2-इन्द्रियमार्गणाधिकार

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इन्द्रियमार्गणाधिकार

अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

इदानीमिन्द्रियमार्गणाप्रमुखत्वेनाल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्राष्टकमवतार्यन्ते-
चउरिंदियपज्जत्ता संखेज्जगुणा।।४४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गुणकार: संख्यातसमया:। प्रतरांगुलस्य असंख्यातभागेन चतुरिन्द्रियपर्याप्तावहार-कालेन ज्योतिष्कदेवीनामवहारकालभूतसंख्यातप्रतरांगुलेषु अपवर्तितेषु संख्यातरूपोपलंभात्।
पंचिंदियपज्जत्ता विसेसाहिया।।४५।।
अत्र विशेष:-चतुरिन्द्रियपर्याप्तानामसंख्यातभाग:।
बेइंदियपज्जत्ता विसेसाहिया।।४६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचेन्द्रियपर्याप्तानामसंख्यातभाग: विशेष: गृहीतव्य:।
तीइंदियपज्जत्ता विसेसाहिया।।४७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीकाद्वीन्द्रियपर्याप्तानामसंख्यातभागो विशेष: गृहीतव्य:।
पंचिंदियअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।४८।।
चउरिंदियअपज्जत्ता विसेसाहिया।।४९।।
तेइंदियअपज्जत्ता विसेसाहिया।।५०।।
बेइंदियअपज्जत्ता विसेसाहिया।।५१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रीन्द्रियपर्याप्तापेक्षया पंचेन्द्रियापर्याप्तानामसंख्यातगुणा:। अत्र गुणकार:-आवलिकाया: असंख्यातभाग:। चतुरिन्द्रियापर्याप्ता: विशेषाधिका:-पंचेन्द्रियापर्याप्तानामसंख्यातभाग:। त्रीन्द्रियापर्याप्ता: विशेषाधिका:-चतुरिन्द्रियापर्याप्तानामसंख्यातभाग: विशेषोऽस्ति। द्वीन्द्रियापर्याप्ताश्च विशेषाधिका:-त्रीन्द्रियपर्याप्तानामसंख्यातभाग:। अत्र त्रिसूत्रेषु प्रतिभाग:आवलिकाया: असंख्यातभागो गृहीतव्य:।
एवं इन्द्रियमार्गणाप्रमुखत्वेनाल्पबहुत्वप्रतिपादनेऽष्टसूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे महादण्डकनाम - द्वादशे महाधिकारे
गणिनीज्ञानमतीकृत - सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणायामल्पबहुत्व-
निरूपकोऽयं द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार

अब यहाँ इन्द्रियमार्गणा की प्रमुखता से अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने हेतु आठ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

चतुरिन्द्रिय पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं।।४४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गुणकार संख्यात समय है, क्योंकि प्रतरांगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण चतुरिन्द्रिय पर्याप्त जीवों के अवहारकाल से ज्योतिषी देवियों के अवहारकाल भूत संख्यात प्रतरांगुलों के अपवर्तित करने पर संख्यातरूप उपलब्ध होते हैं।

सूत्रार्थ-

उनसे पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।४५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ विशेष का प्रमाण चतुरिन्द्रिय पर्याप्त जीवों के असंख्यातवें भाग प्रमाण है।

सूत्रार्थ-

उनसे द्वीन्द्रिय पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।४६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ विशेष का प्रमाण पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के असंख्यातवें भाग प्रमाण ग्रहण करना चाहिए।

सूत्रार्थ-

उनसे त्रीन्द्रिय पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।४७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दो इन्द्रिय पर्याप्त जीवों का असंख्यातवाँ भाग प्रमाण यहाँ विशेष ग्रहण करना चाहिए।

सूत्रार्थ-

उनसे पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।४८।।

उनसे चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।४९।।

उनसे त्रीन्द्रिय अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।५०।।

उनसे द्वीन्द्रिय अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।५१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रीन्द्रिय पर्याप्त जीवों की अपेक्षा पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का प्रमाण असंख्यातगुणा है। यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है। उनसे चार इन्द्रिय अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं। यहाँ विशेष का अर्थ पंचेन्द्रिय अपर्याप्तकों के असंख्यातवें भाग प्रमाण है। उनसे तीन इन्द्रिय अपर्याप्तकजीव विशेष अधिक हैं। चार इन्द्रिय अपर्याप्तकों का असंख्यातवाँ भाग यहाँ विशेष जानना है। उनसे दो इन्द्रिय अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं। यहाँ विशेष से तीन इन्द्रिय अपर्याप्तकों का असंख्यातवाँ भाग जानना। यहाँ तीन सूत्रों में प्रतिभाग आवली का असंख्यातवाँ भाग ग्रहण करना चाहिए।

