2.क्षुल्लिका दीक्षा

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क्षुल्लिका दीक्षा

समाहित विषयवस्तु

१. आचार्यश्री का लखनऊ विहार-ब्र.मैना का भी संघ साथ जाना।

२. संघ श्रीमहावीर जी पहुँचा।

३. आचार्यश्री से दीक्षा की प्रार्थना।

४. आचार्यश्री द्वारा क्षुल्लिका दीक्षा देना।

५. नाम क्षुल्लिका वीरमती रखा गया।

६. आचार्यश्री द्वारा शुभाशीष।

७. माता मोहिनी का दर्शनार्थ आना।

८. माता मोहिनी द्वारा स्वयं को घर से उद्धार का निवदेन।

९. माता मोहिनी की गृह वापसी-टिकैतनगर को शुभ समाचार।

काव्य पद

चातुर्मास हुआ निष्ठापित, आचार्यश्री का हुआ विहार।

सत्य अहिंसा ध्वज फहराते, पग-पग करते धर्म प्रचार।।
अवधप्रांत, लखनऊ रजधानी, डालीगंज में ठहरा संघ।
बालयोगिनी संघ साथ में, मैना चलती सहित उमंग।।२००।।

लखनऊ से श्री महावीर जी, यात्रा लक्ष्य बना गुरुवर।
कर विहार चंद्रप्रभ चरणों, संघ था पहुँचा सोनागिर।।
पुण्यप्रदा तीर्थ की यात्रा, पावन हो जाते पग-माथ।
सहस गुणा पुण्य बढ़ जाता, यदि हो साधु-संघ के साथ।।२०१।।

कोमल अंग, बालवय कन्या, मार्ग बिछे कंकण-पत्थर।
माघ-पौष की सर्द हवायें, शरीर काँपता है थर-थर।।
मन विरागिनी, कष्ट सहिष्णु, धीर-वीर यह कन्या है।
एक ही साड़ी, ठंड निकाली, एक अशन अति धन्या है।।२०२।।

आचार्यश्री देशभूषण जी, संघ चतुर्विध किया प्रधान।
सोनागिरि से महावीर जी, क्रमश: पहुँच गया शुभ थान।।
फाल्गुन पर्व अठाई पहले, हुआ क्षेत्र पर शुभागमन।
बड़े भाग्य से पाये सबने, महावीर प्रभु के दर्शन।।२०३।।

ब्रह्मचारिणी मैना दीदी, के मन रही एक इच्छा।
अचिरकाल प्राप्त हो जाये, जग कल्याणी जिन दीक्षा।।
समय-समय बहु किये निवेदन, पुन: यहाँ भी विनती की।
देख पात्रता श्रीगुरुवर ने, शुभाशीष-सह स्वीकृति दी।।२०४।।

चैत्रकृष्ण एकम् सन् त्रेपन, आई घड़ी वह मंगलमय।
भवसागर से पार उतरने, का आया उपयुक्त समय।।
प्रातकाल मैना दीदी ने, प्रभु आराधन-पूजन की।
फिर सुहागिनी महिलाओं ने, की मंगल स्नान विधी।।२०५।।

श्रीफल ले पाण्डाल में गर्इं, आचार्यश्री से विनती की।
तारण-तरण जहाज श्रीगुरु, सुन लीजे मेरी अरजी।।
हे गुरुवर! मैं तो अनादि से, भव-वन में हूँ भटक रही।
मोह महावैरी ने लूटा, दुख दावानल झुलस रही।।२०६।।

नरक-निगोद चार गतियों में, दु:ख अनंते पाई हूँ।
अब उनसे छुटकारा पाने, शरण आपकी आई हूँ।।
आचार्यदेव! जिनदीक्षा देकर, मेरा जीवन धन्य करें।
निरतिचार व्रत करूँगी पालन, कोई विकल्प न अन्य करेंं।।२०७।।

श्रीफल किया समर्पित मैना, गुरुचरणों में किया प्रणाम।
स्वास्तिक रचित चौक में बैठी, शुरू हुआ दीक्षा का काम।।
दीक्षा शब्द स्वयं कहता है, सुकरणीय है आत्म रमण।
तथा जरूरी भाव विशुद्धि, अत: कषाय करें उपशम।।२०८।।

दीक्षार्थी के मस्तक ऊपर, हस्त रखा आचार्यश्री।
विधिविधान से श्रीगुरुवर ने, मैना क्षुल्लिका दीक्षा दी।।
धैर्य-वीरता मूर्ती इसने, सदा वीरवत् काम किया।
गुणानुरूप आचार्यश्री ने, वीरमती शुभनाम दिया।।२०९।।

