2. कषायमार्गणा से आहारमार्गणा में अस्तित्व के कथन तक

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अथ कषायमार्गणाधिकार:

अधुना कषायमार्गणायामस्तित्वकथनार्थं सूत्रमवतार्यते-

कसायाणुवादेण कोधकसाई माणकसाई मायकसाई लोभकसाई अकसाई णियमा अत्थि।।१३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कषायमार्गणायां क्रोधादिचतुःकषायसहिताः जीवाः संसारे सर्वकालं सन्त्येव, अकषायिनो जीवा अपि सर्वदा विद्यन्त एव। अन्यथा संसारमोक्षयोरेवाभावः स्यात्।
तात्पर्यमेतत्-‘वयमपि एतज्ज्ञात्वा क्रोधादिकषायान् कृशीकृत्य शनैः शनैः अकषायिनो भविष्यामः’ इति भावयितव्यं अहर्निशम्।
एवं कषायमार्गणास्तित्वभंगनिरूपणत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: समाप्त:।

अथ कषायमार्गणा अधिकार

अब कषायमार्गणा में अस्तित्व कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणानुसार क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी, लोभकषायी और अकषायी जीव नियम से हैं।।१३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कषायमार्गणा मेें क्रोधादि चारों कषाय से सहित जीव संसार में सर्वकाल हमेशा रहते ही हैं, अकषायी-कषायरहित जीव भी सर्वदा ही रहते हैं। अन्यथा संसार और मोक्ष दोनों का ही अभाव जो जाएगा।

तात्पर्य यह है कि-‘हम सभी ऐसा जानकर क्रोधादि कषायों को कृश करके धीरे-धीरे कषायरहित बनेंगे’, ऐसी अहर्निश भावना भानी चाहिए। इस तरह से कषायमार्गणा में अस्तित्व भंग का निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।

अथ ज्ञानमार्गणाधिकार:

अधुना ज्ञानमार्गणायामस्तिभंगप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-

णाणाणुवादेण मदिअण्णाणी सुदअण्णाणी विभंगणाणी आभिणिबोहिय-सुद-ओहि-मणपज्जवणाणी केवलणाणी णियमा अत्थि।।१४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रस्यार्थःसुगमोऽस्ति। ‘णाणिणो’ इतिबहुवचननिर्देशः सूत्रे किं न कृतः इति चेत् ?
न, प्राकृतव्याकरणनियमेन इकारान्तपुरुषलिंग-नपुंसकलिंग शब्देभ्यः उत्पन्नप्रथमाबहुवचनस्य विकल्पेन लोपोपलंभात्। ‘जहा पव्वए अग्गी जलंति, मत्ता हत्थी एंति।’ इत्यत्र ‘अग्गी’ एवं ‘हत्थी’ पदयोः प्रथमाबहुवचनविभत्तेर्लोपो दृश्यते।
एवं ज्ञानमार्गणानां संततमस्तित्वकथनत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां ज्ञानमार्गणानाम सप्तमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ ज्ञानमार्गणा अधिकार

अब ज्ञानमार्गणा में अस्ति भंग का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

ज्ञानमार्गणा के अनुसार मतिअज्ञानी, श्रुतअज्ञानी, विभंगज्ञानी, आभिनिबोधिकज्ञानी श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मन:पर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी नियम से हैं।।१४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्र का अर्थ सुगम है।

शंका-सूत्र में ‘‘णाणिणो’’ ऐसा बहुवचन निर्देश क्यों नहीं किया गया है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि प्राकृत व्याकरण के नियम से इकारान्त पुल्लिंग और नपुंसकलिंग शब्दों से उत्पन्न प्रथमा के बहुवचन का विकल्प से लोप पाया जाता है। जैसे-पव्वए अग्गी जलंति (पर्वत पर अग्नि जलती हैं) मत्ता हत्थी एंति (मत्त हाथी आते हैं) यहाँ ‘अग्गी’ और ‘हत्थी’ पदों में प्रथमाबहुवचनविभक्ति का लोप हो गया है।

इस तरह से ज्ञानमार्गणा में जीवों का सतत अस्तित्व कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में ज्ञानमार्गणा नाम का सातवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

अथ संयममार्गणाधिकार:

संयममार्गणानामस्ति-नास्तिभंगविचयाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

