21 सितम्बर 2018 दशलक्षण धर्म प्रवचन

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उत्तम त्याग धर्म आज दशलक्षण पर्व का आठवाँ दिवस है। पूज्य चंदनामती माताजी ने प्रात:कालीन पारस चैनल के माध्यम से त्याग धर्म पर बहुत ही सुंदरता से समझाया, जिससे भक्तगण बहुत ही हर्षायमान होते हैं। पूज्य चंदनामती माताजी ने त्याग धर्म के बारे में कहा | कि पूज्य गणिनी ज्ञामनती माताजी ने त्याग धर्म की साक्षात् जीवन्त प्रतिमा को हमारे सामने विराजमान है। पूज्य माताजी ने अपने जीवन में चारों दान देकर इतना विशाल पुण्य प्राप्त किया है कि हम सभी लोग इसका मूल्यावंâन नहीं कर सकते हैं। इन्होंने इस जन्म में ही नहीं पूर्व जन्म में इतना ज्ञान दिया है। अंग के अंशों का ज्ञान प्राप्त करके सिद्धान्तचिंतामणि की १६ पुस्तक लिखकर इन्होंने बताया कि ज्ञानदान क्या होता है। पिच्छी से ६६ साल से सूक्ष्म जीवों की रक्षा की। शांतिसागर जी महाराज अगर धर्म धारण नहीं करते तो शायद त्याग की परम्परा न चलती।

पूज्य चंदनामती माताजी ने त्याग धर्म की महिमा सुंदर कहानी के माध्यम से जन-जन में पहुँचाई। एक महिला बहुत गरीब थी, वह सेठ जी के यहाँ नौकरी करती थी, उसका एक बेटा था। माँ ने सठ जी के यहाँ एक दिन खीर बनायी। सेठ जी के बच्चों को खीर खाते देखकर बच्चे ने माँ से कहा माँ मुझे भी खीर खाना है। सेठ जी के बच्चों ने उसे एक थप्पड़ लगाया और कहा अपना मुख तो देख। माँ ने बच्चों को समझाते हुए कहा कि बेटा हम लोगों की हैसियत नहीं है। जब यह बात सेठ जी को पता चली, तभी सेठ जी ने उसे दूध, चावल आदि सामग्री खीर बनाने के लिए दी और कहा तुम यह ले जाओ और बच्चे को घर पर खीर बनाकर खिला देना। माँ ने घर पर खीर बनाई और बच्चों से कहा बेटा मैं कुएं पर पानी लेने जा रही हूँ। अगर कोई साधु महाराज आये तो रोक लेना। उनको खीर खिलाकर तुझे भी खिलाऊँगी। ऐसा कहकर माँ पानी लेने चली गयी। उधर से एक मासोपवासी साधु आहारचर्या के लिए निकले। बच्चे ने कहा महाराज मेरी माँ ने खीर बनाई है। अभी आपको देगी। उधर से माँ पानी का घड़ा लेकर आयी और महाराज का पड़गाहन करके आहार कराया और बालक महाराज का आहार देखकर जय हो.....जय हो.....ऐसी आहार की अनुमोदना करने लगा, जिससे उसने महान पुण्य का अर्जन कर दिया और पंचाश्चर्य की वृष्टि हुई। पंचाश्चर्य की वृष्टि केवल आहारदान में ही होती है। महाराज अक्षीण ऋद्धि के धारी थी, जिससे वह खीर अक्षय हो गयी।

महानुभाव! आप लोग पूर्ण त्याग नहीं, तो आंशिक रूप से त्याग को धारण करें। त्याग धर्म की जय।