3. चतुर्गतिगमनस्थानप्ररूपक अन्तराधिकार

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चतुर्गतिगमनस्थानप्ररूपक अन्तराधिकार

अथ चतुर्गतिगमनस्थानप्ररुपक: अन्तराधिकार:

अथ षट्खंडागमस्य जीवस्थानचूलिकायां नवमीचूलिकासु स्थलचतुष्टयेन सप्तविंशत्यधिकशतसूत्रै: गत्यागतीवर्णना क्रियते। तत्र प्रथमस्थले नरकगते: निर्गत्य क्व क्व गच्छन्तीति प्रतिपादनत्वेन पंचविंशति सूत्राणि कथ्यन्ते। तदनु द्वितीयस्थले तिर्यग्गते: नि:सृत्य कां कामवस्थां लभन्ते इति कथनत्वेन चत्वािंरशत्सूत्राणि। तत: परं तृतीयस्थले मनुष्यगते: निर्गत्य क्व क्व यान्तीति निरूपणत्वेन द्वात्रिंशत्सूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले देवगते: च्युत्वा क्व क्व यान्तीति प्ररूपणत्वेन त्रिंशत्सूत्राणि इति समुदायपातनिका कथिता भवति।
अधुना मिथ्यादृष्टिसासादननारका: नरकगते: निर्गत्य क्व क्व गच्छन्तीति प्रतिपादनाय सूत्रदशकमवतार्यते-णेरइयमिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी णिरयादो उवट्ठिदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति?।।७६।।
दो गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगदिं चेव मणुसगदिं चेव।।७७।।
तिरिक्खेसु आगच्छंता पंचिंदिएसु आगच्छंति, णो एइंदिय-विगलिं-दिएसु।।७८।।
पंचिंदिएसु आगच्छंता सण्णीसु आगच्छंति, णो असण्णीसु।।७९।।
सण्णीसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।८०।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्तएसु।।८१।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवस्साउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वस्साउएसु।।८२।।
मणुस्सेसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।८३।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।८४।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवस्साउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वस्साउएसु।।८५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। नारका: नरकभूमिभ्य: निर्गत्य पुन: नरकगतिं देवगतिं वा न गच्छन्ति। किं कारणं ? स्वभावादेव।
नरकादागत्य जीवा: असंख्यातवर्षायुष्केषु भोगभूमिजेषु कथं नोत्पद्यन्ते ?
नारकेषु दान-दानानुमोदनयोरभावात्।
संप्रति नारका: सम्यग्मिथ्यादृष्टि-सम्यग्दृष्टिजीवा: ततो निर्गत्य क्व क्व गच्छन्तीति प्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-णेरइया सम्मामिच्छाइट्ठी सम्मामिच्छत्तगुणेण णिरयादो णो उव्वट्टेंति।।८६।।
णेरइया सम्माइट्ठी णिरयादो उव्वट्टिदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।८७।।
एक्कं मणुसगदिं चेव आगच्छंति।।८८।।
मणुसेसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।८९।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।९०।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवासाउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वासाउएसु।।९१।।
एवं छसु उवरिमासु पुढवीसु णेरइया।।९२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टयो नारका: नरकगते: न निर्गच्छन्ति न चास्मात् गुणस्थानात् नरके प्रविशन्ति। नारका: सम्यग्दृष्टय: ततो निर्गत्य मनुष्या: एव भविष्यन्ति। सम्यग्दृष्टिनारकाणां मनुष्यायु: मुक्त्वा अन्यायु:सत्कर्मिणां सम्यक्त्वेन सह नरकात् निर्गमनाभावात्। अस्यायमर्थ:-सम्यग्दृष्टिनारका: यदि बद्धतिर्यगायुष्का:, तर्हि सम्यक्त्वं त्यक्त्वा एव निर्गच्छन्ति, सम्यक्त्वसहिता: निर्गत्य मनुष्या: एव भवन्ति इति। एतन्नियम: षट्पृथिवीषु ज्ञातव्य:।
सप्तमपृथिव्या: निर्गत्य क्व क्व गच्छन्तीति प्रतिपादनाय सूत्राष्टकमवतार्यते-अधो सत्तमाए पुढवीए णेरइया मिच्छाइट्ठी णिरयादो उव्वट्टिदसमाणा कदिगदीओ आगच्छंति ?।।९३।।
एक्कं तिरिक्खगदिं चेव आगच्छंति।।९४।।
तिरिक्खेसु आगच्छंता पंचिंदिएसु आगच्छंति णो एइंदिय विगलिंदि-एसु।।९५।।
पंचिंदिएसु आगच्छंता सण्णीसु आगच्छंति, णो असण्णीसु।।९६।।
सण्णीसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।९७।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।९८।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवस्साउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वासाउएसु।।९९।।
सत्तमाए पुढवीए णेरइया सासणसम्मादिट्ठी सम्मामिच्छादिट्ठी असंजद-सम्मादिट्ठी अप्पप्पणो गुणेण णिरयादो णो उव्वट्टेंति।।१००।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। तत्र तेषां नारकाणां सप्तमपृथिवीगतानां तिर्यगायु: मुक्त्वा शेषायुषां बंधाभावात्।
एवं ज्ञात्वा प्रथमतस्तु नरकगमनयोग्यानि अशुभकार्याणि न कर्तव्यानि कदाचिदपि। प्रतिसमयं शुभपरिणामाय प्रयत्नो विधेय:। राजाश्रेणिकवत् प्रतिशोधार्थं गुरवो नावमन्तव्या:, न च जिनधर्मबाह्यक्रिया: आचरितव्या:। तथा च-
‘बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुष:।।’ इति सूत्रेण नरकायु:कारणानि ज्ञात्वा प्रत्यहं तेभ्य: भेतव्यं सम्यग्दृष्टिभिरिति।
एवं प्रथमस्थले गत्यागतिचूलिकायां नरकगतिनिर्गमनगतिप्रतिपादनत्वेन पंचविंशतिसूत्राणि गतानि।

अब चतुर्गतियों में गमन स्थान का प्ररूपक अन्तराधिकार प्रारंभ होता है

अब षट्खण्डागम के जीवस्थान चूलिका में नवमी चूलिका के अन्तर्गत चार स्थलों द्वारा एक सौ सत्ताईस सूत्रों से गत्यागती का वर्णन करते हैं। उसमें प्रथम स्थल में नरकगति से निकलकर जीव कहाँ-कहाँ जाते हैं ? इस प्रकार प्रतिपादन करते हुए पच्चीस सूत्र कहेंगे। अनंतर द्वितीय स्थल में तिर्यंचगति से निकलकर जीव किस-किस गति को प्राप्त करते हैं ? इस विषय का कथन करते हुए चालीस सूत्र कहेंगे। पुन: तृतीय स्थल में मनुष्यगति से निकलकर जीव किस-किस गति में जाते हैं ? इस विषय का निरूपण करते हुए बत्तीस सूत्र हैं। अनंतर चौथे स्थल में देवगति से च्युत होकर कहाँ-कहाँ जाते हैं ? इस विषय का प्ररूपण करते हुए तीस सूत्र कहेंगे। इस प्रकार यह समुदायपातनिका सूचित की गई है।

अब मिथ्यादृष्टि और सासादन गुणस्थानवर्ती नारकी नरकगति से निकलकर कहाँ-कहाँ जाते हैं ? इस विषय को बतलाते हुए दश सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नारकी मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीव नरक से निकलकर कितनी गतियों में आते हैं।।७६।

उक्त नारकी जीव दो गतियों में आते हैं-तिर्यंचगति में भी और मनुष्यगति में भी।।७७।।

तिर्यंचों में आने वाले नारकी जीव पंचेन्द्रियों में आते हैं, एकेन्द्रियों या विकलेन्द्रियों में नहीं आते।।७८।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में आने वाले नारकी जीव संज्ञियों में आते हैं, असंज्ञियों में नहीं।।७९।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच संज्ञियों में आने वाले नारकी जीव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं।।८०।।

पंचेन्द्रिय संज्ञी गर्भोपक्रान्तिक तिर्यंचों में आने वाले नारकी जीव पर्याप्तकों में ही आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।८१।।

पंचेन्द्रिय संज्ञी गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्त तिर्यंचों में आने वाले नारकी जीव संख्यात वर्ष की आयु वाले जीवों में ही आते हैं, असंख्यात वर्ष की आयु वालों में नहीं।।८२।।

मनुष्यों में आने वाले नारकी जीव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं।।८३।।

गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में आने वाले नारकी जीव पर्याप्तकों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।८४।।

गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्त मनुष्यों में आने वाले नारकी जीव संख्यात वर्ष की आयुष्य वालों में आते हैं, असंख्यात वर्ष की आयुष्य वालों में नहीं।।८५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। नारकी नरक से निकलकर पुन: उसी भव से नरकगति को या देवगति को नहीं प्राप्त करते हैं।

शंका-क्या कारण है ?

समाधान-ऐसा स्वभाव ही है।

शंका-नरक से आने वाले जीव असंख्यात वर्ष की आयु वाले अर्थात् भोगभूमि के तिर्यंचों में क्यों नहीं आते ?

समाधान-नारकी जीवों में दान और दान का अनुमोदन इन दोनों भोगभूमियों में उत्पन्न होने के कारणों के अभाव से वे जीव असंख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंचों में नहीं उत्पन्न होते।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि नारकी जीव वहाँ से निकलकर कहाँ-कहाँ जाते हैं, ऐसा प्रतिपादन करने के लिए छह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकी जीव सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान सहित नरक से नहीं निकलते।।८६।।

सम्यग्दृष्टि नारकी जीव नरक से निकलकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।८७।।

सम्यग्दृष्टि नारकी जीव नरक से निकलकर एक मनुष्यगति में ही आते हैं।।८८।।

मनुष्यों में आने वाले सम्यग्दृष्टि नारकी जीव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं।।८९।।

गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में आने वाले सम्यग्दृष्टि नारकी जीव पर्याप्तकों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।९०।।

गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्तक मनुष्यों में आने वाले सम्यग्दृष्टि नारकी जीव संख्यात वर्ष की आयु वालों में आते हैं, असंख्यात वर्ष की आयु वालों में नहीं।।९१।।

इस प्रकार ऊपर की छह पृथिवियों के नारकी जीव निर्गमन करते हें।।९२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नारकी सम्यग्मिथ्यादृष्टि तृतीय गुणस्थान से नरक से नहीं निकलते हैं और न इस गुणस्थान से नरक में प्रवेश ही करते हैं। सम्यग्दृष्टि नारकी नरक से निकलकर मनुष्य ही होते हैं। सम्यक्त्व सहित नारकी मनुष्यायु को छोड़कर अन्यायु की सत्ता सहित सम्यक्त्व के साथ नहीं निकल सकते।

इसका यह अभिप्राय है कि किसी नारकी ने पहले तिर्यंचायु बांध ली है पुन: सम्यक्त्व को प्राप्त करते हैं तो वे सम्यक्त्व को छोड़कर ही वहाँ से निकलते हैं, क्योंकि सम्यक्त्व सहित वहाँ से निकलकर मनुष्य ही होते हैं। यह नियम छह पृथिवी तक जानना चाहिए।

छठी पृथ्वी से निकलकर कहाँ-कहाँ जाते हैं, ऐसा प्रतिपादन करने के लिए आठ सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नीचे सातवीं पृथिवी के मिथ्यादृष्टि नारकी जीव निकलकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।९३।।

सातवीं पृथिवी से निकले हुए नारकी जीव केवल एक तिर्यंचगति में ही आते हैं।।९४।।

तिर्यंचों में आने वाले सातवीं पृथिवी के नारकी जीव पंचेन्द्रियों में ही आते हैं, एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रियों में नहीं।।९५।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में आने वाले सातवीं पृथिवी के नारकी जीव संज्ञियों में आते हैं, असंज्ञियों में नहीं।।९६।।

पंचेन्द्रिय संज्ञी तिर्यंचों में आने वाले सातवीं पृथिवी के नारकी जीव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं।।९७।।

पंचेन्द्रिय संज्ञी गर्भोपक्रान्तिक तिर्यंचों में आने वाले सातवीं पृथिवी के नारकी जीव पर्याप्तकों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।९८।।

पंचेन्द्रिय संज्ञी गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्त तिर्यंचों में आने वाले सातवीं पृथिवी के नारकी जीव संख्यात वर्ष की आयु वालों में आते हैं, असंख्यात वर्ष की आयु वालों में नहीं।।९९।।

सातवीं पृथिवी के सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीव अपने-अपने गुणस्थान सहित नरक से नहीं निकलते।।१००।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रोें का अर्थ सुगम है। नरक में सातवीं पृथ्वी को प्राप्त उन नारकियों के तिर्यंचायु को छोड़कर शेष-तीनों आयु के बंध का अभाव है।

ऐसा जानकर पहले तो नरक जाने के योग्य ऐसे अशुभ कार्यों को कदाचित भी नहीं करना चाहिए। प्रत्युत् प्रतिसमय भी शुभ परिणाम के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। राजा श्रेणिक के समान प्रतिशोध लेने के लिए गुरुओं का अपमान नहीं करना चाहिए न जिनधर्म से बहिर्भूत ऐसी क्रियाओं को ही करना चाहिए।

