21.चतुर्विंशति तीर्थंकर स्तोत्र

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चतुर्विंशति तीर्थंकर स्तोत्


।।सोलहवाँ अधिकार।।

(१) आदिनाथ जी
जो जग प्रमाद के वश होकर अज्ञान वूâप में पड़ा हुआ।
उस जग को प्रभु आदीश्वर ने निज वचनों से संबोध दिया।।
ऐसे परमात्म स्वरूप वचन सुनकर जिनका उद्धार हुआ।
उन आदिनाथ तीर्थंकर की सेवा से जग कल्याण हुआ।।
(२) अजितनाथ जी
सब जीवों का जग ही वैरी दूजा ना कोई वैरी है।
और रत्नत्रय ही मित्र एक निंह दूजी कोई सहेली है।।
जिस जग वैरी को अजितनाथ ने रत्नत्रय से जीत लिया।
वे उत्तम सुख के दाता हों ऐसी मैंने प्रार्थना किया।।
(३) संभवनाथ जी
जो बार बार जग के दुखों से दुक्खित सभी प्राणियों को।
जग के दुखों के नाश हेतु जो मोक्षमार्ग दिखलाते वो।।
शरणागत प्राणी की भगवन दुखों से रक्षा करते हैं।
ऐसे श्री संभवनाथ प्रभू को शीश झुकाकर नमते हैं।।
(४) अभिनंदननाथ जी
हो तीनों लोकों में पूजित इसलिए नहीं हो तुम महान।
जो नहीं किसी में मिल सकते ऐसे निज गुण से हो महान।।
जिस ज्ञान के आगे सकल विश्व की सभी वस्तुएँ हेय लगें।
ऐसे श्री अभिनंदन जिन के चरणों में हम शत नमन करें।।
(५) सुमतिनाथ जी
जिसमें प्रमाण नय आदिक का भलीभाँति सम्मिश्रण है।
ऐसे तत्वों का प्रतिपादन तव नामरूप ही सार्थक है।।
क्योंकी हे सुमतिनाथ भगवन ! सबको अच्छी मति देते हो।
इसलिए नमन हम करते हैं अति निर्मल तत्त्व प्रकाशक हो।।
(६) पद्मप्रभु जी
आकाश में चंदा जिस प्रकार शोभित होता नक्षत्रों से।
आनंदामृत की वर्षा होती रहती तत्सम जीवों में।।
श्री पद्मप्रभु जी समवसरण बीच ऐसे शोभित होते हैं।
अपने प्रकाश से हम सबकी वे रक्षा करते रहते हैं।।
(७) सुपाश्र्वनाथ जी
जो कामदेव नर इंद्र आदि को भी सुख देने वाला है।
शस्त्रों का धारी धीरमना और मीन की ध्वजा वाला है।।
ऐसे श्री कामदेव को जिन सुपाश्र्व भगवन ने पल भर में।
बिन अस्त्र शस्त्र के जीत लिया उनको है नमन चरणद्वय में।।
(८) चंद्रप्रभु जी
जो वाणीमय अमृत की किरणों से यद्यपि चंद्रमा है।
फिर भी कलंककर से विरहित और दोष रहित परमात्मा हैं।।
ऐसे ‘‘चंद्रप्रभु तीर्थंकर’’ सब पाप का क्षय करने वाले।
जयंवत सदा इस जग में हों हम सबके दुख हरने वाले।।
(९) पुष्पदंत जी
जैसे कोई ठग जीवों को मोहित करके ठग लेता है।
वैसे ही मोह बड़ा भारी ठग सब जीवों को ठगता है।।
इसलिए प्राणियों में कुछ भी नहिं बुद्धि हिताहित की रहती।
‘‘श्री पुष्पदंत तीर्थंकर’’ को ध्या मोहधूलि पल में नशती।।
(१०) शीतलनाथ जी
जो वचन सज्जनों को चंदा चंदन सी शीतलता देते।
श्री शीतलनाथ प्रभू जग के सारे तापों को हैं हरते।।
ऐसे शीतल जिन नमस्कार के योग्य जगत में हुए अहो।
हम शीश नवाकर नमते हैं हमको भी शीतलता देवो।।
(११) श्रेयांसनाथ जी
तीनों लोकों के जीवों को कल्याण प्राप्ति इनसे होती।
इसलिए प्रभो श्री श्रेयनाथ इस नाम से जगप्रसिद्धि इनकी।।
जिन भव्यों की श्रेयांसनाथ भगवन में सच्ची भक्ती है।
उनको इन प्रभु की कृपादृष्टि से होय मनोरथ सिद्धि है।।
(१२) वासुपूज्यनाथ जी
हे वासुपूज्य भगवन ! जो जन तव चरण युगल में नमता है।
वह भव्य अपूर्व पुण्य फल की जग में प्राप्ती कर सकता है।।
उस पुण्य के फल से इस जग में ना कोई ऐसी लक्ष्मी है।
