1 सितम्बर 2017 प्रवचन

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उत्तम संयम धर्म

दशलक्षण पर्व के सप्तम दिवस पर मंगल दिन की शुरूआत पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के मुखारविंद से उनके द्वारा ही रचित सुप्रभात स्तुति से हुई।
जयति जय जय मंगलं, मम सुप्रभात सुमंगलं।
मंगल शुभ मंगलं, ते सुप्रभात सुमंगलम्।।
तत्पश्चात् भाद्रपद शुक्ला दशमी तिथि दो होने से पूज्य माताजी ने उत्तम संयम दिवस के विषय में भक्तों को अवगत कराया।
उन्होंने बताया कि कैसे संयम के द्वारा यम को रोका जा सकता है। इस विषय पर पूज्य माताजी ने एक कविता की रचना भी की है-
यम आया धरती पर तो, संयम ने उसको रोका।
कान में उसने कह करके कुछ उसे तर्जनी से टोका ।।
बोलो, भाग जा रे यमराज, तेरा यहाँ चले ना राज,
बहुत हुआ तेरा साम्राज्य।
बोला यम, हे संयम भैया! ऐसा मेरा क्या कसूर है,
जो आप मुझे कर रहे, अपने से दूर हैं,
मैं तो यहाँ लोगों के पुराने जीर्ण कपड़े उतारकर,
सुंदर नये वस्त्र पहनाने आया हूँ।
एक गति से दूसरी गति में जीवात्मा को ले जाना आया हूँ।
संयम बोला, हे मेरे प्यारे यम भाई! नहीं है मेरी तुमसे लड़ाई।
But I don't want to go with you
because my seat is reserve for "Moksh" on Siddhshila
Please excuse me and you can go to your place from there.
Hearing his talk, You went from there.

इस कविता के माध्यम से पूज्य माताजी ने भक्तों को उत्तम संयम धर्म की महिमा को बताया।
इसी के पश्चात् परमपूज्य भारतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा सभी व्रतों एवं पर्वों की मंत्र जाप्य कराते हुए श्री गौतम गणधर वाणी के अध्याय सात में मुनिधर्म के वर्णन को बताते हुए कहा कि गौतम गणधर भगवान ने भगवान महावीर के मुख से मुनिधर्म को सुना है। मुनियों के ८४ लाख उत्तर गुण होते हैं, रत्नत्रय को धारण करने वाले, दिगम्बर साधु ही मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं बिना मुनि बने मोक्ष प्राप्त नहीं किया जा सकता।

पूज्य माताजी ने बताया कि कर्मभूमि में तीन ही वर्ण है-क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । ब्राह्मण वर्ण की स्थापना भरत चक्रवर्ती ने की। सभी तीर्थंकर क्षत्रिय कुल में ही जन्म लेते हैं। पूज्य माताजी ने मोक्ष, ऋद्धि, अणुभाग आदि को परिभाषित करते हुए यह भी बताया कि सभी सारों में सार ध्यान है। पूज्य माताजी ने भगवान के जन्मकल्याणक में आने वाले ऐरावत हाथी की भी महिमा बताई। माताजी ने बताया कि ऐरावत हाथी जो होता है, वो नागदत्त नामक आभियोग्य जाति का देव होता है जो विक्रिया से ऐरावत हाथी का रूप धारण कर अत्यन्त पुण्य अर्जित करता है।
ऐरावत हाथी की अवगाहना ४ लाख कोश अर्थात् ८ लाख मील की होती है। एक ऐरावत के चार मुख होते हैं, क्रमानुसार आगे वर्णन करते हुए पूज्य माताजी ने बताया कि एक हाथी के मुख के दांत पर २७ करोड़ नृत्यांगनाएं नृत्य करती हैं। इतना वैभव ऐरावत हाथी का होता है। सरस्वती स्वरूपागणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने भगवान ऋषभदेव के सातवें भव अच्युत इन्द्र के बारे में भी बताया।