पुनश्च ‘‘बहुत आरंभ और परिग्रह नरक आयु के लिए कारण हैं’’ इस सूत्र से नरकायु के कारणों को जानकर सभी सम्यग्दृष्टिजनों को प्रतिदिन उन नरक के कारणों से डरते रहना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में गत्यागति चूलिका में नरकगति से निकलकर प्राप्त होने वाली गति का प्रतिपादन करने वाले पच्चीस सूत्र पूर्ण हुए।

पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: तिर्यग्गतेर्निगत्य क्व क्व गच्छन्ति इति प्रतिपादनाय एकादशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

तिरिक्खा सण्णी मिच्छाइट्ठी पंचिंदियपज्जत्ता संखेज्जवासाउआ तिरिक्खा तिरिक्खेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।१०१।।

चत्तारि गदीओ गच्छंति णिरयगदिं तिरिक्खगदिं मणुसगदिं देवगदिं चेदि।।१०२।।
णिरएसु गच्छंता सव्वणिरएसु गच्छंति।।१०३।।
तिरिक्खेसु गच्छंता सव्वतिरिक्खेसु गच्छंति।।१०४।।
मणुसेसु गच्छंता सव्वमणुसेसु गच्छंति।।१०५।।
देवेसु गच्छंता भवणवासियप्पहुडि जाव सयार-सहस्सारकप्पवासिय-देवेसु गच्छंति।।१०६।।
पंचिंदियतिरिक्खअसण्णिपज्जत्ता तिरिक्खा तिरिक्खेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।१०७।।
चत्तारि गदीओ गच्छंति णिरयगदिं तिरिक्खगदिं मणुसगदिं देवगदिं चेदि।।१०८।।
णिरएसु गच्छंता पढमाए पुढवीए णेरइएसु गच्छंति।।१०९।।
तिरिक्ख-मणुस्सेसु गच्छंता सव्वतिरिक्ख-मणुस्सेसु गच्छंति, णो असंखेज्जवासाउएसु गच्छंति।।११०।।
देवेसु गच्छंता भवणवासिय-वाणवेंतरदेवेसु गच्छंति।।१११।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। संज्ञिन: पर्याप्ता: पंचेंद्रियतिर्यञ्च: मिथ्यादृष्टय: तिर्यक्पर्यायेभ्य: कालगतसमाना: विनष्टा: सन्त:, तत्पर्यायेभ्य: मृत्वा चतस¸: अपि गती: प्राप्नुवन्ति। देवगतिषु भवनत्रिकेषु गच्छंति, सौधर्मादिसहस्रारकल्पपर्यंतं गन्तुं शक्नुवन्ति नोपरि, सम्यक्त्वाणुव्रतै: विना आनतादिषु कल्पेषु गमनाभावात्।
पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: असंज्ञिन: पर्याप्ता: चतसृषु गतिषु गच्छन्ति, तत्रापि प्रथमनरकभूमिष्वेव, अधस्तननरकेषु उत्पत्तिनिमित्तपरिणामाभावात्। इमे असंज्ञिन: असंख्यातवर्षायुष्कभोगभूमिषु न गच्छन्ति। असंज्ञिजीवा: न च दानं दानानुमोदनं वा कुर्वन्ति। देवेषु भवनवासि-वानव्यन्तरदेवेषु गन्तुं क्षमा: सन्ति तत: उपरि देवपर्यायेषु उत्पत्तिनिमित्तपरिणामाभावात्।
उक्तं च- सण्णि-असण्णी जीवा मिच्छाभावेण संजुदा केई।
जायंति भावणेसुं दंसणसुद्धा ण कइया वि।।
एवमेव श्रीअकलंकदेवेन कथितं-
तैर्यग्योनेषु असंज्ञिन: पर्याप्ता: पंचेन्द्रिया: संख्येयवर्षायुष्षु अल्पशुभपरिणामवशेन पुण्यबंधमनुभूय भवनवासिषु व्यन्तरेषु च उत्पद्यन्ते।
संप्रति पंचेन्द्रियापर्याप्तएकेन्द्रियविकलेन्द्रियतिरश्चां आगतिप्रतिपादनाय एकोनविंशतिसूत्राण्यवतार्यन्ते-पंचिंदियतिरिक्खसण्णी-असण्णी अपज्जत्ता पुढवीकाइया आउकाइया वणप्फइकाइया णिगोदजीवा बादरा सुहुमा बादरवणप्फदिकाइया पत्तेयसरीरा पज्जत्ता अपज्जत्ता बीइंदिय-तीइंदिय-चउिंरदिय-पज्जत्तापज्जत्ता तिरिक्खा तिरिक्खेहिं कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।११२।।
दुवे गदीओ गच्छंति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं चेव।।११३।।
तिरिक्ख-मणुस्सेसु गच्छंता सव्वतिरिक्ख-मणुस्सेसु गच्छंति, णो असंखेज्जवस्सा-उएसु गच्छंति।।११४।।
तेउक्काइया आउक्काइया बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता तिरिक्खा तिरिक्खेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति।।११५।।
एक्कं चेव तिरिक्खगदिं गच्छंति।।११६।।
तिरिक्खेसु गच्छंता सव्वतिरिक्खेसु गच्छंति, णो असंखेज्जवस्साउएसु गच्छंति।।११७।।
तिरिक्खसासणसम्माइट्ठी संखेज्जवस्साउआ तिरिक्खा तिरिक्खेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।११८।।
तिण्णि गदीओ गच्छंति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं देवगदिं चेदि।।११९।।
तिरिक्खेहि गच्छंता एइंदिय-पंचिंदिएसु गच्छंति, णो विगलिंदि-एसु।।१२०।।
एइंदिएसु गच्छंता बादरपुढवीकाइय-बादरआउक्काइय-बादरवणप्फइ-काइय-पत्तेयसरीरपज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्तएसु।।१२१।।
पंचिंदिएसु गच्छंता सण्णीसु गच्छंति, णो असण्णीसु।।१२२।।
सण्णीसु गच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु गच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।१२३।।
गब्भोवक्कंतिएसु गच्छंता पज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।१२४।।
पज्जत्तएसु गच्छंता संखेज्जवासाउएसु वि गच्छंति, असंखेज्जवासाउवेसु वि।।१२५।।
मणुसेसु गच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु गच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।१२६।।
गब्भोवक्कंतिएसु गच्छंता पज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्तएसु।।१२७।।
पज्जत्तएसु गच्छंता संखेज्जवासाउएसु वि गच्छंति, असंखेज्जवासाउएसु गच्छंति।।१२८।।
देवेसु गच्छंता भवणवासियप्पहुडि जाव सदर-सहस्सारकप्पवासियदेवेसु गच्छंति।।१२९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। तेजस्कायिका: वायुकायिका: बादरा: सूक्ष्मा:, इमे चतुर्विधा: पर्याप्ता: अपर्याप्ताश्च अष्टधा भवन्ति, एते सर्वेऽपि संक्लेशपरिणामयुक्ता: शेषगतियोग्य-परिणामाभावात् केवलं एकां तिर्यग्गतिमेव प्राप्नुवन्ति। कर्मभूमिजा: सासादनसम्यग्दृष्टितिर्यञ्च: नरकगतिं न गच्छन्ति, तिर्यग्मनुष्ययो: सासादनगुणस्थानवर्तिनो: नरकगतिगमनयोग्यपरिणामाभावात्। यदि एकेन्द्रियेषु सासादनगुणस्थानवर्तिन: उत्पद्यन्ते, तर्हि पृथ्वीकायादिषु द्वे गुणस्थाने भवत: इति चेत् ?
न, छिन्नायु:प्रथमसमये सासादनगुणस्थानं विनश्यति, अत: सासादनगुणस्थानं त्यक्त्वा एव एकेन्द्रियेषु गच्छंति।
अत्रायमर्थ: ज्ञातव्य:-षट्खंडागमसूत्राभिप्रायेण सासादनसम्यग्दृष्टय: तिर्यञ्च: यदि बादरपृथिवी-कायिकादिषु गच्छन्ति तर्हि ते तत्रोत्पन्नप्रथमसमये मिथ्यात्वं प्रतिपद्यन्ते इति।
इमे सासादनतिर्यञ्च: देवेषु भवनत्रिकेषु सौधर्मादिसहस्रारकल्पपर्यंतेषु गच्छन्ति।
उक्तं च अन्यत्रापि-त एव संज्ञिनो मिथ्यादृष्टय: सासादनसम्यग्दृष्टयश्चाऽऽसहस्रारादुत्पद्यन्ते१।
संखेज्जाउव-सण्णी सदरसहस्सारगो त्ति जायंति।’’

अब पंचेन्द्रिय तिर्यंच तिर्यंचगति से निकलकर कहाँ-कहाँ जाते हैं, इस विषय का प्रतिपादन करने के लिए ग्यारह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच संज्ञी मिथ्यादृष्टि पंचेन्द्रिय पर्याप्त संख्यातवर्षायु वाले तिर्यंच जीव तिर्यंचपर्यायों से मरण करके कितनी गतियों में जाते हैं ?।।१०१।।

उपर्युक्त तिर्यंच जीव चारों गतियों में गमन करते हैं-नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति।।१०२।।

नरकों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच जीव सभी अर्थात् सातों नरकों में जाते हैं।।१०३।।

तिर्यंचों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच जीव सभी तिर्यंचों में जाते हैं।।१०४।।

मनुष्यों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच जीव सभी मनुष्यों में जाते हैं।।१०५।।

देवों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच जीव भवनवासियों से लगाकर शतार-सहस्रार तक के कल्पवासी देवों में जाते हैं।।१०६।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच असंज्ञी पर्याप्त तिर्यंच जीव तिर्यंच पर्यायों से मरणकर कितनी गतियों में जाते हैं ?।।१०७।।

उपर्युक्त तिर्यंच जीव चारों गतियों में जाते हैं-नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति।।१०८।।

नरकों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच प्रथम पृथिवी के नारकी जीवों में जाते हैं।।१०९।।

तिर्यंच और मनुष्यों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच सभी तिर्यंच और मनुष्यों में जाते हैं, किन्तु असंख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंच और मनुष्यों में नहीं जाते।।११०।।

देवों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच जीव भवनवासी और वानव्यन्तर देवों में जाते हैं।।१११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। संज्ञी, पर्याप्त, पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टी तिर्यंच तिर्यंचपर्याय से काल-मरण करके चारों ही गतियों को प्राप्त करते हैं। देवगति में भवनत्रिकों में जाते हैं, सौधर्म स्वर्ग से लेकर सहस्रार स्वर्ग पर्यंत जा सकते हैं। इसके ऊपर नहीं, क्योंकि आगे के आनत आदि कल्पों में सम्यक्त्व सहित अणुव्रतों के बिना जाना संभव नहीं है।

असंज्ञी, पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच चारों ही गतियों में जा सकते हैं, वहाँ भी नरकों में पहली पृथिवी में ही जा सकते हैं आगे के द्वितीय आदि नरकों में नहीं जा सकते, क्योंकि नीचे के नरकों में उत्पन्न होने के योग्य परिणामों का उनके अभाव है। ये असंज्ञी तिर्यंच असंख्यात वर्ष की आयु वाले ऐसे भोगभूमियों में नहीं जा सकते, क्योंकि वे असंज्ञी जीव दान और दान की अनुमोदना नहीं कर सकते हैं। देवों में भी भवनवासी और व्यंतर देवों में ही जाने में सक्षम हैं, उसके ऊपर की देवपर्याय में उत्पन्न होने योग्य परिणामों का अभाव है।

तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में कहा भी है-

कोई संज्ञी और असंज्ञी जीव मिथ्यात्व भाव से सहित हुए भवनवासी देवों में उत्पन्न होते हैं किन्तु सम्यग्दर्शन से शुद्ध जीव कदाचित् भी भवनवासी देवों में उत्पन्न नहीं होते हैं।

तत्त्वार्थवार्तिक ग्रंथ में श्री अकलंकदेव ने भी कहा है-

तिर्यंच योनि में रहने वाले असंज्ञी, पर्याप्त, पंचेन्द्रिय जीव अल्पशुभ परिणाम के वश से पुण्यबंध का अनुभव करके संख्यात वर्ष की आयु वाले भवनवासी और व्यंतर देवों में उत्पन्न हो जाते हैं।

अब पंचेन्द्रिय अपर्याप्त तथा एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय तिर्यंचों की आगति का प्रतिपादन करने के लिए इक्कीस सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच संज्ञी और असंज्ञी अपर्याप्त, पृथिवीकायिक, जलकायिक, वनस्पतिकायिक, निगोद जीव, बादर और सूक्ष्म, बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर, पर्याप्त और अपर्याप्त, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पर्याप्त और अपर्याप्त तिर्यंच तिर्यंचपर्यायों से मरण करके कितनी गतियों में जाते हैं ?।।११२।।

पूर्वोक्त तिर्यंच जीव दो गतियों में ही जाते हैं-तिर्यंचगति और मनुष्यगति।।११३।।

तिर्यंच और मनुष्यों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच सभी तिर्यंच और मनुष्यों में जाते हैं, किन्तु असंख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंचों और मनुष्यों में नहीं जाते।।११४।।

अग्निकायिक और वायुकायिक बादर व सूक्ष्म पर्याप्तक व अपर्याप्तक तिर्यंच तिर्यंचपर्यायों से मरण करके कितनी गतियों में जाते हैं ?।।११५।।

