27.स्नानाष्टक प्रश्नोत्तरी

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स्नानाष्टक

प्रश्न ५१५—आत्मा को अपवित्र कौन बनाता है ?
उत्तर—यद्यपि आत्मा पवित्र है परन्तु यह शरीर उस आत्मा को भी अपवित्र बना लेता है।

प्रश्न ५१६—संसार के समस्त अपवित्र पदार्थों का स्थान क्या है ?
उत्तर—जितने भी संसार में अपवित्र पदार्थ हैं उन सबका स्थान यह शरीर है।

प्रश्न ५१७—स्नान क्यों किया जाता है ?
उत्तर—स्नान शरीर तथा आत्मा की शुद्धि के लिए नहीं होता है किन्तु यत्वकंचित् बाह्य शुद्धि के लिए ही होता है।

प्रश्न ५१८—क्या स्नान से आत्मा पवित्र होती है ?
उत्तर—आत्मा तो स्वभाव से अत्यन्त पवित्र है इसलिए आत्मा को पवित्र करने के लिए स्नान करना व्यर्थ ही है।

प्रश्न ५१९—क्या स्नान से शरीर पवित्र होता है ?
उत्तर—चूँकि शरीर सर्वथा अपवित्र ही है अत: यह स्नान से कदापि पवित्र नहीं हो सकता।

प्रश्न ५२०—शुद्धि का अर्थ क्या है ?
उत्तर—शुद्धि का अर्थ निर्मलता है।

प्रश्न ५२१—यह निर्मलता कब होती है ?
उत्तर—यह निर्मलता उसी समय हो सकती है जिस समय समस्त मलों का नाश हो जावे।

प्रश्न ५२२—वास्तविक स्नान कौन सा है ?
उत्तर—सज्जनों के चित्त में जो हिताहित का विवेक है वही स्नान है क्योंकि वही स्नान सर्व भवों में उपार्जन किए गए जो करोड़ों पाप हैं उन पापों से उत्पन्न हुए मिथ्यात्व आदिक मल का सर्वथा नाश करने वाला है।

प्रश्न ५२३—शास्त्रानुसार किसमें स्नान करना चाहिए ?
उत्तर—शास्त्रानुसार परमात्मा रूपी उत्तम तीर्थ में ही स्नान करना चाहिए।

प्रश्न ५२४—क्या प्रयाग आदि तीर्थों में स्नान से शुद्धि सम्भव है ?
उत्तर—प्रयाग आदि तीर्थों में स्नान से मात्र बाह्य शुद्धि है आत्मशुद्धि नहीं।

प्रश्न ५२५—परमात्मा रूपी तीर्थ में स्नान से आत्मशुद्धि किस प्रकार है ?
उत्तर—परमात्मा रूपी तीर्थ में सम्यग्ज्ञान रूपी उत्तम पवित्र जल मौजूद है, सम्यग्दर्शन आदि उत्तम तरंगों का समूह मौजूद है, यह समस्त पापों का नाश करने वाला है और यह समस्त तीर्थों में उत्तम तीर्थ है।

प्रश्न ५२६—निश्चयनय से पाप का नाश कैसे सम्भव है ?
उत्तर—निश्चयनय से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र रूपी नदी में भलीभाँति स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है।

प्रश्न ५२७—संसार में सबसे अपवित्र क्या है ?

उत्तर—संसार में सबसे अपवित्र मनुष्यों का शरीर है।