20.सरस्वती स्तोत्र

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सरस्वती स्तोत्र


(१)
सब देव झुकाकर मस्तक को जिनको हैं नमस्कार करते।
ऐसी हे माता सरस्वती ! तव चरण युगल मन में धरते।।
सब लोक में हो जयवंत तथा सब जन की जड़ता हरती हो।
है कमल धूलि और जड़तायुत पर आप धूलि से विरहित हो।।
(२)
हे सरस्वती माँ ! तेरा जो है तेज रात्रि दिन से विरहित।
और नहीं अपेक्षा भीतर या बाहर की सभी को ताप रहित।।
जड़ता को नहीं प्रदान करे सब वस्तु प्रकाशित करता है।
ऐसी माँ सरस्वती के तेजपुंज को जग नित नमता है।।
(३)
हे सरस्वती माँ ! कृपा तेरी जो मुझको ये चातुर्य मिला।
उससे मैं स्तुति करके माँ कवि बनने का सौभाग्य मिला।।
जैसे गंगाजल से पूरित अंजुलि में जल को ले करके।
उसको ही अर्घ चढ़ाते हैं तेरा तुझको अर्पण करके।।
(४)
यद्यपि श्रुतकेवलि भी तेरी शोभा का गान नहिं कर सकते।
तब मुझ जैसे अज्ञानीजन वैâसे तव स्तुति कर सकते।।
लेकिन हे सरस्वती माता ! हम जैसे मानव साहस कर।
‘‘जय हो’’ इन दो शब्दों से ही स्तुति कर लेते भक्ती भर।।
(५)
त्रैलोक्य रूप घर में स्थित जो सम्यग्ज्ञानमयी दीपक।
हे सरस्वती माँ ! वह ही तुम हो तेरी कृपादृष्टि जिस पर।।
वह सम्यग्दृष्टी जीव तीन लोकों में जो रहने वाले।
उन जीव अजीव पदार्थों को अच्छी प्रकार देखे भाले।।
(६)
जो मार्ग आपका हे माता ! नभ के समान अति निर्मल है।
ऐसा है कौन बिबुुध प्राणी जो मार्गगमन से वंचित है।।
फिर भी क्यों ऐसा लगता है उस मार्ग से कोई गया नहीं।
हे सरस्वती माँ ! मार्ग आपका गहन है गंदा हुआ नहीं।।
(७)
हे सरस्वती माँ ! सब जन को आश्चर्यचकित करने वाली।
कविता लेखन का गुण भी जो मानव को मिलता गुणशाली।।
उसमें भी कृपा आपकी ही लेकिन वह पद भी मिलता है।
जिसको हर ऋषि मुनि तप करके पाने की इच्छा रखता है।।
(८)
जिसमें नहिं कला आपकी है वह चाहे जितना पढ़ लेवे।
नहिं हो सकता है शास्त्रज्ञान पर जिस पर दृष्टी रख देवें।।
वह बिना पढ़े ही सब गुण में पारंगत होता जाता है।
हे माता ! बिना कृपा तेरी विद्वान न पूजा जाता है।।
(९)
इस जग में जो केवली हुए वे भी जो सब कुछ जान रहे।
और सभी वस्तुओं को देखें उसमें भी कारण आप रहें।।
हे माता ! जब तीनों जग के स्वामी के ज्ञान की कारण हो।
तब हम जैसे अज्ञानी के सब दुख की तुम्हीं निवारण हो।।
(१०)
चिरकाल से इस संसाररूप सागर में भ्रमण करे प्राणी।
सैकड़ों क्लेश से इस मानुष का जन्म धारता ये प्राणी।
इस मानुष तन से ही चारों पुरुषार्थ किए जा सकते हैं।
फिर भी हे जिनवाणी माता ! तुम बिन सब व्यर्थ बताते हैं।।
(११)
हे माता ! बिना अनुग्रह के शास्त्रों का यदि अध्ययन करे।