उपर्युक्त तिर्यंच एकमात्र तिर्यंचगति में ही जाते हैं।।११६।।

तिर्यंचों में जाने वाले उपर्युक्त तिर्यंच जीव सभी तिर्यंचों में जाते हैं, किन्तु असंख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंचों में नहीं जाते।।११७।।

तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि संख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंच तिर्यंचपर्यायों से मरण करके कितनी गतियों में जाते हैं ?।।११८।।

पूर्वोक्त तिर्यंच जीव तीन गतियों में जाते हैं अर्थात् तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति में जाते हैं।

तिर्यंचों में जाने वाले संख्यात वर्ष की आयु वाले सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच एकेन्द्रिय और पंचेन्द्रियों में जाते हैं, विकलेन्द्रियों में नहीं जाते।।१२०।।

एकेन्द्रियों में जाने वाले संख्यातवर्षायुष्क सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच बादर पृथिवीकायिक, बादर जलकायिक, बादर वनस्पतिकायिक, प्रत्येक शरीर पर्याप्तकों में ही जाते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं जाते।।१२१।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में जाने वाले संख्यातवर्षायुष्क सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच संज्ञी जीवों में जाते हैं, असंज्ञियों में नहीं।।१२२।।

संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में जाने वाले पूर्वोक्त तिर्यंच गर्भोपक्रान्तिकों में जाते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं।।१२३।।

गर्भोपक्रान्तिक संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में जाने वाले उक्त तिर्यंच पर्याप्तकों में जाते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।१२४।।

पर्याप्तक गर्भोपक्रान्तिक संज्ञी पंचेन्द्रियों मेें जाने वाले उक्त तिर्यंच संख्यात वर्ष की आयु वाले जीवों में भी जाते हैं, असंख्यातवर्षायुष्कों में भी।।१२५।।

मनुष्यों में जाने वाले संख्यातवर्षायुष्क सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में ही जाते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं।।१२६।।

गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में जाने वाले उक्त तिर्यंच पर्याप्तकों में ही जाते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।१२७।।

पर्याप्तक गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में जाने वाले उक्त तिर्यंच संख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्यों में भी जाते हैं और असंख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्यों में भी जाते हैं।।१२८।।

देवों में जाने वाले संख्यातवर्षायुष्क सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच भवनवासी देवों से लगाकर शतार-सहस्रार तक के कल्पवासी देवों में जाते हैं।।१२९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। तेजस्कायिक और वायुकायिक ये दो प्रकार के जीव बादर और सूक्ष्म के भेद से चार भेदरूप हैं पुन: इन्हें पर्याप्त-अपर्याप्त से गुणा करने पर आठ भेदरूप हो जाते हैं, ये सभी संक्लेश परिणाम से युक्त हैं अत: इनके शेष गति के योग्य परिणामों का अभाव होने से ये केवल एक तिर्यंचगति को ही प्राप्त करते हैं। कर्मभूमिया सासादनगुणस्थानवर्ती तिर्यंच नरकगति को प्राप्त नहीं करते हैं, क्योंकि सासादन गुणस्थानवर्ती तिर्यंच और मनुष्यों में नरकगति के गमन योग्य परिणामों का अभाव है।

शंका-यदि सासादन गुणस्थानवर्ती एकेन्द्रियों में उत्पन्न होते हैं तो पृथिवीकायिक आदि जीवों में मिथ्यात्व और सासादन ये दो गुणस्थान होना चाहिए ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि आयु के क्षीण होने पर प्रथम समय में ही सासादन गुणस्थान का विनाश हो जाता है अत: सासादन गुणस्थान को छोड़कर ही एकेन्द्रियों में जाते हैं। यहाँ अभिप्राय यह है कि-

षट्खण्डागम सूत्र के अभिप्रायानुसार जो सासादनसम्यग्दृष्टि जीव बादरपृथिवीकायिक पर्याप्त आदि जीवों में जाते हैं उनके इन जीवों में उत्पन्न होने के पहले समय में मिथ्यात्व गुणस्थान हो जाता है।

ये सासादन तिर्यंच देवों में-भवनत्रिक देवों में और सौधर्म स्वर्ग से लेकर सहस्रार पर्यंत देवों में जाते हैं।

तत्त्वार्थराजवार्तिक में भी कहा है-ये संज्ञी मिथ्यादृष्टि तिर्यंच और सासादनसम्यग्दृष्टी सहस्रार स्वर्गपर्यंत उत्पन्न होते हैं। यही बात तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में भी कही है-

संख्यातवर्षायुष्क संज्ञी शतार-सहस्रार स्वर्ग तक जा सकते हैं।

तिरश्चां सम्यग्मिथ्यादृष्टिनां सम्यग्दृष्टीनां च गतिप्रतिपादनाय एकादशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

तिरिक्खा सम्मामिच्छाइट्ठी संखेज्जवस्साउआ सम्मामिच्छत्तगुणेण तिरिक्खा तिरिक्खेसु णो कालं करेंति।।१३०।।

तिरिक्खा असंजदसम्मादिट्ठी संखेज्जवस्साउआ तिरिक्खा तिरिक्खेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।१३१।।
एक्कं चेव देवगदिं गच्छंति।।१३२।।
देवेसु गच्छंता सोहम्मीसाणप्पहुडि जाव आरणच्चुदकप्पवासियदेवेसु गच्छंति।।१३३।।
तिरिक्खमिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी असंखेज्जवासाउवा तिरिक्खा तिरिक्खेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति?।।१३४।।
एक्कं हि चेव देवगदिं गच्छंति।।१३५।।
देवेसु गच्छंता भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसियदेवेसु गच्छंति।।१३६।।
तिरिक्खा सम्मामिच्छाइट्ठी असंखेज्जवासाउआ सम्मामिच्छत्तगुणेण तिरिक्खा तिरिक्खेहि णो कालं करेंति।।१३७।।
तिरिक्खा असंजदसम्माइट्ठी असंखेज्जवासाउआ तिरिक्खा तिरिक्खेहि कालग-दसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।१३८।।
एक्कं हि चेव देवगदिं गच्छंति।।१३९।।
देवेसु गच्छंता सोहम्मीसाणकप्पवासियदेवेसु गच्छंति।।१४०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थाने चतसृषु अपि गतिषु आयुकर्मण: सर्वत्र बंधाभावात्। यस्यां गत्यां यस्मिन् गुणस्थाने च आयु:कर्मबंध: नास्ति, न तेन गुणस्थानेन तस्या: गतेश्च निर्गम: कषायोपशामकान् मुक्त्वा इति ज्ञातव्यं।
सम्यग्दृष्टय: तिर्यञ्च: असंयता: अपि षोडशस्वर्गपर्यंतं गच्छन्ति।
उपरि किन्न गच्छन्ति इति चेत् ?
न, तिर्यक्सम्यग्दृष्टिषु संयमाभावात्। संयमेन विना न चोपरि गमनमस्ति। अनेन कथनेन तत: उपरि मिथ्यादृष्टय: उत्पद्यन्ते तर्हि एभि: व्यभिचारदोषो भवति ?
न भवति, तेषामपि मिथ्यादृष्टीनां मनुष्याणां भावसंयमेन विना द्रव्यसंयम: संभवति।
द्रव्यसंयममाहात्म्यमपि कथयन्ति आचार्यदेवा:-
धृत्वा निर्ग्रन्थलिंगं ये प्रकृष्टं कुर्वते तप:।
अन्त्यग्रैवेयकं यावदभव्या: खलु यान्ति ते।।
किंतु तिर्यञ्च: महाव्रतस्वरूपं द्रव्यसंयमं न गृहीतुं क्षमा: अतस्ते अच्युतस्वर्गादुपरि न गच्छन्ति।
ये तिर्यञ्च: असंख्यातवर्षायुष्का: भोगभूमिजा: ते देवगतिं प्राप्नुवन्ति, मंदकषायत्वात्, तत्र देवायुर्मुक्त्वा अन्येषामायुषां बंधाभावात् वा। इमे मिथ्यादृष्टय: सासादनसम्यग्दृष्टयश्च भवनत्रिकदेवेष्वेव गच्छन्ति, सौधर्मैशानादिउपरिमदेवेषु गमनयोग्यपरिणामाभावात्।
उक्तं चान्यत्रापि- संख्यातीतायुषां नूनं देवेष्वेवास्ति संक्रम:।
निसर्गेण भवेत्तेषां यतो मंदकषायता।।
तथा च-‘‘असंख्येयवर्षायुष: तिर्यङ्मनुष्या: मिथ्यादृष्टय: सासादनसम्यग्दृष्टयश्च आ ज्योतिष्केभ्य: उपजायन्ते।’’
असंयतसम्यग्दृष्टयस्तिर्यञ्च: देवगतिं गच्छन्त: सौधर्मैशानस्वर्गयो: एव गच्छन्ति, नोऽध:, नोपरि, तद्योग्योत्पन्नपरिणामाभावात्।
एवं द्वितीयस्थले तिर्यग्गतिभ्य: निर्गमनकथनत्वेन गुणस्थानापेक्षया चत्वािंरशत्सूत्राणि गतानि।
संप्रति मिथ्यादृष्टिमनुष्याणां आगतिप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-मणुसा मणुसपज्जत्ता मिच्छाइट्ठी संखेज्जवासाउआ मणुसा मणुसेहि कालगदसमाणा कदि कदीओ गच्छंति ?।।१४१।।
चत्तारि गदीओ गच्छंति णिरयगई तिरिक्खगई मणुसगई देवगई चेदि।।१४२।।
णिरएसु गच्छंता सव्वणिरएसु गच्छंति।।१४३।।
तिरिक्खेसु गच्छंता सव्वतिरिक्खेसु गच्छंति।।१४४।।
मणुसेसु गच्छंता सव्वमणुस्सेसु गच्छंति।।१४५।।
देवेसु गच्छंता भवणवासियप्पहुडि जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु गच्छंति।।१४६।।
मणुसा अपज्जत्ता मणुसा मणुसेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।१४७।।
दुवे गदीओ गच्छंति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं चेव।।१४८।।
तिरिक्ख-मणुसेसु गच्छंता सव्वतिरिक्ख-मणुसेसु गच्छंति, णो असंखेज्जवासाउएसु गच्छंति।।१४९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। सामान्यमनुष्या: पार्यप्तमनुष्याश्च संख्यातवर्षायुष्का:-कर्मभूमिजा: यद्यपि मिथ्यादृष्टय: तह्र्यपि चतुर्गतिषु गच्छन्ति, विशेषेण तु-नवग्रैवेयकानामुपरि न गच्छन्ति सम्यक्त्वाभावात्।
मिथ्यादृष्टयो भव्या अपि द्रव्यसंयमबलेन नवग्रैवेयकं यावत् यान्तीति।
ये केचिन्मनुष्या: लब्ध्यपर्याप्तका: तिर्यग्मनुष्यायुषी मुक्त्वा नरकदेवायुषी न बध्नन्ति। तथा च असंख्यातवर्षायुष्केषु भोगभूमिजतिर्यङ्मनुष्येष्वपि न गच्छन्ति, दान-दानानुमोदनयोरभावात्।
संप्रति सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्टिमनुष्याणां आगतिप्रतिपादनाय त्रयोदशसूत्राण्यवतार्यन्ते-मणुस्ससासणसम्माइट्ठी संखेज्जवासाउआ मणुसा मणुसेहि कालगद-समाणा कदि कदीओ गच्छंति ?।।१५०।।
तिण्णि गदीओ गच्छंति तिरिक्खगदिं माणुसगदिं देवगदिं चेदि।।१५१।।
तिरिक्खेसु गच्छंता एइंदिय-पंचिंदिएसु गच्छंति, णो विगिंलदिएसु गच्छंति।।१५२।।
एइंदिएसु गच्छंता बादरपुढवी-बादरआउ-बादरवणप्फदिकाइय-पत्तेयसरीरपज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्तएसु।।१५३।।
पंचिंदिएसु गच्छंता सण्णीसु गच्छंति, णो असण्णीसु।।१५४।।
सण्णीसु गच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु गच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।१५५।।
गब्भोवक्कंतिएसु गच्छंता पज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्त-ऐसु।।१५६।।
पज्जत्तएसु गच्छंता संखेज्जवासाउएसु वि गच्छंति, असंखेज्जवासाउएसु वि गच्छंति।।१५७।।
मणुसेसु गच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु गच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।१५८।।
गब्भोवक्कंतिएसु गच्छंता पज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।१५९।।
पज्जत्तएसु गच्छंता संखेज्जवासाउएसु गच्छंति, असंखेज्जवासाउएसु वि गच्छंति।।१६०।।
देवेसु गच्छंता भवणवासियप्पहुडि जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु गच्छंति।।१६१।।
मणुसा सम्मामिच्छाइट्ठी संखेज्जवासाउआ सम्मामिच्छत्तगुणेण मणुसा मणुसेहि णो कालं करेंति।।१६२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते।
कश्चिदाह-यदि एकेन्द्रियेषु सासादनसम्यग्दृष्टय: उत्पद्यन्ते तर्हि एकेन्द्रियेषु द्वे गुणस्थाने भवितव्ये ? भवतु चेत्, न एकेन्द्रियसासादनद्रव्यस्य द्रव्यानियोगद्वारे प्रमाणप्ररूपणाभावात् ?
अत्र परिहार: उच्यते-सासादनसम्यग्दृष्टय: एकेन्द्रियेषु उत्पद्यमाना येन आत्मन: आयुष: चरमसमये सासादनगुणस्थानपरिणामेन सहिता: भूत्वा तत: उपरिमसमये मिथ्यात्वं प्रतिपद्यन्ते तेन एकेन्द्रियेषु न द्वे गुणस्थाने स्त:, मिथ्यादृष्टिगुणस्थानमेकमेव।
मनुष्या: संज्ञिन: एव सन्ति न चासंज्ञिन:।
मनुष्या: सासादनसम्यग्दृष्टय: सम्यक्त्वसंयमरहिता: अपि नवग्रैवेयकपर्यंतं उत्पद्यन्ते।
कथं एते नवग्रैवेयकपर्यंतं गन्तुं शक्नुवन्ति ?
नैष दोष:, द्रव्यसंयमस्यापि तत्फलत्वोपलंभात्।
सम्यग्मिथ्यादृष्टिमनुष्याणां सर्वायु:बंधाभावात् न ते म्रियन्ते।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टी और सम्यग्दृष्टी तिर्यंचों की गति का प्रतिपादन करने के लिए ग्यारह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातवर्षायुष्क तिर्यंच जीव तिर्यंचों में सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान के साथ मरण नहीं करते।।१३०।।

