28.परमार्थ विंशति

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परमार्थ विंशति


।।तेईसवाँ अधिकार।।
(१)
इस जग में काल अनंत भ्रमण कर मोह द्वेष रति के आश्रित।
जो हैं विकार उनको सबने देखा और सुना व अनुभवगत।।
पर भगवन आत्मा के अद्वैत को देखा सुना नहीं जाना।
इसलिए एक उत्कृष्ट तत्व जयवंत रहे ये है माना।।
(२)
जो अंतर बाह्य विकल्परहित शुद्धैक चिदानन्द आत्मा है।
परमात्म प्रीति करने वाली कृतकृत्य रूप परमात्मा है।।
उसको नहिं जरा आदि ज्वालायें भस्म कभी कर सकती हैं।
क्योंकी आनन्त्यचतुष्टय रूपी नदि में स्थित रहती हैं।।
जैसे पानी में आग कभी भी नहीं लगा सकता कोई।
ऐसी आत्मा को नमन करूं नहिं भस्म जिसे कर सके कोई।।
(३)
एकत्व स्थिती में बुद्धि के जाने से जो होता है।
उस आत्मज्ञान के होने से आनंद बहुत ही होता है।।
जब नहीं बुद्धि कुछ समयों तक सब शील गुणों के संग रहे।
तो निश्चय ही परमात्मा के आनंद का क्या हम वर्ण करें।।
(४)
मेरे आश्रित जो मित्र कहे उनसे निंह कोई कार्य मुझे।
फिर प्रेम दूसरों से भी क्यों जब निज तन से नहिं राग मुझे।।
सब स्त्री पुत्र मित्र जग के संयोग से उनके कष्ट हुआ।
इसलिए अकेला उदासीन एकान्तवास ही सुखद हुआ।।
(५)
जो जान देखकर भी सबको चैतन्य रूप नहिं तजता है।
वह मैं हूँ अन्य पदार्थ कोई जग से न कोई भी ममता है।।
यह क्रोधादिक व शरीर आदि कर्मों से जनित सभी कुछ है।
इसलिए सैकड़ों शास्त्रों को सुनकर भी मन ये अस्थिर है।।
(६)
इस दुषमकाल में हीन संहनन से परिषह नहिं सह सकता।
और प्राय: करके तीव्र तपों को यह शरीर नहिं कर सकता।।
एवं निंह होते हैं अतिशय दुष्कर्म बराबर दुख देते।
इसलिए सभी पदार्थ पर हैं यह ही ज्ञानी विचार करते।।
(७)
यद्यपि आत्मा के संग कर्म है नीर क्षीर के सदृश मिले।
फिर भी यह आत्मा ज्ञान दर्श और परमानंद स्वरूप खिले।।
स्फटिकमणी के पास कोई काली वस्तू ज्यों रखी जाये।
तो भी वो कालिमा भिन्न रहे निंह मणि काली होने पाये।।
(इसी का आशय-समयसार में भी कहा है)
(८)
इस मानव के वर्णादि तथा रति मोह आदि जो भाव कहे।
वे सब हैं भिन्न अत: जो नर अंतस के तत्त्व को देख रहे।।
उनके ये भाव नहीं होते उनको बस एक तेज दिखता।
वह परमतेजधारी आत्मा इस जग में सदा सुखी रहता।।
(९)
यति का संबंध अगर पर से हो तो यतिपना नहीं रहता।
फिर श्रीमंतों के साथ अगर संबंध हुआ बहु दुख देता।।
जैसे मदिरा पीने वाला उन्मत्त हुआ सा राजा भी।
यदि यति संबंध रखे उससे तो घोर कष्ट को पाता ही।।
(१०)
यदि नित्यानंदप्रदायक श्रीगुरु के हैं वचन मेरे मन में।
तब मुनिजन प्रीति करें न मुझे अथवा गृहस्थ नहिं भोजन दे।।
धन भी निंह मेरे पास रहे मेरा शरीर भी रोगी हो।
और नग्न देखकर हँसे सभी पर मुझको खेद कभी ना हो।।