सकल उपस्थित जनसमूह ने, सहर्ष जय-जयकार किया।
तदुपरान्त आचार्यश्री ने, समयोचित उपदेश दिया।।
बहुत कठिन मानव तन पाना, उत्तम कुल जिनवाणी संग।
तदपि कठिन आना जीवन में, संयम-दीक्षा धरण प्रसंग।।२१०।।

इस दुर्लभ अवसर को पाकर, जो जन सफल बनाते हैं।
वे जन निश्चित स्वल्प भवों में, मोक्ष परम पद पाते हैं।।
मैंने इसमें शुरूआत से, बहुत वीरता देखी है।
इस युग में अन्यत्र न वैसी, कहीं वीरता पेखी है।।२११।।

जैसे गुण हैं, नाम हो वैसा, अत: वीरमति रक्खा नाम।
आगे भी सार्थकता देना, वीरमती तुम रखना ध्यान।।
प्रतिभा तुमरी महाविलक्षण, इसे और चमकाना तुम।
पढ़ो-पढ़ाओ संघ में रहकर, सूरज पूर्ण उगाओ तुम।।२१२।।

मेरा यह आशीष है तुमको, अगर रखा क्रम यह जारी।
तो तुम विदुषी श्रेष्ठ बनोगी, पाओ यश:कीर्ति भारी।।
श्रीगुरु का आशीष प्राप्तकर, वीरमती कहा गद्गद स्वर।
मेरा जीवन धन्य हो गया, दीक्षा पा आचार्यप्रवर।।२१३।।

तदनन्तर गुरुवर आज्ञा से, मंदिरजी दर्शन करने।
गर्इं क्षुल्लिका वीरमती जी, भगवन् की स्तुति करने।।
नाथ आपका अतिशय सच्चा, जो मैंने दीक्षा पाई।
बना रहे आशीष भक्त पर, सदा-सदा हे जिनराई।।२१४।।

चैत्र कृष्ण एकम सन् त्रेपन, दिवस रहा अतिशयकारी।
बीसविं सदि में प्रथम कुंवारी, कन्या ने दीक्षा धारी।।
संयम के इस स्वर्ण क्षेत्र में, रचा गया मणिमय इतिहास।
फैलाया इस वीरमती ने, अनुपम संयम-ज्ञान प्रकाश।।२१५।।

ब्राह्मीमती क्षुल्लिका माता, रहें संघ में सदा समय।
वीरमती जी साथ उन्हीं के, करें साधना रत्नत्रय।।
एक दिवस माँ मोहिनी देवी, दर्शनार्थ थीं आई तदा।
हर्ष-विषाद द्वय झलक रहे थे, एक साथ ही मुख मुद्रा।।२१६।।

माता श्री मोहिनीदेवी, करती थीं अतीत मन याद।
लेकिन माता वीरमती मन, लेश न आया हर्ष-विषाद।।
इच्छामि की माताजी से, धर्म वृद्धि आशीष मिला।
वयोवृद्ध होता है छोटा, रहा संयमी सदा बड़ा।।२१७।।

आचार्यश्री से सम्बोधन पा, मन ने पाई शांति सुधा।
इष्ट वियोगे अविवेकी ही, करते है दु:ख शोक मुधा।।
आदि न अंत महा भवसागर, इसमें किसका कौन नहीं।
सच पूछो तो एक आत्मा, अपना दूजा कोई नहीं।।२१८।।

बहुत देर तक रहीं देखतीं, बैठी रहीं यथा हो चित्र।
फिर बोली निज की आत्मा ही, होती है निज की ही मित्र।।
वह पावन दिन कब आएगा, मैं भी संयम धारूँगी।
तुम जैसी दीक्षा धारण कर, अष्ट कर्म को जारूँगी।।२१९।।

माताश्री मोहिनी देवी, कहा परस्पर हो उपकार।
मैंने संयम अनुमति देकर, तुम्हेें लगाया भव से पार।।
बेटी तू भी भव बंधन से, मुझे दिलाना छुटकारा।
वीरमती ने धर्मवृद्धि-सह, शुभ विचार को स्वीकारा।।२२०।।

माता यात्रा पूरी करके, टिकैतनगर विश्राम किया।
गृहीजनों को वीरमती की, दीक्षा बाबत ज्ञान दिया।।
मोहनृपति के वशीभूत हो, दुखी हुए परिवार-स्वजन।
किन्तु नियति को अटल जान फिर, मोहताप का किया शमन।।२२१।।