तिर्यंच असंयतसम्यग्दृष्टि संख्यातवर्षायुष्क तिर्यंचपर्यायों से मरण कर कितनी गतियों में जाते हैं ?।।१३१।।

पूर्वोक्त तिर्यंच जीव मरकर एकमात्र देवगति को जाते हैं।।१३२।।

देवों में जाने वाले असंयतसम्यग्दृष्टि संख्यातवर्षायुष्क तिर्यंच सौधर्म-ईशान स्वर्ग से लगाकर आरण-अच्युत तक के कल्पवासी देवों में जाते हैं।।१३३।।

तिर्यंच मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातवर्षायुष्क तिर्यंच तिर्यंचपर्यायों से मरणकर कितनी गतियों में जाते हैं ?।।१३४।।

उपर्युक्त तिर्यंच एकमात्र देवगति में ही जाते हैं।।१३५।।

देवों में जाने वाले पूर्वोक्त तिर्यंच भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों मेें जाते हैं।।१३६।।

तिर्यंच सम्यग्मिथ्यादृष्टि असंख्यातवर्षायुष्क तिर्यंच जीव तिर्यंचपर्यायों से सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान के साथ मरण नहीं करते।।१३७।।

तिर्यंच असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातवर्षायुष्क तिर्यंच जीव तिर्यंचपर्यायों से मरण करके कितनी गतियों में जाते हैं ?।।१३८।।

असंख्यातवर्षायुष्क असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंच मरकर एकमात्र देवगति को ही जाते हैं।।१३९।।

देवों मेें जाने वाले असंख्यातवर्षायुष्क असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंच सौधर्म-ईशान कल्पवासी देवों में जाते हैं।।१४०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान में चारों भी गतियों में आयुकर्म के बंध का सर्वत्र अभाव है। जिस गति में और जिस गुणस्थान में आयु कर्म का बंध नहीं है, उस गुणस्थान से उस गति से निकलना कषायोपशमकों को छोड़कर अन्यों का नहीं होता है, ऐसा जानना चाहिए।

सम्यग्दृष्टी तिर्यंच असंयत भी सोलह स्वर्ग पर्यंत जाते हैं।

शंका-संख्यातवर्षायुष्क असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंच मरकर आरण-अच्युत कल्प से ऊपर क्यों नहीं जाते ? समाधान-नहीं, क्योंकि, तिर्यंच सम्यग्दृष्टि जीवों में संयम का अभाव पाया जाता है और संयम के बिना आरण-अच्युत कल्प से ऊपर गमन होता नहीं है।

शंका-इस कथन से आरण-अच्युत कल्प से ऊपर उत्पन्न होने वाले मिथ्यादृष्टि जीवों के साथ व्यभिचार दोष हो जावेगा ?

समाधान-यह दोष नहीं आता है, क्योंकि उन मिथ्यादृष्टियों के भी भावसंयम रहित द्रव्यसंयम होना संभव है।

द्रव्य संयम का माहात्म्य भी तत्त्वार्थसार में आचार्यदेवों ने कहा है-

जो निग्र्रन्थ वेष को धारण कर प्रकृष्ट तप करते हैं, ऐसे अभव्यजीव भी अंतिम ग्रैवेयक पर्यंत चले जाते हैं।।

किन्तु तिर्यंच महाव्रतस्वरूप द्रव्यसंयम को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं अत: वे अच्युत स्वर्ग से ऊपर नहीं जाते हैं।

जो असंख्यात वर्ष की आयु वाले भोगभूमिया तिर्यंच हैं, वे देवगति को ही प्राप्त करते हैं, क्योंकि वे मंद कषाय वाले हैं अथवा वहाँ भोगभूमि में देवायु को छोड़कर अन्य आयु के बंध का अभाव है।

ये मिथ्यादृष्टी और सासादन सम्यग्दृष्टी तिर्यंच भवनत्रिक देवों में ही जाते हैं, क्योंकि सौधर्म आदि ऊपर के स्वर्गों के देवों में गमन योग्य परिणामों का उनके अभाव है।

अन्यत्र-तत्त्वार्थसार में भी कहा है-

असंख्यात वर्षायु वाले जीवों का देवों में ही गमन होता है क्योंकि निसर्गत: वहाँ उनके कषायों की मंदता है।।

यही बात तत्त्वार्थराजवार्तिक में भी कही है-

‘‘असंख्यात वर्षों की आयु वाले मिथ्यादृष्टी और सासादनसम्यग्दृष्टी तिर्यंच या मनुष्य ज्योतिष्क देवपर्यंत उत्पन्न होते हैं।’’ असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंच देवगति को प्राप्त करते हुए सौधर्म-ईशान स्वर्गों में ही जाते हैं, न इसके नीचे और न इसके ऊपर, क्योंकि उस योग्य उत्पन्न होने के परिणामों का उनके अभाव है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तिर्यंचगति से निर्गमन के कथन रूप से गुणस्थानों की अपेक्षा चालीस सूत्र पूर्ण हुए।

अब मिथ्यादृष्टि मनुष्यों की आगति का प्रतिपादन करने के लिए नव सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्य मनुष्यपर्याप्त मिथ्यादृष्टि संख्यातवर्षायुष्क मनुष्य मनुष्यपर्यायों से मरणकर कितनी गतियों को जाते हैं ?।।१४१।।

उपर्युक्त मनुष्य चारों गतियों में जाते हैं-नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति।।१४२।।

नरकों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य सभी नरकों में जाते हैं।।१४३।।

तिर्यंचों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य सभी तिर्यंचों में जाते हैं।।१४४।।

मनुष्यों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य सभी मनुष्यों में जाते हैं।।१४५।।

देवों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य भवनवासी देवों से लगाकर नौ ग्रैवेयक विमानवासी देवोंं तक में जाते हैं।।१४६।।

मनुष्य अपर्याप्तक मनुष्य मनुष्यपर्यायों से मरण करके कितनी गतियों मेें जाते हैं ?।।१४७।।

उपर्युक्त मनुष्य दो गतियों में जाते हैं-तिर्यंचगति और मनुष्यगति।।१४८।।

तिर्यंच और मनुष्यों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य सभी तिर्यंच और सभी मनुष्यों में जाते हैं, किन्तु असंख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंच और मनुष्यों में नहीं जाते।।१४९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। सामान्य मनुष्य, पर्याप्त मनुष्य संख्यात वर्षायु वाले कर्मभूमिज, यद्यपि ये मिथ्यादृष्टी हैं, तो भी चारों गतियों में जाते हैं, विशेषता यह है कि वे नवग्रैवेयक के ऊपर नहीं जाते हैं, क्योंकि इनके सम्यक्त्व का अभाव है। मिथ्यादृष्टी भव्य भी द्रव्यसंयम के बल से नव ग्रैवेयक पर्यंत जा सकते हैं।

जो कोई लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य हैं, वे तिर्यंचायु और मनुष्यायु को छोड़कर नरकायु और देवायु का बंध नहीं करते हैं। उसी प्रकार असंख्यात वर्ष की आयु वालों में भी-भोगभूमिज तिर्यंच-मनुष्यों में भी नहीं जाते हैं, क्योंकि उनके दान और दान की अनुमोदना का अभाव है।

अब सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टी मनुष्यों की आगति का प्रतिपादन करने के लिए तेरह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्य सासादनसम्यग्दृष्टि संख्यातवर्षायुष्क मनुष्य मनुष्यपर्यायों से मरण करके कितनी गतियों को जाते हैं ?।।१५०।।

उपर्युक्त मनुष्य तीन गतियों में जाते हैं-तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति।।१५१।।

तिर्यंचों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य एकेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों में जाते हैं, विकलेन्द्रिय जीवों में नहीं जाते।।१५२।।

एकेन्द्रियों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य बादर पृथिवीकायिक, बादर जलकायिक और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्तकों में जाते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।१५३।।

चेन्द्रियों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य संज्ञियों में जाते हैं, असंज्ञियों में नहीं।।१५४।।

संज्ञियों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य गर्भोपक्रान्तिकों में जाते हैं, सम्मूचछमों में नहीं।।१५५।।

गर्भोपक्रान्तिकों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य पर्याप्तकों में जाते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।१५६।।

पर्याप्तकों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य संख्यात वर्ष की आयु वालों में भी जाते हैं और असंख्यात वर्ष की आयु वालों में भी जाते हैं।।१५७।।

मनुष्यों मेें जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य गर्भोपक्रान्तिकों में जाते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं।।१५८।।

गर्भोपक्रान्तिकों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य पर्याप्तकों में जाते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।१५९।।

पर्याप्तकों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य संख्यातवर्षायुष्क मनुष्यों में भी जाते हैं और असंख्यातवर्षायुष्क मनुष्यों में भी जाते हैं।।१६०।।

देवों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य भवनवासी देवों से लगाकर नौ ग्रैवेयक विमानवासी देवों तक जाते हैं।।१६१।।

संख्यात वर्ष की आयु वाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि मनुष्य सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान सहित मनुष्य होते हुए मनुष्य पर्यायों से मरण नहीं करते।।१६२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ कोई प्रश्न करता है-

शंका-यदि एकेन्द्रियों में सासादनसम्यग्दृष्टी जीव उत्पन्न होते हैं, तो एकेन्द्रियों में दो गुणस्थान होना चाहिए ? यदि कहा जाये कि एकेन्द्रियों में दो ही गुणस्थान होने दो, सो यह कहना भी नहीं बन सकता, क्योंकि द्रव्यानुयोगद्वार में एकेन्द्रिय सासादनगुणस्थानवर्ती जीवों के द्रव्य का प्रमाण नहीं बतलाया गया है ?

समाधान-यहाँ पूर्वोक्त शंका का परिहार कहा जाता है। वह इस प्रकार है-चूँकि एकेन्द्रियों में उत्पन्न होने वाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीव अपनी आयु के अंतिम समय में सासादनपरिणाम सहित होकर उनसे अगले समय में मिथ्यात्व को प्राप्त हो जाते हैं, इसलिए एकेन्द्रियों में दो गुणस्थान नहीं होते, केवल एक मिथ्यादृष्टि गुणस्थान ही होता है।

मनुष्य संज्ञी ही होते हैं असंज्ञी नहीं होते। सम्यक्त्व और संयम से रहित भी सासादनसम्यग्दृष्टि मनुष्य नवग्रैवेयक पर्यंत उत्पन्न होते हैं।

शंका-सम्यक्त्व और संयम से रहित सासादनसम्यग्दृष्टि मनुष्यों की नौ ग्रैवेयकों में उत्पत्ति किस प्रकार होती है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि द्रव्यसंयम के भी नौ ग्रैवेयकों में उत्पन्न होने रूप फल की प्राप्ति पाई जाती है।

सम्यग्मिथ्यादृष्टी जीवों के सभी आयु के बंध का अभाव है अत: वे उस गुणस्थान में मरण नहीं करते हैं।

सम्यग्दृष्टिमनुष्याणामागतिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

मणुससम्माइट्ठी संखेज्जवासाउआ मणुस्सा मणुस्सेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।१६३।।

