26.क्रियाकांड चूलिका

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क्रियाकांड चूलिका



।।इक्कीसवाँ अधिकार।।
(१)
जो सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण अरु समता शील क्षमागुण है।
हे भगवन् ! ये गुण तव आश्रित निंह कोई आपमें अवगुण है।।
उन अवगुण को अभिमान यही सारा जग मुझको ग्रहण करे।
केवल बस एक जिनेश्वर हैं सर्वथा जो मुझसे अलग रहें।।
(२)
तुम में हैं गुण अनंत एवं तुम तीन भुवन के स्वामी हो।
फिर भी जो कविता करे और निज को माने बहुज्ञानी हो।।
वह बुद्धिमान बुद्धी भ्रम से अम्बर का अंत पाने हेतू।
सैकड़ों वृक्ष की चोटी पर चढ़ जाये न उसको मिलता तू।।
(३)
तेरे चरणों की बड़े-बड़े पंडित आकर पूजन करते।
तुम सब विद्याओं के स्वामी फिर भी जो तव स्तुति करते।।
यद्यपि नहिं कोई समर्थ प्रभो ! केवल भक्ती ही कारण है।
इसलिए वे पूजन करते हैं हो जाएं दुख निवारण हैं।।
(४)
जो भक्त आपका मन वच से स्मरण और स्तुति करता।
उसको जग की सब सिद्धि प्राप्त हो जाती नहिं कोई िंचता।।
वह स्तुति उत्तम है अथवा मध्यम जघन्य वैâसी भी है।
भक्तों को उत्तम फल देती नहिं इसमें कुछ संशय ही है।।
(५)
हे जिनवर ! इस भव में अथवा परभव में आप मुझे मिलिए।
तेरे चरणों की सदाकाल सेवा मैं करूं यह फल चहिए।।
इसके न अधिक कुछ इच्छा है नहिं और कामना है मेरी।
इतनी ही याचना करता हूँ यह मनोकामना हो मेरी।।


(६)
सब आगम से हो तत्त्वज्ञान निश्चय से मोक्ष की प्राप्ती हो।
लेकिन इस पंचमकाल में नहिं होता है तत्त्वज्ञान ही वो।।
असमर्थ और दुर्गंधयुक्त इस काय से निंह चारित पलता।
इसलिए विनयपूर्वक मेरी भक्ती तुममें ही हो कहता।।
(७)
वृद्धावस्था सब काया की कांती को नष्ट किया करती।
एवं इंद्रियाँ बहुत समयों में होकर शिथिल न कुछ करतीं।।
जग में दुख होता है होवे सब कुछ विनष्ट भी यदि होवे।
यह सब कुछ हो पर भक्ति मेरी, हे प्रभू कभी भी न कम होवे।।
(८)
हे प्रभो ! जगत में रत्नत्रय रूपी जो त्रयी है मिली मुझे।
उससे सब पाप नष्ट होवें बस यही याचना है तुमसे।।
पर इससे भिन्न कोई वस्तू मैं नहीं मांगता हूँ तुमसे।
क्योंकि जग में नहिं कोई वस्तु जो पहले नहीं मिली मुझसे।।
(९)
हे श्री जिनेन्द्र ! तव चरण कमल यदि मुझको प्राप्त हो गये हैं।
जो सुक्ख अतीन्द्रिय देते हैं तो प्रभु हम धन्य हो गये हैं।।
सब आकुलता से रहित शांत आपत्तिरहित पुण्यात्मा हूूँ।
मैं ज्ञानी हूँ ऐसा अपने को अब से सदा मानता हूँ।।
(१०)
सम्यक्त्व आदि रत्नत्रय में तप में एवं दश धर्मों में।
अरु मूल तथा उत्तरगुण में और तीन प्रकार गुप्तियों में।।
जो कुछ अभिमान तथा प्रमाद से मैंने दोष लगाया हो।
वह सब प्रभु ! कृपादृष्टि करके मेरे सब दोष क्षमा कर दो।।
(११)
मन वचन काय से हे जिनवर! जो जीवों को पीड़ा दी है।
अथवा प्रमाद अभिमान में आकर दूजे से दिलवाई है।।
वा जीवों को पीड़ा देने वालों को अच्छा बोला हो।
इन सब द्वारा जो किए पाप वह पाप मेरे सब मिथ्या हों।।
(१२)
खोटे पदार्थ की िंचता से एवं खोटे परिणामों से।
संवर कर रहित शरीर से अरु बोले गये खोटे वचनों से।।
जो मैंने नाना कर्मों का संचयन किया हे प्रभो! उन्हें।
तब चरण कमल की स्मृति ही वे सारे पाप नष्ट कर दें।।
प्रभु चरण कमल की स्मृति जब है मोक्ष संपदा दिलवाती।
तब पाप कर्म क्षय करने में क्यों नहीं शक्ति उसमें आती।।
(१३)
सर्वज्ञदेव की जो वाणी स्याद्वादमयी कांती से युत।
जिसकी मनुष्य सुर नागदेव स्तुति करते हैं परिकरयुत।।
जो तीनों लोकों कालों में सब तत्त्वों को बतलाती है।
ऐसी वह दीपशिखा समान वाणी उत्कृष्ट कहाती है।।
(१४)
हे माता सरस्वती ! मुझसे जो मन वच काय विकलता से।
जिनपति अरु श्रुत की स्तुति में जो मुझसे हुई हीनता है।।
उसको हे माता क्षमा करो क्योंकी अनेक भव की जड़ता।
उनके कारण जो कर्म लगे नहिं आने देते चातुरता।।
(१५)
जो कल्पवृक्ष की शाखा के है अग्रभाग में लगा हुआ।
पल्लव जैसे अभीष्ट फल को है देने वाला कहा गया।
वैसे ही ‘‘क्रियाकाण्ड’’ रूपी जो कल्पवृक्ष की शाखा पर।
है लगा हुआ फल भव्यों को देने वाला है इस भू पर।।
(१६)
जो भव्य जीव इस क्रियाकाण्ड संबंधि चूलिका तीन समय।
पढ़ते हैं आगे भी पढ़ लें सब कार्य पूर्ण होंगे असमय।।
जो मन वच काया के विकल्प से है अपूर्ण जो क्रिया कही।
भव्यों की पूर्ण तुरत होगी ऐसे जिनवर के वचन सही।।
(१७)
हे तीन भुवन के चूड़ामणि ! जग के भय से भयभीत हुआ।
मैं शरण आपकी आया हूँ इस हेतु आपको नमन किया।।
जग की पीड़ा के नाश हेतु जो तत्व कहे विद्वानों ने।
उनको अंतर में धार लिया तुम ही जग के नशने वाले।।
(१८)
हे अर्हन् ! जैसे सूर्यकिरण कमलों को आनंदित करती।
वैसे ही तव वचनामृत की किरणें मुझमें प्रकाश भरतीं।
इसलिए सूर्य सम आप प्रभो ! जो कुछ तेरी स्तुती करी।
वह सब मेरी वाचालता उसमें बस भक्ती कारण ही।।

।।इति क्रियाकाण्ड चूलिका।।