इस प्रकार से इन्द्रियमार्गणा की प्रमुखता से अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में महादण्डक नाम के बारहवें महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में इन्द्रियमार्गणा में अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाला द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।

अथ कायमार्गणाधिकार:

संप्रति कायमार्गणाप्रमुखत्वेनाल्पबहुत्वनिरूपणाय अष्टाविंशतिसूत्राण्यवतार्यन्ते-

बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वीन्द्रियापर्याप्तजीवापेक्षया इमे जीवा: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: पल्योपमस्यासंख्यातभाग:।
बादरणिगोदजीवा णिगोदपदिट्ठिदा पज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५३।।
गुणकार: आवलिकाया असंख्यातभाग:।
बादरपुढविपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५४।।
बादरआउपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५५।।
द्वयो: सूत्रयो: गुणकार: आवलिकाया असंख्यातभाग:।
बादरवाउपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५६।।
गुणकार: असंख्याता: श्रेण्य: प्रतरांगुलस्यासंख्यातभागमात्रा: सन्ति।
बादरतेउअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५७।।
गुणकार: असंख्याता लोका्र:। तेषामध्र्दच्छेदनानि सागरोपमं पल्योपमस्यासंख्यातभागेनोनं।
बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरा अपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंख्याता लोका्र: गुणकारोऽस्ति, तेषामद्र्धच्छेदनानि पल्योपमस्यासंख्यातभाग:।
बादरणिगोदजीवा णिगोदपदिट्ठिदा अपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५९।।
गुणकार: पूर्ववत्।
बादरपुढविकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।६०।।
बादरआउकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।६१।।
बादरवाउकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।६२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रिषु सूत्रेषु गुणकार: असंख्याता लोका: कथ्यन्ते।
सुहुमतेउकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।६३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गुणकार: असंख्याता लोका:। तेषामद्र्धच्छेदनानि असंख्याता लोका:।
कथं ज्ञायते ? गुरूपदेशाद् ज्ञायते।
सुहुमपुढविकाइया अपज्जत्ता विसेसाहिया।।६४।।
अत्र विशेषोऽसंख्याता लोका:, सूक्ष्मतेजस्कायिकापर्याप्तानामसंख्यातभाग:।
क: प्रतिभाग: ? असंख्याता लोका:।
सुहुमआउकाइयअपज्जत्ता विसेसाहिया।।६५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विशेषोऽसंख्याता लोका:, सूक्ष्मपृथिवीकायिकापर्याप्तानामसंख्यातभाग:।
सुहुमवाउकाइयअपज्जत्ता विसेसाहिया।।६६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विशेषोऽत्रापि असंख्याता लोका:, सूक्ष्माप्कायिकापर्याप्तानामसंख्यातभाग:।
अत्रापि प्रतिभाग:-असंख्याता लोका:।
सुहुमतेउकाइयपज्जत्ता संखेज्जगुणा।।६७।।
गुणकार: संख्यातसमया:।
सुहुमपुढविकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।६८।।
सुहुमआउकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।६९।।
सुहुमवाउकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।७०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रिष्वपि सूत्रेषु विशेष: असंख्याता लोका ज्ञातव्या:।
अकाइया अणंतगुणा।।७१।।
गुणकार: अभव्यसिद्धिर्जीवैरनन्तगुणोऽस्ति, इमेऽकायिका: सिद्धा एव।
बादरवणप्फदिकाइयपज्जत्ता अणंतगुणा।।७२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंख्यातलोकगुणिताकायि: अपवर्तितसर्वजीवराशिप्रमाणत्वात्।
बादरवणप्फदिकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।७३।।
गुणकारोऽसंख्याता लोका:।
बादरवणप्फदिकाइया विसेसाहिया।।७४।।
अत्र विशेष: बादरवनस्पतिकायिकपर्याप्तमात्र:।
सुहुमवणप्फदिकाइया अपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।७५।।