एक्कं हि चेव देवगदिं गच्छंति।।१६४।।
देवेसु गच्छंता सोहम्मीसाणप्पहुडि जाव सव्वट्टसिद्धिविमाणवासियदेवेसु गच्छंति।।१६५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। कर्मभूमिजा: सम्यग्दृष्टिमनुष्या: देवायुरेव बध्नंति। सम्यक्त्वसहिता: अणुव्रतिन: आर्यिका: वा अच्युतस्वर्गपर्यंतं गच्छन्ति। महाव्रतिन: द्रव्यसंयमिन: भावसंयमिनो वा नवग्रैवेयकपर्यंतं गच्छन्ति किंतु केवलं भावसंयमिन एव नवानुदिशपंचानुत्तरविमानपर्यंतं गच्छन्ति इति ज्ञातव्यं।
अत्र कश्चिदाह-सम्यग्दृष्टिमनुष्या: कर्मभूमिजा: चतुर्गतिष्वपि गच्छंति एतद्वक्तव्यं। देवगिंत तावद् गच्छन्ति एव, अत्रैव सूत्रे प्रोक्तत्वात्। नरकगतिमपि गच्छंति। ‘णेरइया सम्मत्तेण अधिगदा णियमा सम्मत्तेण चेव णींति१। इति सूत्रवचनात्। तिर्यक्सम्यग्दृष्टय: नरकगतिं नाधिगच्छन्ति, तत्र दर्शनमोहनीयस्य क्षपणाभावात् क्षायिकसम्यक्त्वाभावोऽस्ति। न च तत्रतनवेदकसम्यग्दृष्टयो नरकगतिं प्राप्नुवन्ति, तेषां मरणकाले नरकायु:सत्त्वाभावात्। न देवा: नारका वा सम्यग्दृष्टय: नरकगतिमधिगच्छन्ति, जिनाज्ञाभावात्। तस्मात् पारिशेषन्यायात् सम्यग्दृष्टयो मनुष्याश्चैव नरकगतिमधिगच्छन्ति इति सिद्धम्।
तिर्यग्गतिमपि गच्छन्ति। ‘तिरिक्खगदिं सम्मत्तेण अधिगदा णियमा सम्मत्तेण चेव णींति।। इति जिनाज्ञासूत्रात्। अत्र-तिर्यक्षु देवा: नारका: तिर्यञ्चो वा सम्यग्दृष्टयो नोत्पद्यन्ते, एतेषामत्रोत्पत्ते: प्रतिपादनजिनाज्ञाभावात्। तस्मात् तिर्यक्षु सम्यग्दृष्टयो मनुष्याश्चैवोत्पद्यन्ते। एवं मनुष्येषु मनुष्यसम्यग्दृष्टीनां उत्पत्ति: कथयितव्या इति ?
अत्र परिहार: उच्यते-तद्यथा-यै: मिथ्यादृष्टिभि: मनुष्यै: देवायु: मुक्त्वा अन्यायुर्बद्ध्वा पश्चात् सम्यक्त्वं गृहीतं, तेऽत्र न परिगृहीता:। ‘तेन एकां चैव देवगतिं गच्छन्ति मनुष्यसम्यग्दृष्टय:’ इति भणितं।
देवगतिं मुक्त्वान्यगत्यायुर्बध्द्वा यै: सम्यक्त्वं पश्चात् प्रतिपन्नं तेऽत्र किन्न गृहीता: ?
न, तेषां मिथ्यात्वं गत्वात्मन: बंधायुष्कवशेन उत्पद्यमानानां सम्यक्त्वाभावात्।
सम्यक्त्वं गृहीत्वा दर्शनमोहनीयं क्षपयित्वा नरकादिषु उत्पद्यमाना: अपि मनुष्यसम्यग्दृष्टय: सन्ति, ते किन्न गृहीता:?
अत्र सम्यक्त्वमाहात्म्यप्रतिपादनार्थं पूर्वबद्धायु:कर्ममाहात्म्यप्रतिपादनार्थं च ते न गृहीता: इति ज्ञातव्यं।
अन्यिंलगिनोऽपि देवगतौ गच्छन्त: क्व क्व गच्छन्ति इति प्रतिपाद्यते श्रीभट्टाकलंकदेवेन-‘‘परिव्राजकानां देवेषूपपाद: आ ब्रह्मलोकात्, आजीविकानां आ सहस्रारात्। तत ऊध्र्वमन्यलिंगिनां नास्त्युपपाद:, निर्ग्रन्थलिंगधारिणामेव उत्कृष्टतपोऽनुष्ठानोपचितपुण्यबंधानाम् असम्यग्दर्शनानामुपरिमग्रैवेयकान्तेषु उपपाद:, तत ऊध्र्वं सम्यग्दर्शनज्ञानचरणप्रकर्षोपेतानामेव जन्म नेतरेषाम्। श्रावकाणां सौधर्मादिष्वच्युतान्तेषु जन्म नाधो नोपरीति परिणामविशुद्धिप्रकर्षयोगादेव कल्पस्थानातिशये योगोऽवसेय:।’’
श्रीमदमृतचन्द्रसूरिणापि प्रोक्तं-
उत्पद्यन्ते सहस्रारे तिर्यञ्चो व्रतसंयुता:।
अत्रैव हि प्रजायन्ते सम्यक्त्वाराधका नरा:।।१६५।।
न विद्यते परं ह्यस्मादुपपादोऽन्यलिंगिनाम्।
निर्र्ग्रन्थश्रावका ये ते जायन्ते यावदच्युतम् ।।१६६।।
यावत्सर्वार्थसिद्धिं तु निर्ग्रन्था: हि तत: परं।
उत्पद्यन्ते तपोयुक्ता रत्नत्रयपवित्रिता:।।१६८।।
तथैव च- णरतिरियदेसअयदा उक्कस्सेण च्चुदो त्ति णिग्गंथा।
णरअयददेसमिच्छा गेवज्जंतो त्ति गच्छंति।।५४५।।
सव्वट्ठो ति सुदिट्ठी महव्वई भोगभूमिजा सम्मा।
सोहम्मदुगं मिच्छा भवणतियं तावसा य वरं।।५४६।।
चरया य परिव्वाजा बह्मोत्तर चुदपदो त्ति आजीवा।

संप्रति भोगभूमिजमनुष्याणामागतिप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-मणुसा मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी असंखेज्जवासाउआ मणुसा मणुसेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ?।।१६६।।
एक्कं हि चेव देवगदिं गच्छंति।।१६७।।
देवेसु गच्छंता भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसियदेवेसु गच्छंति।।१६८।।
मणुसा सम्मामिच्छाइट्ठी असंखेज्जवासाउआ सम्मामिच्छत्तगुणेण मणुसा मणुसेहि णो कालं करेंति।।१६९।।
मणुसा सम्माइट्ठी असंखेज्जवासाउआ मणुसा मणुसेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति?।।१७०।।
एक्कं हि चेव देवगदिं गच्छंति।।१७१।।
देवेसु गच्छंता सोहम्मीसाणकप्पवासियदेवेसु गच्छंति।।१७२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। असंख्यातवर्षायुष्का: भोगभूमिजा: मनुष्या:, तत्रत्येभ्यो मृत्वा नियमेन देवा: भवन्ति।
उक्तं चान्यत्रापि-
संख्यातीतायुषो मत्र्या: तिर्यञ्चश्चाप्यसद्दृश:।
उत्कृष्टास्तापसाश्चैव यान्ति ज्योतिष्कदेवताम्।।१६३।।

इमे च सम्यग्दृष्टयो भोगभूमिजा: सौधर्मैशानयो: देवा: भवन्ति। न चोपरि नाध: गच्छन्ति।
एवं तृतीयस्थले मनुष्याणामागतिनिरूपणत्वेन द्वात्रिंशत्सूत्राणि गतानि।
अधुना देवानामागतिप्ररूपणाय मिथ्यात्वादिचतुर्गुणस्थानापेक्षया सप्तदशसूत्राण्यवतार्यन्ते-देवा मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी देवा देवेहि उवट्टिद-चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।१७३।।
दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं चेव।।१७४।।
तिरिक्खेसु आगच्छंता एइंदिय-पंचिंदिएसु आगच्छंति, णो विगिंलदि-एसु।।१७५।।
एइंदिएसु आगच्छंता बादरपुढवीकाइय-बादरआउकाइय-बादरवणप्फ-दिकाइयपत्तेय-सरीरपज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्तएसु।।१७६।।
पंचिंदिएसु आगच्छंता सण्णीसु आगच्छंति, णो असण्णीसु।।१७७।।
सण्णीसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छि-मेसु।।१७८।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।१७९।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवासाउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वासाउएसु।।१८०।।
मणुसेसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।१८१।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।१८२।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवासाउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वासाउएसु।।१८३।।
देवा सम्मामिच्छाइट्ठी सम्मामिच्छत्तगुणेण देवा देवेहि णो उव्वट्टंति, णो चयंति।।१८४।।
देवा सम्माइट्ठी देवा देवेहि उव्वट्टिद-चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति।।१८५।।
एक्कं हि चेव मणुसगदिमागच्छंति।।१८६।।
मणुसेसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छि-मेसु।।१८७।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।१८८।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवासाउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वासाउएसु।।१८९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवा: देवायुनरकायुषी न बध्नन्ति, कदाचित् तिर्यक्षु एकेन्द्रियेषु आगच्छन्ति किंतु विकलत्रया: न भवन्ति, स्वभावात्। इमे देवा भोगभूमिषु न आयान्ति दान-दानानुमोदनयोरभावात् स्वभावाद्वा।
अन्यत्रापि उक्तं- भाज्या एकेन्द्रियत्वेन देवा ऐशानतश्च्युता:।
तिर्यक्त्वमानुषत्वाभ्यामासहस्रारत: पुन:।।१६९।।
सम्यग्दृष्टयो देवा: मनुष्यायुर्मुक्त्वा अन्यायूंषि न बध्नन्ति। पुनश्च ते देवा: भोगभूमिजा: न भवन्तीति।
भवनत्रिकदेवा: सौधर्मैशानकल्पवासिनश्च क्व क्व आगच्छन्तीति प्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसिय-सोधम्मीसाणकप्पवासियदेवेसु देवगदिभंगो।।१९०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इमे देवा: द्वे गती लभन्ते। विषयेष्वासक्ता: सन्त: कदाचिदन्त्यसमये षण्मासावशेषे मंदारमालाम्लाने सति वा संक्लेशपरिणामेन देवगतिपर्यायात् च्युत्वा एकेन्द्रिया: अपि भवन्ति। तथापि ते तेजस्कायिकवायुकायिकौ न भवत:। कदाचित् पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: भवन्ति तत्रापि अपर्याप्तका: संमूच्र्छनजा: भोगभूमिजा: वा न भवितुं शक्नुवन्ति।

अब सम्यग्दृष्टी मनुष्यों की आगति का प्रतिपादन करने के लिए तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्य सम्यग्दृष्टि संख्यातवर्षायुष्क मनुष्य मनुष्यपर्यायों से मरण कर कितनी गतियों में जाते हैं ?।।१६३।।

संख्यातवर्षायुष्क सम्यग्दृष्टि मनुष्य एकमात्र देवगति को ही जाते हैं।।१६४।।

देवों में जाने वाले संख्यातवर्षायुष्क सम्यग्दृष्टि मनुष्य सौधर्म-ईशान से लगाकर सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देवों तक में जाते हैं।।१६५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। कर्मभूमिया सम्यग्दृष्टी मनुष्य देवायु ही बांधते हैं। सम्यक्त्व सहित अणुव्रती श्रावक और आर्यिकाएँ अच्युत स्वर्ग पर्यंत जाते हैं। महाव्रती द्रव्यसंयमी या भावसंयमी मुनि नवग्रैवेयक पर्यंत जाते हैं, किन्तु केवल भावसंयमी ही नव अनुदिश और पाँच अनुत्तरों में जाते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

शंका-यहाँ पर कोई कहता है कि ‘संख्यातवर्षायुष्क सम्यग्दृष्टि मनुष्य चारों गतियों को जाते हैं,’ ऐसा कहना चाहिए, क्योंकि सम्यग्दृष्टि मनुष्यों का चारों गतियों में गमन पाया जाता है। वह इस प्रकार है-सम्यग्दृष्टि मनुष्य देवगति को तो जाते ही हैं, क्योंकि यह बात प्रस्तुत सूत्र में ही कही गई है और सम्यग्दृष्टि मनुष्य नरकगति को भी जाते हैं, क्योंकि ‘नारकी सम्यक्त्व से नरक में प्रवेश करके नियम से सम्यक्त्व सहित ही वहाँ से निकलते हैं,’ ऐसा सूत्र का वचन है। तिर्यंच सम्यग्दृष्टि जीव तो नरकगति को जाते नहीं हैं, क्योंकि उनमें दर्शनमोहनीय के क्षपण का अभाव होने से क्षायिक सम्यक्त्व का अभाव है और न तिर्यंचगतिसंबंधी वेदकसम्यग्दृष्टि नरकगति को जाते हैं, क्योंकि उनके मरणकाल में नरकायु कर्म की सत्ता का अभाव होता है। देव और नारकी सम्यग्दृष्टि नरकगति को जाते नहीं है, क्योंकि ऐसा जिनभगवान् का उपदेश नहीं है। इसलिए पारिशेष न्याय से सम्यग्दृष्टि मनुष्य ही नरकगति को जाते हैं यह बात सिद्ध हुई। सम्यग्दृष्टि मनुष्य तिर्यंचगति को भी जाते हैं, क्योंकि तिर्यंचगति को सम्यक्त्व सहित जाने वाले जीव नियम से सम्यक्त्व सहित ही वहाँ से निकलते हैं’ ऐसा जिनभगवान् का उपदेश है। यहाँ तिर्यंचों में देव, नारकी और तिर्यंच सम्यग्दृष्टि जीव तो उत्पन्न होते नहीं, क्योंकि इन जीवों के यहाँ उत्पन्न होने का प्रतिपादन करने वाला जिनभगवान् का उपदेश पाया नहीं जाता। इसलिए तिर्यंचों में सम्यग्दृष्टि मनुष्य ही उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार मनुष्यों में मनुष्य सम्यग्दृष्टि जीवोें के उत्पत्ति साध लेना चाहिए-कहना चाहिए ?

