22 सितम्बर 2018 दशलक्षण धर्म के प्रवचन

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आकिंचन्य धर्म

उत्तम आकिंचन्य धर्म आज दशलक्षण पर्व का नवां दिन है। नवग्रह मंदिर में सर्वप्रथम पूज्य ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य में पंचामृत अभिषेक होता है। भक्तों की भीड़ ऋषभदेवपुरम् में उमड़ रही है, सभी लोग मांगीतुंगी-ऋषभदेवपुरम् में स्वर्ग जैसी अनुभूति कर रहे हैं। पूज्य चंदनामती माताजी प्रतिदिन हर धर्म के ऊपर बहुत ही सुंदरता के साथ भक्तों को समझाती हैं। आज आकिचन्य धर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मेरा कुछ भी नहीं है, अत: मैं आकिंचन्य हूँ, फिर भी मेरी आत्मा अनन्त गुणों से परिपूर्णा होकर अनन्तकाल से निवास कर रहा हूँ, परिग्रह का त्यागी बनकर गुणों से परिपूर्ण हो जाता है, मैं सदा पर भिन्न से शून्य हूँ।

उत्तम आकिंचन्य धर्म मुनि जनधारण करते हैं, उसका पालन करते हैं। लेकिन अणुव्रत के रूप में श्रावक धारण कर सकता है। अणुव्रत धारण करने वाले श्रावक नियम से देवगति की प्राप्ति करते है। महानुभाव! पाँचों पापों के एक देश त्याग कर ले तो आकिंचन्य धर्म आपके जीवन में साकार हो जायेगा। अणुव्रत हमारे अनंतानंत जन्मों में संचित पाप को नष्ट करने वाले हैं।

जैसे जड़ के बिना वृक्ष नहीं टिक सकता।
नींव के बिना नहीं मकान बन सकता।
वैसे ही बिना धर्म के मनुष्य हो सकता है
लेकिन मानव नहीं बन सकता है।
यदि धारण कर ले धर्म,
तो नर क्या नारायण बन सकता है।

पूर्ण आकिंचन्य बनना संतों का काम है, एक देश आकिंचन्य बनना श्रावकों का काम है।

दिगम्बर संतों के चरणों में बैठकर यदि हमने पाप के त्याग करने की शिक्षा प्राप्त नहीं की, तो आप कोरे के कोरे रह जायेंगे। श्रावकों के लिए कहना है, आज के दिन आप लोग पंच अणुव्रत धारण करें।

पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने कहानी के माध्यम से बताया|

कि एक व्यक्ति गरीब था, उसने दिगम्बर मुनि के पास जाकर दीक्षा ले ली, उसने कहा मुनिराज मेरे ऊपर कर्जा था, मैं चुका नहीं पा सकता हूँ। मुनि ने कहा तुम तपस्या करो। दीक्षा लेने के बाद उन्होेंने विहार किया। विहार करते-करते वह उसी गांव में आ गये, जहाँ पर उस गांव में कर्जा लिया था। वह व्यक्ति सामने आ गया बोला कायर कहीं का कर्जा न चुकाना पड़े इसलिए जाकर मुनि बन गये। वह मुनि के पास और कहा! आप किसी व्यक्ति मेरा कर्ज चुका दीजिए, मुनि ने कहा जाओ तुमने जहाँ पर कर्जा मांगा था, वहाँ खड़े हो जाये और अपने व्रत को बेचो। उन्होंने वैसा ही किया। सभी लोग हंसते कोई कहता, कहीं व्रत भी बेचा जाता है। एक देवी का आसन कम्पायमान हो रहा है। वह प्रगट हो गई। वह बोली आप यह व्रत क्यों बेच रहे हैं, महाराज मैं व्रत लेने में समक्ष नहीं हूँ। केशलोंच की परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है, मैं उसकी बोली ले सकती हूँ, उन्होंने केश उखाड़ा, देवी ने केश के बदल वहाँ पर रत्नों का ढेर लगा दिया। उसी भीड़ के अंदर वह व्यक्ति था, उसने रत्न देखकर सोचा २-३ रत्न में मेरा कर्जा उतर जायेगा। लेकिन उसके भाव बदल गये, उसने रत्न न लेकर धर्म को स्वीकार किया। वह बहुत प्रभावित हुआ, उसने कहा धर्म में इतनी शक्ति है, जिन्होने सब कुछ त्याग कर दिया, उसके आगे तीन लोक की सम्पत्ति भी बेकार हो जाती है। ऐसे आकिचन्य धर्म को स्वीकार करके अपने उत्तम दशधर्म को स्वीकार कर रहा हूँ। उत्तम आकिंचन्य धर्म की जय।