गुणकार: असंख्याता लोका:।
सुहुमवणप्फदिकाइया पज्जत्ता संखेज्जगुणा।।७६।।
गुणकार: संख्यातसमया:।
सुहुमवणप्फदिकाइया विसेसाहिया।।७७।।
अत्र विशेष:-सूक्ष्मवनस्पतिकायिकापर्याप्तमात्रोऽस्ति।
वणप्फदिकाइया विसेसाहिया।।७८।।
विशेष:-बादरवनस्पतिकायिकमात्र:।
णिगोदजीवा विसेसाहिया।।७९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र विशेष:-बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरबादरनिगोदप्रतिष्ठितमात्रोऽस्ति।
एवं कायमार्गणाप्रमुखाल्पबहुत्वेनाष्टाविंशतिसूत्राणि गतानि।
अत्र उपसंहार: क्रियते-अस्मिन्नल्पबहुत्वमहादण्डकनाममहाधिकारे ‘‘सव्वत्थोवा मणुसपज्जत्ता गब्भोवक्कंतिया’’ इति सूत्रादारभ्य ‘‘णिगोदजीवा विसेसाहिया’’ इति एकोनाशीति-अंकेनान्तिमसूत्रपर्यन्तं विशेषेण चूलिकारूपेण वाल्पबहुत्वं निरूपितम्। एतत्पठित्वा प्रत्यहं प्रतिक्षणं च चिन्तनीयमस्माभि:-
पर्याप्तमनुष्याणां संख्या केवलमेकोनत्रिंशदंकप्रमाणास्ति, निगोदजीवानां च अनन्तानन्तप्रमाणा:। निगोदपर्यायेभ्यो मनुष्यपर्यायत्वं अतीव दुर्लभं, अस्मिन् विषये केवलमेकमेवोदाहरणं दृश्यते आगमे। तथाहि-
अदृष्टपूर्वतीर्थेशा:, प्रविष्टा: समवस्थितिम्।
कदाचिच्चक्रिणा सार्धं, विवद्र्धनपुरोगमा:।।३।।
क्लिष्टा: स्थावरकायेष्वनादिमिथ्यात्वदृष्टय:।
दृष्ट्वा भगवतो लक्ष्मीं राजपुत्रा: सुविस्मिता:।।४।।
अन्तर्मुहूर्तकालेन, प्रतिपन्नसुसंयमा:।
त्रयोविंशान्यहो चित्रं, शतानि नवभिर्बभु:।।५।।
विवद्र्धनकुमारादयो भरतचक्रिण: पुत्रा: त्रयोविंशत्यधिकनवशतप्रमाणा: स्वपित्रा सह श्रीऋषभदेवस्य समवसरणे आगत्य भगवन्तं समवसरणवैभवसहितं विलोक्य भक्तिभावेन वंदनां कृत्वोपदेशं श्रुत्वा जैनेश्वरीं दीक्षां जगृहु:। ये सर्वे तीर्थकरपौत्रा निगोदपर्यायेण स्थावरकायेन आजग्मु:। एते प्रथमबारं मनुष्यपर्यायं संप्राप्यैव मोक्षं प्रापु:, एतदाश्चर्यमेव।
एतस्माद्विपर्ययस्य कथनं श्रीपद्मनन्दि-आचार्यवचनेनैव द्रष्टव्यं-
इंद्रत्वं च निगोदतां च बहुधा मध्ये तथा योनय:।
संसारे भ्रमता चिरं यदखिला: प्राप्ता मयानन्तश:।।
तन्नापूर्वमिहास्ति किंचिदपि मे हित्वा विकल्पावलिम्।
सम्यग्दर्शनबोधवृत्तपदवीं तां देव! पूर्णां कुरु।।३१।।
एतेन ज्ञायते अनन्तवारान् मया निगोदपर्यायत्वं प्राप्तं।
अस्योदाहरणमपि महापुराणे दृश्यते-
विद्याधरराज्ञो महाबलस्य चतु:षु मंत्रिषु मध्ये द्वौ मंत्रिणौ निगोदं जग्मतु:।
एकदा श्रीधरदेव: स्वगुरुं प्रीतिंकरसर्वज्ञं नमस्कृत्य पपृच्छ-
भगवन्! मम त्रयो मंत्रिण: कीदृशीं गतिं प्रापु: ?
तदेवोच्यते-
महाबलभवे येऽस्मन्मंत्रिणो दुर्दृशस्त्रय:।
ते लब्धजन्मान: कीदृशीं वा गतिंश्रिता:।।४।।
इति पृष्टवते तस्मै सोऽवोचत् सर्वभाववित्।
तन्मनोध्वान्तसंतान-मपाकुर्वन् वचोंऽशुभि:।।५।।
त्वयि स्वर्गगतेऽस्मासु लब्धबोधिषु ते तदा।
प्रपद्य दुर्मृतिं याता वियाता वत दुर्गतिम्।।६।।
द्वौ निगोदास्पदं यातौ तमोऽन्धं यत्र केवलम्।
तप्ताधिश्रयणोद्वत्र्त-भूयिष्ठैर्जन्ममृत्युभि:।।७।।
गत: शतमति: श्वभ्रं मिथ्यात्वपरिपाकत:।
विपाकक्षेत्रमाम्नातं तद्धि दुष्कृतकर्मणाम्।।८।।
मिथ्यात्वविषसंसुप्ता ये मार्गपरिपन्थिन:।
ते यान्ति दीर्घमध्वानं कुयोन्यावत्र्तसंकुलम्।।९।।
तमस्यन्धे निमज्जन्ति सज्ज्ञानद्वेषिणो नरा:।
आप्तोपज्ञमतो ज्ञानं बुधोऽभ्यस्येदनारतम्१।।१०।।
अत एव चतुर्गतिनिगोदपर्यायेषु अस्माकं गमनं न भवेदिति भीरुतया जिनेन्द्रचरणांबुरुहेषु प्रकृष्टा भक्तिर्विधेयास्माभि:।
तथैव प्रोक्तं श्रीमदमितगतिसूरिणा-
मुनीश! लीनाविव कीलिताविव, स्थिरौ निखाताविव बिम्बिताविव।
पादौ त्वदीयौ मम तिष्ठतां सदा, तमो धुनानौ हृदि दीपिकाविव।।
ईदृग्भावनया चतुर्विंशतितीर्थंकरान् त्रिकरणशुद्ध्या वंदामहे वयं भूरिभक्त्या नित्यम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे महादण्डकनाम द्वादशे-महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां कायमार्गणाादषु अल्पबहुत्व-प्रतिपादकोऽयं तृतीयोऽधिकार: समाप्त:।