समाधान-यहाँ उक्त शंका का परिहार कहते हैं। वह इस प्रकार है-जिन मिथ्यादृष्टियों ने देवायु को छोड़ अन्य आयु बांधकर पश्चात् सम्यक्त्व ग्रहण किया है, उनका यहाँ ग्रहण नहीं किया गया। इसीलिए ऐसा कहा गया है कि सम्यग्दृष्टि मनुष्य एकमात्र देवगति को ही जाते हैं।

शंका-देवगति को छोड़ अन्य गतियों की आयु बांधकर जिन मनुष्यों ने पश्चात् सम्यक्त्व ग्रहण किया है, उनका यहाँ ग्रहण क्यों नहीं किया गया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि पुन: मिथ्यात्व में जाकर अपनी बांधी हुई आयु के वश से उत्पन्न होने वाले उन जीवों के सम्यक्त्व का अभाव पाया जाता है।

शंका-सम्यक्त्व को ग्रहण करके और दर्शनमोहनीय का क्षपण करके नरकादिक में उत्पन्न होने वाले भी सम्यग्दृष्टि मनुष्य होते हैं, उनका यहाँ क्यों नहीं ग्रहण किया गया ?

समाधान-सम्यक्त्व का माहात्म्य दिखलाने और पूर्व में बांधे हुए आयु कर्म का माहात्म्य उत्पन्न करने के लिए उक्त जीवों का यहाँ ग्रहण नहीं किया गया, ऐसा जानना चाहिए।

अन्य लिंगी भी देवगति में जाते हुए कहाँ-कहाँ जाते हैं, इस विषय को श्रीमान् भट्टाकलंक देव तत्त्वार्थराजवार्तिक ग्रंथ में कहते हैं-

परिव्राजक ब्रह्म स्वर्ग तक और आजीवक सहस्रार स्वर्ग तक उत्पन्न होते हैं। बारहवें स्वर्ग के ऊपर अन्य लिङ्गियों की उत्पत्ति नहीं होती। उत्कृष्ट तपो अनुष्ठान के द्वारा पुण्यबंध करने वाले निग्र्रन्थलिंगधारी, मिथ्यादृष्टि मुनियों का अंतिम ग्रैवेयक तक उत्पाद होता है। नौ ग्रैवेयकों के ऊपर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और उत्कृष्ट चारित्र के धारी महामुनियों का ही उत्पाद होता है अन्य मिथ्यादृष्टि द्रव्यलिंगी मुनि नौ ग्रैवेयक के ऊपर जन्म नहीं ले सकते। सम्यग्दृष्टि व्रतधारी श्रावक-श्राविका और आर्यिका का उत्पाद सौधर्म स्वर्ग से लेकर अच्युत स्वर्ग तक है। परिणामविशुद्धि के उत्कृष्ट योग एवं सम्यग्दर्शन सहित होने से नीचे भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में भी उनका उत्पाद नहीं है और वस्त्रधारी होने से सोलहवें स्वर्ग के ऊपर भी जन्म नहीं ले सकते। इनका जन्म परिणामों की विशुद्धि की प्रकर्षता से ही कल्पवासी देवों तक होता है, ऐसा जानना।

श्रीमान् अमृतचंद्रसूरि ने भी तत्त्वार्थसार में कहा है-

व्रतयुक्त पंचमगुणस्थानवर्ती तिर्यंच मरकर बारहवें स्वर्ग तक उत्पन्न होते हैं। सम्यक्त्व के धारी चतुर्र्थगुणस्थानवर्ती मनुष्य भी मरकर बारहवें स्वर्ग तक जाते हैं। निग्र्रन्थ दिगम्बर वेष के अतिरिक्त वेषधारी कोई भी साधु मरकर बारहवें स्वर्ग से ऊपर जन्म नहीं ले सकते हैं, यह नियम है। आर्यिका तथा निष्परिग्रह श्रावक मरकर अच्युत नाम के सोलहवें स्वर्ग तक उपजते हैं। ग्रैवेयक के भी ऊपर सर्वार्थसिद्धि अन्तिम विमान पर्यन्त वे ही जीव उपजते हैं जो भव्य हैं और रत्नत्रय धारण कर निग्र्रंथ दिगम्बर मुनि होकर उत्कृष्ट तप करते हैं।।

अन्यत्र भी कहा है-असंयत और देशसंयत मनुष्य, तिर्यंच अधिक से अधिक अच्युत कल्प तक तथा निग्र्रन्थ देशसंयत, असंयत एवं मिथ्यादृष्टि मुनि अंतिम ग्रैवेयक पर्यंत जाते हैं।

विशेषार्थ-असंयतसम्यग्दृष्टि और देशसंयमी मनुष्य एवं तिर्यंच उत्कृष्टता से अच्युत कल्प अर्थात् १६ स्वर्ग पर्यन्त ही उत्पन्न होते हैं, इससे ऊपर नहीं। जो द्रव्य से निर्ग्रन्थ और भाव से मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि एवं देशसंयमी हैं, वे अंतिम ग्रैवेयक पर्यन्त उत्पन्न होते हैं, इससे ऊपर नहीं।

सम्यग्दृष्टि महाव्रती सर्वार्थसिद्धि पर्यन्त, सम्यग्दृष्टि भोगभूमिज मनुष्य, तिर्यंच सौधर्मेशान पर्यन्त और मिथ्यादृष्टि भोगभूमिज मनुष्य, तिर्यंच एवं तापसी साधु उत्कृष्टता से भवनत्रय पर्यन्त ही उत्पन्न होते हैं। चरक और परिव्राजक सन्यासी ब्रह्मकल्प पर्यन्त और आजीवक साधु अच्युतकल्प पर्यन्त उत्पन्न होते हैं।।

अब भोगभूमिज मनुष्यों की आगति का प्रतिपादन करने के लिए सात सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्य मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातवर्षायुष्क मनुष्य मनुष्यपर्यायों से मरण करके कितनी गतियों में जाते हैं ?।।१६६।।

उपर्युक्त मनुष्य एकमात्र देवगति को ही जाते हैं।।१६७।।

देवों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों में जाते हैं।।१६८।।

मनुष्य सम्यग्मिथ्यादृष्टि असंख्यातवर्षायुष्क मनुष्य सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान सहित मनुष्यपर्यायों से मरण नहीं करते।।१६९।।

मनुष्य सम्यग्दृष्टि असंख्यातवर्षायुष्क मनुष्यपर्यायों से मरण कर कितनी गतियों में जाते हैं ?।।१७०।।

उपर्युक्त मनुष्य मरण कर एकमात्र देवगति को जाते हैं।।१७१।।

देवों में जाने वाले उपर्युक्त मनुष्य सौधर्म और ईशान कल्पवासी देवों में जाते हैं।।१७२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। असंख्यात वर्षायु वाले भोगभूमिया मनुष्य वहाँ से मरकर नियम से देव होते हैं। तत्त्वार्थसार में कहा है-असंख्यात वर्षायु वाले मनुष्य और तिर्यंच भी सम्यग्दर्शनरहित तथा उत्कृष्ट तापसी ये मरकर ज्योतिषी देव पर्यंत उत्पन्न होते हैं।।

ये ही सम्यग्दृष्टी भोगभूमिया सौधर्म और ईशान स्वर्ग में देव होते हैं, न इससे ऊपर जाते हैं और न इनसे नीचे के देवों में उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार तृतीय स्थल में मनुष्यों की आगति का प्रतिपादन करने वाले बत्तीस सूत्र पूर्ण हुए।

अब देवों की आगति की प्ररूपणा करने के लिए मिथ्यात्व आदि चार गुणस्थानों की अपेक्षा से सत्रह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

देव मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देव देवपर्यायों से उद्वर्तित व च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।१७३।।

मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देव मरणकर तिर्यंचगति और मनुष्यगति इन दो गतियों में आते हैं।।१७४।।

तिर्यंचों में आने वाले मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देव एकेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों में आते हैं, विकलेन्द्रियों में नहीं आते।।१७५।।

एकेन्द्रियों में आने वाले उपर्युक्त देव बादर पृथिवीकायिक, बादर जलकायिक और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्तक जीवों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।१७६।।

पंचेन्द्रियों में आने वाले उपर्युक्त देव संज्ञी तिर्यंचों में आते हैं, असंज्ञियों में नहीं।।१७७।।

संज्ञी तिर्यंचों में आने वाले उपर्युक्त देव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं आते।।१७८।।

गर्भोपक्रान्तिकों में आने वाले उपर्युक्त देव पर्याप्तकों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं आते।।१७९।।

पर्याप्तकों में आने वाले उपर्युक्त देव संख्यातवर्षायुष्कों में आते हैं, असंख्यात- वर्षायुष्कों में नहीं आते।।१८०।।

मनुष्यों में आने वाले मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं आते।।१८१।।

गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में आने वाले उपर्युक्त देव पर्याप्तकों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं आते।।१८२।।

पर्याप्तक मनुष्यों में आने वाले उपर्युक्त देव संख्यातवर्षायुष्कों में आते हैं, असंख्यातवर्षायुष्कों में नहीं आते।।१८३।।

देव सम्यग्मिथ्यादृष्टि सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान सहित देवपर्यायों से न उद्वर्तित होते हैं और न च्युत होते हैं।।१८४।।

देव सम्यग्दृष्टि देव देवपर्यायों से उद्वर्तित व च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।१८५।। सम्यग्दृष्टि देव मरणकर केवल एक मनुष्यगति में ही आते हैं।।१८६।।

मनुष्यों में आने वाले सम्यग्दृष्टि देव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं आते।।१८७।।

गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में आने वाले सम्यग्दृष्टि देव पर्याप्तकों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं आते।।१८८।।

पर्याप्तक गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में आने वाले सम्यग्दृष्टि देव संख्यातवर्षायुष्कों में आते हैं, असंख्यातवर्षायुष्कों में नहीं आते।।१८९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देव, देवायु और नरकायु को नहीं बांधते हैं। कदाचित् वे तिर्यंचों में एकेन्द्रिय जीवों में जन्म ले सकते हैं किन्तु देव विकलत्रय नहीं हो सकते हैं क्योंकि वैसा स्वभाव है। ये देव भोगभूमियों में भी जन्म नहीं ले सकते हैं क्योंकि उनके दान और दान की अनुमोदना का अभाव है। अथवा ऐसा स्वभाव ही है। तत्त्वार्थसार में भी कहा है-

ईशान स्वर्ग तक के देव मरकर एकेन्द्रिय तक होते हैं और बारहवें सहस्रार स्वर्ग तक के देव मरकर तिर्यंच भी हो सकते हैं तथा मनुष्य भी हो सकते हैं।।१६९।।

सम्यग्दृष्टी मनुष्य देवायु को छोड़कर अन्यायु नहीं बांधते हैं और ये देव भोगभूमि में भी नहीं जाते हैं।

भवनवासी, व्यंतर और ज्योतिषी तथा सौधर्म-ईशान कल्पवासी देव कहाँ-कहाँ आते हैं-जन्म लेते हैं, ऐसा प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

भवनवासी, वानव्यंतर, ज्योतिषी तथा सौधर्म और ईशान कल्पवासी देवों की गति उपर्युक्त देवगति के समान है।।१९०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ये देव दो गति को प्राप्त करते हैं। विषयों में आसक्त हुए कदाचित् अन्त समय में, छह मास शेष रहने पर अथवा मंदार माला के मुरझाने पर संक्लेश परिणाम से देवगति पर्याय से च्युत होकर एकेन्द्रिय भी हो जाते हैं, फिर भी उनमें अग्निकायिक और वायुकायिक नहीं होते हैं। कदाचित् कोई देव पंचेन्द्रिय तिर्यंच हो जाते हैं, वहाँ पर भी अपर्याप्तक, सम्मूच्र्छन या भोगभूमिज नहीं हो सकते हैं।

तृतीयस्वर्गादासहस्रारदेवानां आगतिप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

सणक्कुमारप्पहुडि जाव सदरसहस्सारकप्पवासियदेवेसु पढमपुढवीभंगो। णवरि चुदा त्ति भाणिदव्वं।।१९१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तृतीयस्वर्गादारभ्य द्वादशस्वर्गपर्यन्ता: देवा: द्वे गती प्राप्नुवन्ति। तिर्यग्गतिं मनुष्यगतिं च। इमे देवा: पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: एव भवन्ति न चैकेन्द्रिया:, गर्भजा: पर्याप्ता: कर्मभूमिजाश्चैव। मनुष्यगत्यामपि न च लब्ध्यपर्याप्ता: भोगभूमिजा: कुभोगभूमिजा वा भवन्तीति ज्ञातव्यं।
अधुना आनतादिसर्वार्थसिद्धिदेवानामागतिप्रतिपादनाय एकादशसूत्राण्यवतार्यन्ते-आणदादि जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी देवा देवेहि चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति?।।१९२।।
एक्कं हि चेव मणुसगदिमागच्छंति।।१९३।।
मणुसेसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छि-मेसु।।१९४।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।१९५।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवासाउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वासाउएसु।।१९६।।
आणद जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवा सम्मामिच्छाइट्ठी सम्मामिच्छत्तगुणेण देवा देवेहि णो चयंति।।१९७।।
अणुदिस जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा असंजदसम्माइट्ठी देवा देवेहि चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।१९८।।
क्कं हि मणुसगदिमागच्छंति।।१९९।।
मणुसेसु आगच्छंता गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।२००।।
गब्भोवक्कंतिएसु आगच्छंता पज्जत्तएसु आगच्छंति, णो अपज्जत्त-एसु।।२०१।।
पज्जत्तएसु आगच्छंता संखेज्जवासाउएसु आगच्छंति, णो असंखेज्ज-वासाउएसु।।२०२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। आनतादिदेवानां नवग्रैवेयकवासिनामहमिन्द्राणां च शुक्ललेश्यासहितानां मनुष्यायुर्विना अन्यायुषां बंधाभावात्।
अन्यत्रापि कथितं-
तत्तो उवरिमदेवा सव्वा सुक्काभिधाणलेस्साए।
उप्पज्जंति मणुस्से णत्थि तिरिक्खेसु उववादो।।६८१।।
तथा च- तत: परं तु ये देवास्ते सर्वेऽनन्तरे भवे।
उत्पद्यन्ते मनुष्येषु न हि तिर्यक्षु जातुचित्।।१७०।।