संजमाणुवादेण सामाइय-छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदा परिहारसुद्धिसंजदा जहाक्खादविहारसुद्धिसंजदा संजदासंजदा असंजदा णियमा अत्थि।।१५।।
सुहुमसांपराइयसंजदा सिया अत्थि सिया णत्थि।।१६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रस्यार्थः सुगमोऽस्ति। मोक्षप्राप्ताभिमुखसंयताः वीतरागछद्मस्थसंयताः देशसंयताः असंयताश्च सर्वेऽपि जीवाः अस्मिन्ननादिसंसारे सर्वकालं सन्त्येव। केवलं सूक्ष्मसांपरायिकमुनयो दशमगुणस्थानवर्तिनः कथंचित् संति कथंचित् न संति।
एवं संयममार्गणानामस्तिनास्तिभंगनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतं।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संयममार्गणानाम अष्टमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ संयममार्गणा अधिकार

अब संयममार्गणा में अस्ति-नास्ति भंगविचय का कथन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं- सूत्रार्थ-

संयममार्गणानुसार सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयत, परिहारशुद्धिसंयत, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत, संयतासंयत और असंयत जीव नियम से हैं।।१५।।

सूक्ष्मसाम्परायिकसंयत कदाचित् हैं और कदाचित् नहीं हैं।।१६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। मोक्षप्राप्ति के अभिमुख हुए संयत मुनिराज, वीतरागछद्मस्थ संयत, देशसंयत और असंयत ये सभी जीव इस अनादि संसार में सर्वकाल रहते ही हैं। केवल सूक्ष्मसाम्परायिक दशमगुणस्थानवर्ती मुनि कथंचित् हैं, कथंचित् नहीं हैं।

इस प्रकार संयममार्गणा में अस्ति-नास्ति भंग का निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में संयममार्गणा नाम का आठवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

अथ दर्शनमार्गणाधिकार:

अधुना दर्शनमार्गणास्तित्वप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणी अचक्खुदंसणी ओहिदंसणी केवलदंसणी णियमा अत्थि।।१७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सू्रत्रस्यार्थः सुगमोऽस्ति। इमे दर्शनमार्गणासहिताः जीवाः सर्वकालं संति।
एवं दर्शनमार्गणास्तित्वनिरूपणत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां दर्शनमार्गणानाम नवमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ दर्शनमार्गणा अधिकार

अब दर्शनमार्गणा का अस्तित्व बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

दर्शनमार्गणानुसार चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, अवधिदर्शनी और केवलदर्शनी नियम से हैं।।१७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्र का अर्थ सुगम है। ये दर्शनमार्गणा समन्वित जीव सर्वकाल पाये जाते हैं।

इस तरह से दर्शनमार्गणा में अस्तित्व निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में दर्शनमार्गणा नाम का नवमाँ अधिकार समाप्त हुआ।

अथ लेश्यामार्गणाधिकार:

इदानीं लेश्यामार्गणासु अस्तित्वप्रतिपादनाय सूत्रमवतार्यते-

लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिया णीललेस्सिया काउलेस्सिया तेउलेस्सिया पम्मलेस्सिया सुक्कलेस्सिया णियमा अत्थि।।१८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सर्वे संसारिणः लेश्यावन्त एव, अतस्ते सर्वकालं विद्यन्ते।
एवं लेश्यास्तित्वप्रतिपादनत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां लेश्यामार्गणानाम दशमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ लेश्यामार्गणा अधिकार

अब लेश्यामार्गणा में अस्तित्व का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

लेश्यामार्गणानुसार कृष्णलेश्या वाले, नीललेश्या वाले, कापोतलेश्या वाले, तेजोलेश्या वाले, पद्मलेश्या वाले और शुक्ललेश्या वाले जीव नियम से हैं।।१८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सभी संसारी जीव लेश्यावान् ही होते हैं, अत: वे सर्वकाल विद्यमान रहते हैं।

इस तरह से लेश्या में अस्तित्व का प्रतिपादन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में लेश्यामार्गणा नाम का दशवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

अथ भव्यमार्गणाधिकार:

संप्रति भव्यमार्गणायामस्तित्वकथनार्थं सूत्रमवतार्यते-

भवियाणुवादेण भवसिद्धिया अभवसिद्धिया णियमा अत्थि।।१९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सिद्धिपुरस्कृताः-मुक्तिगामिनो भव्या नाम, तद्विपरीता अभव्याः। सिद्धाः न भव्या न चाभव्याः, तद्विपरीतस्वभावत्वात्।
भव्याभव्यजीवाः इव सिद्धा अपि नियमेन संति पुनः तेषामस्तित्वमत्र किन्नोक्तं ?
न, बंधाधिकारेऽत्र तेषां सिद्धानामबंधकानां संभवाभावात्।
एवं भव्यत्वमार्गणास्तित्वनिरूपणत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां भव्यमार्गणानाम एकादशोऽधिकार: समाप्त:।