अथ कायमार्गणा अधिकारतत्वार्थ सूत्र प्रशनोत्तरी

अब कायमार्गणा की प्रमुखता से अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु अट्ठाईस सूत्र अवतीर्ण किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दो इन्द्रियअपर्याप्त जीवों की अपेक्षा ये जीव असंख्यातगुणे हैं। यहाँ गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है।

उनसे बादर निगोदजीव निगोदप्रतिष्ठित पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।५३।।

टीका-यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है।

उनसे बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।५४।।

उनसे बादर अप्कायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।५५।।

टीका-यहाँ दोनों सूत्रों का गुणकार आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण है।

उनसे बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।५६।।

टीका-यहाँ गुणकार असंख्यात जगत्श्रेणियाँ हैं, जो कि प्रतरांगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।

उनसे बादर तेजस्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।५७।।

टीका-यहाँ गुणकार असंख्यातलोकप्रमाण है। उनके अद्र्धच्छेद पल्योपम के असंख्यातवें भाग से हीन सागरोपमप्रमाण हैं।

उनसे बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।५८।।

टीका-'यहाँ असंख्यात लोकप्रमाण गुणकार है, उनके अद्र्धच्छेद पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं।

उनसे बादर निगोद जीव निगोद प्रतिष्ठित अपर्याप्त असंख्यातगुणे हैं।।५९।।

टीका-यहाँ गुणकार पूर्व के समान ही है।

उनसे बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।६०।।

उनसे बादर अप्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।६१।।

उनसे बादर वायुकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।६२।।

टीका-तीनों सूत्रों में गुणकार असंख्यातलोकप्रमाण बताया गया है।

उन उपर्युक्त बादर वायुकायिक अपर्याप्त जीवों से सूक्ष्म तेजस्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।६३।।

टीका-यहाँ गुणकार असंख्यात लोक प्रमाण है। उनके अद्र्धच्छेद असंख्यात लोकप्रमाण हैं।

शंकायह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-यह गुरु के उपदेश से जाना जाता है।

उनसे सूक्ष्म पृथिवीकायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।६४।।

टीका-यहाँ विशेष का प्रमाण असंख्यात लोक प्रमाण है, जो कि सूक्ष्म तेजस्कायिक अपर्याप्तों के असंख्यातवें भाग है। प्रतिभाग क्या है ? असंख्यातवाँ लोक प्रतिभाग है।

उनसे सूक्ष्म अप्कायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।६५।।

टीका-यहाँ विशेष असंख्यातलोक हैं, जो कि सूक्ष्म पृथिवीकायिक अपर्याप्तक जीवों के असंख्यातवें भाग प्रमाण है।

उनसे सूक्ष्म वायुकायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।६६।।

टीका-यहाँ भी विशेष का प्रमाण असंख्यातलोक प्रमाण है, जो कि सूक्ष्म जलकायिक अपर्याप्तकों का असंख्यातवाँ भाग है।

