19 सितम्बर 2018 दशलक्षण धर्म के प्रवचन

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उत्तम संयम धर्म

ऋषभदेवपुरम् के अंदर एक अद्भुत नजारा है, जहाँ पर विश्वशांति महामण्डल के विधान बने हुए हैं। सभी श्रद्धालुगण भगवन्तों का पंचामृत अभिषेक पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ सान्निध्य में करते हैं| और सुमेरु पर्वत के आकार का बना मण्डल उस पर अघ्र्य चढ़ाते हैं, रत्न चढ़ाते हैं, पूज्य बड़ी माताजी विधान के एक-एक मंत्र का इतना सुंदर अर्थ समझाती हैं, कि विद्वान् लोग एक मंत्र पर १ घंटे बोल सकते हैं। प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने दशलक्षण पर्व के उत्तम संयम धर्म पर प्रकाश डाला और दशधर्म को नमन करते हुए मेरे चित्त को पवित्र करें। नि:संदेह कहा जाता है कि धर्म को धारण करने वाले महापुरुष अपनी आत्मा को पवित्र कर लेते हैं। धर्म धारण करने की वस्तु होती है। धर्म आत्मा की वस्तु है, चारित्र को धर्म कहते हैं। दया मूल धर्म है। मुनि भी उत्तम धर्म से लेकर दशधर्म तक ग्रहण करते हैं। माताजी ने १० धर्म की पुस्तक में संयम धर्म का बहुत सुंदर वर्णन तकिया है। समिति प्रवृत्त हुए मुनि जो प्राणी हिंसा में परिहार करते हैं, वह संयम है, इन्द्रिय पर विजय प्राप्त करना संयम है। सम्यग्प्रकार से यम, नियम का पालन करना सबसे बड़ा संयम है। मुनि पूर्णरूप से षट्काय जीवों की रक्षा करते हैं। धर्म का संकट आने पर विरोधी हिंसा का सहारा लेना तो दोष नहीं होगा। एक नदी पानी को अंदर रखती है, पानी जब सीमा में रहता है, तब तक सबके लिए सुखदायी होता है। सभी सीमाओं में रहना संयम कहलाता है। अगर छोटा सा नियम धारण कर लिया तो|

नाम संयम का लेते ही बड़ा डर लगता है, उससे | कहीं कोई नियम पालन न करवा दे गुरु मुझसे | इसलिए तो नहीं जाती नई पढ़ी गुरु पद में | क्योंकि कलंकित रहता है, मन उसका | मगर भारत की मिट्टी से सभी सुन लो | संयम की सही परिभाषा जानकर सभी गुन लो।

पूज्य चंदनामती माताजी ने बहुत ही सुंदर शब्दों में कहा- एक बूढ़ी माँ घर से मंदिर जा रही थी, लाठी कांप रही थीं, एक नवयुवक मिला वह अपनी युवा वस्था पर मदोन्मत हो रहा था, उसने बूढ़ी माँ से पूछा- क्या खोया क्या छिपा दिया है, मुझको सही बता दे। बुढ़िया समझ गई है यह मेरे बुढ़ापे पर हंस रहा है, बूढ़ी माँ ने कहा- तरुणाई का मोती छोटा, मैने वहाँ गिराया। खोज-खोज कर परेशान हूँ, मैंने न ढूंढ पाया।। दोनों की बात सुनकर एक नवयुवक आये और कहने लगे- खोया मोती ढूंढ रही माँ, उचित बात यह लगती। पर तू बेटा जानबूझ कर, तू क्यों खोता तरुणाई का मोती। छोटा सा नियम आप धारण कर ले।

एक राजा के कहने पर दुर्भाव से एक मुनि को रानी ने आहार दिया। रानी कहीं बाहर घूमने जा रही थी, रानी को बहुत बुरा लगा। लेकिन उसने मुनि को दुर्भाव से कड़ी तुमड़ी का आहार दे दिया मुनि की समाधि हो गई। रानी नरक में गई और भी उसे अनेकों पर्याय में दु:ख उठाना पड़ा। शांतिसागर महाराज कहते थे-बाण भिऊ नका-संयम धारण करा संयम और संयमियों की कभी निंदा न करें।

तत्पश्चात पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ने अनेक मंत्र उच्चारण कराये|गौतम गंणधर वाणी का सार भक्तों को बताया|माताजी ने सभी लो मंगल आशीर्वाद कहा है |