26 अगस्त 2017 प्रवचन

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क्षमा धर्म धर्मप्रेमी भाईयों एवं बहनों! आज से दशलक्षण पर्व प्रारंभ हो गया है। मुम्बई महानगर के भाण्डुप उपनगर में जैनम हाल के सामने २४ कल्पद्रुम महामण्डल विधान मण्डप में २४ समवसरण की रचना की गई है एवं ९६ भगवान विराजमान किये गये हैं। इस विधान में मुम्बई महानगर के अलावा बाहर से सैकड़ों भक्त इस दृश्य को देखने एवं पूजा करने के लिए पधारे हैं और अत्यधिक पुण्यसंचित कर रहे हैं। उत्तम क्षमा के प्रथम धर्म पर पूज्य चंदनामती माताजी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में अपने मंगल प्रवचन के माध्यम से दशलक्षण पर्व के बारे में बताया। आज ३५५ दिन के इंतजार के पश्चात् दशलक्षण पर्व का शुभारंभ हो रहा है। इस पर्व में १० धर्मों की आराधना की जाती है, धर्मधारण करने की वस्तु है, जब सच्चे रूप से धर्म को आत्मा में धारण कर लिया जाता है, तब वह उत्तम सुख में हमें पहुंंचा देता है। जैनाचार्य समन्तभद्राचार्य कहते हैं, जो संसारी प्राणियों को चारों गतियों के दु:ख से निकालकर उत्तम सुख में अर्थात् परम उत्कृष्ट मोक्ष सुख, आत्मिक सुख में पहुँचाता है, वह धर्म है। चारित्र का पालन करना भी धर्म है। दशलक्षण पर्व के अंदर विशेषरूप से अणुव्रतों का पालन करते हुए और अनेक प्रकार से त्याग संयम धारण करने के लिए जो तैयार होते हैं वे साधु उत्तम क्षमा धर्म को धारण करते हैं, वैâसी भी परिस्थिति आये, लेकिन साधु क्षमा धर्म को नहीं छोड़ते हैं एवं किसी शत्रु से भी बदला लेने का भाव नहीं रखते हैं। आचार्य पूज्यपाद स्वामी के भावों का अनुसरण करते हुए अपनी दश धर्म की पुस्तक में बहुत ही सुन्दर रूप से वर्णन किया है, वैâसे भी प्रतिवूâल परिस्थिति आये, क्षमा गुण को नहीं छोड़ना चाहिए, बंधुओं बैर से बैर की समाप्ति नहीं होती है। दुर्गति के दु:खों का निवारण करने वाली क्षमा है। पूज्य ज्ञानमती माताजी ने दशलक्षण पर्व की बहुत सुंदर पूजा बनाई है। आप इस पूजा को करके भावविभोर हो जायेंगे। पूज्य ज्ञानमती माताजी जो क्षमा की देवी है, जिन्होंने उत्तम क्षमा को जीवन में साकार किया है। गौतम गणधर वाणी पूज्य माताजी की एक अमूल्य कृति है। इस पुस्तक की रचना करके पूज्य माताजी ने जैन समाज पर महान उपकार किया है। भगवान महावीर की साक्षात् दिव्यध्वनि के अंश को पढ़कर उसे हृदयंगम कर हम अपने सम्यग्दर्शन को शुरू करें। पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने गणधर वाणी के प्रथम अध्याय चैत्यभक्ति पर प्रकाश डाला। पुन: बताया कि क्षमा वीरस्य भूषणम् अर्थात् क्षमा वीरो का आभूषण है। उन्होंने बताया कि गौतम गणधर वाणी चतुर्थकालीन वाणी है, जो १० अध्याय में विभक्त हैं। आज माताजी ने विस्तार से इस पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस चैत्यभक्ति के पढ़ने मात्र से १०० उपवासों का फल प्राप्त होता है। आप लोग उसे पढ़ें, यही मेरा सभी के लिए बहुत-बहुत मंगल आशीर्वाद है।