तो भी वास्तविक तत्व का निंह हो सकता ज्ञान बिना तेरे।।
बिन तत्वज्ञान के प्राणी में हित अहित विवेक न होता है।
इसलिए आपकी कृपा बिना नरजन्म भी निष्फल होता है।।
(१२)
हे माता! बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी तेरा आश्रय लेते हैं।
उससे ही वह सर्वोत्कृष्ट मुक्ती को भी पा लेते हैं।।
जैसे जिस घर में अंधकार हो दीपक का आश्रय लेते।
तब ही इच्छित वस्तू दिखती और प्राप्त उसे हैं कर लेते।।
(१३)
तुममें अनेक पद हैं फिर भी तू इक ही पद१ को देती है।
तू चौतरफा है श्वेत शुक्ल फिर भी सुवर्ण तन धरती है।।
हे माता ! तू आश्चर्यजनक चेष्टा को धारण करती है।
तू स्वर्ण विग्रहा श्रेष्ठ वर्ण रूपी तन धारण करती है।।
(१४)
हे सरस्वती माँ ! जिस क्षण तू अर्हत के मुख से प्रगट हुई।
उस समय तेरी ध्वनि सागर सम गंभीर धीर सी प्रगट हुई।।
सब भाषा में परिणत होती जिससे सब प्राणी समझ सके।
किसके मन में आश्चर्य नहीं होगा ऐसी वाणी सुनके।।
(१५)
हे सरस्वती माँ ! तेरे बिन नर नेत्र सहित भी अंधा है।
परमार्थ ज्ञान नहिं हो जिसको विद्वतजन कहते अंधा हैं।।
हे माता ! तुम प्रसाद से ही निश्चयनय का दर्शन होता।
जिसको हो जाए मोक्षरूप दर्शन नर जन्म सफल होता।।
(१६)
मानव का जीवन वाणी से ही सार्थक समझा जाता है।
एवं वक्ता कवित्व का गुण वाणी को सफल बनाता है।।
ये दोनों गुण इस दुनिया में अतिदुर्लभ माने जाते हैं।
गर कृपा आपकी हो जिस पर उसको ये गुण मिल जाते हैं।।
(१७)
जिन कानों का संस्कार किया वे ही अच्छे माने जाते।
और वही कान हितकारक है अरु अविनाशी माने जाते।।
हे सरस्वति ! तव वाणी ही प्राणीगण को विवेक देती।
और उससे भिन्न राग आदिक के गान मूढ़ता ही देती।।
(१८)
यह सरस्वती तालू व कण्ठ से पैदा हुई सभी कहते।
तो भी इसकी स्थिति आदि और अंतरहित प्रभुवर कहते।।
इस तरह अनेक धर्म से युत एकांत विधी का नाश किया।
द्रव्य श्रुत से है तालू व वंâठ भावों से ज्ञानमयी किरिया।।
(१९)
हे सरस्वती माँ ! कामधेनु िंचतामणि कल्पवृक्ष सब ही।
इक ही भव में प्राणीजन को इच्छित फल देते हैं सच ही।।
लेकिन यदि आप मनुष्यों पर संतुष्ट हो गयी हो माता।
तो उसको इहभव परभव में देती हो इष्टफल हे माता।।
(२०)
यद्यपि जग में सूरज चंदा दीपक अंधियारा नष्ट करे।
पर अंदर का जो अंधकार उसको निंह कोई विनष्ट करे।।
वह अंधकार हे सरस्वती माँ ! आप नष्ट कर सकती हो।
इसलिए सभी के मन में तुम ज्योति बन करके जलती हो।।
(२१)
तू जिनवर रूपी स्वच्छ सरोवर को इकमात्र कमलिनी है।
और ग्यारह अंग पूर्व चौदह रूपी कमलों से शोभित है।।
अरु गणधर रूपी हंसों से जिनकी सेवा की जाती है।
