24 अगस्त 2017 प्रवचन

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24_अगस्त_2017_प्रवचन

उठो भव्य खिल रही है उषा तीर्थ वंदना स्तवन करो आर्त रौद्र दुध्र्यान छोड़कर श्री जिनवर का ध्यान करो - पूज्य चंदनामती माताजी ने कहा-भव्यात्माओं! आपको प्रतिदिन नींद से जगाने का पुरुषार्थ किया जाता है, साधु ऐसे अकारण बंधु है, जो नींद से नहीं मोहनींद से उठते हैं। कल सभी लोगों ने समाधि सम्राट आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की पुण्यतिथि बहुत ही धूमधाम से मनाई गई। जैनधर्म एक ऐसी कला है जो जीने की कला के साथ मरने की कला भी सिखाता है। युवा धर्म की शक्ति जागृत है, सम्राट चन्द्रगुप्त का सपना साकार करने के लिए। यह युवा संतों की वाणी का ही प्रभाव है। पूज्य ज्ञानमती माताजी ने कल अपने उद्बोधन में कहा कि युवा शक्ति ऐसी शक्ति है जो देश की संस्कृति, भारत की संस्कृति, धर्म और धर्मायतन की रक्षा करेगी। पंचमकाल में धर्म और धर्मायतन की रक्षा करने वाली युवा पीढ़ी होगी। पूज्य माताजी ने कहा-आज त्रिलोक तीज व्रत है। इस व्रत में त्रिकाल चौबीसी की आराधना की जाती हैं कहीं-कहीं पर इसे रोट तीज भी कहते हैं। शास्त्र में त्रिलोक तीज है। माताजी के गुरु आचार्य श्रीशांतिसागर जी महाराज का गुणानुवाद जितने भी शब्दों में किया जाये, उतना कम है, ऐसे गुरु को हम श्रद्धा से नमन करते हैं। सभी भक्तों से प्रेरणा है कि आचार्यश्री का इसी तरह गुणानुवाद करते रहें, यही मंगल प्रेरणा है। रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने कहा कि जैनशासन में दो प्रकार के पर्व माने हैं-सादि पर्व, अनादि पर्व। जो पर्व किसी के द्वारा शुरू नहीं किये जाते हैं, प्रत्युत अनादिकाल से स्वयं चले आ रहे हैं और अनंतकाल तक चलते रहेंगे। वे अनादिपर्व कहलाते हैं। दशलक्षण पर्व, सोलहकारण आष्टान्हिक ये तीन अनादि पर्व हैं।

ये भाद्रशुक्ला पंचमी से चौदश तक दशलक्षण पर्व मनाया जाता है। इसमें दश धर्मों की आराधना की जाती है। इन दश दिनों में खूब व्रत-उपवास भी करते हैं तथा समाज में अनेक प्रकार के धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। आप सभी लोग धर्मलाभ प्राप्त करें, यही मंगल कामना है।