27 अगस्त 2017 प्रवचन दशलक्षण पर्व के

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मार्दव धर्म

मुंबई महानगर में आज क्या हो रहा है..27 अगस्त आज दशलक्षण पर्व का द्वितीय दिवस है। पूज्य आर्यिकारत्न श्री चंदनामती माताजी ने मार्दव धर्म पर बहुत ही सुंदर वर्णन किया है-धर्म मार्दव को सब मिल निभाना, धम्र का रूप जग को दिखाना। भव्यात्माओं! दशलक्षण धर्म की पूजा के अंदर प्रथमानुयोग, चरणानुयोग का सार पूज्य ज्ञानमती माताजी ने भर दिया है। जहाँ पर मान गलित होता है, वहीं मार्दव धर्म प्रगट होता है। भगवान महावीर के शिष्य गौतम गणधर की हम बात करते हैं। पूज्य माताजी उनकी वाणी को सुनाती हैं। उन्होंने मान को अर्थात् घमंड को तिलांजलि दे दिया, उनको मन:पर्यय ज्ञान प्रगट हो गया। ऐसी मुदृता जब महान ज्ञानियों के अंदर आ जाती है, हम सबके अंदर उसका अंश अवश्य होना चाहिए। हमें अपने परिणामों को मृदु बनाकर अर्थात् कोमल बनाकर स्वभाव को मृदु बनाना है। आप संकल्प करें कि किसी के सामने अहंकार नहीं करेंगे, हम मान नहीं करेंगे। सिद्ध को प्राप्त करने के लिए मार्दव धर्म को हमें अपने अंदर जगाना है। हम कहीं भी रहे, किसी भी धर्म में रहें, विनय धर्म बहुत ही आवश्यक है।

पूज्य चंदनामती माताजी ने मृदुता धर्म के ऊपर चेतन और अचेतन के बारे में सुंदर कविता में बताया है कि-

जंगल में चलते-चलते एक पथिक को मिल गई पगडंडी पहाड़ की। पथिक ने चढ़ना शुरू किया पहाड़ पर। थोड़ी दूर चलकर पूछता है अरे पर्वत देख मैं तेरी छाती को रौंद्र रहा हूँ। तुझे अपनी चोटे सौंपे रहा हूँ। सुनकर पथिक को अपने प्रति दया आई, स्मरण हो आई पथिक को अपनी पुरी यादें-मैं सदा से अपनी छाती से चोट सहकर हर पर्वतारोही को ऊपर तक पहुँचा रहा हूँ। सभी को उसकी मंजिल दिला रहा हूँ। इस पथिक को भी ऊपर तक पहुँचाऊंगा, इसे विनय सिखलाऊँगा।

कठोर रहकर भी झुकना सिखाऊँगा, बड़े होकर भी चोट सहना सिखाऊँगा। वह बोला सुन मेरे नादान बच्चे-

मुक्तक-जो पर्वत चोट सहता है, वही तो पूज्य बनता है।
जो पत्थर चोट सहता है, वही तो मूर्ति बनता है।
अरे देखो ऋषभगिरि पर जो सबसे ऊँची मेरत है।
वह जिनशासन की युग-युग तक बन गई सच्ची कीरत है।
अगर वह चोट न सहती, तो वैâसे दर्श हम पाते।
शिल्पी के हाथ में जाकर कड़ा भी नरम हो जाता है।

सोचता है पथिक सच तो कह रहा है, जिसे कठोर समझ रहा था, वह तो है नरम-नरम। स्वादिष्ट भोजन खाकर भी कड़क बात कठोर बात बोलता हूं, अपनी वाणी को नहीं तोलता हूँ। पथिक ने पर्वत से कहा-हे मेरे शिक्षक पर्वतराज! तुमने बताई आज पते की बात। अब मैं मृदु बनूँगा, कोमलता को धारण करूँगा। अपने मधुर व्यवहार से शत्रु के दिल को जीतूँगा। हे भाई-अब मैंने यह जान लिया है सकारात्म्क सोच बनाएंगे, सकारात्मक बनेंगे अपनी सोच को पासिटिव बनायेंगे।

मृदुता भाव धारण करके मनुष्य सारे गुण पा लेते हैं।

आज भारतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सर्वप्रथम उत्तम मार्दव धर्म की जाप्य सभी भक्तों से करवाई। ॐ ह्रीं उत्तम मार्दव धर्मांगाय नम:। उत्तम मार्दव धर्म क्या है-मृंदोर्भाव: मार्दव: अर्थात् मृदुता का भाव मृदुता है। यह मार्दव धर्म मानरूपी शत्रु का मर्दन करने वाला है, यह आठ प्रकार के मद से रहित होता है और चार प्रकार के विनय से सहित होता है। रावण भी एक दिन मान के वश में आकर नष्ट हो गया। इसलिए मान का त्याग सभी को करना चाहिए। इसके पश्चात् माताजी ने गौतम गणधर वाणी जो चतुर्थकालीन वाणी हैं, आज दूसरी अध्याय में पूज्य माताजी ने कृतिकर्म विधि बताई-अहोरात्र के नित्य के साधुओं के २८ कृतिकर्म होते हैं। १ कृतिकर्म में २ प्रणाम, १२ आर्वत, ४ शिरोनति होती है। माताजी ने विस्तार से कृतिकर्म पर प्रकाश डाला है। माताजी ने सभी को प्रेरणा दी, इसको सीखना जैन समाज के लिए आवश्यक है। यही मेरी प्रेरणा और मंगल आशीर्वाद है।