ऐसी हे सरस्वती माता ! हम पर भी दया लुटाती है।।
(२२)
यद्यपि जग में सुन्दरता अरु राजा बनना अति दुर्लभ है।
पर हे माता ! तेरे प्रभाव से ये सब प्राप्ति सुलभ ही है।।
क्योंकी सबसे है कठिन यहाँ परमात्म तत्त्व की प्राप्ति कही।
जब वह पद भी मिल जाता है तो तुच्छ वस्तु की क्या गिनती।।
(२३)
जो भव्य जीव तव चरण कमल की भक्ती से सेवा करता।
उसके सम्यक्त्व ज्ञानरूपी तीसरा नेत्र प्रगटित होता।
उस ज्ञान नेत्र से सब पदार्थ केवलज्ञानी को दिखते हैं।
मानो श्रुतज्ञानी से ईष्र्या करके तव आश्रित रहते हैं।।
(२४)
जो भवि जीवों को तरे उसी का तीर्थ नाम है कहा गया।
तू सम्यग्ज्ञानमयी जल से है भरी भगीरथ कहा गया।।
सब लोगों की शुद्धि होती तुझमें ही गोता खा करके।
जैसे समुद्र वृद्धिंगत हो चंदा की किरणों से मिलके।।
(२५)
तेरे द्वारा संस्कारित होकर मतिज्ञान सतज्ञान बने।
बाकी के बचे हुए सब श्रुत मनपर्यय में सहकारि बने।।
जितने भी दूर मेरु आदिक दर्शन में चक्षू बन जाती।
संसार वृक्ष को नशने में हे माँ ! कुठार तू बन जाती।।
(२६)
शास्त्रानुसार जो भी प्राणी सारे वर्णों को पढ़ता है।
ऐसी कोई भी लक्ष्मी नहिं जो प्राप्त नहीं कर सकता है।।
निंह कोई उत्तम गुण अथवा उत्तम पद जो ना मिले उसे।
ऐसा गुरु ने उपदेश कहा हे देवि ! कृपा होवे जिस पे।।
(२७)
जो संचित किया पापरूपी पर्वत अनेक जन्मों का हो।
उसका भी भेदन हो जाता यदि शास्त्र विवेकपने का हो।।
हे माता ! श्रेष्ठ अर्थ एवं वाक्यों से पूर्ण जो शास्त्र कहे।
उन शास्त्ररूप मेघों से ही सब संचित पाप समूह बहे।।
(२८)
हे सरस्वती माँ ! इस जग में है सूर्य चन्द्र के तेज बहुत।
पर जो सर्वोत्कृष्ट तेरी वाणी के तेज से है संयुत।।
वह नहीं किसी भी अंधकार से नष्ट कभी हो सकता है।
वह स्वत: प्रकाशित है इससे जयवंत सदा ही रहता है।।
(२९)
हे माता ! तेरे ही प्रसाद से प्राणी कविता कर लेता।
पर मेरे सदृश वङ्कामूर्ख वैâसे यह चेष्टा कर सकता।।
अतएव प्रसन्नमना हो माँ कुछ मुझको ज्ञान प्रदान करो।
यदि पुत्र निर्गुणी भी होवे तब भी माता नहिं निष्ठुर हो।।
(३०)
जो मानव ‘‘पद्मनंदि मुनिवर’’ द्वारा विरचित कृति को पढ़ता।
वह कविता आदिक उत्तम गुण को पाकर भव सागर तिरता।।
क्रमश: संसार रूप सागर तरकर मुक्ती को पाता है।
‘‘श्रुतदेव’’ की स्तुति करके फिर वो अव्याबाध सुख पाता है।।
(३१)
हे देवी! तव गुण गाने में विद्वान वृृहस्पति आदिक भी।
हो जाते मंदबुद्धि जब वे फिर हम जैसे अज्ञानी की।।
क्या बात कहें जो थोड़ी सी स्तुति की वाकचपलता है।
अत्यन्त भक्ति ही कारण है बस क्षमा की आवश्यकता है।।

।।इति ‘‘सरस्वति स्तवन’’ नामक अधिकार।।