(११)
जो भवरूपी वन तरह-तरह के दुख रूप गज अजगर से।
है व्याप्त तथा िंहसा असत्य चोरी रूपी दुख वृक्षों से।।
भीलों के दुर्गति रूपी खोटे मार्ग से हमें निकाले जो।
ऐसे सद्पथदाता गुरु के वचनों से पाये मुक्तीपथ को।।
(१२)
जीवों में जो सुख-दुख होते वे सब कर्मों के कार्य कहे।
ये कर्म ही है जो आत्मा से हैं भिन्न योगिजन जान रहे।।
इस तरह भेदविज्ञानी जो योगी निंह तनिक विकल्प करे।
मैं सुखी तथा मैं दुखी नहीं ऐसे भावों से विरत रहे।।
(१३)
जब तक हम सब व्यवहार मार्ग में स्थित हैं ये मान रहे।
देवों को उनकी प्रतिमा को गुरु को मुनिगण को मान रहे।।
पर निश्चय से एकत्व रूप चैतन्य तत्व इक आत्मा है।
उत्कृष्ट तत्त्व है नहिं इससे कोइ भिन्न और परमात्मा है।।
(१४)
चाहे वर्षा सुख नष्ट करे और बर्पâ भी तन को पीड़ा दे।
आताप सूर्य का तप्त करे और दंशमशक भी दुख देवें।।
अरु जो भी बचे हुए परिषह उनसे भी भले मरण होवे।
निंह कोई भय इन सबसे हो बुद्धी मेरी निश्चल होवे।।
(१५)
जिस तरह किसी वैरी द्वारा हो नष्ट गाँव को देखके भी।
राजा निंह िंचता करता है त्यों शक्तिमान है आत्मा भी।।
इन्द्रिय रूपी किसान द्वारा रूपादि कृषी की जो जमीन।
यह सब कुछ नष्ट हुआ करता निश्चय से ही करता यकीन।।
(१६)
कर्मों के क्षय से उपशम से अथवा गुरु के उपदेशों से।
जो आत्मा का एकत्व रूप है बोधिज्ञान का निलय कहे।।
सब परिग्रह से है रहित तथा जिसका मन आत्म साधना में।
ऐसा वह जल में भिन्न कमल सदृश रहता है इस जग में।।
(१७)
गुरु के चरणद्वय से प्रदत्त मुक्तीपदवी की प्राप्ति हेतु।
निग्र्रंथपने का जो सुख है वह इंद्रियसुख में नहीं होय।।
क्योंकी जब तक अत्यंत मिष्ट शर्वâरा प्राप्त नहिं होती है।
तब तक ही खल अति मिष्ट लगे पश्चात् न मीठी लगती है।।
अति निर्मल ध्यान के आश्रय से वृृद्धिंगत जो निग्र्रंथ सुक्ख।
स्मरण करेगा क्यों फिर खोटे ध्यान से प्राप्त जो इंद्रिय सुख।।
ऐसा धीमान कौन होगा जो शीत बावड़ी पा करके।
अग्नी से घिरे हुए घर से बाहर हो पुन: प्रवेश करे।।
(१८)
उत्पन्न मोह से मोक्ष की भी अभिलाषा यदि की जाती है।
वह भी मुक्ती की क्षयकारक इच्छा निषिद्ध कहलाती है।।
इसलिए शुद्ध निश्चयनय का आश्रय जो मुनिगण करते हैं।
वह तत्त्वज्ञान में दत्तचित्त परिग्रह निंह िंकचित धरते हैं।।
(१९)
आनंद रूप शुद्धात्मा का िंचतन होने पर जो रस है।
वह विरस रूप लगने लगते गोष्ठी की कथा के जो रस हैं।।
सब विषय नष्ट हो जाते हैं तन से भी प्रीति नहीं करती।
सब दोष नष्ट मन के होते वाणी भी मौन रूप धरती।।
(२०)
निश्चयनय से तो तत्त्व वचन से कहे नहीं जा सकते हैं।
लेकिन व्यवहार मार्ग से शिष्यों को समझाए जाते हैं।।
फिर भी उस तत्त्व के व्याख्या की नहिं मुझमें कोई प्रौढ़ता है।
इसलिए मौन धारण कर लूं निंह और अधिक अब क्षमता है।।

।।इति परमार्थविंशति अधिकार।।