2 सितम्बर 2017 प्रवचन दशलक्षण पर्व

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उत्तम तप धर्म


हे वीतराग प्रभु! मुझे तपशक्ति दीजिए।

जब तक तपस्या कर न सकूं भक्ति दीजिए।।


परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा रचित उत्तम तप धर्म के भजन की पंक्तियों के साथ आर्यिका श्री सुव्रतमती माताजी ने आज की सभा का मंगलाचरण किया। तत्पश्चात् प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने सभी भक्तों को उत्तम तप धर्म के विषय में अवगत कराया। उत्तम तप धर्म को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने एक कविता की रचना की। पूज्य माताजी ने तप का अर्थ तपस्या करके ऊँचे बनना ऐसा बताया।

शब्द केवल दो हैं पर छत्तिस का आंकड़ा।

आगे से लें तो तपस्या का मूल बड़ा
पीछे से लें तो पत-पतित हो के गिर ही पड़ा
ऐसे ही जीव पुद्गल दो के संयोग में भी।
देखो तो दिखता है छत्तिस का आंकड़ा
जीव यदि आगे रहे तो तप की करे पालना
बंधुओं और मेरी बहनों!
यह है दो शब्दों की कहानी
उठना गिरना इनकी निशानी
तुमको तो चिंतन करना है।
मुझे आज तुमसे कहना है
तुम भी घर में आज दो ही रहते हो
हम दो हमारे दो के नतीजे को भुगतते हो।

तो छत्तिस न बनना।।


इस कविता के माध्यम से पूज्य माताजी तप और पत के अनुसार जीव-पुद्गल को भी घटित किया, माताजी ने कहा हमेशा जीव को ही आगे रखना क्योंकि अगर पुद्गल को आगे किया तो वो जीव को कभी मुक्ति नहीं होने देगा। हमेशा संसार में भ्रमण करायेगा। पूज्य माताजी ने संत और सैनिक दोनों को तपस्वी बताते हुए कहा कि सैनिक हमारे देश की रक्षा करता है, देश की लिए शहीद हो जाता है। संत हमारे धर्म की रक्षा करते हैं। अगर संत और सैनिक दोनों सो गए तो यह संसार ही जल जायेगा। हमारे धर्म की रक्षा नहीं हो पायेगी।

तदनन्तर परमपूज्य सरस्वतीस्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा व्रतों के मंत्र जाप्य कराये । पूज्य माताजी ने अनंत चतुर्दशी व्रत की विधि बताई। माताजी ने कहा कि आगम के अनुसार अनंत चतुर्दशी व्रत भाद्रपद शुक्ला एकादशी से लेकर चतुर्दशी, चार दिन का किया जाता है। एकादशी को उपवास, द्वादशी को एकासन, त्रयोदशी को कांजी आहार, अर्थात् भूख से कम खाना और चतुर्दशी को उपवास इस प्रकार माताजी ने विधि बताई। व्रत का मंत्र जाप्य भी कराया।

मंत्र-ॐ ह्रीं अर्हं हं स: अनंतकेवलिने नम:।