23 सितम्बर 2017 प्रवचन

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परम पूज्य ज्ञानमती माताजी के 84 जन्मदिन पर शत-शत वन्दामि-

पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने अपनी गुरु माता ज्ञानमती माताजी के ८४वें जन्ममहोत्सव के बारे में वर्णन करते हुए कहा- बंधुओं आपको यह बताते हुए अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है कि जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी इस वर्ष शरदपूर्णिमा के अवसर पर अपने स्वर्णिम जीवन के ८४वें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं। शरदपूर्णिमा एक ऐसा दिन है जिस दिन ऐसी महान आत्मा ने जन्म लिया। २२ अक्टूबर सन् १९३४, शरदपूर्णिमा के दिन टिकैतनगर ग्राम में माता मोहिनी की कुक्षी से मैना देवी के रूप में मैना ने अवतार लिया था। माँ को दहेज में प्राप्त पद्मनंदिपंचविंशतिका ग्रंथ के स्वध्याय से एवं पूर्वजन्म के प्राप्त संस्कारों से १८ वर्ष की अल्प आयु में ही शरदपूर्णिमा के दिन मैना ने आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज से सन् १९५२ में आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया एवं सप्तम प्रतिमा के व्रत भी ग्रहण किए। अब उन्होंने अपने जीवन में दीक्षा के भाव शीघ्र ही जाग्रत करने लगीं। वह शुभ दिवस की बेला आई जब ब्र. मैना ने १९५३ में आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज से चैत्र कृष्णा एकम् को महावीर जी में क्षुल्लिका के व्रत ग्रहण कर लिए और क्षुल्लिका वीरमती नाम प्राप्त कर लिया।

सन् १९५५ में चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की समाधि के समय कुंथलगिरि पर एक माह तक उनके सान्निध्य में रहीं। आचार्यश्री ने अपने प्रथम पट्टाचार्य वीरसागर महाराज से क्षुल्लिका वीरमती से सन् १९५६ में वैशाख कृष्णा दूज को माधोराजपुरा में आर्यिका दीक्षा देकर आर्यिका ज्ञानमती नाम रख दिया और एक बात कही। ज्ञानमती तुम अपने नाम का ध्यान रखना। उन्होंने ज्ञानमती नाम सार्थक कर दिया। दीक्षा के बाद इनकी लेखनी हमेशा चलती रही। इन्होंने अपनी लेखनी से एक नहीं, दो नहीं ४०० से अधिक ग्रंथ लिख डाले। ये अपने शिष्य-शिष्याओं को अनेक ग्रंथों का अध्ययन करवाती थीं।

माताजी की लेखनी से व्याकरण, न्याय, सिद्धान्त, बाल साहित्य, उपन्यास, चारों अनुयोग और भी अनेक साहित्य उपलब्ध हुए हैं। इसके अलावा अनेक विधान की रचना की है। अत: पूरे भारत समाज के जैन मंदिरों में पूज्य माताजी द्वारा रचित विधान ही होती हैं। विधान करके भक्तलोग भक्ति की गंगा में स्नान करते हैं।

पूज्य माताजी जो भी वाणी अपने मुख से बोलती हैं, या लिखती हैं, उसमें एक भी शब्द आगम के विरुद्ध नहीं बोलती हैं। आगम के परिप्रेक्ष्य में बोलती हैं। यह उनकी महान विशेषता है। धन्य हैं, ऐसी सरस्वती माता।

उनके सान्निध्य में अनेकों शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर होते हैं। न जाने कितने अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार होते हैं। इसी प्रकार से सामाजिक संस्थाओं द्वारा पूज्य माताजी को न्याय प्रभाकर, आर्यिकारत्न, वात्सल्यमूर्ति, चारित्रचन्द्रिका आदि अनेकों उपाधियों से अलंकृत किया गया है।

पूज्य माताजी ने अनेक तीर्थों का जीर्णोद्धार कराया। कुण्डलपुर, प्रयाग, काकंदी, हस्तिनापुर आदि तीर्थों को स्वर्ग जैसा बना दिया। यात्री जब इन तीर्थों पर दर्शन करके वापस आते हैं, तो कहते हैं माताजी हम तो स्वर्ग में आ गये। ऐसे सुन्दर तीर्थों का निर्माण पूज्य माताजी की प्रेरणा से होते हैं। मांगीतुंगी में १०८ फुट भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा निर्माण का कार्य हुआ है, वह बहुत ही आश्चर्य और अद्भुत कार्य हुआ है। १०८ फुट की मूर्ति बनवाना कोई आसान कार्य नहीं है। लेकिन माताजी के मस्तिष्क में जो भी कार्य आता है, वह बहुत ही सरलता से पूरा कर देती है। माताजी के कार्य कलापों का भी वर्णन जिह्वा से या लेखनी से कोई नहीं कर सकता है।

पूज्य चंदनामती माताजी ने उनके भावों को लेकर बहुत सी सुन्दर पंक्तियों में छोटा सा गीत लिखा है-

ज्ञानमती माताजी से पूछे सब भाई, माता तूने ऋषभदेव मूर्ति क्यों बनाई।

बोली मुस्कराती माता सुनों मेरे भाई, मैंने तो जिनधर्म की प्राचीनता बतलाई।

एक सौ अठ फुट जिनवर की छवि मन को भाई-सुनो मेरे भाई......

सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी का कण-कण पवित्र है

वही ध्यान करके पाया प्रेरणा पवित्र है

तभी तूने माता सबको बात ये बताई, मूर्ति क्यों बनाई

काम था कठिन बहुत ही, किन्तु सरल हो गया

मेरी तेरी साधना से पूरा सहज हो गया

देखो ऋषभगिरि की महिमा सारे जग में छाई। सुनो मेरे भाई.......

आज गिनीज बुक में प्रभु का नाम दर्ज हो गया

शिष्यों और भक्तों का पूरा कर्तव्य हो गया

चंदनामती प्रभु पद में भक्ति पुण्य लाई, मूर्ति क्यों बनाई..
पूज्य चंदनामती माताजी ने भगवान के प्रति एवं वात्सल्यमूर्ति ज्ञानमती माताजी को शत बार नमन किया।