यहाँ भी प्रतिभाग का प्रमाण असंख्यात लोकप्रमाण है।

उनसे सूक्ष्म तेजस्कायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं।।६७।।

यहाँ गुणकार संख्यात समय है।

उनकी अपेक्षा सूक्ष्म पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।६८।।

उनसे सूक्ष्म वायुकायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।६९।।

उपर्युक्त जीवों की अपेक्षा सूक्ष्म अप्कायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।७०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तीनों सूत्रों में विशेष का प्रमाण असंख्यात लोकप्रमाण जानना चाहिए।

उनसे अकायिक जीव अनन्तगुणे हैं।।७१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीकायहाँ गुणकार अभव्यसिद्धिक जीवों से अनन्तगुणा है। ये अकायिक जीव सिद्धपरमेष्ठी ही होते हैं।

इन सिद्ध जीवों की अपेक्षा बादर वनस्पतिकायिक पर्याप्त जीव अनन्तगुणे हैं।।७२।।

टीका-वे असंख्यातलोक से गुणित अकायिक जीवों से अपवर्तित सर्वजीवराशि प्रमाण हैं।

उनसे बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।७३।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'यहाँ गुणकार असंख्यातलोक प्रमाण है।

उनसे बादर वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।७४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ विशेष का मान बादरवनस्पतिकायिक पर्याप्त जीवों के बराबर है।

उनकी अपेक्षा सूक्ष्म वनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।७५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार असंख्यातलोक प्रमाण है।

उपर्युक्त जीवों की अपेक्षा सूक्ष्म वनस्पतिकायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं।।७६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार संख्यातसमय प्रमाण है।

उनसे सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।७७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ विशेष का प्रमाण सूक्ष्मवनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीवों के बराबर है।

उनकी अपेक्षा वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।७८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ विशेष का प्रमाण बादरवनस्पतिकायिक जीवों के प्रमाण सदृश है।

इन सबकी अपेक्षा निगोद जीव विशेष अधिक हैं।।७९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ विशेष का प्रमाण बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर बादर निगोद प्रतिष्ठित जीवों के प्रमाण के बराबर है।

इस प्रकार कायमार्गणा की प्रमुखता से अल्पबहुत्व का वर्णन करने वाले अट्ठाईस सूत्र पूर्ण हुए।

अब यहाँ चूलिका का उपसंहार किया जा रहा है-

इस अल्पबहुत्व प्रकरण के महादण्डक अधिकार में ‘‘गर्भ जन्म को प्राप्त पर्याप्तक मनुष्य सबसे कम हैं’’ इस सूत्र से आरंभ करके ‘‘निगोदिया जीव विशेष अधिक हैं’’ इस प्रकार उन्यासी अंक के द्वारा अंतिम सूत्र पर्यन्त विशेषरूप से अथवा चूलिकारूप से अल्पबहुत्व निरूपित किया गया है, ऐसा पढ़कर हम सभी को प्रतिदिन और प्रतिक्षण चिन्तन करना चाहिए कि-

पर्याप्त मनुष्यों की संख्या केवल उनतीस अंक प्रमाण है और निगोदिया जीवों की संख्या अनन्तानन्त प्रमाण है। निगोद पर्याय से मनुष्य पर्याय की प्राप्ति अतीव दुर्लभ है। इस विषय में केवल एक ही उदाहरण आगम में देखा जाता है। जो इस प्रकार है-

श्लोकार्थ-किसी समय चक्रवर्ती भरत के साथ विवद्र्धनकुमार आदि नौ सौ तेईस राजकुमार भगवान् के समवसरण में प्रविष्ट हुए। उन्होंने पहले कभी तीर्थंकर के दर्शन नहीं किये थे।।३।।
वे सभी राजकुमार अनादि मिथ्यादृष्टि थे और अनादिकाल से ही स्थावरकायिक जीवों में संक्लेश को प्राप्त हुए थे। भगवान की समवसरण लक्ष्मी को देखकर वे सभी आश्चर्यचकित हो गये।।४।।
अहो! आश्चर्य है कि समवसरण में पहुँचकर उन सभी नौ सौ तेईस राजकुमारों ने अन्तर्मुहूर्त मात्र में संयम को प्राप्त कर लिया।।५।।

भरतचक्रवर्ती के विवर्धन कुमार आदि नौ सौ तेईस पुत्रों ने अपने पिता के साथ तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभदेव के समवसरण में आकर भगवान को समवसरण वैभव से सहित देखकर उनकी भक्तिभाव से वंदना की और उनका उपदेश सुनकर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली थी। ये सभी तीर्थंकर भगवान के पौत्र निगोद पर्याय से-स्थावरकाय से आये थे। सभी ने प्रथम बार मनुष्य पर्याय को प्राप्त करके उसी भव से मोक्ष प्राप्त कर लिया, यह आश्चर्य की ही बात है।

