27.एकत्व भावना

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एकत्व भावना


।।बाइसवाँ अधिकार।।

(१)
जो परम तेज स्वानुभवगम्य जो आत्म रूप के ज्ञाता हैं।
इसलिए आत्मा का स्वरूप ज्ञानी को सुन्दर लगता है।।
है वचन अगोचर तेज कहा और मन से भी वो अगोचर है।
उस परम तेज चैतन्यरूप का अब हम वर्णन करते हैं।।
(२)
जो भव्य जीव एकत्व रूप से आत्म तत्त्व का है ज्ञाता।
वह नहीं किसी को भी पूजे खुद ही सबसे पूजा जाता।।
(३)
जिस तरह धीर धी पुरुष नहीं सागर के जल से भय खाता।
वैसे ही योगी बहुत तरह के कर्मों से नहिं भय खाता।।
(४)
चैतन्यैकत्व का ज्ञान बड़ा दुर्लभ है मोक्ष का दाता है।
इसलिए जिसे चैतन्यज्ञान हो जाए उसी को ध्याता है।।
(५)
सब काम भोग की बंध कथा सबने ही सुनी और जानी।
एकत्वविभक्त आत्मा की है कथा जो दुर्लभ नहिं जानी।।
(६)
साक्षात सुक्ख तो मोक्ष में है उसका अभिलाषी ही पाता।
इस जग में जो सुख दिखता है वह सुख है नहीं दु:खदाता।।
(७)
इस जग संबंधी कोई वस्तु निश्चय से नहीं हमें प्रिय है।
पर श्री गुरु के उपदेश से जाना हुआ मोक्षपद ही प्रिय है।।


(८)
मोहोदय विष से व्याप्त स्वर्ग का सुख भी चंचल नश्वर है।
फिर और सुखों का क्या कहना जग के सुख सभी विनश्वर हैं।।
(९)
जो श्रेष्ठ बुद्धि का धारक मुनि आत्मा में स्थित रहता है।
वह परभव में है गया हुआ वैसा ही विचरण करता है।।
(१०)
जिस उत्तम मुनि ने वीतराग पथ पर ही गमन किया हो वे।
नहिं विघ्न कोई भी मिलता है उनको मुक्ती के मारग में।।
(११)
इस तरह एकचित हो करके जो सदा भावना करता है।
वह मुनि ही मोक्षरूप लक्ष्मी को शीघ्र वरण कर लेता है।।
(१२)
नरभव का फल यदि धर्म कहा तो धर्म मेरे ही अंदर है।
फिर आपत्ती के आने पर निंह मुझे मरण से भी डर है।।

।।इति एकत्व भावना।।