20 सितम्बर 2018 दशलक्षण धर्म प्रवचन

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उत्तम तप धर्म

आज दशलक्षण धर्म का सप्तम दिवस है। सिद्धिरूपी महल पर चढ़ने के लिए दस सीढ़ियों के समान दश धर्म मेरे जीवन को पवित्र करे। आज उत्तम तप धर्म है। पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी अपनी सुस्वर वाणी से हजारों भक्तों को ज्ञानरूपी अमृत का पान करवाती है। माताजी ने बताया कि जैन साधुओं के ६ अन्तरंग और ६ बहिरंग तप माने हैं। जिनको करके संत उत्तम तप का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। लेकिन आंशिक रूप से हर श्रावक इस तप धर्म को पालन कर सकते हैं। तप में २ शब्द हैं-इनको उल्टा करने पर पत हो जाता है। तप में केवल २ शब्द हैं, लेकिन इसमें ३६ का आंकड़ा है। पतन-गिरना, पतित होकर-गिरकर जो पतित हो जाते हैं। ऐसे जीव, पुद्गल दो का संयोग है। दिखता है ३६ का आंकड़ा। लेकिन जीव को आगे कर दें तो तप करके आत्मा पवित्र हो जाती है और पुद्गल को आगे कर दें, तो पतित हो जाता है। इन्द्रिय भोगों में पतित होकर जीव गिर जाते हैं। कर्तव्य पालन करना भी एक तप है, यानि क्रोध को शांत रखना, सभी के प्रति यथायोग्य कर्तव्यों का पालन करना तप से कम नहीं है। एक सैनिक भारत की सीमा पर अपने जान की बाजी लगाकर देश की सुरक्षा करने में तत्पर रहते हैं। वह सैनिक भी देश की सुरक्षा करने में, उसका पालन करने के लिए एक साधु से कम तप नहहीं करता है। जिस देश का आश्रय लेकर संत तपस्या करते हैं, उस देश के राजा को संत की तपस्या का ६वाँ भाग पुण्य राजा को प्राप्त होता है। पूज्य चंदनामती माताजी तप धर्म के माध्यम से एक बहुत ही रोमांचक धटना के बारे में बताया। विदेह क्षेत्र के अंदर एक पुण्डरीक नाम का देश था। वहाँ पर त्रिभुवनानंद नाम के चक्रवर्ती रहते थे। उसकी पुत्री का नाम अनंगसरा था। एक विद्याधर अपने विमान में बैठकर जा रहा था। उसने सुंदरी अनंगसरा को देखा उसके रूप में मोहित होकर उसका अपहरण करके विमान में बैठाकर ले गया। जब चक्रवर्ती के कहे अनुसार सैनिकों ने उसका पीछा किया, तो उस कन्या को विद्याधर ने पणलध्वी नामक विद्या से जंगल में छोड़कर चला गया। जंगल में पशुओं-पक्षियों की आवाज सुन-सुनकर वह बेहोश हो गई। जब उसे होश आया, वह बहुत रोई। उसने कहा हे पिताजी! आप मेरा पता क्यों नहीं लगा पा रहे हैं, मैने कौन सा घोर पाप किया है। तत्पश्चात् उसी जंगल में उसने ३००० साल तक जंगल में रहकर वहाँ के फल-पूâल खाती रही, अनेकों उपवास भी करती थी। उसने सोचा अब मुझे कोई नहीं बचाने आयेगा। उसने सल्लेखना ले ली, मैं १०० हाथ से ज्यादा दूर कहीं नहीं जाऊँगी। काफी समय बाद विदेह क्षेत्र का एक व्यक्ति विमान से आया, नीचे उतरकर देखा उसने कहा अरे यह तो चक्रवर्ती की कन्या है। बोला कि बेटी घर चलो। अनंगसरा ने कहा मैं कहीं नहीं जाऊँगी। फिर पिता को समाचार मिलता है, पिताजी अपने सेना लेकर जंगल में आ जाते हैं, देखते क्या हैं कि अनंगसरा को एक अजगर ने निगल लिया है, सिर्फ उसका मुख दिख रहा हैं तुरंत चक्रवर्ती ने धनुष-बाण उठाया और अपनी बेटी को बचाने के लिए बाण छोड़ने लगे, तुरंत बेटी ने रोका कहा पिताजी! मैंने चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दिसया है, आप अजगर को मत मारिये। इस प्रकार से समता परिणाम के द्वारा तप से उसने यम सल्लेखना ले ली और वहाँ से आकर अयोध्या में राजा द्रोणमेघ की कन्या विशल्या हो गई। शरीर में इतनी शक्ति, तप के प्रभाव से उसके स्नान का जल भी औषधि हो गया। कितनों के रोग दूर हो गया। विशल्या ने अपनी अमोघशक्ति से लक्ष्मण को ठीक कर दिया। उसको मुनि ने बताया था कि इस कन्या ने जो ३००० साल तक तपस्या करती थी, इसलिए इसके शरीर में इतनी तपस्या आ गई, यह है तप का प्रभाव। जय बोलो तप धर्म की जय।।

तत्पश्चात् गणिनी ज्ञानमती माताजी ने गौतम गणधर वाणी की सातवीं अध्याय पर प्रकाश डाला |सुदं में आऊसंतो_हे,आयुष्मन्तो मैंने सूना है|इस पर पूज्य माताजी ने विस्तार से बताया फिर माताजी ने भगवान ऋषभदेव के सातवाँ भाव के बारे में बताया |