इससे विपरीत अवस्था का कथन श्रीपद्मनंदि आचार्यदेव के वाक्यों में द्रष्टव्य है-

श्लोकार्थ-हे भगवन्! इस संसार में भ्रमण करते हुए मैंने इन्द्रपना, निगोदपना एवं बीच में अन्य भी अनेक योनियों में अनन्तबार जन्म धारण किया है। इसलिए ये कोई भी पदवी मेरे लिए अपूर्व नहीं हैं, किन्तु मोक्ष को प्रदान करने वाली सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की पदवी को हे देव! अब मुझमें पूर्ण कीजिए-प्रदान कीजिए।।३१।।

इससे ज्ञात होता है कि मैंने अनन्तबार निगोदपर्याय प्राप्त की है।

इसका उदाहरण भी महापुराण ग्रंथ (आदिपुराण) में देखने को मिलता है-

विद्याधर राजा महाबल के चार मंत्रियों में से दो मंत्री निगोद में (मिथ्यात्व के कारण) चले गये थे।

एक बार श्रीधरदेव ने अपने गुरु श्रीप्रीतिंकर सर्वज्ञ भगवान् को नमस्कार करके उनसे पूछा-

भगवन्! मेरे तीनों मंत्री किस गति को प्राप्त हुए हैं ?

इसी प्रकरण को कहते हैं-

श्लोकार्थ-हे प्रभो! मेरे महाबल राजा के भव में जो मेरे तीन मिथ्यादृष्टि मंत्री थे, वे इस समय कहाँ उत्पन्न हुए हैं, अर्थात् उन लोगों ने कौन सी गति प्राप्त की है ?।।४।।
इस प्रकार पूछने वाले श्रीधर से सर्वज्ञदेव ने अपने वचनरूपी किरणों के द्वारा उसके हृदय में व्याप्त समस्त अज्ञान अंधकार को नष्ट करते हुए कहना प्रारंभ किया।।५।।
हे भव्य! जब तू राजा महाबल की पर्याय से शरीर छोड़कर चला गया और मैंने रत्नत्रय को प्राप्त कर दीक्षा धारण कर ली, तब खेद है कि उन तीन धृष्ट (दुष्ट) मंत्रियों ने कुमरण से मरकर दुर्गति को प्राप्त कर लिया।।६।।
उन तीनों में से महामति और संभिन्नमति ये दो उस निगोद स्थान को प्राप्त हुए हैं, जहाँ मात्र सघन अंधकार ही अंधकार है और जहाँ अत्यन्त तप्त उबलते हुए जल में उठने वाली खलबलाहट के समान अनेक बार (एक श्वांस में अट्ठारह बार) जन्म-मरण होते रहते हैं।।७।।
तथा शतमति नाम का मंत्री अपने मिथ्यात्व भाव के कारण नरकगति में गया है। क्योंकि वास्तव में बुरे कर्मों का फल भोगने के लिए नरक ही मुख्य क्षेत्र है।।८।।
जो जीव मिथ्यात्वरूपी विष से मूच्र्छित होकर समीचीन जैनमार्ग का विरोध करते हैं, वे कुयोनिरूपी भँवरों से व्याप्त इस संसाररूपी मार्ग में दीर्घ काल तक भ्रमण करते हैं।।९।।
चूँकि सम्यग्ज्ञान के विरोधी जीव अवश्य ही नरकरूपी गाढ़ अंधकार में निमग्न होते हैं, इसलिए विद्वान् पुरुषों को आप्त प्रणीत सच्चे आगम का ही निरन्तर अभ्यास करना चाहिए।।१०।।

इसलिए चतुर्गतिरूप निगोद पर्यार्यों में हमारा गमन न होवे इस भीरुता-भय से जिनेन्द्र भगवान के चरणकमलों में हम सभी को उत्कृष्ट भक्ति करनी चाहिए।

यही बात श्री अमितगति आचार्य ने कही है-

श्लोकार्थ-हे मुनियों के ईश जिनेन्द्र भगवान्! आपके चरणयुगल मेरे हृदय में लीन हो जावें, बस जावें, कीलित हो जावें, स्थिर हो जावें, उत्कीर्ण हो जावें, बिम्बित हो जावें और अज्ञान अंधकार को नष्ट करके मेरे हृदय को आलोकित करते हुए सदा-सदा के लिए हृदय में स्थित रहें, यही प्रार्थना है।