जो दौड़ के आगे ना आए ऐसी न कोई सुख संपति है।।
(१३) विमलनाथ जी
इस जग में कौन पुरुष होगा जिनने निंह विमल को नमन किया।
सब मल से रहित यथार्थ नामधारी को जिनने नमन किया।।
ऐसे श्री ‘‘विमलनाथ भगवन’’ को हम भी नमस्कार करते।
जिनके श्रीनाम स्मरण मात्र से सारे कल्मष हैं धुलते।।
(१४) अनंतनाथ जी
जो हैं अनंतज्ञानादि रूप उनको मैं हृदय में धरता हूँ।
जो गुण उनमें है विद्यमान उन गुण की इच्छा करता हूँ।।
जैसे प्यासा निज तृषा हेतु उत्तम जल भरे सरोवर की।
इच्छा करता है वैसे ही श्री ‘‘अनंतनाथ’’ फल देवें भी।।
(१५) धर्मनाथ जी
श्री धर्मनाथ तीर्थंकर को मुक्ती के हेतु नमन करता।
जो धर्मतीर्थ के प्रविधायक भवि जीवों को आश्रयदाता।।
अति दुर्लभ है सर्वोत्कृष्ट ऐसी कल्याण परम्परा को।
भव्यों को प्राप्त कराते हैं बन जाते धर्मधुरंधर वो।।
(१६) शांतिनाथ जी
जो शांतिनाथ निज आत्मा की शांतीकर्ता निज कर्मों से।
क्षय करके जग में शांत किया हम सबको शांतिप्रदायक वे।।
दोनों प्रकार की लक्ष्मी के स्वामी सोलहवें तीर्थंकर।
हे कामदेव चक्रीपद के धारी हमको हों क्षेमंकर।।
(१७) वुंâथुनाथ जी
बाह्याभ्यंतर दोनों प्रकार के परिग्रह तजने के कारण।
दोनों विशुद्धि को प्राप्त हुए तीर्थंकर वुंâथुनाथ भगवन।।
जीवों पर दयाविशुद्धिकरी चैतन्य विशुद्धी अंदर है।
ऐसे श्री वुंâथुनाथ जिनवर हम सबके लिए शांतिकर हैं।।
(१८) अरहनाथ जी
दीपक की प्रभा जगदगृह के पापांधकार को नष्ट करे।
वैसे ही प्रभु के नख की कांती सब पापों को नष्ट करें।।
देवों के मुकुट की रत्नकांति से भी ज्यादा है प्रभायुक्त।
श्री अरहनाथ के चरणयुगल जयवंत रहें जो पापमुक्त।।
(१९) मल्लिनाथ जी
श्री मल्लिनाथ भगवान स्वयं हैं उदासीन फिर भी देखो।
उनके स्नेही सुख पाते दुख पाते शत्रूगण हैं जो।।
सारे जग को आश्चर्यचकित करने वाले हे मल्लि प्रभू।
इस लोक में तुम जयवंत रहो हम सबके केवल तुम्हीं विभू।।
(२०) मुनिसुव्रतनाथ जी
तृण के समान सम्पदा छोड़ मुनिव्रत को तुमने धार लिया।
सुव्रत को धारण करने से मुनिसुव्रत जी यह नाम किया।।
जो कर्मनाश कर अविनाशी मुक्तीपद को है प्राप्त किया।
मुझ पर भी हो जाओ प्रसन्न ऐसी मैंने प्रार्थना किया।।
(२१) नमिनाथ जी
इंद्रिय से जनित सुख पराधीन अतिदुर्बल अरु अति चंचल है।
ऐसा सुख केवल दुख ही है आत्मिक सुख केवल निश्चल है।।
स्वाधीन और स्थिर भी है दुर्बलतारहित परमसुख है।
ऐसे आत्मिक सुख में रहने वाले श्री नमिजिन प्रभुवर हैं।।
(२२) नेमिनाथ जी
जिस तरह चक्र की धारा छेदन करने में रहती पैनी।
वैसे ही कर्म नाशने में नहिं आप समान अरिष्ट नेमि।।
भव्यों के अशुभ कर्मनाशक गिरनार से मोक्ष पधारे हो।
हे अरिष्टनेमि भगवान सदा इस लोक में भी जयवंत रहो।।
(२३) पार्श्वनाथ जी
जिस समय ध्यान में लीन प्रभो तब कमठ जा रहा था नभ से।
उसका विमान रुक गया तभी और वैर याद आया मन में।।
उस कमठासुर का वध करने को फणपति पद्मा संग आया।
उपसर्ग निवारण किया तुरत जय पाश्र्वनाथ जग ने गाया।।
(२४) श्री महावीर जी
तीनों लोकों के ईश्वर होकर भी तुम नि:स्पृह रहते हो।
अपनी काया से मोह नहीं इच्छा से रहित अत: जिन हो।।
अंतिम तीर्थंकर वद्र्धमान हम सब तुमको वंदन करते।
मुझ ‘‘पद्मनंदि’’ को मुक्ती दो हम भी तव चरणकमल नमते।।

।।इति श्री चतुर्विंशति स्तोत्र।।