अथ भव्यमार्गणा अधिकार

अब भव्यमार्गणा में अस्तित्व का कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

भव्यमार्गणा के अनुसार भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक नियम से हैं।।१९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सिद्धिपुरस्कृत अर्थात् मोक्षगामी जीवों को भव्य और इनसे विपरीत जीवों को अभव्य कहते हैं। सिद्ध जीव न तो भव्य हैं और न अभव्य हैं, क्योंकि उसका स्वरूप भव्य और अभव्य दोनों से विपरीत है।

शंका-भव्य व अभव्यों के समान ‘सिद्ध भी नियम से हैं पुन: उनका अस्तित्व क्यों नहीं कहा ?

समाधान-नहीं, क्योंकि बंधकाधिकार में अबंधक सिद्धों की संभावना का अभाव है।

इस प्रकार भव्यमार्गणा में भव्यों का अस्तित्व बतलाने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में भव्यमार्गणा नाम का ग्यारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

अथ सम्यक्त्वमार्गणाधिकार:

इदानीं सम्यक्त्वमार्गणायामस्ति-नास्तिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

सम्मत्ताणुवादेण सम्मादिट्ठी खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी मिच्छाइट्ठी णियमा अत्थि।।२०।।
उवसमसम्माइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी सिया अत्थि सिया णत्थि।।२१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थः सुगमो वर्तते।
एतेषां त्रयाणां मार्गणावचनानां सान्तरस्वरूपत्वदर्शनात्।
एवं सम्यक्त्वमार्गणानामस्तिनास्तिनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतं।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां सम्यक्त्वमार्गणानाम द्बादशोऽधिकार: समाप्त:।

अथ सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार

अब सम्यक्त्वमार्गणा में अस्ति-नास्ति भंग का निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यक्त्वमार्गणानुसार सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि नियम से हैं।।२०।।

उपशमसम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव कदाचित् हैं और कदाचित् नहीं हैं।।२१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। इन तीन मार्गणा प्रभेदों का सान्तर स्वरूप दिखाया जा चुका है।

इस तरह से सम्यक्त्वमार्गणा में अस्ति-नास्ति भंग का निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में सम्यक्त्वमार्गणा नाम का बारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

अथ संज्ञिमार्गणाधिकार:

संज्ञिमार्गणायामस्तिभंगकथनाय सूत्रमवतरति-

सण्णियाणुवादेण सण्णी असण्णी णियमा अत्थि।।२२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संसारे संज्ञिनः समनस्काः, असंज्ञिनोऽमनस्काः जीवाः निरन्तरं सन्त्येव।
एवं संज्ञिमार्गणास्तित्वकथनपरत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संज्ञिमार्गणानाम त्रयोदशोऽधिकार: समाप्त:।

अथ संज्ञीमार्गणा अधिकार

अब संज्ञीमार्गणा में अस्ति भंग का कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

संज्ञिमार्गणानुसार संज्ञी और असंज्ञी जीव नियम से हैं।।२२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संसार में संज्ञी-समनस्क और असंज्ञी-अमनस्क जीव निरन्तर हैं ही हैं। इस तरह से संज्ञीमार्गणा में अस्तित्व का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में संज्ञीमार्गणा नाम का तेरहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

अथ आहारमार्गणाधिकार:

