20.करुणाष्टक

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करुणाष्टक

त्रिभुवनगुरो जिनेश्वर परमानंदैककारण कुरुष्व ।
मयि किंकरेऽत्र करूणां यथा तथा जायते मुक्ति: ।।१।।

अर्थ —हे तीनों लोकों के गुरु हे कर्मों के जीतने वाले महात्माओं के स्वामी, और हे उत्कृष्ट मोक्षरूपी आनंद के देने वाले जिनेन्द्र मुझदास पर ऐसी दया कीजिये जिससे कि मेरा मोक्ष हो जावे अर्थात् समस्त पाप कर्मों से मैं सर्वथा छूट जाऊं ।।१।।

निर्विण्णोहं निजरामर्हन् बहुदु:खया भवस्थित्या ।
अपुनर्भवाय भवहर कुरु करुणामत्र मयि दीने ।।२।।

अर्थ —हे समस्त घातिया कर्मों को जीतने वाले अर्हंत भगवान, अनेक प्रकार के दु:खों को देने वाली ऐसी जो संसार की स्थिति है उसमें मैं सर्वथा खिन्न हूं इसलिये हे संसार के नाश करने वाले जिनेन्द्र ! इस संसार में मुझ दीन पर ऐसी दया कीजिये जिससे मुझे फिर से जन्म न धारण करना पड़े अर्थात् मैं मुक्त हो जाऊं ।।२।।

श्रीपद्मनंदि आचार्य गान करते हैं--

उद्धर मां पतितमतो विषमादभवकूवेंपत: कृपां कृत्वा ।
अर्हन्नलमुद्धरणे त्वमसीतिं पुन पुनर्वच्मि ।।३।।

अर्थ —हे प्रभो ! मैं इस भंयकर संसार रूपी कूवें में पड़ा हुवा हूं इसलिये मेरे ऊपर दया करके मुझे इस संसार रूपी भयंकर कुवें से बाहिर निकालिये क्योंकि हे अर्हन् ! हे भगवन् ! इस कूवें से मुझे निकालने में आप ही समर्थ हैं ऐसा मैं फिर २ से आपकी सेवा में निवेदन करता हूं ।।३।।

त्वं कारुणिक: स्वामी त्वमेव शरणं जिनेश तेनाहम् ।
मोहरिपुदलितमान: पूत्कारं तव पुर: कुर्वे ।।४।।

अर्थ —हे जिनेश ! हे प्रभो ! यदि संसार में कोई दयावान हैं तो आप ही हैं और भव्य जीवों के शरण हैं तो आप ही हैं इसलिये मोहरूपी बैरी ने जिसका मान (अभिमान) नष्ट कर दिया है ऐसे मैं आपके सामने ही फूत्कार को करता हूं अर्थात् फुक्का मार- २ कर रोता हूं ।।४।।

ग्रामपतेरपि करुणा परेण केनाप्युपद्रुते पुंसि ।
जगतां प्रभो न किं तव जिन मयि खलकर्मभि: प्रहते ।।५।।

अर्थ —जो मनुष्य जिस गांव का अध्यक्ष (मुखिया) है यदि उस गांव में किसी मनुष्य पर कोई अन्य मनुष्य आकर उपद्रव करें अर्थात् उसको दु:ख देवें तो वह ग्राम का मुखिया भी जब उस दु:खित मनुष्य पर करुणा करता है तो हे जिनेन्द्र ! आप तो तीनों लोक के प्रभू हैं और मुझे अत्यंत दुष्ट कर्मों ने सता रक्खा है तो क्या आप मेरे ऊपर करुणा न करेंगे ? अवश्य ही दया करेंगे ।।५।।

आप तीनों लोकों के गुरुहैं--

अपहर मम जन्म दयां कृत्वेत्येकत्र वचसि वक्तव्यो ।
तेनातिदग्ध, इति मे देव बभूव प्रलापित्वम् ।।६।।

अर्थ —हे प्रभो ! सबका मूलभूत एक ही शब्द कह देना चाहिये वह एक शब्द यही है कि कृपाकर आप मेरे जन्म को (संसार को) सर्वथा नष्ट करें क्योंकि मैं इस जन्म से अत्यंत दु:खित हूं इसीलिये यह मेरा आपके सामने प्रलाप हुआ है अर्थात् मैं विलप-२ कर रो रहा हूं ।।६।।

तव जिन चरणाब्जयुगं करुणामृतसंगशीतलं यावत् ।
संसारातपतप्त: करोमि हृदि तावदेव सुखी ।।७।।

अर्थ —हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! संसाररूपी आतप से संतप्त हुआ मैं जब तक दया रूपी जल के संग से अत्यन्त शीतल ऐसे आपके दोनों चरण कमलों को हृदय में धारण करता हूं तभी तक मैं सुखी हूं।

भावार्थ —जिस प्रकार कोई मनुष्य धूप के संताप से अत्यंत संतप्त होवे तथा उस समय पानी के संबंध से अत्यंत शीतल ऐसे कमलों को अपने हृदय पर धरे तो जिस प्रकार वह सुखी होता है उसी प्रकार हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! मैं भी संसार के प्रखर संताप से अत्यंत संतप्त हूं इसलिये जब तक मैं दयारूपी जल के संबंध से अत्यंत शीतल ऐसे आपके दोनों चरण कमलों को अपने हृदय में धारण करता हूं तब तक मैं अत्यंत सुखी रहता हूं ।।७।।

आचार्य कहते हैं--

जगदेकशरण भवन्नसमश्रीपद्नन्दितगुणौध ।
किं बहुना कुरु करुणामत्र जने शरणमापन्ने ।।८।।

अर्थ —हे समस्त जगत के एकशरण, हे भगवान् ! आपसे अतिरिक्त जनों में नहीं पाये जाये ऐसे श्रीपद्मनंदि नामक आचार्य द्वारा गान किये गुणों के समूह को धारण करने वाले हे जिनेश ! हे प्रभो ! अब मैं विशेष कहां तक कहूं बस यही प्रार्थना है कि इस शरण में आये हुवे जन पर अर्थात् मुझ पर आप इस संसार में दया करें ।।८।।

इस प्रकार श्री पद्मनंदिआचार्यद्वारा विरचित श्री पद्मनंदिपंचविंशतिका में करुणाष्टकनामक अधिकार समाप्त हुवा।

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