अनुदिशाविमानादारभ्य सर्वार्थसिद्धिपर्यन्ता: सर्वेऽपि देवा: सम्यग्दृष्टय एव। ते मनुष्यभवे आगत्य नियमात् स्वर्गगा: मोक्षगा: वा भवन्तीति ज्ञातव्यं।
एवं चतुर्थस्थले देवगतेरागतिकथनमुख्यत्वेन त्रिंशत्सूत्राणि गतानि।
अथ चतुर्गतीनामागतिप्रकरणमुपसंह्रियते-
नारका: नरकेभ्य: उद्वत्र्य-निर्गत्य केचित् पंचेन्द्रियपर्याप्तसंज्ञिगर्भजतिर्यञ्च: भवन्ति, केचित् पर्याप्तमनुष्या: भवन्ति। सप्तमपृथिव्या: निर्गता: तु नियमेन तिर्यञ्च: व्रूरा: एव।
तिर्यञ्च: चतुर्गतिं गच्छन्ति, केवलं षोडशस्वर्गादुपरि न गच्छंति। मनुष्या: चतुर्गतिषु सर्वत्रापि गच्छन्ति, सिद्धिगतिं चापि। द्रव्यस्त्रियस्तु अधस्तात् षष्ठीभूमिपर्यंतं उपरि षोडशस्वर्गपर्यन्तमेव।
देवा: ईशानस्वर्गपर्यंता: एकेन्द्रिया: अपि भवन्ति। सहस्रारपर्यंता: कदाचित् पंचेन्द्रियतिर्यञ्चो भवन्ति उपरितनात् च्युता: नियमेन मनुष्या: एव भवन्ति।
अतो मनुष्यगतिरेव सर्वोत्तमा वर्तते यत्र गन्तुमिच्छति मानवस्तत्र गन्तुं शक्नोति सिद्धालयं चापि गन्तुं शक्यते। एतज्ज्ञात्वा मनुष्यपर्यायस्य फलं संयमं गृहीत्वा लक्षोपायेनापि अन्त्यसमाधि: साधनीया।
तिर्यग्गतिस्त्वशुभा तिर्यगायु: शुभप्रकृति: कथिता सिद्धान्ते, कथमेतद् वैषम्यं ?

उक्तं च- सादं तिण्णेवाऊ उच्चं णरसुरदुगं च पंचिंदी।
देहा बंधणसंघादंगोवंगाइं वण्णचओ।।४१।।
समचउरवज्जरिसहं उवघादूणगुरुछक्क सग्गमणं।
तसबारसट्ठसट्ठी बादालमभेददो सत्था।।४२।।
घादी णीचमसादं णिरयाऊ णिरयतिरियदुगं जादी-
संठाणसंहदीणं चदुपणपणगं च वण्णचओ।।४३।।
उवघादमसग्गमणं थावरदसयं च अप्पसत्था हु।
बंधुदयं पडि भेदे अडणउदि सयं दुचदुरसीदिदरे।।४४।।

अस्योत्तरं दीयते-
नरकगतिरशुभा तत्र गन्तुं कश्चिदपि न इच्छति तथा च तत्र गत्वा कश्चिदपि तत्र स्थातुमपि नेच्छति सत्त्वरं निर्गन्तुमिच्छति अत: तत्रावस्थानकारणं नरकायुरपि अशुभमेव। तिर्यग्गतौ गन्तुं कश्चिदपि नेच्छति किंतु तत्र गत्वा मर्तुमपि नेच्छति तत्रैव स्थातुं वाञ्छति शुभ नाम्नो नृपतिवत् अत: तिर्यग्गतिस्त्वशुभा, किंतु आयु: शुभमेव।
एतच्छ्रुतं मया महाव्रतदीक्षागुरुवर्यश्रीवीरसागराचार्यप्रवरमुखारविंदेन।
अधुनात्र शुभनृपते: कथा निरूप्यते-
शुभनृपतेराख्यानम्
प्रणम्य परमानंदं श्रीजिनेन्द्रजगद्धितम्। शुभाख्यभूपतेर्वच्मि चरित्रं विरतिप्रदम्।।१।।
मिथिलानगरे राजा शुभो राज्ञी मनोरमा। तयोर्देवरति: पुत्र: संजात: सुगुणाकर:।।२।।
एकदा नगरे तत्र मुनीन्द्रो ज्ञानसंयुत:। नाम्ना देवगुरूर्धीमान्समायात: सुसंघभाक्।।३।।
तदा महीपति: सोपि शुभो भव्यजनै: सह। नत्वा मुनिं जगत्पूज्यं धर्ममाकण्र्य पृष्टवान्।।४।।
अहो मुन क्व मे जन्म भविष्यति विचक्षण। तच्छ्रुत्वा स मुनि: प्राह सुधीर्देवगुरु: स्फुटम्।।५।।
निजवर्चो गृहे राजं-स्त्वं भविष्यसि पापत:। महाक्रमिर्मुनीन्द्राणां मानसे न भयं क्वचित्।।६।।
नगर्याश्च प्रवेशे ते विट्प्रवेशो मुखे ध्रुवम् । छत्रभंगस्तथा विद्धि साभिज्ञानमिति स्फुटम्।।७।।
सप्तमे च दिने भूप विद्युत्पातेन ते क्षय:। भविष्यति भवेदत्र प्राणिनां पापतो न किम्।।८।।
पुरं प्रविशतश्चापि ततस्तस्य महीपते:। रथाश्वचरणोद्घातान्मुखे गूथ: प्रविष्टवान्।।९।।
महावायुप्रवेगेन छत्रभंगोभवत्तदा। दुष्टपापोदये जन्तो: किं किं न स्याद्विरूपकम्।।१०।।
सुतं प्राह ततो भूप: पुत्र वर्चोगृहेऽहकम्। पञ्चवर्ण: कृमि: पापाद्भविष्यामि तदा त्वया।।११।।
स हन्तव्य इति प्रोक्ता भीत्वा विद्युत्प्रपातत:। कारयित्वा महालोह-मंजूषां तां प्रविश्च च।।१२।।
तस्थौ गंगाह्रदे यावत्तावत्सप्तमवासरे। सा मंजूषा स्वपापेन मत्स्येनोच्छादिता द्रुतम्।।१३।।
तस्मिन्नेव क्षणे कष्टं विद्युत्पातेन स प्रभु:। मृत्वा वर्चोगृहे जात: कृमिजन्तु: स्वपापत:।।१४।।
स देवरतिपुत्रेण मार्यमाणो पि विट्चयम्। प्रणश्य गतवानित्थं भुंत्ते जन्तु: स्वकर्मकम्।।१५।।
तदा देवरतेर्वाक्या-च्छ्रुत्वा तद्वृत्तकं जना:। भीत्वा संसारचेष्टाया जिनधर्मे तरां रता:।।१६।।
सोपि देवरतिर्धीमान्महावैराग्यभावत:। विधासय संसृतेर्निन्दां मुनिजातो विचक्षण:।।१७।।
सकलभुवनसारं दत्तसंसारपारं, दुरितशतनिवारं यस्य वाक्यं सुतारम्।
स सृजतु जिनदेवो देवदेवेन्द्रवन्द्यो, निजचरणसुसेवां मुक्तिपर्यन्तमुच्चै:।।१८।।
इति ज्ञात्वा शुभाशुभप्रकृतिभ्यो विरज्य सिद्धपदप्राप्त्यर्थं प्रयत्नो विधेय:।

अब तृतीय स्वर्ग से लेकर बारहवें सहस्रार स्वर्ग के देवों की आगति का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ -

सनत्कुमार से लगाकर शतार-सहस्रार कल्पवासी देवों की गति प्रथम पृथिवी के नारकी जीवों की गति के समान है। केवल यहाँ ‘उद्वर्तित होते हैं’ के स्थान पर ‘च्युत होते हैं’ ऐसा कहना चाहिए।।१९१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका- तृतीय स्वर्ग से लेकर बारहवें स्वर्ग तक के देव दो गति को प्राप्त करते हैं, तिर्यंचगति और मनुष्यगति को। ये देव पंचेन्द्रिय तिर्यंच ही होते हैं, एकेन्द्र्रिय नहीं होते हैं, उनमें भी गर्भज, पर्याप्तक और कर्मभूमिज ही होते हैं। मनुष्यगति में भी लब्यपर्याप्तक मनुष्य, भोगभूमिया या कुभोगभूमिया नहीं होते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

अब आनत स्वर्ग से लेकर सर्वार्थसिद्धि के देवों की आगति का प्रतिपादन करने के लिए ग्यारह सूत्र अवतार लेते हैं -

सूत्रार्थ-

आनत से लगाकर नव ग्रैवेयकविमानवासी देवों में मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देव देवपर्यायों से च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।१९२।।

उपर्युक्त देव केवल एक मनुष्यगति में ही आते हैं।।१९३।।

मनुष्यों में आने वाले उपर्युक्त देव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों मेें नहीं आते।।१९४।।

गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में आने वाले उपर्युक्त देव पर्याप्तकों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं आते।।१९५।। गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्त मनुष्यों में आने वाले उपर्युक्त देव संख्यातवर्षायुष्कों में आते हैं, असंख्यातवर्षायुष्कों में नहीं आते।।१९६।।

आनत से लगाकर नव ग्रैवेयक तक के विमानवासी सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान सहित देवपर्यायों से च्युत नहीं होते।।१९७।।

अनुदिश से लगाकर सर्वार्थसिद्धि तक के विमानवासी असंयतसम्यग्दृष्टि देव देवपर्यायों से च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।१९८।।

उपर्युक्त देव केवल एक मनुष्यगति में ही आते हैं।।१९९।।

मनुष्यों में आने वाले उपर्युक्त देव गर्भोपक्रान्तिकों में आते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं आते।।२००।।

गर्भोपक्रान्तिक मनुष्यों में आने वाले उपर्युक्त देव पर्याप्तकों में आते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं आते।।२०१।।

गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्त मनुष्यों में आने वाले उपर्युक्त देव संख्यातवर्षायुष्कों में आते हैं, असंख्यातवर्षायुष्कों में नहीं आते।।२०२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। आनत आदि स्वर्ग के देवों के और नवग्रैवेयकों के अहमिन्द्रों के-इन शुक्ललेश्या सहित वाले देवों के मनुष्यायु के बिना अन्य आयु का बंध नहीं होता है।

तिलोयपण्णत्तिग्रंथ में कहा भी है-

इससे ऊपर के सब देव शुक्ललेश्या के साथ मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं, इनकी उत्पत्ति तिर्यंचों में नहीं है।।

उसी प्रकार तत्त्वार्थसार में भी कहा है-

ईशान स्वर्ग तक के देव मरकर एकेन्द्रिय तक होते हैं और बारहवें सहस्रार स्वर्ग तक के देव मरकर तिर्यंच भी हो सकते हैं तथा मनुष्य भी हो सकते हैं।।१७०।।

नव अनुदिश विमानों से लेकर अंतिम सर्वार्थसिद्धि पर्यंत सभी देव सम्यग्दृष्टि ही हैं। वे वहाँ से च्युत होकर मनुष्य भव में आकर नियम से स्वर्ग को या मोक्ष को प्राप्त करते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में देवगति की आगति का कथन करने वाले तीस सूत्र पूर्ण हुए।

अब यहाँ चारों गतियों की आगति के प्रकरण का उपसंहार करते हैं- नारकी नरक से निकलकर कोई पंचेन्द्रिय, पर्याप्त, संज्ञी और गर्भज तिर्यंच होते हैं, कोई पर्याप्त मनुष्य होते हैं। सातवीं पृथ्वी से निकलकर नारकी नियम से व्रूर तिर्यंच ही होते हैं।

तिर्यंच मरकर चारों गतियों में जाते हैं, केवल सोलह स्वर्ग के ऊपर नहीं जाते हैं। मनुष्य मरकर चारों गतियों में सर्वत्र भी जाते हैं और सिद्धगति को भी प्राप्त करते हैं। द्रव्य स्त्रियाँ मरकर नरक में छठी भूमि तक ही जाती हैं और ऊपर में सोलह स्वर्र्ग तक ही जाती हैं।

ईशान स्वर्गपर्यंत के देव च्युत होकर एकेन्द्रिय भी हो सकते हैं। सहस्रार स्वर्ग तक के देव कदाचित् पंचेन्द्रिय तिर्यंच भी हो सकते हैं। इनसे ऊपर के स्वर्ग के देव वहाँ से च्युत होकर नियम से मनुष्य ही होते हैं। इसलिए मनुष्यगति ही सर्वोत्तम है। मनुष्य जहाँ जाना चाहता है, वहाँ जा सकता है, सिद्धालय को भी प्राप्त कर सकता है, ऐसा जानकर मनुष्य पर्याय का फल संयम है, अत: उसे ग्रहण कर लाखों उपाय करके भी अन्त में समाधि की सिद्धि करनी चाहिए।