आहारमार्गणास्तित्वकथनार्थं सूत्रमवतार्यते-

आहाराणुवादेण आहारा अणाहारा णियमा अत्थि।।२३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-आहारकाः अनाहारकाश्च नियमेन संति। अत्र नानाजीवैः भंगविचयानुगमाधिकारे चतुर्दशमार्गणाः संति। आसु मार्गणासु अंतरमार्गणाः अष्टौ संति। तासामेव मार्गणानामत्र अस्तिनास्तिद्वयभंगौ प्ररूपितौ, शेषाः मार्गणाः अस्तिभंगरूपेणैव।
उक्तं च- उवसमसुहुमाहारे वेगुव्वियमिस्सणर अपज्जत्ते।
सासणसम्मे मिस्से सांतरगा मग्गणा अट्ठ।।१४३।।
सत्तदिणाच्छम्मासा वासपुधत्तं च बारहमुहुत्ता ।
पल्लासंखं तिण्हं वरमवरं एगसमओ दु।।१४४।।
पढमुवसमसहिदाए विरदाविरदीए चोद्दसा दिवसा।
विरदीए पण्णरसा विरहिदकालो दु बोद्धव्वो।।१४५।।
लोके नानाजीवापेक्षया विवक्षितगुणस्थानं विवक्षितमार्गणास्थानं वा त्यक्त्वा गुणस्थानान्तरे मार्गणान्तरे वा गत्वा पुनर्यावत्तद्विवक्षितं गुणस्थानं मार्गणास्थानं वा नायाति तावान् कालः अंतरं नाम। तच्चोत्कृष्टेन औपशमिकसम्यग्दृष्टीनां सप्त दिनानि । तदनन्तरं कश्चित् स्यादेवेत्यर्थः। सूक्ष्मसांपरायसंयमिनां षण्मासाः। आहारकतन्मिश्रकाययोगिनां वर्षपृथक्त्वं । त्रिकादुपरि नवकादधः पृथक्त्वमित्यागमसंज्ञा। वैक्रियिकमिश्रकाय-योगिनां द्वादशर्मुहूर्ताः। लब्ध्यपर्याप्तकमनुष्याणां सासादनसम्यग्दृष्टीनां सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां च प्रत्येकं पल्या-संख्यातैकभागमात्रं एवं सान्तरमार्गणा अष्टौ। तासां जघन्येनान्तरमेकसमय एव ज्ञातव्यः। लोके उपशमसम्य-ग्दृष्टयादयो यदि न संति तदा उत्कर्षेणोक्तस्व-स्वकालपर्यन्तमेव तेषामष्टानामभावस्ततो नाधिकः कालः।
अथ सान्तरमार्गणाविशेषं चात्र प्ररूपयति-
विरहकालः लोके नानाजीवापेक्षया उत्कृष्टेनांतरं प्रथमोपशमसम्यक्त्वसहितायाः विरताविरतेः-अणुव्रतस्य, चतुर्दशदिनानि। तत्सहितविरतेः-महाव्रतस्य पञ्चदश दिनानि। तु पुनः, द्वितीयसिद्धान्तापेक्षया चतुर्विंशतिदिनानि। इदमुपलक्षणं इत्येकजीवापेक्षयापि उक्तमार्गणानामन्तरं प्रवचनानुसारेण बोद्धव्यम्१।
एवं आहारमार्गणायां अस्तित्वनिरूपणत्वेन सूत्रमेकं गतं।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे
महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां आहारमार्गणानाम
चतुर्दशोऽधिकार: समाप्त:।
तात्पर्यमेतत्-गुणस्थानमार्गणास्थानातीतं यत् किमपि पदं तदेव स्वपदं, इति ज्ञात्वा स्वशुद्धात्मतत्त्वस्य सम्यक्श्रद्धानं, तस्यैव ज्ञानं, तत्रैव निश्चलत्वं चेति निश्चयरत्नत्रयं समालम्ब्य निजपरमानन्दस्थानमेव प्राप्तव्यं।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खंडागमस्य श्रीमद्भूतबलिसूरिविरचिते क्षुद्रक-बंधनाम्नि द्वितीयखंडे वीरसेनाचार्यविरचितधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रंथाधारेणविंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्यः चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागरस्तस्यप्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागराचार्यस्तस्य शिष्या-जम्बूद्वीप-रचनाप्रेरिका गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणि-टीकायां नानाजीवापेक्षया भंगविचयानुगमो-नाम चतुर्थो महाधिकारः समाप्तः।

अथ आहारमार्गणा अधिकार

अब आहारमार्गणा में अस्तित्व का कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

आहारमार्गणानुसार आहारक और अनाहारक जीव नियम से होते हैं।।२३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारक और अनाहारक दोनों प्रकार के जीव नियम से रहते हैं। यहाँ नाना जीवों की अपेक्षा भंगविचयानुगम अधिकार में चौदह मार्गणाएँ बताई गई हैं। इन मार्गणाओं में आठ अन्तर मार्गणा हैं। उन्हीं मार्गणाओं के यहाँ अस्ति-नास्ति दो भंग प्ररूपित किये गये हैं, शेष मार्गणाएँ अस्तिभंगरूप ही हैं। जैसा कि गोम्मटसार जीवकाण्ड ग्रंथ में कहा भी है-