इस प्रकार की भावना भाते हुए चौबीसों तीर्थंकर भगवन्तों की हम त्रिकरणशुद्धिपूर्वक खूब भक्ति से नित्य ही वंदना करते हैं।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में महादण्डक नाम के महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में कायमार्गणा आदि में अल्पबहुत्व का प्रतिपादक यह तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।

अथ ग्रन्थस्योपसंहार:-

ततश्च यस्य युगादिब्रह्मणो देवाधिदेवस्य श्रीऋषभदेवस्य ‘समवसरणश्रीविहार-’ योजना संप्रति सनद्धेन चलति स देवदेवो मया नंनम्यते।

प्रभो: ऋषभदेवस्य समवादिसृतिर्भुवि। श्रीविहारोऽपि देवस्य सर्वमंगलकारणम्।।१।।
साक्षात्पूर्वं बभूवापि रूपेण च प्रतिकृते:। वर्तमाने भवेच्चाग्रे सर्वमंगलकारणम्।।२।।
आधिव्र्याधिर्विपत्तिश्च नश्येद् देवप्रभावत:। क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भूयाल्लोके च मंगलम्।।३।।
इत्थं त्रिचत्त्वािंरशत्सूत्रैर्बन्धसत्त्वप्ररूपणाख्यां भूमिकां प्रतिपाद्य महादण्डकनाम्ना चूलिकया सह एकोनपंचाशदधिकपंचदशशतसूत्रै: सर्वे मिलित्वा चतुर्णवत्यधिपंचदशशतसूत्रैर्वा क्षुद्रकबन्धग्रन्थोऽयं पूर्णतामगात्।
अस्मिन् क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे महाग्रन्थे भूमिका-पीठिका-नामैकोऽधिकार:, एकजीवापेक्षया स्वामित्वनाममहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, एकजीवापेक्षया कालनाममहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, एकजीवापेक्षयान्तरनाममहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, नानाजीवापेक्षया भंगविचयनाममहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, द्रव्यप्रमाणानुगमाख्यमहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, क्षेत्रानुगमाख्यमहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, स्पर्शनानुगमनाममहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, नानाजीवापेक्षया कालाख्यमहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, नानाजीवापेक्षयान्तराख्यमहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, भागाभागानुगमनाममहाधिकारे षडधिकारा:, अल्पबहुत्वनाममहाधिकारे चतुर्दशाधिकारा:, दण्डकनाममहाधिकारे त्रयोऽधिकारा विभक्तीकृता: सन्ति।
ततश्च द्वादश महाधिकारा:, पञ्चाशदधिकैकशताधिकारा ज्ञातव्या भवन्ति। सूत्राणि षड्न्यूनषोडशशतानि सन्ति।
श्रीसरस्वतीमातु: कृपाप्रसादादेतन्महाग्रन्थमधीत्यानन्तश: देवशास्त्रगुरून् अहं नंनमीमि त्रिकरणशुद्ध्या भक्तिभावेन।
वीराब्दे दिग्द्विखद्व्यंके शान्तिनाथस्य सन्मुखे। मार्गे सिते त्रयोदश्यां, हस्तिनागपुराभिधे।।१।।
षट्खण्डागमग्रन्थेऽस्मिन् खण्डद्वितीयकस्य हि। क्षुद्रकबन्धनाम्नोऽस्य टीकेयं पर्यपूर्यत।।२।।
गणिन्या ज्ञानमत्येयं टीका ग्रन्थश्च भूतले। जीयात् ज्ञानद्र्धये भूयात् भव्यानां मे च सन्ततम्।।३।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्यान्तर्गते श्रीभूतबल्याचार्यविरचिते क्षुद्रक-
बंधनाम्नि द्वितीयखण्डे श्रीवीरसेनाचार्यविरचितधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्ती श्री शान्तिसागरस्तस्य प्रथमशिष्य: प्रथम-पट्टाधीशश्च श्रीवीरसागराचार्यस्तस्य शिष्या जंबूद्वीपरचना प्रेरिका-गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां महादण्डको नामा द्वादशो महाधिकार: समाप्त:।
समाप्तोऽयं क्षुद्रकबंधनाम्ना द्वितीयखण्डो ग्रन्थ:।
इति वर्धतां जिनशासनम्।

