23 सितम्बर 2018 दशलक्षण पर्व के प्रवचन

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उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

आज दशलक्षण पर्व का अंतिम दिन है, ब्रह्मचर्य धर्म। सभी भक्तों ने बहुत ही हर्षोल्लास के साथ दशलक्षण पर्व मनाया। पूज्य प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माताजी ने ब्रह्मचर्य धर्म पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा | कि धर्म धारण करने की वस्तु है, प्रत्येक आत्मा इन धर्मों को हमेशा अपने जीवन में धारण करे, वह धर्मी कहे जाते हैं। धर्म की वंदना केवल जैनधर्म के अंदर ही रत्नत्रय की आराधना की जाती है। जैनधर्म में इन दश धर्मों का बड़ा महत्व है। आज उत्तम ब्रह्मचर्य है, आत्मा परम ब्रह्म है, आत्मा के अंदर रमण करना, वह वास्तविक धर्म है। जिससे उत्तम रूप में यह चतुर्विध माना है। रत्नत्रय को पालन करने वाले मुनि तो अखण्ड ब्रह्मचर्य तो पालन करते ही हैं, संसार में रहने वाले गृहस्थ भी एकदेश रूप में पालन करते हैं। ब्रह्मचर्य में सीता ने अपने शील की रक्षा करके जग में प्रसिद्धि प्राप्त की। सेठ सुदर्शन ने अखण्ड ब्रह्मचर्य पाला देवों ने आकर चंवर ढुंराया। आज भी उनके नाम आचार्योें ने अपने मुख से लिए हैं। जम्बू कुमार का नाम अखण्ड ब्रह्मचर्य में आता है, जिन्होंने पूर्व जन्म में असीधाराव्रत का पालन करने वाले थे। जम्बू स्वामी का विवाह ४ रानियों से हुआ। रात्रि में राग का अलाप करने पर भी सुबह जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली। जिस माता ने ४ सुंदर कन्या के साथ पुत्र का विवाह करवाया था, वह माता भी जाकर सुप्रभा नाम की आर्यिका से दीक्षा ले ली। चारों रानियाँ भी जो पति से राग करके रिझाती थीं, उन्होंने भी जाकर दीक्षा ग्रहण कर ली। जिस दिन सुधर्मा स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ, उसी दिन जम्बू स्वामी को केवलज्ञान प्रगट हो गया।

आज भी मानव ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, ब्रह्मचर्य के द्वारा ही शांतिसागर महाराज ने अनेकों चमत्कार दिखाएं, जिन्होंने जन्म लेने के बाद विषय भोग को नहीं जाना। उन्हीं की शिष्या पूज्य ज्ञानमती माताजी के अंदर जो ब्रह्मचर्य की शक्ति है, जिन्हें हाथ उठाकर आशीर्वाद दे देती हैं, उनके कार्य सिद्ध हो जाते हैं। हमेशा इसे पूर्ण ब्रह्मचर्य के रूप में जो धारण करेंगे, उनका कल्याण होगा। पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ने सभी को मंगल आशीर्वाद कहा है |