनुष्य के जन्म—जन्मांतर के समस्त दुख नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न ४२०—मिथ्यादृष्टि को भगवान का उपदेश कैसा प्रतीत होता है ?

उत्तर—जिस प्रकार पित्त ज्वर वाले को मीठा भी दूध जहर के समान कडुआ लगता है उसी प्रकार उस मिथ्यादृष्टि को भगवान का उपदेश, दर्शन विपरीत ही मालूम पड़ता है।