यहाँ ग्रंथ का उपसंहार करते हैं-

जिन युगादिब्रह्मा देवाधिदेव श्री ऋषभदेव तीर्थंकर भगवान के ‘‘समवसरण श्रीविहार’’ की योजना इन दिनों सन्नद्ध-उत्साहपूर्वक तत्परता के साथ चल रही है, वे देवोें के देव भगवान ऋषभदेव-आदिनाथ मेरे द्वारा पुन: पुन: नमस्कृत हैं, अर्थात् मैं उन्हें कोटि-कोटि वंदन करती हूँ।

श्लोकार्थ-इस धरती पर तीर्थंकर प्रभु ऋषभदेव का समवसरण जीवन्त रहे तथा उसका श्रीविहार भी सभी के लिए मंगलकारी होवे।।१।।

पूर्व में जिनका समवसरण साक्षात् बना था और वर्तमान में उसकी प्रतिकृति बनाई जाती है तथा आगे भविष्य में भी यह समवसरण सभी के लिए मंगलकारी होवे।।२।।

श्री जिनेन्द्रदेव के प्रभाव से सभी की आधि-व्याधि और विपत्तियाँ नष्ट होवें, एवं सम्पूर्ण लोक में क्षेम-सुभिक्ष-आरोग्यता का संचार होकर मंगलमय वातावरण बने, यही मेरी मंगल भावना है।।३।।

इस प्रकार से तेंतालिस सूत्रों के द्वारा बंधसत्वप्ररूपणा नाम की चूलिका का प्रतिपादन करके महादण्डक नाम की चूलिका के साथ पन्द्रह सौ उनंचास (१५४९) सूत्रों के द्वारा अथवा सब कुल मिलाकर पन्द्रह सौ चौरानवे (१५९४) सूत्रों के द्वारा क्षुद्रकबंध नाम का यह ग्रंथ पूर्ण हुआ।

इस क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड रूप महाग्रंथ में भूमिका अर्थात् पीठिका नाम का एक अधिकार है पुन: एक जीव की अपेक्षा से स्वामित्व नामक महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, एक जीव की अपेक्षा कालानुगम नामक महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम नामक महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, नाना जीव की अपेक्षा भंगविचय नाम के महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, द्रव्यप्रमाणानुगम नाम के महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, क्षेत्रानुगम नाम के महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, स्पर्शनानुगम नाम के महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, नानाजीव की अपेक्षा कालानुगम नाम के महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, नाना जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम नाम के महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, भागाभागानुगम नाम के महाधिकार में छह अधिकार हैं, अल्पबहुत्वानुगम नाम के महाधिकार में चौदह अधिकार हैं, दण्डक नाम के महाधिकार में तीन अधिकार विभक्त किये गये हैं।

इस प्रकार बारह महाधिकार और एक सौ पचास अधिकार बताये गये हैं। छह कम सोलह सौ (१६००-६·१५९४) अर्थात् पन्द्रह सौ चौरानवे सूत्र हैं। श्री सरस्वती माता की कृपा प्रसाद से इस महाग्रंथ को पढ़कर मैं देव-शास्त्र-गुरु को त्रिकरणशुद्धिपूर्वक भक्तिभाव से अनन्तबार नमस्कार करती हूँ। श्लोकार्थ-वीर निर्वाण संवत् २५२४ मगसिर शु. त्रयोदशी (१२ दिसम्बर १९९७) को हस्तिनापुर तीर्थ पर (जम्बूद्वीप रचना स्थल पर रत्नत्रयनिलय नाम की वसतिका में) तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ के सन्मुख इस षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड की यह टीका मैंने लिखकर पूर्ण किया। मुझ गणिनी आर्यिका ज्ञानमती द्वारा संस्कृत में रचित यह टीका एवं यह षट्खण्डागम ग्रंथ इस पृथ्वीतल पर सदा जयशील होवें तथा मेरे और समस्त भव्यात्माओं (ज्ञानपिपासु) के लिए सदाकाल ज्ञानरूपी ऋद्धि की प्राप्ति के लिए कारण बने, यही मंगल भावना है।।१-२-३।।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पुष्पदंत-भूतबली प्रणीत षट्खण्डागम ग्रंथ के अन्तर्गत श्री भूतबली आचार्य द्वारा रचित क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में श्री वीरसेनाचार्य विरचित धवला टीका को प्रमुख आधार बनाकर अन्य अनेक ग्रंथों के आधार से रचित बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज उनके प्रथम शिष्य एवं प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर महाराज की शिष्या जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में महादण्डक नामक बारहवाँ महाधिकार समाप्त हुआ।

यहाँ यह क्षुद्रकबंध नाम का द्वितीय खण्ड रूप ग्रंथ पूर्ण हुआ।

जैन शासन सदा वृद्धिंगत होवे।