शंका -तिर्यंचगति अशुभ है और तिर्यंचायु शुभ है, ऐसा सिद्धान्तग्रंथ में कहा है, ऐसी विषमता क्यों है ? गोम्मटसार कर्मकाण्ड में कहा भी है-

सातावेदनीय, तीन आयु, उच्च गोत्र, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, पञ्चेन्द्रियजाति, पाँच शरीर, पाँच बंधन, पाँच सङ्घात, तीन अङ्गोपाङ्ग, वर्णचतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, वङ्कार्षभनाराचसंहनन, उपघात बिना अगुरुलघुषट्क, प्रशस्तविहायोगति, त्रस आदि बारह ये अड़सठ प्रकृतियाँ भेदविवक्षा से हैं तथा अभेदविवक्षा से पुण्यप्रकृतियाँ ४२ ही हैं।।४१-४२।।

विशेषार्थ- उपर्युक्त गाथा में कथित पुण्यप्रकृतियों में जो तीन आयु कही हैं, वे तिर्यंच, मनुष्य और देवायु जानना। वर्णचतुष्क में-वर्ण-गंध-रस और स्पर्श है, किन्तु यहाँ शुभरूप वर्णादि चतुष्क को ही ग्रहण करना। इनके भेद करने पर वर्ण ५, गंध २, रस ५ और स्पर्श ८, इस प्रकार २० भेद होते हैं, सो यह कथन भेदविवक्षा से है, किन्तु अभेदविवक्षा में शुभरूप वर्णादि चार ही ग्रहण के योग्य हैं। उपघात के बिना अगुरुलघुषट्क अर्थात् अगुरुलघु-परघात-उच्छ्वास-आतप और उद्योत ये ५ प्रकृतियाँ जानना। त्रस आदि १२ प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर। भेदविवक्षा से तो ६८ प्रकृतियाँ कहीं और अभेदविवक्षा से ४२ प्रकृतियाँ कहीं सो इसका अभिप्राय यह है कि पाँच बंधन और ५ सङ्घात, पाँच शरीरों के अविनाभावी हैं अत: इनको पृथक् नहीं गिनने से १० प्रकृति तो ये एवं वर्णादि की २० में से सामान्य से वर्णचतुष्क कहने पर १६ प्रकृतियाँ वे कम हो गई हैं। इस प्रकार इन २६ प्रकृतियों को कम कर देने पर अभेदविवक्षा से ४२ ही प्रकृतियाँ रहती हैं एवं भेदविवक्षा से इन १६ का भी कथन होने से ६८ प्रकृतियाँ हो जाती हैं। यहाँ पृथक्-पृथक् रूप से नाम गिनाकर पुण्य (प्रशस्त) प्रकृतियों का कथन किया गया है। इसी बात को एक संक्षिप्त सूत्र द्वारा तत्त्वार्थसूत्र में उमास्वामी आचार्य ने कहा है ‘‘सातावेदनीय, शुभ आयु, नामकर्म की शुभ प्रकृतियाँ तथा शुभगोत्र (उच्चगोत्र) ये पुण्यरूप हैं।’’

घातियाकर्म की ४७ प्रकृति तथा नीचगोत्र, असातावेदनीय, नरकायु, नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगति-तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, जाति ४, संस्थान ५, संहनन ५, (अशुभ) वर्णचतुष्क, उपघात, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावरादि १० ये अप्रशस्त (पाप) प्रकृतियाँ हैं। भेदविवक्षा से बंधरूप ९८ प्रकृतियाँ एवं उदयरूप १०० प्रकृतियाँ हैं। अभेदविवक्षा से वर्णादि की १६ प्रकृति घटाने पर बंधरूप ८२ और उदयरूप ८४ प्रकृतियाँ हैं, ऐसा जानना।।४३-४४।। विशेषार्थ-यहाँ अप्रशस्तप्रकृतियों में घातिया कर्मों की प्रकृतियाँ कही गई हैं, सो घातियाकर्म तो अप्रशस्तरूप ही हैं। उनकी ४७ प्रकृतियाँ-ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ९, मोहनीय २८ और अन्तराय की ५ हैं तथा नीचगोत्र, असातावेदनीय, नरकायु, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगति, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रियादि ४ जाति, समचतुरस्रसंस्थान बिना न्यग्रोधमण्डलादि ५ संस्थान, वङ्कार्षभनाराच बिना वङ्कानाराचादिक ५ संहनन, अशुभवर्ण-गंध-रस-स्पर्श, उपघात, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय और अयशस्कीर्ति इस प्रकार वर्णादि की १६ कम करने पर उदयापेक्षा ८४ प्रकृतियाँ तथा घातियाकर्म की ४७ में से सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति कम कर देने से बंधापेक्षा ८२ प्रकृतियाँ अप्रशस्त रूप से कहीं हैं। भेद विवक्षा से वर्णादि की १६ मिलने पर बंधापेक्षा ९८ एवं उदयापेक्षा सम्यग्मिथ्यात्व व सम्यक्त्वप्रकृति मिलने से १०० प्रकृतियाँ पापरूप (अप्रशस्त) कही हैं।

समाधान -इसका उत्तर देते हैं-नरकगति अशुभ है क्योंकि वहाँ कोई भी जाना नहीं चाहता है और वहाँ जाकर कोई भी वहाँ रहना नहीं चाहता है शीघ्र ही वहाँ से निकलना चाहता है, इसलिए वहाँ रहने के लिए कारणभूत ऐसी नरकायु भी अशुभ ही है तथा तिर्यंचगति में कोई भी जाना नहीं चाहता है किन्तु वहाँ जाने के बाद कोई मरना भी नहीं चाहता है, वहीं पर रहना चाहता है ‘शुभ नाम’ के राजा के समान, इसलिए तिर्यंचगति तो अशुभ है, किन्तु आयु तो शुभ ही है।

मैंने यह महाव्रतदीक्षाप्रदाता गुरुवर्य श्री वीरसागर आचार्यदेव के मुखारविन्द से सुना है।

अब यहाँ उन शुभ राजा की कथा निरूपित करते हैं-

जगत के हितकर्ता, परमानंदस्वरूप श्री जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार करके मैं विरतिप्रद ऐसे शुभ राजा का चरित्र कहता हूँ।

मिथिला नगर के राजा शुभ की रानी मनोरमा के देवरति नाम का एक पुत्र था। देवरति गुणवान और बुद्धिमान था। किसी प्रकार का दोष या व्यसन उसे छू तक न गया था।

एक दिन देवगुरु नाम के अवधिज्ञानी मुनिराज अपने संघ को साथ लिये मिथिला में आये। शुभ राजा तब बहुत से भव्यजनों के साथ मुनि पूजा के लिए गया। मुनिसंघ की सेवा पूजा कर उसने धर्मोपदेश सुना। अन्त में उसने अपने भविष्य के संबंध का मुनिराज से प्रश्न किया-योगीराज, कृपाकर बतलाइये कि आगे मेरा जन्म कहाँ होगा ? उत्तर में मुनि ने कहा-राजन्, सुनिए! पापकर्मों के उदय से तुम्हें आगे के जन्म में तुम्हारे ही पाखाने में एक बड़े कीड़े की देह प्राप्त होगी, शहर में घुसते समय तुम्हारे मुँह में विष्टा प्रवेश करेगा, तुम्हारा छत्रभंग होगा और आज के सातवें दिन बिजली गिरने से तुम्हारी मौत होगी। सच है, जीवों के पाप के उदय से सभी कुछ होता है। मुनिराज ने ये सब बातें राजा से बड़े निडर होकर कहीं और यह ठीक भी है कि योगियों के मन में किसी प्रकार का भय नहीं रहता।

मुनि का शुभ के संबंध का भविष्य कथन सच होने लगा। एक दिन बाहर से लौटकर जब वे शहर में घुसने लगे तब घोड़े के पाँवों की ठोकर से उड़े हुए थोड़े से विष्टा का अंश उनके मुँह में आ गिरा और यहाँ से वे थोड़े ही आगे बढ़े होंगे कि एक जोर की आँधी ने उनके छत्र को तोड़ डाला। सच है, पापकर्मों के उदय से क्या नहीं होता ? उन्होंने तब अपने पुत्र देवरति को बुलाकर कहा-बेटा, मेरे कोई ऐसा पापकर्म का उदय आवेगा, उससे मैं मरकर अपने पाखाने में पाँच रंग का कीड़ा होऊँगा, सो तुम उस समय मुझे मार डालना। इसलिए कि फिर मैं कोई अच्छी गति प्राप्त कर सकू। उक्त घटना को देखकर शुभ को यद्यपि यह एक तरह से निश्चय सा हो गया था कि मुनिराज की कही बातें सच्ची हैं और वे अवश्य होंगी पर तब भी उनके मन में कुछ - कुछ संदेह बना रहा और इसी कारण बिजली गिरने के भय से डरकर उन्होंने एक लोहे की बड़ी मजबूत संदूक मंगवाई और उसमें बैठकर गंगा के गहरे जल में उसे रख आने को नौकरों को आज्ञा की। इसलिए कि जल में बिजली का असर नहीं होता। उन्हें आशा थी कि मैं इस उपाय से रक्षा पा जाऊँगा। पर उनकी यह बेसमझी थी। कारण प्रत्यक्षज्ञानियों की कोई बात कभी झूठी नहीं होती। जो हो, सातवाँ दिन आया। आकाश में बिजलियाँ चमकने लगीं। उसी समय दुर्भाग्य से एक बड़े मच्छ ने राजा के उस सन्दूक को एक ऐसा जोर का उथेला दिया कि सन्दूक जल से बाहर दो हाथ ऊँचे तक उछल आई। सन्दूक का बाहर होना था कि इतने में बड़े जोर से कड़क कर उस पर बिजली आ गिरी। खेद है कि उस बिजली के गिरने से राजा अपने यत्न मेें कामयाब न हुए और आखिर वे मौत के मुँह में पड़ ही गये। मरकर वह मुनिराज के कहे अनुसार पाखाने में कीड़ा हुए। पिता के कहे अनुसार जब देवरति ने जाकर देखा तो सचमुच एक पाँच रंग का कीड़ा उसे देख पड़ा और तब उसने उसे मार डालना चाहा। पर जैसे ही देवरति ने हाथ का हथियार उसके मारने को उठाया, वह कीड़ा उस विष्टा के ढ़ेर में घुस गया। देवरति को इससे बड़ा ही अचम्भा हुआ। उसने जिन-जिनसे इस घटना का हाल कहा, उन सबको संसार की इस भयंकर लीला को सुनकर बड़ा डर मालूम हुआ। उन्होंने तब संसार का बंधन काट देने के लिए जैनधर्म का आश्रय लिया, कितनों ने सब माया-ममता तोड़ जिनदीक्षा ग्रहण की और कितनों ने अभ्यास बढ़ाने को पहले श्रावकों के व्रत ही लिये।

देवरति को इस घटना से बड़ा अचम्भा हो रहा था, सो एक दिन उसने अवधिज्ञानी मुनिराज से इसका कारण पूछा-भगवन्, क्यों तो मेरे पिता ने मुझसे कहा कि मैं विष्टा में कीड़ा होऊँगा सो मुझे तू मार डालना और जब मैं उस कीड़े को मारने जाता हूँ तब वह भीतर ही भीतर घुसने लगता है। मुनि ने इसके उत्तर में देवरति से कहा - भाई, जीव गतिसुखी होता है। फिर चाहे वह कितनी ही बुरी से बुरी जगह भी क्यों न पैदा हो। वह उसी में अपने को सुखी मानेगा, वहाँ से कभी मरना पसंद न करेगा। यही कारण है कि जब तक तुम्हारे पिता जीते थे, तब तक उन्हें मनुष्य जीवन से प्रेम था, उन्होंने न मरने के लिए यत्न भी किया, पर उन्हें सफलता न मिली और ऐसी उच्च मनुष्यगति से वे मरकर कीड़ा होंगे, सो भी विष्टा में, इसका उन्हें बहुत खेद था। पर अब उन्हें वही जगह अत्यन्त प्यारी है, वे मरना पसन्द नहीं करते, इसलिए जब तुम इस कीड़े को मारने जाते हो, तब वह भीतर घुस जाता है। इसमें आश्चर्य और खेद करने की कोई बात नहीं। संसार की स्थिति ही ऐसी है। मुनिराज द्वारा यह मार्मिक उपदेश सुनकर देवरति को बड़ा वैराग्य हुआ। वह संसार को छोड़कर इसलिए कि उसमें कुछ सार नहीं है, मुनिपद स्वीकार कर आत्महित साधक योगी हो गया।

जिनके वचन पापों के नाश करने वाले हैं, सर्वोत्तम है और संसार का भ्रमण मिटाने वाले हैं, वे देवों द्वारा पूजे जाने वाले जिन भगवान् मुझे तब तक अपने चरणों की सेवा का अधिकार दें, जब तक कि मैं कर्मों का नाश कर मुक्ति प्राप्त न कर लूँ।

यहाँ ऐसा जानकर शुभ - अशुभ प्रकृतियों से विरक्त होकर सिद्धपद की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए।