02.धर्मोपदेशामृत

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धर्मोपदेशामृत


(प्रथम अधिकार)

(७)
अब आवो बताएँ तुम्हें जिनधर्म की व्याख्या।
सब जीवों पे दया करो उसके हैं भेद क्या।।
दो रूप धर्म मुनि और गृहस्थ के कहे।
फिर रत्नत्रय स्वरूप से त्रयभेद भी कहे।।
इस एकदेश धर्म को गृहस्थ पालते।
उत्कृष्ट रत्नत्रय जो धर्म साधु धारते।।
यहाँ और भी क्षमादि गुण से दश धरम कहे।
उसमें जो आत्मा की परिणति से सुख लहे।।
(८)
सब ही व्रतों में मुख्य यह दया ही श्रेष्ठ है।
जैसे बिना जड़ के ठहर सकता न पेड़ है।।
जिसमें नहीं दया वो शून्य के समान है।
निर्दय हृदय को कुछ भी रहता न भान है।।
(९)
चिरकाल भवभ्रमण में हम क्या क्या नहीं बने।
माता पिता भाई बहन हम सबके बन चुके।
पिछले भवों के रागद्वेष वश हो मारते।
जन्मान्तरों के बैर को गुरुजन धिक्कारते।।
(१०)
यदि किसी दरिद्री से कहिए वह अपने प्राणदान दे दे।
बदले में जितनी चाहे वो मुझसे मेरी संपति ले ले।।
लेकिन जब इसको ठुकरा दे तो समझो तुम हे पुरुषोत्तम।
आहार अभय औषधि व शास्त्र ये चार दान सबसे उत्तम।।
(११)
व्रत रहित अव्रती भी यदि हो इस दया भाव से भरा हुआ।
वह स्वर्ग मोक्ष का अधिकारी बन जाता है यह कहा गया।।
लेकिन जो दया रहित प्राणी कितना भी भीषण तप कर ले।
वह पापी ही समझा जाता सब दान पुण्य भी व्यर्थ रहें।।
(१२)
जो रत्नत्रयधारी मुनि को भक्ती से उत्तम दान करे।
ऐसे गृहस्थ अरु मुनियों को खुद सुरगण सदा प्रणाम करें।।
क्योंकि मानुष तन द्वारा ही परमेष्ठि साधु बन सकते हैं।
इस तन से ही बस मोक्ष मिले वहाँ इंद्र नहीं जा सकते हैं।।
(१३)
जिस घर में पूजा होती है अर्हंत सिद्ध आचार्यों की।
भक्ति से दान दिया जाता निग्र्र्रंथ तपस्वी गुरुओं को।।
करूणा से दान दिया जाता जो दुखी दरिद्र मनुष्य दिखें।
ऐसे गृहस्थ सम्यग्दृष्टि विद्वानों से भी पूज्य हुए।।

ग्यारह प्रतिमाओं के नाम

(१४)

आचार्य पद्मनंदि जी ने ग्यारह प्रतिमा बतलाई हैं।
जो दर्शन, व्रत, सामायिक और चौथी प्रोषध कहलाई हैं।।
सचित्तत्याग, रात्रिभोजन सातवीं ब्रह्मचर्य प्रतिमा।
आरम्भ, परिग्रह व अनुमति त्याग, भिक्षापूर्वक भोजन लेना।।

(१५)
श्री समन्तभद्र आदिक आचार्य ने और भी विस्तृत व्याख्या की।
अतएव उपासकाध्ययन ग्रंथ से पढ़ने की भी आज्ञा दी।।
गुरुओं ने सप्त व्यसन त्यागे बिन प्रतिमा लेना व्यर्थ कही।
जो व्यसन रहित सज्जन प्राणी उनको ही पूज्यता प्राप्त हुई।।

सप्तव्यसन के नाम

(१६)

-दोहा-
जुआँ खेलना, मांस, मद्य, वेश्यागमन, शिकार।
चोरी, पररमणी रमण ये सातों व्यसन निवार।।
इन सातों व्यसनों का क्रमश: आचार्य प्ररूपण करते हैं।
इनसे क्या हानि होती है उसका कुछ वर्णन करते हैं।।
गर उसको समझे प्राणी तो मानव जीवन सार्थक होगा।
आत्मा उत्थान करेगी और परभव में उत्तम फल होना।।

जुआँ का स्वरूप

(१७)

इस जुआँ खेलने से जग में अपर्कीित फैलती है सच में।
क्योंकि चोरी वेश्यावृत्ति इन सबका मेल हुआ इसमें।।
जिस तरह राज्य में राजा के आधीन मंत्रिगण होते हैं।।
बस इसी तरह यह जुआँ व्यसन आपत्तीकारक होते हैं।।
(१८)
आचार्यों ने सारे व्यसनों में जुआँ को सबसे मुख्य कहा।
क्योंकि इससे बनकर दरिद्र बनकर आगे प्राणी विपदा में घिरा।।
जब विपदा आती तब मानव क्रोधित हो लोभ में पंâसता है।
इसलिए त्याग कर दो भविजन इससे बस दुख ही मिलता है।

मांस भक्षण का विरोध

(१९)

जो सज्जन पुरुषों के द्वारा आँखों से देखा जा न सके।
जो दीन प्राणियों का वध कर खाते उनको हम छू न सके।।
ऐसे सर्वथा अपावन मांसाहार का जो भक्षण करते।
ना जाने कितने पापों का संचय कर नरकगती लहते।।
(२०)
यदि कोई अपना पिता पुत्र बाहर से लौट के ना आये।
तो नर हो या फिर नारी हो वह बिलख बिलख कर चिल्लाये।
फिर कैसे मूक प्राणियों का वह माँस बनाकर खाता है।
आती है दया और लज्जा कैसे कट कर चिल्लाता है।।

मदिरा का निषेध

(२१)

यह मदिरा पीने वाला भी धन धर्म सभी को नष्ट करे।
नरकों में जाने का भी डर इनको न कभी भी त्रस्त करे।।
यदि समझाने से भी मानव मदिरा सेवन नहिं त्याग करे।
तो समझो वह व्यसनी कोई उत्कृष्ट न कोई कार्य करे।।
(२२)
मदिरा पीने वाला मानव माता को भी स्त्री माने।
खोटी चेष्टाएँ कर करके कोई भी बात नहीं माने।।
उससे भी अधिक जब नशा चढ़े तब कुत्ते भी यदि मूत्र करें।
उसको भी मिष्ट मिष्ट कहकर वह पापी उसको गटक रहे।।

वेश्यागमन

(२३)

जो मद्य माँस सेवन करती जिनका स्नेह दिखावा है।
विषयी पुरुषों को बहलाकर धन लेकर करे छलावा है।।
ऐसी वेश्याओं का सेवन करने से नरकद्वार खुलता।
धन और प्रतिष्ठा भी खोकर आगे कुछ हाथ नहीं लगता।।
(२४)
जैसे धोबी सबके कपड़े इक शिला पे जाकर धोता है।
वैसे ही वेश्या के समीप सब तरह का प्राणी रमता है।।
जिस तरह माँस के एक पिण्ड पर कुत्ते लड़ते रहते हैं।
ऐसे वेश्यागामी पुरुषों को तत्सम उपमा देते हैं।।

शिकार का निषेध

(२५)

जो सदा वनों में भ्रमण करें जिनका निज देह सिवा न कोई।
जो तृण खाकर जीवित रहते रक्षक भी जिनका नहिं कोई।।
ऐसे में जो मांसाहारी लोभी शिकार करते मृग का।
इहलोक व्याधियों से पीड़ित परलोक नरक में घर उनका।।
(२६)
आचार्य पुन: समझाते हैं इक चींटी जब पीड़ा देती।
तो भी क्यों मानव दयाहीन पशु पक्षी पर कुदृष्टि रहती।।
जो भलीभाँति यह समझ रहे हैं इनको भी पीड़ा होती।
फिर भी ऐसे दुष्कर्म करें फिर इनकी कौन गती होगी।।
(२७)
जिनको तुम आज मारते हो भव भव में आगे मारेगा।
जिसको तुम सब ठग रहे आज वह कल तुमसे बदला लेगा।
शास्त्रों का और विज्ञजन का यह ही तो कहना रहा सदा।
पर फिर भी इनमें लगे रहे कुछ भी ना ज्ञान हमें रहता।।

चोरी करने का दोष

(२८)

छल कपट दगाबाजी से जो परद्रव्य हड़प कर लेते हैं।
वे प्राणहरण से भी ज्यादा उस प्राणी को दुख देते हैं।।
क्योंकि धन प्राणों से प्यारा होता है सूक्ति कही जाती।
इसलिए कहा है गुरुओं ने, परद्रव्य में प्रीति न की जाती।।

परस्त्री सेवन की हानि

(२९)

परस्त्री का सेवन जो करे भय िंचता आकुलता रहती।
संतप्त सदा रहता प्राणी निंह बुद्धि ठिकाने पर रहती।।
क्षुध तृषा रोग से पीड़ित वह जब नरकगती में जाता है।
लोहे की बनी पुतली से आिंलगन करवाया जाता है।।
(३०)
इतना ही नहीं स्वप्न में भी जो परस्त्री का ध्यान करे।
आचार्य उसे समझाते हैं ऐसा पौरुष भी व्यर्थ अरे।।
पर धन वनिता दिलवाने में जो बनते बड़े सहायक हैं।
ऐसे मित्रों से दूर रहें दुर्बुद्धी देते घातक है।।

सप्तव्यसन में जिनको हानि हुई

(३१)

जो जुएं में सब कुछ हार गये वे हुए युधिष्ठिर राजा हैं।
अरु मांस का भक्षण करने में सब छूटा वे बक राजा हैं।।
मदिरा पीने से यदुवंशी राजा के पुत्र विनष्ट हुए।
वेश्यासेवन में चारुदत्त होकर दरिद्र अतिकष्ट सहें।।
ब्रह्मदत्त नाम के राजा भी करके शिकार पदभ्रष्ट हुए।
चोरी करने में सत्यघोष को गोबर भक्षण दण्ड मिले।।
परस्त्री सेवन से रावण ने दुख सहे अरु नरक गए।
इसलिए त्याग दो सप्त व्यसन आचार्य हमारे यही कहें।।
(३२)
आचार्य और भी कहते हैं केवल ये व्यसन न दुखदायी।
इनसे अतिरिक्त अल्पबुद्धी मिथ्यादृष्टी जो हैं भाई।।
वे कई तरह के गलत मार्ग से जन धन की हानी करते।
इसलिए कुमार्ग छोड़ करके सत्पथ पर चलने को कहते।।
(३३)
जिनकी बुद्धी अति निर्मल है जो आत्मा का हित चाह रहे।
वे कभी न झुकते व्यसनों में जो स्वर्ग मोक्ष सुख चाह रहे।।
सब व्रत के नाशक परमशत्रु ये व्यसन प्रथम तो मधुर लगें।
पर अंत में कटु फल मिलता है इसलिए स्वप्न में भी न गहें।।
(३४)
हे भव्य जीव यदि सुख चाहो तो दुर्जन की संगति न करो।
क्योंकी जैसी संगति होती वैसी ही बुद्धि की प्राप्ति हो।।
यदि उत्तम पथ पर चलना है तो सत्पुरुषों के संग रहो।
इससे निंह बुद्धि भ्रमित होगी निंह दुर्गतियों में भ्रमण करो।।
(३५)
जब दुष्ट पुरुष को काम पड़े तो मीठे वचन प्रयोग करें।
लेकिन गुरुवर समझाते हैं उससे न कभी संबंध रखें।।
जैसे सरसों जब खली रूप पर्याय में परिणत होती है।
तब उसका तेल अगर आँखों में लगे तो आँखें रोती हैं।।
(३६)
जिस तरह ग्रीष्म ऋतु में मछली जल के अभाव में मर जाती।
कुछ एक अगर जीवित बचतीं तो बगुले से खाई जाती।।
बस इसी तरह इस कलियुग में सज्जन प्राणी कम ही होते।
यदि हो भी जाएं इक आधे तो दुष्ट नहीं जीने देते।।
(३७)
आचार्य अंत में कहते हैं यदि रहे दरिद्री तो अच्छा।
नाना पीड़ाएं सह करके मर जाना भी तो है अच्छा।।
पर नहीं दुर्जनों के संग में व्यापार आदि संबंध करें।
क्योंकी वैसी ही बुद्धी से प्राणी कर्मों का बंध करे।।