23 अगस्त 2017 प्रवचन

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23 अगस्त 2017 प्रवचन

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आज देश के सभी नगरों में, मंदिरों में एवं साधु संघो में पुण्यतिथि का कार्यक्रम जोर-शोर से मनाया जा रहा है। परमपूज्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की पवित्र परम्परा की सर्वप्राचीन दीक्षित आर्यिका गणिनी ज्ञामनती माताजी यह विराजमान है। उन्हीं के सान्निध्य में यह कार्यक्रम चल रहा है| सर्वप्रथम जिनेन्द्र भगवान जी का अभिषेक एवं आचार्यश्री की प्रतिमा का एवं पंचामृत अभिषेक एवं १६ प्रकार के फलों के रसों से अभिषेक हुआ। स्वामीजी ने पंचामृत अभिषेक विधिवत् विधि से सम्पन्न कराया। मुम्बई महानगर के भक्तों को बहुत ही हर्षोल्लास की अनुभूति हो रही है, सभी भक्त अपने-अपने को बहुत धन्य समझ रहे हैं। खूब प्रसन्नता से आज आचार्य श्री का गुणानुवाद करना है।

पारस टी.वी. के माध्यम से सभी भक्तगण अपने-अपने घरों में बैठकर श्री जी की प्रतिमा का अभिषेक देखकर पुण्य का अर्जन कर रहे हैं। पूज्य ज्ञानमती माताजी ने आचार्य श्री चरणों में विनयांजलि, श्रद्धांजलि समर्पित किया।भव्यात्माओं! आज शांतिसागर महाराज की ६२वीं पुण्यतिथि है।आचार्य श्री ने अपना नश्वर शरीर छोड़कर पंडित मरण प्राप्त किया। उनके अनेकों कार्यकलाप जग में प्रसिद्ध है। उन्होंने सच्चे देव, सच्चे शास्त्र, सच्चे गुरु की भक्ति की। उनके द्वारा कियिे गये उपकार हमारे और सबके ऊपर है। इस २०वीं सदी में निर्दोष चर्या वाले १६०० साधु आचार्यश्री की कृपा प्रसाद से विचरण कर रहे हैं। पूज्य चंदनामती माताजी ने आचार्यश्री की पूजा मधुरवाणी से पढ़ी। सभी भक्तों ने भावविभोर होकर पूजन किया। गुरु शांतिसिंधु की पूजन से आतम सुख का भण्डार मिले, गुरुवर के दर्शन वंदन से, शाश्वत सुखशांति बहार मिलें। पूजन के पश्चात् प्रथम आचार्य से लेकर सप्तम पट्टाचर्य का अर्घ्य चढ़ाया गया। तत्पश्चात् जैन युवा जागृति सम्मेलन का आयोजन किया गया।

स्वामीजी ने बताया कि आचार्यश्री (भादों शुक्ला दूज) को प्रात: ६ बजे उन्होंने नश्वर शरीर का परित्याग किया।

हम कल्पना करें आज से ६२ साल पहले कुंथलगिरि पर्वत पर सन् १९५५ में आचार्यश्री ने अंतिम सल्लेखना की ओर इतने उन्मुख थे कि उन्हें किसी के संबोधन की आवश्यकता ही नहीं थी। वह अन्तर में मग्न थे। सन् १९५५ में आचार्यश्री कुंथलगिरि में कुलभूषण-देशभूषण जी की प्रतिमा के समक्ष १२ वर्ष की सल्लेखना ली थी। ज्ञानमती माताजी उस समय क्षुल्लिका अवस्था में वीरमती माताजी थी, वह आचार्यश्री की सल्लेखना के समय वहाँ गई थी। भादों शुक्ल दूज को उन्होंने अपने शरीर का परित्याग करके उपपाद शैय्या पर जाकर वैक्रियिक शरीर धारण किया। आज लगभग १६०० साधु विहार कर रहे हैं, यह सब आचार्यश्री का ही उपकार है।

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