गाथार्थ-उपशमसम्यक्त्व, सूक्ष्मसाम्पराय संयम, आहारक काययोग, आहारकमिश्रकाययोग, वैक्रियिक मिश्रकाययोग, अपर्याप्त-लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य, सासादन सम्यक्त्व और मिश्र ये आठ सान्तर मार्गणाएँ हैं।।१४३।

उक्त आठ अन्तरमार्गणाओं का उत्कृष्ट काल क्रम से सात दिन, छ: महीना, पृथक्त्व वर्ष, पृथक्त्व वर्ष, बारह मुहूर्त और अन्त की तीन मार्गणाओं का काल पल्य के असंख्यातवें भाग है और जघन्य काल सबका एक समय है।।१४४।।

प्रथमोपशमसम्यक्त्वसहित पंचमगुणस्थान का उत्कृष्ट विरहकाल चौदह दिन और छठे, सातवें गुणस्थान का उत्कृष्ट विरहकाल पंद्रह दिन समझना चाहिए।।१४५।।

लोक में नाना जीवों की अपेक्षा विवक्षित गुणस्थान अथवा विवक्षित मार्गणास्थान को त्यागकर अन्य गुणस्थान अथवा अन्य मार्गणास्थान में जाकर पुन: जब तक विवक्षित गुणस्थान अथवा मार्गणास्थान में नहीं आता है, तब तक के काल को अन्तर कहते हैं। वह अन्तर उत्कृष्ट से औपशमिक सम्यग्दृष्टियों का सात दिन है। अर्थात् तीनों लोकों में कोई भी जीव उपशमसम्यक्त्वधारी यदि न हो, तो अधिक से अधिक सात दिन तक न हो उसके बाद कोई अवश्य ही होगा। इसी तरह सूक्ष्मसाम्पराय संयमियों का उत्कृष्ट अन्तर छह मास है। आहारक और आहारकमिश्रकाययोग वालों का उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है। तीन से ऊपर और नौ से नीचे की संख्या की आगम में पृथक्त्व संज्ञा है। वैक्रियिक मिश्रकाययोगियों का अन्तर बारह मुहूर्त है। लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य, सासादन सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि में से प्रत्येक का अन्तर पल्य का असंख्यातवाँ भाग काल है। इस प्रकार सान्तरमार्गणा आठ हैं। इनका जघन्य अन्तर एक समय ही जानना चाहिए। लोक में यदि उपशमसम्यग्दृष्टि आदि न हों, तो उत्कृष्ट से उक्त अपने-अपने काल पर्यन्त ही उन आठों का अभाव हो सकता है, इससे अधिक काल तक नहीं है।

आगे सान्तर मार्गणाविशेष को कहते हैं-

विरहकाल अर्थात् लोक में नाना जीवों की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर प्रथमोपशमसम्यक्त्व सहित विरताविरत अर्थात् अणुव्रती जीवों का चौदह दिन है और प्रथमोपशमसम्यक्त्व सहित विरत अर्थात् महाव्रत का विरहकाल पन्द्रह दिन है। किन्तु द्वितीय सिद्धान्त की अपेक्षा चौबीस दिन है। यह कथन उपलक्षणरूप है। अत: एक जीव की अपेक्षा भी उक्त मार्गणाओं का अन्तर प्रवचन के अनुसार जानना चाहिए।

इस तरह से आहारमार्गणा में अस्तित्व भंग का निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में आहारमार्गणा नाम का चौदहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

तात्पर्य यह है कि-गुणस्थान और मार्गणास्थान से अतीत-रहित जो कोई भी पद है, वही स्वपद-निज पद है। ऐसा जानकर निज शुद्ध आत्म तत्त्व का सम्यक् श्रद्धान, उसी का ज्ञान एवं उसी में निश्चलता-दृढ़ता रखते हुए निश्चयरत्नत्रय का आलम्बन लेकर निज परमानन्द स्थान को ही प्राप्त करना चाहिए।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदंत-भूतबली आचार्य द्वारा प्रणीत षट्खण्डागम ग्रंथ में श्री भूतबली आचार्य विरचित क्षुद्रक बंध नाम के द्वितीय खण्ड में श्रीवीरसेनाचार्य द्वारा रचित धवला टीका को प्रमुख करके नाना ग्रंथों के आधार से रचित बीसवीं शताब्दी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी उनके प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीरसागर महाराज की शिष्या जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती माताजी कृत सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में नाना जीव की अपेक्षा भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार समाप्त हुआ।